लोकसभा चुनाव 2024: पहले और दूसरे चरण की वोटिंग के आंकड़ों में देरी पर क्यों उठ रहे हैं सवाल

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- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत में लोकसभा चुनाव को लेकर सरगर्मी लगातार बढ़ रही है. सत्ता पक्ष और विपक्ष में आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी जारी है.
लेकिन इन सबके बीच अब विपक्ष ने चुनाव आयोग की मंशा पर भी सवाल उठा दिए हैं.
मामला है दो चरणों के मतदान के आँकड़ें जारी करने में हुई देरी.
विपक्ष का तर्क है कि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ. कई विपक्षी नेताओं को लगता है कि चुनाव आयोग का क़दम शक पैदा करता है.
कांग्रेस ने कहा है कि लोकसभा चुनाव के पहले और दूसरे चरण के मतदान के अंतिम आंकड़े की जानकारी देने में देरी 'अस्वीकार्य' है और ऐसा पहले कभी नहीं हुआ.
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने बुधवार को प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहा कि अब जब आँकड़े जारी कर दिए गए हैं, उन्हें उम्मीद है कि चुनाव के बचे हुए चरणों में ऐसा नहीं होगा.
लोकसभा चुनाव के पहले और दूसरे चरण के मतदान के अंतिम आँकड़ों में देरी की विपक्षी दलों ने आलोचना की है.
19 अप्रैल को पहले चरण और 26 अप्रैल को दूसरे चरण के मतदान के आख़िरी आँकड़े 30 अप्रैल को जारी किए गए थे, जबकि जानकारों के मुताबिक़ ये काम वोटिंग ख़त्म होने के 24 घंटों या फिर उससे कुछ समय बाद ही जारी हो जाता है.
विपक्ष आँकड़ों के जारी करने में देरी को लेकर शक जता रहा है.
विपक्षी नेताओं के आरोप

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दरअसल, 30 अप्रैल को जारी आँकड़ों में चुनाव आयोग ने बताया कि पहले चरण में 102 संसदीय सीटों पर 66.14 प्रतिशत और दूसरे चरण में 88 सीटों पर 66.71 प्रतिशत वोट पड़े.
हालाँकि 19 अप्रैल की शाम चुनाव आयोग ने बताया था कि शाम सात बजे तक 60 प्रतिशत से अधिक वोट पड़े.
26 अप्रैल को चुनाव आयोग ने बताया था कि उस दिन शाम सात बजे तक 88 संसदीय क्षेत्रों में हुए मतदान में क़रीब 61 प्रतिशत मत पड़े.
लेकिन आख़िरी आँकड़े 30 अप्रैल को जारी किए गए.
जानकारों के मुताबिक़ वोटिंग वाले दिन शाम तक चुनाव आयोग एक मोटा आँकड़ा जारी करता है जिसे और सूचना आने के बाद उसमें सुधार किया जाता है और फिर अगले कुछ घंटों में मतदान का अंतिम आँकड़ा जारी किया जाता है.
30 अप्रैल को चुनाव आयोग के आँकड़े जारी करने से पहले जयराम रमेश ने ट्वीट करके कहा था, "ऐसा पहली बार हो रहा है कि पहले चरण के मतदान के 11 दिन बाद और दूसरे चरण के चार दिन बाद भी चुनाव आयोग ने मतदान प्रतिशत का अंतिम डेटा जारी नहीं किया है."
उन्होंने कहा, "पहले चुनाव आयोग मतदान के तुरंत बाद या 24 घंटों के भीतर मतदान प्रतिशत का अंतिम डेटा जारी करता था. चुनाव आयोग की वेबसाइट पर केवल अनुमानित रुझान के आँकड़े ही उपलब्ध हैं. इस देरी का कारण क्या है?"
विपक्षी सीपीएम नेता सीताराम येचुरी ने भी कहा था कि ये बहुत परेशान करने वाला है. इससे नतीजों में गड़बड़ी का गंभीर शक़ पैदा होता है.
चुनाव आयोग के आँकड़े प्रतिशत में जारी किए थे जिस पर सीताराम येचुरी ने पूछा कि प्रतिशत के बजाए डाले गए वोटों की संख्या क्यों नहीं बताई गई है.
उनका कहना था कि जब तक संख्या की जानकारी न हो, प्रतिशत का कोई मतलब नहीं है.
'नतीजों में गड़बड़ी का शक'

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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी चुनाव आयोग की मंशा पर सवाल उठाए हैं.
उन्होंने चुनाव आयोग से पूछा है कि आख़िर डेटा देने में इतनी देरी क्यों हुई है?
ममता बर्नजी ने एक चुनावी रैली में न सिर्फ़ चुनाव आयोग को घेरा बल्कि ईवीएम की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए.
टीएमसी के सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने ट्वीट कर पूछा है कि दूसरे चरण के मतदान के चार दिन बाद चुनाव आयोग के अंतिम आँकड़ों में 5.75 प्रतिशत की बढ़त "क्या सामान्य है, क्या मैं कुछ मिस कर रहा हूँ?"
दूसरी ओर पूर्व चुनाव आयुक्त एन गोपालास्वामी मानते हैं कि चुनाव आयोग की ओर से अंतिम आँकड़ो में देरी की बात ग़लत है.
वो कहते हैं, "दस दिन की देरी का सवाल ही कहाँ पैदा होता है? आप क्या बात कर रहे हैं? मैं मतदान के कुल आँकड़ों की बात कर रहा हूँ."
वो कहते हैं इस बार एक नए ऐप पर वोटिंग बूथ से आ रही हर घंटे की जानकारी दी गई और पीठासीन अधिकारी को उस ऐप पर जानकारी देनी थी, और हो सकता हो कि कुछ हद तक जानकारी न आ पाई हो.
गोपालास्वामी बताते हैं कि पुष्ट चुनावी संख्या तब उपलब्ध होती है, जब वोटिंग के अंत में फ़ॉर्म 17C को जमा किया जाता है. इस फ़ॉर्म पर डाले गए वोटों की कुल संख्या होती है.
अगर अब इस साल के जारी आँकड़े की तुलना साल 2019 में चुनाव आयोग की ओर से जारी आँकड़ों से करें तो उस साल पहले चरण का चुनाव 11 अप्रैल को हुआ और 13 अप्रैल को चुनाव के बारे में कई तरह के आँकड़े जारी किए गए थे.
इनमें डाले गए वोटों की संख्या शामिल है.
चुनाव आयोग सवालों के घेरे में?

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चुनाव विश्लेषक और राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्राओं में शामिल रहे योगेंद्र यादव के मुताबिक़ कभी-कभी सुधार किए गए आँकड़ों में चार-पाँच प्रतिशत तक का भी फ़र्क आ जाता है.
वो कहते हैं, "आमतौर पर (वोटिंग के) अगले दिन सुबह या शाम पाँच छह बजे तक आख़िरी आँकड़ा जारी कर दिया जाता है जिसमें हर मतदान क्षेत्र में कुल मत, कुल पुरुष और महिलाएँ, और कुल कितने वोट पड़े, और कितने पुरुषों और महिलाओं ने वोट डाले, इसके साथ ही इस बारे में राज्य स्तर का औसतन आँकड़ा दिया जाता है."
इस बार कई दिनों तक ऐसा नहीं हुआ है. आरोप ये भी है कि चुनाव आयोग ने 30 अप्रैल को 'द हिंदू' अख़बार में इस बारे में एक ख़बर छपने और राजनीतिक आलोचना के बाद आँकड़े जारी किए.
चुनाव आयोग ने बहुत सी जानकारी अपने मोबाइल ऐप के माध्यम से भी साझा की है.
30 अप्रैल को चुनाव आयोग ने संसदीय क्षेत्रों और राज्य स्तर पर पहले और दूसरे चरण के वोट प्रतिशत के भी आँकड़े जारी किए थे.
योगेंद्र यादव के मुताबिक चुनाव आयोग का अंतिम मत आँकड़ों के जारी करने में देरी और मतों की संख्या का जारी न करना 'असाधारण' है.
योगेंद्र यादव के मुताबिक़ जब मतों की संख्या करोड़ों में हो, तो प्रतिशत में एक छोटा सा बदलाव भी बहुत बड़ी छाप छोड़ सकता है.
वो कहते हैं कि ये मामला कार्यक्षमता से जुड़ा मामला नहीं है बल्कि इससे 'गहरा शक' पैदा होता है.
चुनाव आयोग को बीबीसी ने इस बारे में सवाल भेजे है और जवाब मिलने पर उसे कहानी में शामिल किया जाएगा.
हालाँकि चुनाव आयोग के एक अधिकारी ने बताया, "जितना मुझे पता है हमेशा से वोटर टर्नआउट प्रतिशत में ही आता है. पिछले राज्यों के चुनाव में आपने ये सवाल नहीं पूछा?"

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उधर, पूर्व चुनाव आयोग वीएस संपत को नहीं लगता कि चुनाव आयोग कोई गड़बड़ी कर सकता है और ये आलोचना 'अवास्तविक' है.
वो कहते हैं, "आमतौर पर हमें ज़्यादातर जानकारी वोटिंग वाले दिन ही मिल जाती है और जो दूर के इलाक़े होते हैं, वहाँ से थोड़ी जानकारी देर से आ सकती है."
"लेकिन आमतौर पर वोटिंग के 24 घंटों के भीतर ही सभी जानकारी आ जाती है. अगर जानकारी मिलने में उससे ज़्यादा समय लगता है तो ये उनकी अक्षमता दर्शाता है. लेकिन मुझे नहीं लगता कि वो कोई ग़लत काम कर सकते हैं."
वोटों की संख्या की बजाय प्रतिशत में जानकारी मिलने पर वीएस संपत कहते हैं कि जिन्हें ये जानकारी चाहिए वो चुनाव आयोग से ये जानकारी मांग सकते हैं.
संपत के मुताबिक़, ये सब कुछ चुनाव आयोग में 'थोड़ा अविश्वास' दिखाता है.
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