लोकसभा चुनाव: स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदान पर विपक्ष की चिंताएं कितनी सच हैं

विपक्षी गठबंधन

इमेज स्रोत, Sanjeev Verma/Hindustan Times via Getty Images

    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, बेंगलुरु से

कुछ हफ़्ते पहले जब चुनावी मौसम शुरू हुआ उसके बाद से कोई भी दिन ऐसा नहीं गुजरा जब विपक्षी पार्टियों और उनके नेताओं को बेचैनी न महसूस हुई हो.

एक नेता ने केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाइयों के बारे में कुछ इसी तरह का संकेत देते हुए कहा कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), इनकम टैक्स और सीबीआई जैसी केंद्र सरकार की एजेंसियां 'राजनीतिक मक़सद के लिए जांच' के अपने हुनर को तेज़ कर रही हैं.

विपक्ष के कुछ नेताओं को लगता है कि 2024 का लोकसभा चुनाव लड़ना उनके करियर का सबसे चुनौतीपूर्ण इलेक्शन होगा.

विपक्ष का तर्क है कि जिस तरीक़े से हेमंत सोरेन और अरविंद केजरीवाल की गिरफ़्तारी, केंद्रीय एजेंसियों पर विपक्ष के ख़िलाफ़ कार्रवाई, चुनाव की तारीख़ें घोषित होने के बाद कांग्रेस और अन्य पार्टियों के बैंक खाते फ़्रीज करने जैसी घटनाओं ने चुनावों के स्वतंत्र और निष्पक्ष होने की चिंताएं बढ़ा दी हैं.

यह चिंता इस स्तर पर पहुंच चुकी है कि राहुल गांधी जैसे नेता सार्वजनिक तौर पर कह चुके हैं कि यह चुनाव 'फ़िक्स' है जैसे क्रिकेट में मैच फ़िक्सिंग होती है.

यह अजीब लग सकता है लेकिन 1977 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अचानक इमरजेंसी हटा ली और चुनावों की घोषणा की तब भी ऐसी चिंताएं ज़ाहिर नहीं की गई थीं.

लेकिन राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव मौजूदा हालात के बारे में बिल्कुल स्पष्ट हैं.

उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा, "आज़ाद भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है कि आम चुनाव सबसे कम स्वतंत्र और निष्पक्ष होंगे."

योगेंद्र यादव का आकलन कितना सही है?

योगेंद्र यादव

इमेज स्रोत, Getty Images

राजनीतिक टिप्पणीकार शीतल पी सिंह कहते हैं, "राजनीति पर नज़र रखने वाले कह रहे हैं कि विपक्षी पार्टियों के लिए यह बराबरी का मुकाबला नहीं है. उदाहरण के लिए कांग्रेस का खाता फ़्रीज हो गया है. हर कोई जानता है कि चुनाव में पैसे खर्च होते हैं. कम्युनिस्ट पार्टियों को छोड़ दें तो हर पार्टी चुनाव आयोग की ओर से निर्धारित राशि से अधिक खर्च करती है."

"सत्तारूढ़ पार्टी के नेता जो अहम पदों पर बैठे हैं वो विमानों में सवार होकर प्रचार कर रहे हैं. क्या कभी इसकी जांच हो सकती है?"

सिंह एक दूसरा उदाहरण देते हैं, "उत्तर प्रदेश में एक डीएम ने लोगों से वाराणसी में आरएसएस के एक कार्यक्रम में जाने के लिए कहा, जबकि उनकी ज़िम्मेदारी पड़ोसी ज़िले की थी. उनकी अपील का वीडियो बाहर आया और बड़े पैमाने पर साझा किया गया."

"जिस अधिकारी पर निष्पक्ष चुनाव कराने की ज़िम्मेदारी उससे आप किस निष्पक्षता की क्या उम्मीद कर सकते हैं? चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश के गृह सचिव को तो बदल दिया है. लेकिन डीएम को नहीं. सबको बराबर अवसर नहीं दिया जा रहा है."

'ईवीएम से छेड़छाड़ तार्किक दलील नहीं'

राहुल गांधी

इमेज स्रोत, ANI

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

बेंगलुरु यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के रिटायर्ड प्रोफ़ेसर पीएस जयरामू ने बीबीसी हिंदी से कहा, "ये बराबरी का मुकाबला नहीं है. बीजेपी चुनाव लड़ने में विपक्ष को असहज करन वाली चीजें कर रही है."

लेकिन प्रोफ़ेसर जयरामू राहुल गांधी की टिप्पणी से भी पूरी तरह सहमत नहीं हैं.

वो कहते हैं, "कुछ हद तक चिंताएं वाजिब हैं. मैच फ़िक्सिंग वाला राहुल गांधी का बयान ग़ैर ज़रूरी था, बल्कि अनअपेक्षित था. जब एक पार्टी चुनाव लड़ रही हो तो उसे मौजूदा हालात से पार पाना होता है और चुनाव लड़ना होता है."

जाने-माने राजनितिक टिप्पणीकार डॉ. संदीप शास्त्री भी चुनाव समिति में सदस्य के बतौर बिना सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस की मौजूदगी के, दो चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, ईडी की कार्रवाईयां और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ़्तारी का उदाहरण देते हैं.

ये पूछे जाने पर कि क्या विपक्षी पार्टियों की ओर से मैच फ़िक्सिंग का आरोप हार का संकेत है, डॉ. शास्त्री कहते हैं, "ये इस पर निर्भर करता है कि बराबरी के मुकाबले को लेकर क्या नज़रिया अपनाते हैं. अगर विपक्ष कह रहा है कि ईवीएम में छेड़छाड़ की जाती है, यह कोई तार्किक दलील नहीं है. कुछ मशीनें ख़राब हो सकती हैं लेकिन छेड़छाड़ वाली नहीं. अगर इसमें छेड़छाड़ हुई थी तो विधानसभा चुनावों में विपक्षी पार्टियों की जीत संभव नहीं होगी."

नैरेटिव गढ़ने की चुनौती

रामलीला मैदान रैली

इमेज स्रोत, Getty Images

कुछ राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि विपक्ष को बराबरी के अवसर नहीं मिल रहें, इस बात के संकेत मिल रहे हैं.

डॉ. शास्त्री और जाने माने पत्रकार और विश्लेषक आशुतोष का कहना है कि इन मुद्दों पर विपक्ष कितने प्रभावी तरीके को जनता के सामने पेश करेगा वो अहम बात है.

आशुतोष कहते हैं, "विपक्ष इन मुद्दों को जनता में कैसे ले जाता है, ये सबसे बड़ी चुनौती है."

डॉ. शास्त्री मानते हैं कि "ध्रुवीकरण वाली इस राजनीति में ये मुद्दे मतदाता के नज़रिए के आधार पर ही दलीलों को मजबूत करेंगे. जो लोग सत्तारूढ़ पार्टी का समर्थन करते हैं, वे नहीं मानेंगे कि बराबरी का मुकाबला नहीं है. और सत्तारूढ़ दल का विरोध करने वाले मानेंगे कि बराबरी का मुकाबला नहीं है. ये सब कुछ इस पर निर्भर करता है कि विपक्ष किस तरह इस नैरेटिव को गढ़ता है. फ़िलहाव कोई केंद्रित रणनीति नहीं है."

शीतल पी सिंह इस बात से सहमत हैं कि विपक्षी पार्टियों की ओर से कोई नैरेटिव पेश नहीं किया गया है. लेकिन वो कहते हैं कि जब मीडिया और सोशल मीडिया नियंत्रित हो तो एक नैरेटिव बनाना मुश्किल है.

वो कहते हैं, "विपक्ष की ओर से कोई एकजुट एक्शन भी नहीं लिया गया और ना ही कोई साझा नारा दिया गया. दूसरी तरफ़, दुनिया में बीजेपी के अलावा ऐसी कोई राजनतिक पार्टी नहीं है जिसने चुनाव में अपनी बढ़त के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया हो. पार्टी के पास पैसे की ताक़त भी है."

नरेंद्र मोदी

इमेज स्रोत, ANI

लेकिन आशुतोष एक अलग बात की ओर इशारा करते हैं.

वो कहते हैं, "इस चुनाव में बीजेपी राष्ट्रव्यापी स्तर पर एक नैरेटिव बनाने में असफल रही. अयोध्या का प्रयोग करने की कोशिश की गई लेकिन चुनाव से काफ़ी पहले हो गया. अब सरकार भ्रष्टाचार का प्रयोग कर रही है, मुझे नहीं लगता इसका को ख़ास असर होगा. साल 2019 में बीजेपी बालाकोट के इर्दगिर्द एक नैरेटिव बनाने में सफल रही थी. अब वो अपनी सरकार की उपलब्धियां गिना रही हैं लेकिन यह लोगों का ध्यान नहीं खींच पा रहा."

आशुतोष कहते हैं कि बीजेपी मुख्य तौर पर मोदी की छवि पर निर्भर है.

वे कहते हैं, "बीजेपी कहती है कि मोदी ने देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा दिलाई. यह उनके लिए काम कर रहा है. पार्टी कहती है कि उन्होंने 80 करोड़ लोगों को खाना दिया है. लेकिन इससे केवल बीजेपी वोट ही एकजुट होंगे, उसके समर्थक बढ़ेंगे नहीं."

आशुतोष कहते हैं कि लोगों के लिए बस रोटी ही मायने रखती है लेकिन ज़मीन पर बेरोज़गारी बहुत बड़ा मुद्दा है और केवल तेजस्वी यादव ही बिहार में इस पर बात कर रहे हैं.

डॉ. शास्त्री कहते हैं कि बराबरी के मुकाबले की दलील एक असमंजस वाला सवाल है.

वो कहते हैं, "अगर आप बराबरी का मुकाबला चाहते हैं तो आपके पास सही बल्लेबाज़ और गेंदबाज़ होने चाहिए.

इसके बाद वो वेस्ट इंडीज़ के महान बल्लेबाज़ विवियन रिचर्ड्स की मिसाल देते हैं.

डॉ. शास्त्री कहते हैं, "जब रिचर्ड्स बल्लेबाज़ी करने आते थे तो कहा जाता था कि प्रतिद्वंद्वी कैप्टन अपने गेंदबाज़ से कहता था कि चाहे जिस तरह गेंद डालो, यह आदमी गेंद को मारेगा. इसलिए विकल्प ये है कि रिचर्ड्स की ग़लती या थकने का इंतज़ार करो और विकेट लो. भारतीय विपक्ष का भी यही हाल है."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)