जेएनयू छात्रसंघ चुनावः क्या लेफ़्ट के क़िले में एबीवीपी लहरा पाएगा झंडा- ग्राउंड रिपोर्ट

जेएनयू छात्र संघ चुनाव

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    • Author, अंशुल सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

कभी विवादों तो कभी सुर्खियों में रहने वाली भारत के शीर्ष शिक्षण संस्थानों में शामिल जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी राजनीतिक रंग में डूबी है.

झेलम हॉस्टल लॉन में मंच सजा है, कैंपस में हर ओर से छात्र इस तरफ़ आ रहे हैं और सामने लगे शामियाने के नीचे छात्रों की भीड़ बढ़ती जा रही है. सुरक्षा के लिए जगह-जगह गार्ड तैनात हैं.

ढपली और ढोल की आवाज़ों के बीच रह-रह कर नारे सुनाई दे रहे हैं. जय श्री राम के नारों में लाल सलाम की धुन घुल रही है.

हवा में लहराते भगवा झंड़ों के ठीक बगल में ‘जय भीम’ के नारे और हाथ में नीला झंडा.

इन दोनों के ठीक सामने महज़ दो क़दम की दूरी पर ‘लाल सलाम’ जैसे नारे के शोर के बीच ‘जय मंडल, जय समाजवाद’ की गूंज’.

जैसे-जैसे रात बढ़ रही है, जेएनयू छात्रसंघ चुनाव की प्रेजिडेंशियल डिबेट यानी अध्यक्ष पद के उम्मीदवारों के बीच होने वाली खुली बहस को लेकर उत्साह बढ़ता जा रहा है.

मैं मंच के बगल में खड़ा हूँ. एक छात्रा एक दृष्टिबाधित छात्रा का हाथ थामे धीमे और सावधान क़दमों से बढ़ी चली आ रही है. ये दोनों छात्राएं उम्मीदवारों के भाषण सुनने को लेकर उत्साहित हैं.

अनन्या मूलरूप से ओडिशा की रहने वाली हैं और एमए की छात्रा हैं. अभी उन्हें जेएनयू कैंपस में आए एक साल भी नहीं हुआ है लेकिन अब वो अपने आप को पहले से अधिक स्वतंत्र महसूस करती हैं.

अनन्या कहती हैं, “यहां मैं बापसा छात्र संगठन की विचारधारा के संपर्क में आई हूं और मुझे लगता है कि अब मैं अपने समाज के मुद्दों को और बेहतर तरीक़े से समझती हूँ.”

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उनका हाथ थामे दृष्टिबाधित छात्रा पूजा कहती हैं, “मैं पिछले साल ही झारखंड से यहाँ आई हूँ और इंटरनेशनल स्टडीज में एमए फर्स्ट इयर की छात्रा हूँ. यहाँ हम जैसे छात्रों के लिए जहाँ बहुत से मौक़े हैं, वहीं चुनौतियां भी हैं. मैं भी बापसा से प्रभावित हूँ और मुझे लगता है कि ये चुनाव हम जैसे डिसेबल छात्रों के मुद्दों को उठाने का भी मौक़ा देते हैं.”

जेएनयू में पिछली बार 2019 में छात्रसंघ चुनाव हुए थे. फिर कोरोना महामारी की वजह से चुनाव नहीं हो सके. अब चार साल बाद फिर से चुनाव हो रहे हैं.

जेएनयू में चार साल बाद हो रहे छात्रसंघ चुनाव ने छात्रों को कैंपस पॉलिटिक्स में हिस्सा लेने का मौक़ा दिया है और इसे लेकर छात्र उत्साहित हैं.

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'प्रेजिडेंशियल डिबेट देखना एक ड्रीम था'

जेएनयू में चार साल चुनाव नहीं हुए और इस दौरान पोस्ट ग्रेजुएशन के दो बैच को छात्र संघ चुनाव में हिस्सा लेने का मौक़ा नहीं मिला.

अब चार साल बाद जब चुनाव हुए तो कहीं छात्र बेहद उत्साहित नज़र आए.

आमिर अहमद एमए फ़र्स्ट ईयर के छात्र हैं. पिछले चार साल से वो जेएनयू में हैं और पहली बार छात्र संघ चुनाव देख रहे हैं.

आमिर कहते हैं, ''सच बात कहूं तो हम लोगों का एक ड्रीम था कि जेएनयू में आने के बाद ये प्रेजिडेंशियल डिबेट और छात्र संघ चुनाव देखने का. पूरे चार साल बाद यह प्रेजिडेंशियल देखने का मौक़ा मिल रहा है और हम कॉमन स्टूडेंट्स के लिए यह बड़ी बात है. यहाँ पर जो डिबेट होती है, उसमें जेएनयू से लेकर पूरी दुनिया के बारे में बात होती है और हम इसे सुनना चाहते हैं. जेएनयू की यही संस्कृति है.''

वीडियो कैप्शन, जेएनयू में बीबीसी डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग के दौरान छात्रों पर पथराव

आमिर की तरह एक और स्टूडेंट हैं, दीपशिखा जो पहली बार छात्रसंघ चुनाव की साक्षी बनने जा रही हैं. दीपशिखा 2022 में जेएनयू आई थीं और अभी डिजास्टर स्टडीज़ में एमए सेकंड ईयर की स्टूडेंट हैं.

छात्रसंघ चुनाव को लेकर वो कहती हैं, ''ये पहली बार चुनाव देख रहे हैं. मैं किसी पार्टी से तो नहीं हूं लेकिन सारी पार्टी काफ़ी मज़बूत हैं. जेएनयू में हॉस्टल, स्कॉलरशिप, फंड और रिसर्च की सीटें में बढ़ोतरी एक बड़ा मुद्दा है.''

एमए सेकंड ईयर में पढ़ने वालीं अंजन इस समय को जेएनयू का सबसे बेहतरीन समय मानती हैं.

अंजन कहती हैं, ''इस टाइम पर जेएनयू अपने ग्लोरी पर है. चार साल बाद यहां चुनाव हो रहे हैं. अब जाकर हमें लग रहा है कि हम रीयल जेएनयू का एक्सपीरियंस कर रहे हैं. यही देखने के लिए हमने एडमिशन लिया है.''

वो कहती हैं कि जिस तरह की राजनीति जेएनयू में हो रही है, उसी तरह की राजनीति वो भारत में भी देखना चाहती हैं.

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बहस में क्या बोले छात्र नेता

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जेएनयू छात्रसंघ के मंच पर अध्यक्ष पद के उम्मीदवारों के बीच तीखी बहस हुई.

सबसे पहले बोलने आईं समाजवादी छात्र सभा की आराधना यादव ने इलेक्टोरल बॉन्ड्स, बीएचयू में गैंगरेप, मनुवाद और विश्वविद्यालयों में पिछड़े वर्ग के अध्यापकों के ना चुने जाने का मुद्दा उठाया. उन्होंने ग़ज़ा के लोगों के संघर्ष की बात भी की.

इसके बाद बारी आई राजद के छात्र संगठन छात्र राजद के उम्मीदवार अफ़रोज़ आलम अंसारी की.

उन्होंने भी पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यक छात्रों के मुद्दे उठाये और ग़ज़ा के लोगों के संघर्ष को सलाम किया.

अफ़रोज़ आलम ने ज़ोर देकर कहा कि कैंपस में अल्पसंख्यक छात्रों के हितों के लिए क़दम उठाये जाने की ज़रूरत है.

अफ़रोज़ ने जेएनयू के लापता छात्र नजीब अहमद को भी याद किया.

वहीं तीसरे नंबर पर बोलने आए बापसा के उम्मीदवार विश्वजीत मिंजी ने कहा कि बहुत से छात्रों के लिए ये चुनाव एक त्योहार है लेकिन बापसा के लिए ये अपने संघर्ष को आगे बढ़ाने का मौक़ा है.

उन्होंने बिरसा मुंडा को सलाम करते हुए अपनी बात शुरू की और मणिपुर से लेकर संदेशखाली तक का मुद्दा उठाया.

वहीं एबीवीपी के उम्मीदवार उमेश चंद्र ने कहा कि वो विकास की राजनीति करना चाहते हैं. उन्होंने आगामी वर्ष में यूनिवर्सिटी में विकास का खाका खींचा और छात्रों की सुविधा के लिए कई क़दम उठाने का वादा किया.

वीडियो कैप्शन, जेएनयू में रामनवमी और मांस खाने पर हुए बवाल के बाद का माहौल

उमेश चंद्र ने कहा, “वामपंथी संगठनों ने यहां सिर्फ़ तानाशाही चलाई है. उन्होंने कभी रचनात्मक काम नहीं किया. वो जेएनयू को राजनीतिक प्लेटफार्म की तरह इस्तेमाल करते हैं. पाँच सौ सालों की गुलामी के प्रतीक को मिटाकर अयोध्या में श्रीराम आएं हैं, उसी तरह से रामजी का आशीर्वाद लेकर मैं जेएनयू की धरती से वामपंथ की लाल गुलामी को उखाड़ने आया हूँ”

वहीं लेफ़्ट यूनिटी यानी वामपंथी समूहों के गठबंधन के उम्मीदवार धनंजय कुमार ने उमर ख़ालिद और जेएनयू के अन्य छात्रों के संघर्ष को याद किया.

धनंजय कुमार ने कहा, “उमर ख़ालिद, शरजील इमाम, मिरान हैदर, इन सबकी रिहाई की मांग हम यहां से करने आए हैं. हम संविधान को मानते हैं, जिसमें लिखा है कि ये देश धर्मनिरपेक्ष है और रहेगा.”

धनंजय कुमार ने कहा, “हम संविधान की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं. जेएनयू पूरी दुनिया में अपने एकेडेमिक एक्सीलेंस, अपनी बहस की संस्कृति और समावेशी प्राकृति के लिए जाना जाता है लेकिन आज सरकार जेएनयू को बदनाम करने की कोशिश कर रही है. ”

कौन-कौन है मैदान में?

यूनिवर्सिटी में अध्यक्ष समेत चार पदों के लिए कुल 19 प्रत्याशी मैदान में हैं. अध्यक्ष के लिए आठ, उपाध्यक्ष के लिए चार, महासचिव के लिए चार और संयुक्त सचिव पद के लिए तीन प्रत्याशी दावेदारी पेश कर रहे हैं.

2019 की तरह इस बार भी लेफ़्ट यूनिटी यानी वामपंथी छात्रों का गठबंधन बना हुआ. इस यूनिटी में स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफ़आई), ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा), डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स फेडरेशन (डीएसएफ़) और ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन (एआईएसएफ़) शामिल हैं.

लेफ्ट यूनिटी की तरफ़ से धनंजय कुमार अध्यक्ष, अविजित घोष उपाध्यक्ष, स्वाति सिंह महासचिव और साजिद संयुक्त सचिव के लिए उम्मीदवार हैं.

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने उमेश चंद्र अजमीरा अध्यक्ष, दीपिका शर्मा उपाध्यक्ष, अर्जुन आनंद महासचिव और गोविंद दांगी संयुक्त सचिव पद के लिए दावेदारी कर रहे हैं.

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बिरसा आंबेडकर फुले स्टूडेंट्स एसोसिएशन यानी बापसा ने बिश्वजीत मिंजी अध्यक्ष, मोहम्मद अनस उपाध्यक्ष, प्रियांशी आर्य महासचिव और रूपक कुमार सिंह संयुक्त पद के लिए उम्मीदवार बनाया है.

यूनिवर्सिटी में कांग्रेस की स्टूडेंड विंग एनएसयूआई के अलावा आरजेडी का छात्र राजद और समाजवादी पार्टी की समाजवादी छात्रसभा भी चुनाव लड़ रही है. समाजवादी छात्रसभा का जेएनयू छात्र संघ में यह पहला चुनाव है.

एनएसयूआई जुनैद रज़ा, छात्र राजद से अफ़रोज़ आलम अंसारी और समाजवादी छात्रसभा से आराधना यादव अध्यक्ष के लिए उम्मीदवार हैं.

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इमेज कैप्शन, सेंट्रल पैनल के लिए एबीवीपी के उम्मीदवार

क्या ख़त्म होगा एबीवीपी का सूखा

साल 2015 के छात्र संघ चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने संयुक्त सचिव पद पर जीत हासिल की थी.

यह वही साल था जब चर्चित छात्र नेता कन्हैया कुमार जेएनयू के छात्र संघ अध्यक्ष बने थे.

2015 में एबीवीपी के सौरभ शर्मा ने आइसा के प्रत्याशी को 28 वोटों के क़रीबी अंतर से हराया था. इस जीत के साथ एबीवीपी ने यूनिवर्सिटी के सेंट्रल पैनल में 14 साल बाद वापसी की थी.

इससे पहले साल 2000 में एबीवीपी के संदीप महापात्रा अध्यक्ष चुने गए थे.

23 साल गुज़र चुके हैं और इन 23 सालों में एबीवीपी जेएनयू के सेंट्रल पैनल में एक सीट जीत पाई है. हालांकि, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि बीतों सालों में एबीवीपी जेएनयू में पहले से कहीं अधिक मज़बूत हुई है.

इस बात की गवाही है, वामपंथी छात्र संगठनों का एक साथ होकर लड़ना. पहले ये छात्र संगठन अलग-अलग मिलकर चुनाव लड़ते थे.

हमने जब यह सवाल एबीवीपी की तरफ़ से जनरल सेक्रेटरी पद पर चुनाव लड़ रहे अर्जुन आनंद से पूछा तो उनका कहना था कि इस साल एबीवीपी सेंट्रल पैनल की सभी सीटों पर चुनाव जीतने जा रही है.

अर्जुन कहते हैं, ''हमारा मानना है कि कैंपस में विचारधाराओं की लड़ाइयां तो होंगी ही लेकिन इन सबके बीच छात्रों के मुद्दे नहीं पिसने चाहिए. इसलिए एबीवीपी जेएनयू में छात्रों के मुद्दों पर चुनाव लड़ रही है.''

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वहीं लेफ्ट यूनिटी के उम्मीदवार बार-बार पर इस बात पर ज़ोर देते हैं कि जेएनयू को बाहरी हमलों और सांप्रदायिक ताक़तों से बचाने की ज़रूरत है.

लेफ्ट यूनाईटेड पैनल के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार धनंजय कुमार कहते हैं, ''जेएनयू को पिछले कुछ सालों से बदनाम किया जा रहा है. फ़िल्मों में जेएनयू की नकारात्मक छवि गढ़ी जा रही है क्योंकि भाजपा-आरएसएस को यह चुभता है कि इतने सस्ते में वंचित वर्ग से आए लोग यहां पढ़ाई कर रहे हैं.''

लेफ़्ट और राइट से इतर बिरसा अंबेडकर फुले स्टूडेंट्स एसोसिशयन का दावा है कि कैंपस में अब लोग लेफ्ट-राइट की बाइनरी से ऊपर उठकर सोच रहे हैं और बापसा को मज़बूत विकल्प मान रहे हैं.

अध्यक्षीय भाषण के बाद 22 मार्च को मतदान होगा और 24 मार्च को नतीजे आएंगे.

सवाल यही है कि क्या वामपंथी संगठन अपने इस गढ़ को बचा पाएंगे या अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यहां अपना झंडा लहराएगा.

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