JNU हिंसा मामले में पुलिस की जांच पर किसे भरोसा, कौन असंतुष्ट

जेएनयू हिंसा

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    • Author, चंदन कुमार चौधरी
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ (जेएनयूएसयू) ने शनिवार को एक संवाददाता सम्मेलन में जेएनयू हिंसा मामले में दिल्ली पुलिस की जांच को 'फ़र्जी' और 'त्रुटिपूर्ण' क़रार दिया है.

दिल्ली पुलिस के विशेष जांच दल ने वीडियो और अन्य सबूतों के आधार पर नौ छात्रों की पहचान की है. इनमें जेएनयू की छात्रसंघ अध्यक्ष आइशी घोष का नाम भी शामिल है. पुलिस ने इनमें से सात छात्र वामपंथी दलों से जुड़े बताए हैं.

पुलिस के मुताबिक 'यूनिटी अगेंस्ट लेफ़्ट' नाम का वॉट्सऐप ग्रुप भी जांच के दायरे में हैं. इस ग्रुप में क़रीब साठ लोग थे. पुलिस के मुताबिक़ ये वॉट्सऐप ग्रुप हमले के वक़्त ही बनाया गया था. पुलिस ने योगेंद्र भारद्वाज को इस ग्रुप का एडमिन बताया है.

जेएनयू में हुए हमलों की जांच कर रही दिल्ली पुलिस ने कुल तीन मुक़दमे दर्ज किए हैं. डीसीपी जॉय तिरकी के मुताबिक़ दिल्ली पुलिस को जेएनयू के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज नहीं मिली है क्योंकि ये कैमरे काम नहीं कर रहे थे. पुलिस ने इसकी वजह सर्वर रूम में की गई तोड़फोड़ को बताया है.

पुलिस का कहना है कि हमलावरों की पहचान के लिए छात्रों, गार्डों, शिक्षकों और यूनिवर्सिटी परिसर में रहने वाले लोगों से बात की गई है. जो वीडियो पुलिस को मिले हैं उनके आधार पर संदिग्धों की पहचान की जा रही है.

उधर जेएनयू छात्रसंघ ने आरोप लगाया है कि पांच जनवरी को हुई हिंसा से काफी पहले पुलिस को कैंपस में भीड़ की मौजूदगी के बारे में सूचित किया गया था लेकिन उन्होंने मेसेजों की अनदेखी की.

जेएनयूएसयू ने दावा किया कि उन्होंने दोपहर तीन बजे पुलिस को सूचित किया और यह मैसेज सात मिनट बाद तीन बज कर सात मिनट पर पढ़े गए लेकिन मेसेज को नज़रअंदाज कर दिया गया.

यह भी आरोप है कि पिछले सप्ताह छात्राओं और जेएनयूएसयू के पदाधिकारियों पर हमला करने में आरएसएस से जुड़ा छात्र संगठन एबीवीपी शामिल था.

जेएनयूएसयू ने यह भी आरोप लगाया कि एबीवीपी के सदस्यों ने चार जनवरी को भी छात्राओं को मारा और जब जेएनयूएसयू के महासचिव सतीश चंद्र यादव ने हस्तक्षेप किया तो उन लोगों ने उन पर भी हमला किया.

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'इन्हें न तो संविधान पर भरोसा है न पुलिस पर'

जेएनयू छात्र संघ के आरोपों पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के जेएनयू यूनिट के प्रेसिडेंट दुर्गेश कुमार ने कहा, "इनको ना संविधान पर भरोसा है, ना पुलिस पर भरोसा है और ना ही प्रशासन पर भरोसा है, इन्हें किसी पर भरोसा नहीं है. जिसका किसी पर भरोसा नहीं है उस पर हम क्या कह सकते हैं. कहीं ना कहीं तो हमें भरोसा दिखाना पड़ेगा कि हम किसी संस्था पर विश्वास करते हैं. इनको जब किसी संस्था पर ही भरोसा नहीं है तो क्या कहा जा सकता है?"

दिल्ली पुलिस ने हिंसा के संदिग्धों के नाम जारी किए हैं जिनमें छात्र संघ अध्यक्ष आइशी घोष का भी नाम है. उन्होंने कहा, "मैंने किसी तरह का कोई हमला नहीं किया है, ना मेरे हाथ में कोई रॉड थी. मैं नहीं जानती कि दिल्ली पुलिस को ऐसी जानकारी कहां से मिल रही है. मुझे भारत के क़ानून में पूरा विश्वास है और मैं जानती हूं कि मैं ग़लत नहीं हूं. अभी तक मेरी शिकायत पर एफ़आईआर दर्ज नहीं की गई है. क्या मुझ पर जो हमला हुआ है वो जानलेवा नहीं है?"

आइशी ने दिल्ली पुलिस की जांच पर भी सवाल उठाया था.

उन्होंने कहा, "दिल्ली पुलिस क्यों पक्षपातपूर्ण तरीके से काम कर रही है. सुरक्षा कारणों की वजह से अगर मैं छात्रों के पास पहुंचती हूं तो क्या ये ग़लत है? पुलिस के पास कोई सबूत नहीं है. जो वीडियो मीडिया में दिखाया जा रहा है मैं उस पर पहले ही स्पष्टीकरण दे चुकी हूं. मैं छात्रसंघ अध्यक्ष के तौर पर अपनी ज़िम्मेदारी निभा रही थी. मैं छात्रों से मिलने पहुंची थी. अगर सुरक्षाकर्मी काम करते तो हमें जाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती. क्यों पुलिस की जगह छात्रों ने हमें बुलाया?"

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हालांकि, एबीवीपी के दुर्गेश को लगता है कि इस मामले में अभी और लोगों का नाम सामने आना बाक़ी है.

उन्होंने कहा, ''दिल्ली पुलिस की जांच में जिन नौ लोगों का नाम सामने आया है, उससे हम संतुष्ट नहीं हैं. हमें लगता है कि इसमें और लोगों का नाम आना बाक़ी है. जांच जारी है और हमें लगता है कि न्याय मिलेगा.''

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इमेज कैप्शन, जेएनयू वीसी जगदीश कुमार (मध्य में)

दिल्ली पुलिस पर साज़िश का आरोप

दूसरी तरफ, जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष एन साई बालाजी ने कहा, "हमारा साफ़तौर पर कहना है कि कहीं ना कहीं एबीवीपी को बचाने के लिए दिल्ली पुलिस पूरी तरह राजनीति से प्रेरित होकर चल रही है. दिल्ली पुलिस साज़िश के तहत ​बिना किसी सबूत और जांच के गिने-चुने छात्रों और संगठनों को दोषी ठहराने में लगी हुई है."

यह पूछे जाने पर कि इस मामले में वह क्या चाहते हैं, बालाजी ने कहा, "हम चाहते हैं कि जो नाम हमने दिल्ली पुलिस को अपनी शिकायत में दिए हैं उन सारे लोगों से पूछताछ की जाए, उनके व्हाट्सऐप की जांच की जाए, घटना के वक़्त उनके मोबाइल की लोकेशन की जांच की जाए."

बालाजी ने साथ में यह भी मांग की कि दिल्ली पुलिस की कार्यप्रणाली की निष्पक्ष न्यायिक जांच हाई कोर्ट की निगरानी में हो.

दूसरी तरफ एबीवीपी के दुर्गेश पुलिस पर पूरा भरोसा व्यक्त करते हैं. दुर्गेश ने कहा,"दिल्ली पुलिस ने जिन नौ लोगों का नाम लिया है, उनमें से सात लोग वामपंथी संगठन के हैं. हम जांच में पुलिस का पूरी तरह सहयोग करेंगे. दिल्ली पुलिस पर हमें भरोसा है. हम मांग करेंगे कि दिल्ली पुलिस ​जल्द से जल्द जांच करके जो भी दोषी हो उनके ख़िलाफ़ सख़्त से सख़्त कार्रवाई करे."

छात्र संगठन सीआरजेडी से जुड़ीं प्रियंका भारती ने भी पुलिस पर झूठ बोलने का आरोप लगाया. साथ ही उन्होंने इस मामले की निष्पक्ष जांच करने और इस घटना में शामिल लोगों पर कार्रवाई करने की मांग भी की.

उन्होंने कहा, "दिल्ली पुलिस कि​सी भी तरह से हमारे साथ नहीं है. वो जितने भी बयान दे रहे हैं वह आधारहीन और पक्षपातपूर्ण हैं. वो सिर्फ़ झूठ बोल रहे हैं. जिस दिन हमें कैंपस में मारा गया उस दिन वो कैंपस में तीन बजे से ही मौजूद थे. दिल्ली पुलिस इसमें निष्पक्ष नहीं है और उन्हें निष्पक्ष जांच करनी चाहिए और इस घटना में जो भी शामिल हो उस पर कार्रवाई करनी चाहिए."

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और सख़्त हुआ जेएनयू प्रशासन

इस बीच, जेएनयू प्रशासन ने 5 जनवरी को परिसर में हुई हिंसा की जांच के लिए पांच सदस्यीय एक टीम का गठन किया है. इसके साथ ही जेएनयू के डीन उमेश ए. कदम ने सभी वॉर्डन को निर्देश दिया है कि हॉस्टल में किसी बाहरी व्यक्ति की मौजूदगी न हो.

निर्देश में सात जनवरी को वसंत कुंज थाने की तरफ से चिट्ठी मिलने का हवाला दिया गया है. इसमें बताया गया है कि वसंत कुंज थाने से मिली चिट्ठी में रजिस्ट्रार को सुझाव दिया गया है कि वह इस बात का ऑडिट कराएं कि हॉस्टल में कोई बाहरी व्यक्ति तो नहीं रह रहा और ऐसा पाए जाने पर तत्काल थाना प्रभारी को सूचित किया जाए.

नोटिस में कहा गया है कि अगर कोई बाहरी या अनाधिकृत छात्र या गेस्ट किसी हॉस्टल के कमरे में रहता पाया गया तो संबंधित छात्र के ख़िलाफ़ प्रशासनिक नियमों के तहत आवश्यक क़दम उठाए जाएंगे.

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