उमर ख़ालिद: जेएनयू विवाद से दिल्ली दंगों में गिरफ्तारी तक

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- Author, प्रशांत चाहल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र नेता और संस्था 'यूनाइटेड अगेंस्ट हेट' के सह-संस्थापक उमर ख़ालिद को दस दिनों की पुलिस रिमांड पर भेजा गया है.
उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के मामले में उमर ख़ालिद को रविवार रात दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने गिरफ़्तार किया था.
उमर ख़ालिद को मामले की मूल एफ़आईआर 59 में यूएपीए यानी ग़ैर-क़ानूनी गतिविधियाँ रोकथाम अधिनियम की धाराओं के तहत गिरफ़्तार किया गया है.

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जब गृह मंत्री की ज़ुबान पर आया ख़ालिद का भाषण
संसद में दिल्ली दंगों पर जवाब देते हुए भारत के गृह मंत्री अमित शाह ने भी उमर ख़ालिद का नाम लिए बिना 17 फ़रवरी के उनके एक भाषण का ज़िक्र किया था.
गृह मंत्री ने कहा था, "17 फ़रवरी को ये भाषण दिया गया और कहा गया कि डोनाल्ड ट्रंप के भारत आने पर हम दुनिया को बताएँगे कि हिंदुस्तान की सरकार जनता के साथ क्या कर रही है. मैं आप सबसे अपील करता हूँ कि देश के हुक्मरानों के ख़िलाफ़ बाहर निकलिए. इसके बाद 23-24 फ़रवरी को दिल्ली में दंगा हो गया."
उमर ख़ालिद के 17 फ़रवरी को महाराष्ट्र के अमरावती में दिए गए इस भाषण का ज़िक्र दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने भी सबूत के तौर पर किया है.
लेकिन फ़ैक्ट चेक करने वाली कुछ नामी वेबसाइट्स ने यह दावा किया है कि उमर ख़ालिद के भाषण का अधूरा वीडियो सोशल मीडिया पर फैलाकर उनके ख़िलाफ़ भ्रम फैलाने की कोशिश की गई, क्योंकि उनके भाषण के अधूरे वीडियो को सुनकर लगता है कि 'वो लोगों को भड़का रहे हैं.'
जबकि उमर ख़ालिद ने अपने भाषण में कहा था कि "जब अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत में होंगे तो हमें सड़कों पर उतरना चाहिए. 24 तारीख़ को ट्रंप आएँगे तो हम बताएँगे कि हिंदुस्तान की सरकार देश को बाँटने की कोशिश कर रही है. महात्मा गांधी के उसूलों की धज्जियाँ उड़ा रही है. हम दुनिया को बताएँगे कि हिंदुस्तान की आवाम हिंदुस्तान के हुक्मरानों के ख़िलाफ़ लड़ रही है. उस दिन हम तमाम लोग सड़कों पर उतर कर आएँगे."
क़ानून के जानकारों के अनुसार, लोगों से प्रदर्शन करने के लिए कहना संविधान के मुताबिक़ अपराध नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकार है. वहीं लोगों को हिंसा के लिए भड़काना अपराध की श्रेणी में आता है.

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राजद्रोह का मामला
उमर ख़ालिद का नाम पहली बार जेएनयू के छात्र नेता रहे कन्हैया कुमार के साथ फ़रवरी 2016 में सुर्ख़ियों में आया था. लेकिन तब से कई मामलों में और अपने कुछ बयानों की वजह से ख़ालिद लगातार सुर्खि़यों में रहे हैं.
ख़ासकर मोदी सरकार की मुखर आलोचना करने के कारण उमर ख़ालिद दक्षिणपंथी रुझान रखने वाले लोगों के निशाने पर रहे हैं.
इस ताज़ा मामले से पहले फ़रवरी 2016 में 'संसद पर हमले के दोषी अफ़ज़ल गुरू की फाँसी की बरसी पर आयोजित हुआ कार्यक्रम' उमर ख़ालिद को काफ़ी महंगा पड़ा था. आरोप लगे कि इस कार्यक्रम में कथित तौर पर भारत विरोधी नारे लगाए गए थे.
आरोप था कि कथित नारे लगानेवालों में जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार और छह अन्य छात्रों में उमर ख़ालिद भी शामिल थे. इसके बाद उमर ख़ालिद पर राजद्रोह का केस लगा. वे पुलिस रिमांड पर रहे और कुछ वक़्त बाद उन्हें कोर्ट से ज़मानत मिल गई.
लेकिन भारतीय मीडिया के एक गुट ने उन्हें 'देशद्रोही' कहा, यहाँ तक कि उनके साथियों को 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' कहा गया. उमर ख़ालिद बार-बार कहते रहे हैं कि मीडिया ने उनकी इस तरह की छवि गढ़ी है, जिसके चलते वे कुछ लोगों की नफ़रत का शिकार बन रहे हैं.
जनवरी 2020 में उमर ख़ालिद ने गृह मंत्री अमित शाह को चुनौती दी थी कि "अगर वे 'टुकड़े-टुकड़े' गैंग को दंडित करवाना चाहते हैं और अगर वे अपनी बात के पक्के हैं, तो 'टुकड़े-टुकड़े' स्पीच के लिए मेरे ख़िलाफ़ कोर्ट में केस करें. उसके बाद साफ़ हो जाएगा कि किसने हेट स्पीच दी और कौन देशद्रोही है."

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बुरहान वानी पर टिप्पणी
जुलाई 2016 में हिज़्बुल कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद कश्मीर घाटी में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी और इस घटना ने विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया था, जिनमें कई लोग मारे गए थे.
बुरहान की अंतिम-यात्रा में भी भारी भीड़ देखने को मिली थी, जिसके बाद उमर ख़ालिद ने फ़ेसबुक पर बुरहान वानी की 'तारीफ़' में पोस्ट लिखी थी, जिसे काफ़ी आलोचना मिली.
आलोचना को देखते हुए उमर ख़ालिद ने यह पोस्ट कुछ वक़्त बाद हटा ली थी. लेकिन तब तक सोशल मीडिया पर उनका विरोध शुरू हो गया था. हालांकि, कई लोग उनके समर्थन में भी थे.

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दिल्ली यूनिवर्सिटी का कार्यक्रम
फ़रवरी 2017 में दिल्ली यूनिवर्सिटी के रामजस कॉलेज की लिटरेरी सोसायटी ने एक टॉक शो में हिस्सा लेने के लिए उमर ख़ालिद और छात्र नेता शेहला रशीद को बुलाया था.
उमर को 'द वॉर इन आदिवासी एरिया' विषय पर बोलना था. लेकिन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से जुड़े छात्र इस कार्यक्रम का विरोध कर रहे थे, जिनके दबाव में आकर रामजस कॉलेज प्रशासन ने दोनों वक्ताओं का निमंत्रण रद्द कर दिया था.
लेकिन इसे लेकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) और ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन (आइसा) के सदस्यों के बीच डीयू कैंपस में हिंसक झड़प हुई थी.

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उमर ख़ालिद पर हमला
अगस्त 2018 में दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब के बाहर कुछ अज्ञात हमलावरों ने उमर ख़ालिद पर कथित तौर पर गोली चलाई थी. ख़ालिद वहाँ 'टूवर्ड्स ए फ़्रीडम विदाउट फ़ियर' नामक कार्यक्रम में शामिल होने गए थे.
तब प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया था कि सफ़ेद कमीज़ पहने एक शख़्स ने आकर उमर ख़ालिद को धक्का दिया और गोली चलाई. लेकिन ख़ालिद के गिर जाने की वजह से गोली उन्हें नहीं लगी.
इस घटना के बाद उमर ख़ालिद ने कहा, "जब उसने मेरी तरफ़ पिस्टल तानी, तो मैं डर गया था, पर मुझे गौरी लंकेश के साथ जो हुआ था, उसकी याद आ गई."

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'मैं अकेला था जिसे पाकिस्तान से जोड़ा गया'
भीमा-कोरेगाँव में हुई हिंसा के मामले में भी गुजरात के नेता जिग्नेश मेवाणी के साथ उमर ख़ालिद का नाम लिया जाता है कि दोनों ने अपने भाषणों से लोगों को भड़काने का काम किया. उमर ख़ालिद का सार्वजनिक भाषण देना या मुद्दों पर अपनी बात रखना, सुर्ख़ियों में शामिल होता रहा है.
इन तमाम विवादों के बीच उमर ख़ालिद को अपनी पढ़ाई के मामले में भी काफ़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा. काफ़ी मशक्कत के बाद जेएनयू ने उनकी पीएचडी की थीसिस जमा की थी.
उमर ख़ालिद अंग्रेज़ी और हिन्दी, दोनों भाषाओं में बढ़िया बोलते हैं. भारत के आदिवासियों पर उनका विशेष अध्ययन है. वे दिल्ली के दोनों बड़े विश्वविद्यालयों, डीयू और जेएनयू में पढ़ाई कर चुके हैं. वे कुछ सामाजिक संगठनों के माध्यम से मानवाधिकार के मुद्दों पर बात करते रहे हैं.
उमर ख़ालिद ने कांग्रेस के शासनकाल में हुए 'बाटला हाउस एनकाउंटर' पर भी कई बार सवाल उठाए हैं. उन्होंने अपने कई भाषणों में कहा है कि 'कुछ विशेष क़ानूनों के तहत पुलिस को मिलने वाली अतिरिक्त शक्तियों से हमेशा ही मानवाधिकारों पर ख़तरा मँडराता रहता है.'
पिछले साल अपने एक लेख में उमर ख़ालिद ने लिखा था, "2016 में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में तीन छात्र गिरफ़्तार किए गए थे, लेकिन मैं अकेला था जिसे पाकिस्तान से जोड़ा गया. गालियाँ दी गईं और यहाँ तक आरोप लगाया गया कि मैं दो बार पाकिस्तान जा चुका हूँ. लेकिन जब दिल्ली पुलिस ने इन दावों को फ़र्ज़ी साबित कर दिया, तो किसी ने मुझसे माफ़ी नहीं माँगी. क्या कारण था? इस्लामोफ़ोबिया. क्या मुझे स्टीरियोटाइपिंग का शिकार बनाया गया?"
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