UAPA Act: जब सरकार मुंसिफ़ और मुद्दई दोनों बन जाए

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- Author, विभुराज
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ने के नाम पर सरकार जनता पर राज्य का आंतकवाद थोप रही है. विरोध जताने वालों को अब मनमाने तरीक़े से आंतकवादी क़रार दिया जा सकता है."
दो अगस्त को अनलॉफ़ुल ऐक्टिविटिज (प्रिवेंशन) संशोधन बिल पर राज्यसभा में बहस के दौरान सीपीएम के सांसद इलामरम करीम की चिंताओं के जवाब में गृहमंत्री अमित शाह ने कहा था, "अगर हम एक संगठन पर प्रतिबंध लगाते हैं तो लोग दूसरा संगठन बना लेते हैं. आतंकवादी गतिविधियां संगठन अंजाम नहीं देते. इसे कोई व्यक्ति अंजाम देता है."
विपक्ष की चिंताओं और सरकार की दलीलों के बीच यूएपीए ऐक्ट में छठा संशोधन तो पारित हो गया लेकिन इसके साथ ही आतंकवाद ख़त्म करने के नाम पर बनाए गए इस क़ानून को लेकर एक बार फिर से विवाद शुरू हो गया है.
यहां तक कि ये विवाद बहस से आगे निकलकर देश की सबसे बड़ी अदालत में दो जनहित याचिकाओं की शक्ल में पहुंच गया.
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में में इन याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है और फैसला आना बाक़ी है.

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यूएपीए क़ानून पर क्यों है विवाद
सरकार को अगर इस बात का 'यक़ीन' हो जाए कि कोई व्यक्ति या संगठन 'आतंकवाद' में शामिल है तो वो उसे 'आतंकवादी' क़रार दे सकती है.
यहां आतंकवाद का मतलब आतंकवादी गतिविधि को अंजाम देना या उसमें शामिल होना, आतंकवाद के लिए तैयारी करना या उसे बढ़ावा देना या किसी और तरीक़े से इससे जुड़ना है.
दिलचस्प बात ये है कि 'यक़ीन की बुनियाद पर' किसी को आतंकवादी क़रार देने का ये हक़ सरकार के पास है न कि सबूतों और गवाहों के आधार पर फ़ैसला देने वाली किसी अदालत के पास.
कई जानकार मानते हैं कि राजनैतिक-वैचारिक विरोधियों को इसका निशाना बनाया जा सकता है.
यूएपीए ऐक्ट में छठे संशोधन के कुछ प्रावधानों पर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर करने वाले एडवोकेट सजल अवस्थी कहते हैं, "यूएपीए ऐक्ट के सेक्शन 35 और 36 के तहत सरकार बिना किसी दिशानिर्देश के, बिना किसी तयशुदा प्रक्रिया का पालन किए किसी व्यक्ति को आतंकवादी क़रार दे सकती है. किसी व्यक्ति को कब आतंकवादी क़रार दिया जा सकता है? ऐसा जांच के दौरान किया जा सकता है? या इसके बाद? या सुनवाई के दौरान? या गिरफ़्तारी से पहले? ये क़ानून इन सवालों पर कुछ नहीं कहता है."
एडवोकेट सजल अवस्थी बताते हैं, "हमारे क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम के तहत कोई अभियुक्त तब तक बेक़सूर है जब तक कि उसके ख़िलाफ़ दोष साबित न हो जाए. लेकिन इस मामले में जब आप किसी व्यक्ति को सुनवाई के नतीजे आने से पहले ही आतंकवादी क़रार दे देते हैं तो इसके गंभीर नतीजे हो सकते हैं. ये संविधान से मिले बुनियादी अधिकारों के भी ख़िलाफ़ है."

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क्या है यूएपीए क़ानून
आसान शब्दों में कहें तो ये क़ानून भारत में ग़ैरक़ानूनी गतिविधियों पर नकेल कसने के लिए 1967 में लाया गया था.
इसका मुख्य उद्देश्य भारत की अखंडता और संप्रभुता को चुनौती देने वाली गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए सरकार को ज़्यादा अधिकार देना था.
ऐसे में ये सवाल उठता है कि क्या उस समय भारतीय दंड विधान या आईपीसी ऐसा कर पाने में नाकाम हो रही थी.
सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ़ साउथ बिहार में यूएपीए एक्ट पर रिसर्च कर रहे रमीज़ुर रहमान बताते हैं कि यूएपीए क़ानून दरअसल एक स्पेशल लॉ है जो विशेष परिस्थितियों में लागू किया जा सकता है.
"भारत में वर्तमान में यूएपीए ऐक्ट एकमात्र ऐसा क़ानून है जो मुख्य रूप से ग़ैरक़ानूनी और आतकंवाद से जुड़ी गतिविधियों पर लागू होता है."
"ऐसे कई अपराध थे जिनका आईपीसी में ज़िक्र नहीं था, इसलिए 1967 में इसकी ज़रूरत महसूस की गई और ये क़ानून लाया गया."
"जैसे ग़ैरक़ानूनी और आतंकवाद से जुड़ी गतिविधियां, आतंकवादी गिरोह और आतंकवादी संगठन क्या हैं और कौन हैं, यूएपीए ऐक्ट इसे स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है."
कश्मीर में आईपीसी की जगह पर रणबीर पीनल कोड लागू था लेकिन यूएपीए क़ानून पूरे भारत में लागू है.

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आतंकवादी कौन है और क्या है आतंकवाद
यूएपीए ऐक्ट के सेक्शन 15 के अनुसार भारत की एकता, अखंडता, सुरक्षा, आर्थिक सुरक्षा या संप्रभुता को संकट में डालने या संकट में डालने की संभावना के इरादे से भारत में या विदेश में जनता या जनता के किसी तबक़े में आतंक फैलाने या आतंक फैलाने की संभावना के इरादे से किया गया कार्य 'आतंकवादी कृत्य' है.
इस परिभाषा में बम धमाकों से लेकर जाली नोटों का कारोबार तक शामिल है.
आतंकवाद और आतंकवादी की स्पष्ट परिभाषा देने के बजाय यूएपीए एक्ट में सिर्फ़ इतना ही कहा गया है कि इनके अर्थ सेक्शन 15 में दी गई 'आतंकवादी कार्य' की परिभाषा के मुताबिक़ होंगे.
सेक्शन 35 में इससे आगे बढ़कर सरकार को ये हक़ दिया गया है कि किसी व्यक्ति या संगठन को मुक़दमे का फ़ैसला होने से पहले ही 'आतंकवादी' क़रार दे सकती है.
यूएपीए एक्ट से जुड़े मामले देखने वाले एडवोकेट पारी वेंदन कहते हैं, "ये पूरी तरह से सरकार की मर्ज़ी पर निर्भर करता है कि वे किसी को भी आतंकवादी क़रार दे सकते हैं. उन्हें केवल अनलॉफ़ुल ऐक्टिविटिज (प्रिवेंशन) ट्राइब्यूनल के सामने इस फ़ैसले को वाजिब ठहराना होता है."

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यूएपीए से पहले टाडा और पोटा
टेररिस्ट एंड डिसरप्टिव एक्टिविटिज़ (प्रिवेंशन) ऐक्ट यानी टाडा और प्रिवेंशन ऑफ़ टेररिस्ट एक्टिविटिज़ ऐक्ट (पोटा) अब अस्तित्व में नहीं हैं. लेकिन अपने दौर में ये क़ानून बड़े पैमाने पर बेजा इस्तेमाल के लिए ख़ासे बदनाम रहे.
टाडा क़ानून में आतंकवादी गतिविधि की परिभाषा के साथ-साथ विध्वंसात्मक कार्य को भी परिभाषित किया गया था. इसके तहत विध्वंसात्मक गतिविधि के लिए किसी को उकसाना, इसकी पैरवी करना या सलाह देना भी जुर्म था. साथ ही पुलिस अधिकारी के सामने दिए गए इक़बालिया बयान को सबूत के तौर पर वैध माना गया था.
हालांकि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत केवल मजिस्ट्रेट के सामने दिया गया बयान ही वैध माना जाता है.
टाडा क़ानून में मौका-ए-वारदात से अभियुक्त के उंगलियों के निशान या अभियुक्त के पास हथियार या विस्फोटकों की बरामदगी की सूरत में ये माना जाता था कि अभियुक्त ने उस अपराध को अंजाम दिया है और ख़ुद को बेक़सूर साबित करने की ज़िम्मेदारी अभियुक्त पर आ जाती थी.
पोटा में बिना आरोप तय किए किसी अभियुक्त को 180 दिनों के लिए हिरासत में रखने का प्रावधान था जबकि सीआरपीसी में इसके लिए केवल 90 दिनों का प्रावधान है.
पोटा में ये भी सुनिश्चित करने की कोशिश की गई थी कि आतंकवादी गतिविधि की जानकारी रखने वाले शख़्स को सूचना देने के लिए बाध्य किया जाए. इस प्रावधान के तहत कई बार पत्रकारों को भी गिरफ़्तारी का सामना करना पड़ा.
पोटा में आतंकवादी गतिविधि के लिए पैसा जुटाने को भी अपराध की श्रेणी में रखा गया और इसके लिए सज़ा का प्रावधान किया गया था. इस क़ानून को साल 2004 में ख़त्म कर दिया गया.

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पहले भी हुए हैं बदलाव
इसी अगस्त में किए गए विवादास्पद बदलाव से पहले यूएपीए ऐक्ट में पांच बार संशोधन किया जा चुका है.
रमीज़ुर रहमान कहते हैं, "साल 1995 में टाडा और 2004 में पोटा के ख़त्म होने के बाद उसी साल यूएपीए क़ानून में महत्वपूर्ण संशोधन किया गया. पोटा के कुछ प्रावधान छोड़ दिए गए तो कुछ शब्दशः यूएपीए में जोड़ दिए गए. इसमें टेरर फंडिंग से लेकर बिना चार्जशीट दायर किए 180 दिनों तक हिरासत में रखने का प्रावधान रखा गया."
साल 2008 में हुए संशोधन में आतंकवादी गतिविधि की परिभाषा का दायरा बढ़ा दिया गया.

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यूएपीए के ख़िलाफ़ और पक्ष में: क्या हैं दलीलें
राज्यसभा में यूएपीए संशोधन बिल पर बहस के दौरान इसके विरोध और समर्थन में कई दलीलें दी गईं. कहा गया कि ये क़ानून संघीय ढांचे की भावना के ख़िलाफ़ है और एनआईए को किसी भी राज्य में जाकर अपनी मर्ज़ी से जाकर काम करने की छूट मिल जाएगी.
केंद्र और राज्य के पुलिस बलों के बीच टकराव की आशंका भी जताई गई. किसी अफ़सर (जो जज नहीं होगा) की मर्ज़ी या सनक में किसी को आतंकवादी क़रार दिए जाने का जोखिम हो सकता है और इसके लिए कोई एहतियाती उपाय नहीं किया गया है.
लेकिन सरकार की तरफ़ से बिल के पक्ष में जो दलीलें दी गईं, उनका सार यही था कि आतंकवादी हत्याएं करके भाग जाते हैं और इसीलिए क़ानून में बदलाव ज़रूरी था.
गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में कहा, "राज्य सरकारें और एनआईए दोनों ही इस क़ानून का इस्तेमाल करती हैं. एनआईए ने इस क़ानून के तहत 2078 मामले दर्ज किए हैं और इनमें 204 मामलों चार्जशीट दायर की. अभी तक 54 मामलों में फ़ैसला आया है और इनमें 48 मामलों में सज़ा सुनाई गई. एनआईए के पास दर्ज मामलों में दोषी ठहराये जाने की दर 91 फीसदी है. आतंकवाद के ख़िलाफ़ एनआईए जो मामले दर्ज करता है, वो बहुत जटिल क़िस्म के होते हैं. उनमें सबूत मिलने की संभावना कम होती है क्योंकि उनका दायरा राज्यों और देशों की सीमाओं के बाहर तक फैला होता है."

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मौजूदा स्थिति
1967 में यूएपीए, 1987 में टाडा, 1999 में मकोका, 2002 में पोटा और 2003 में गुजकोका, देश में आतंकवाद पर रोकथाम लगाने के लिए बनाए गए क़ानूनों की एक लंबी लिस्ट रही है.
मकोका और गुजकोका क्रमशः महाराष्ट्र और गुजरात सरकारों ने बनाए थे. लेकिन इनमें से कोई क़ानून ऐसा नहीं रहा जिसे लेकर विवाद न हुआ हो.
रिसर्च स्कॉलर रमीज़ुर रहमान कहते हैं, "आतंकवाद विरोधी क़ानूनों का स्याह पक्ष यही रहा है कि वो चाहे टाडा हो या पोटा, नागरिक अधिकारों का उल्लंघन, अवैध हिरासत, टॉर्चर, झूठे मुक़दमे और लंबे समय तक जेल में रखने के मामले बढ़े."
"टाडा के तहत जिन 76,036 लोगों को गिरफ़्तार किया गया, उनमें से केवल एक फ़ीसदी पर आरोप साबित हो पाए. ठीक इसी तरह साल 2004 में जब पोटा क़ानून ख़त्म किया गया था तब तक इसके तहत 1031 लोगों को गिरफ़्तार किया गया जिनमें केवल 18 लोगों की सुनवाई पूरी हुई और उनमें से 13 को दोषी पाया गया था."
कुछ ऐसा ही हाल यूएपीए ऐक्ट का भी है.
एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार साल 2016 में 33 में से 22 मामलों में अभियुक्तों को बरी कर दिया गया जबकि 2015 में 76 में से 65 मामलों में आरोप साबित नहीं किए जा सके. साल 2014 से 2016 तक के आंकड़ें बताते हैं कि 75 फ़ीसदी मामलों में रिहाई या बरी किए जाने का फ़ैसला आया.
टेरर ग्लोबल इंडेक्स, 2018 के अनुसार पश्चिमी देश आतंकवाद विरोधी क़ानूनों के ज़रिए अपने यहां चरमपंथ पर काफ़ी हद तक क़ाबू पाने में कामयाब रहे हैं लेकिन भारत में नतीजे इसके उलट रहे हैं.
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