एनसीईआरटी: नहीं थम रहा विवाद, अब समर्थन में कई कुलपतियों ने जारी किया बयान

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शुभम किशोर
बीबीसी संवाददाता
एनसीईआरटी की किताबों से नाम हटाने से जुड़ा विवाद थमता नज़र नहीं आ रहा है. योगेंद्र यादव और सुहास पालशिकर के बाद एनसीईआरटी के 33 सलाहकारों ने किताबों से अपने नाम हटाने के लिए एनसीईआरटी को पत्र लिखा.
इसके बाद देशभर के कई विश्वविद्यालयों के कुलपतियों समेत 73 शिक्षाविदों ने एक बयान जारी कर इसे ‘गलत प्रोपेगेंडा’ बताया है.
बयान पर हस्ताक्षर करने वालों में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, तेजपुर विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, , झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय, रांची विश्वविद्यालय, बैंगलोर विश्वविद्यालय, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय के कुलपति शामिल हैं.
इनमें एनआईटी जालंधर के निदेशक, बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स, आईआईएम काशीपुर के अध्यक्ष, आईसीएसएसआर सचिव और एनआईओएस अध्यक्ष भी शामिल हैं.
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बयान में क्या कहा गया है?
गुरुवार को जारी एक बयान में कहा गया है, "जिन लोगों ने अपने नाम हटाने की बात की है उनका उद्देश्य मीडिया अटेंशन पाना है और वो भूल गए हैं कि किताबों लोगों की सामूहिक बौद्धिक जुड़ावों और कठोर प्रयासों का नतीजा है."
बयान में लिखा गया, "जहां तक यह तय करने का सवाल है कि कौन अस्वीकार्य है और क्या स्वीकार है, तो प्रत्येक नई पीढ़ी को मौजूदा ज्ञान आधार में कुछ जोड़ने/हटाने का अधिकार है."
"उनकी मांग है कि छात्र समकालीन विकास और शैक्षणिक उन्नति के साथ नई पाठ्यपुस्तकों के बजाय 17 साल पुरानी पुस्तकों से पढ़ना जारी रखें, यह बौद्धिक अहंकार को उजागर करता है. अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के चक्कर में वे देश भर के करोड़ों बच्चों के भविष्य को ख़तरे में डालने के लिए तैयार हैं, जबकि छात्र नए पाठ्यपुस्तकों का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं, ये शिक्षाविद लगातार बाधाएँ पैदा कर रहे हैं और पूरी प्रक्रिया को पटरी से उतार रहे हैं."

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समर्थन में आए यूजीसी चेयरमेन
यूजीसी के चेयरमेन जगदीश कुमार ने शुक्रवार को कई ट्वीट कर अपना नाम वापस लेने की मांग करने वालों की आलोचना की.
उन्होंने लिखा, “हाल के दिनों में, पाठ्यपुस्तकों को संशोधित करने के लिए एनसीईआरटी पर कुछ "शिक्षाविदों" द्वारा किए गए हमले अनुचित हैं. संशोधन सिर्फ़ वर्तमान किताबों में नहीं किए गए हैं. एनसीईआरटी पहले भी समय-समय पर पाठ्यपुस्तकों का संशोधन करता रहा है.”
“एनसीईआरटी को अपनी पाठ्यपुस्तक सामग्री के रैशनलाइज़ेशन का पूरा अधिकार है. एनसीईआरटी ने बार-बार कहा है कि किताबों में संशोधन विभिन्न अलग अलग स्टेक होल्डर के सुझावों के बाद किया जाता है.”
“इसलिए ‘शिक्षाविदों’ के हो हल्ला का कोई मतलब नहीं है. उनके बड़बोलेपन के पीछे शैक्षणिक कारणों से अलग उद्देश्य प्रतीत होता है.”
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“वो चाहते हैं तो नाम हटा लेना चाहिए”
हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्याल की प्रो वाइस चांसलर प्रोफ़ेसर डॉक्टर सुषमा यादव का हस्ताक्षर भी इस पत्र पर है. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि एनसीईआरटी पूरी निष्पक्षता से काम कर रही है.
उन्होंने कहा, “समाज विज्ञान गणित तो है नहीं कि दो और दो चार होते हैं, समाज विज्ञान में समझ होती है, पर्सपेक्टिव होते हैं, इंटिप्रिटेशन होते हैं.”
“एक दृष्टि से लिखा हुआ इतिहास, राजनीति और समाज विज्ञान अच्छा नहीं होता. विद्यार्थियों को पूर्ण दृष्टि मिलनी चाहिए, पूरा सत्य मिलना चाहिए. इसके लिए बदलाव हो रहे हैं, तो वो कह रहे हैं कि नाम हटा ले."
“या तो उन्होंने जो लिखा है वो उसको पुष्ट कर दें, ऐसा नहीं है और अगर नहीं वो चाहते हैं तो फिर उनका नाम हटा देना चाहिए, इसमें कोई बुराई नहीं है, लेकिन समाज और इतिहास का सत्य सामने आने से परेशानी क्यों होनी चाहिए.”
पक्षपात के आरोपों पर वो कहती हैं कि पुरानी पुस्तकें मौजूद हैं, नई जब आ जाए तो पढ़े लिखे लोग दोनों को देखकर तय कर लें कि पक्षपात है या नहीं.

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‘बदलाव से दिक्कत नहीं होनी चाहिए’
महात्मा गांधी सेंट्रल यूनिवर्सिटी, बिहार के वाईस चांसलर प्रोफ़ेसर संजय श्रीवास्तव भी बयान जारी करने वालों में शामिल हैं. वो कहते हैं कि एनसीईआरटी में होने वाले बदलाव स्वाभिवक है, जो कि समय के साथ होते रहते हैं, किसी को इससे दिक्कत क्यों होनी चाहिए.
वो कहते हैं, "हमें लगता है कि एक कमेटी ने इस पर काम किया है, अध्ययन किया है और जो बदलाव किए गए हैं वो साक्ष्य और सत्य पर आधारित है. कुछ चीज़ें जो किताबों में नहीं थीं, उन्हें जोड़ा गया है, और कुछ चीज़े जो ज़रूरत से ज़्यादा थीं, उन्हें कम किया गया है, किसी भी चीज़ को पूरी तरह से हटाया नहीं गया है."
एनसीईआरटी पर सरकार के प्रभाव पर वो कहते हैं कि सरकार का इस संस्था पर कोई प्रभाव नहीं है.

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इसमें कोई राजनीति नहीं है – जेएनयू वीसी
जेएनयू की वीसी शांतिश्री धुलिपुडी पंडित ने अंग्रेज़ी न्यूज़ चैनल टाइम्स नाऊ से बात करते हुए कहा, “इसमें कोई राजनीति नहीं है..ये रैशनेलाइज़ेशन के तहत किया गया है...ये पूरी प्रक्रिया राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत है.”
उन्होंने कहा कि समय समय पर पाठ्यक्रमों में बदलाव होते रहे हैं और कई चीज़ों को लेकर गलत जानकारियां फैलाई गई हैं.
उन्होंने कहा, “कुछ लोगों को लगता है कि जो उन्होंने किया है वो सही है और जो दूसरे कर रहे हैं वो गलत हैं.”

इससे पहले योगेंद्र यादव और सुहास पलशिकर ने इन किताबों में ‘एकतरफ़ा और अतार्किक’ काट-छांट का आरोप लगाते हुए एनसीईआरटी को पत्र लिखा है.
सलाहकारों का कहना है कि जिस पुस्तक और पाठ्यक्रम पर कभी उन्हें गर्व था, आज उसके बदले स्वरूप को देखकर शर्म आती है. ये वो पाठ्यक्रम नहीं हैं, जिसे उन्होंने तैयार किया था इसलिए उनका नाम इस पुस्तक से अलग कर देना चाहिए.
योगेंद्र यादव और सुहास पलशिकर उस सलाहकार समिति के मुख्य चेहरे थे, जिन पर राजनीतिक विज्ञान के पाठ्यक्रम को तैयार करने की ज़िम्मेदारी थी.
ये पाठ्यक्रम साल 2005 में तैयार किए गए थे और इसमें बड़ा योगदान इन दो मुख्य सलाहकारों का रहा था.

किताब के शुरुआती पन्नों में इन सलाहकारों के योगदान की भी चर्चा है. अब दोनों ही सलाहकार इन पाठ्यपुस्तकों से अपने नाम, अपनी लिखी चिट्ठी को हटाने की मांग पर अड़े हैं.
बीबीसी की प्रेरणा से बात करते हुए योगेंद्र यादव कहते हैं, ‘इन्होंने पुस्तक की आत्मा की हत्या कर दी है. राजनीतिक विज्ञान की किताबें मुख्यतः लोकतंत्र की अभिव्यक्ति हैं और लोकतंत्र में जो चीज़ें अनिवार्य समझा जाता है, उसे पाठ्यपुस्तक से बाहर कर दिया गया है.'
''जन-आंदोलनों से जुड़े सभी चैप्टर्स हटा दिए गए, मानवाधिकारों की बात जहां-जहां थी, हटा दिए गए हैं. इमरजेंसी के दौरान लोकतांत्रिक संस्थाओं का जिस तरह से क्षय हुआ था, उसे हटा दिया गया.''
उन्होंने कहा, ''सत्ताधारी पार्टी को जो चीज़ पसंद नहीं आतीं, वो हटा दी गई हैं. महात्मा गांधी के हत्यारे का किस विचारधारा से संबंध था, हटा दिया गया है. जहां विविधता, न्याय की बात है, वो पूरा अध्याय किताब से निकाल दिया गया है.''
'' इसलिए हम कहते हैं कि जिस पुस्तक को हमने बड़े लगाव से लिखा था, जिस पर हमें गर्व था उसे लेकर अब शर्म आती है. तो आप पुस्तक के साथ जो कुछ भी करिए, हमारा नाम हटा दीजिए बस.’’

बीबीसी मराठी सेवा के संवाददाता सिद्धनाथ गानू से बात करते हुए सुहास पलशिकर ने बताया, ''2005-07 के दौरान जब ये किताबें तैयार हुईं, तब हम राजनीति विज्ञान की किताबों के लिए चीफ़ एडवाइजर नियुक्त किए गए थे. हमने अपना काम किया और उसके बाद हमारा काम ख़त्म हो गया.
''लेकिन अभी पिछले सालभर में एनसीईआरटी ने ‘रैशनलाइजेशन’ के नाम पर काफ़ी बदलाव किए हैं, जो हमें मंजूर नहीं. इसलिए हमने किताब से ख़ुद को अलग करने की बात रखी है, क्योंकि जो बदलाव एनसीईआरटी कर रहा है, उसके एडवाइजर हम नहीं हैं. जिन्होंने सलाह दिए हैं इसमें उनके नाम होने चाहिए, न कि हमारे.''
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एनसीईआरटी बोर्ड का जवाब
एनसीईआरटी ने सलाहकारों की मांग पर एक तरह से जवाब देते हुए एक नोटिस जारी किया है और कहा है कि ऐसी कोई भी मांग करना तार्किक नहीं है.
एनसीईआरटी ने नोटिस में लिखा, '' 2005-2008 के दौरान, एनसीईआरटी ने पाठ्यपुस्तकों के विकास के लिए पाठ्यपुस्तक विकास समितियों का गठन किया था. ये समितियां विशुद्ध रूप से अकादमिक थीं.'' ''पाठ्यपुस्तकों के प्रकाशित होने के बाद उसकी कॉपीराइट एनसीईआरटी के पास होती है, न कि विकास समिति के पास और समिति के सदस्य इससे अवगत हैं. पाठ्यपुस्तक विकास समिति में शामिल मुख्य सलाहकार, सलाहकार, सदस्य और को-ऑर्डिनेटर की भूमिका पाठ्यपुस्तक के डिजाइन औऱ विकास से जुड़े सलाह देने तक ही सीमित था.''
''ऐसे में किसी की सम्बद्धता को वापस लेने का कोई सवाल ही नहीं उठता क्योंकि स्कूली स्तर पर पाठ्यपुस्तकें किसी दिए गए विषय पर ज्ञान और समझ के आधार पर विकसित की जाती हैं और किसी भी स्तर पर व्यक्तिगत लेखन का दावा नहीं किया जाता सकता है.''
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