चुनाव आयोग की सख़्ती की मिसाल, जब छीना गया बाल ठाकरे का वोट का अधिकार

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- Author, अनिल जैन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
इन दिनों लोकसभा चुनाव के लिए राजनीतिक दलों का प्रचार अभियान जारी है.
चुनाव आयोग की ओर से लागू आदर्श आचार संहिता के मुताबिक़, चुनाव प्रचार के दौरान न तो धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है और न ही धर्म, संप्रदाय और जाति के आधार पर वोट देने की अपील की जा सकती है.
इसके अलावा किसी भी धार्मिक अथवा जातीय समुदाय के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने वाले भाषण देने या नारे लगाने पर भी रोक है लेकिन अभी तक ऐसा नहीं दिखा है कि इन नियमों का पालन चुनाव आयोग करवा रहा है.
बीजेपी के चुनाव प्रचार में राम मंदिर का इस्तेमाल और राजस्थान के बाँसवाड़ा में प्रधानमंत्री मोदी के भाषण में मुसलमानों के बारे में की गई टिप्पणी ताज़ा उदाहरण हैं जहाँ चुनाव आयोग की भूमिका पर विपक्षी दल सवाल पूछ रहे हैं.
पीएम मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के एक पुराने भाषण का हवाला देते हुए मुसलमानों पर टिप्पणी की थी जिसमें उन्हें 'घुसपैठिए' और 'ज़्यादा बच्चे पैदा करने वाला' कहा गया था.
बाल ठाकरे का वो भाषण

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ऐसे माहौल में करीब ढाई दशक पहले भड़काऊ चुनावी भाषण के लिए शिव सेना के संस्थापक बाल ठाकरे पर छह साल के लिए चुनाव लड़ने और वोट देने पर लगी पाबंदी याद आती है.
1987 में महाराष्ट्र विधानसभा की विले पार्ले (मुंबई) सीट पर उप-चुनाव हो रहा था. मुख्य मुक़ाबला कांग्रेस के उम्मीदवार प्रभाकर काशीनाथ कुंटे और निर्दलीय उम्मीदवार डॉ. रमेश यशवंत प्रभु के बीच था, डॉ. रमेश प्रभु को बाल ठाकरे की पार्टी शिव सेना का समर्थन था.
उस समय शिव सेना को एक राजनीतिक दल के रूप में मान्यता नहीं मिली थी लेकिन शिव सेना सुप्रीमो बाल ठाकरे खुद डॉ. रमेश प्रभु के लिए चुनावी सभाओं के जरिए वोट मांग रहे थे.
13 दिसंबर 1987 को मतदान हुआ था और 14 दिसंबर को उस उप-चुनाव का नतीजा आया था. कांग्रेस उम्मीदवार प्रभाकर कुंटे को निर्दलीय डॉ. रमेश प्रभु के मुकाबले हार का सामना करना पड़ा था. इस उप चुनाव से पहले विले पार्ले सीट कांग्रेस के पास ही थी.
उप-चुनाव में हारने के बाद कांग्रेस के नेता प्रभाकर कुंटे ने डॉ. रमेश प्रभु के निर्वाचन को हाई कोर्ट में चुनौती दी, उन्होंने आरोप लगाया कि डॉ. रमेश प्रभु भड़काऊ और नफरत फैलाने वाले भाषणों के सहारे चुनाव जीते हैं, उन्होंने अपने आरोप के समर्थन में सबूत पेश करते हुए डॉ. रमेश प्रभु का चुनाव रद्द करने की अपील की.
कई महीनों तक चली सुनवाई के बाद 7 अप्रैल 1989 को बॉम्बे हाई कोर्ट ने डॉ. रमेश प्रभु और बाल ठाकरे को 'जनप्रतिनिधित्व कानून 1951’ में परिभाषित 'चुनाव में भ्रष्ट आचरण' का दोषी पाया और इस आधार पर विले पार्ले सीट के उप-चुनाव के नतीजे को रद्द कर दिया.
बॉम्बे हाई कोर्ट के इस फैसले के ख़िलाफ़ डॉ. रमेश प्रभु ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की लेकिन 11 दिसंबर 1995 को सुप्रीम कोर्ट ने यह अपील ख़ारिज कर दी और बॉम्बे हाई कोर्ट के फ़ैसले को बरकरार रखा.
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जेएस वर्मा ने अपने फ़ैसले में लिखा था, "विले पार्ले विधानसभा क्षेत्र में 29 नवंबर, 9 दिसंबर और 10 दिसंबर 1987 को चुनावी सभाओं में डॉ. रमेश प्रभु और बाल ठाकरे के दिए गए भाषणों को इस मामले में जांच का आधार बनाया गया है. इन सभाओं में बाल ठाकरे ने कहा था कि 'हम हिंदुओं की रक्षा के लिए चुनाव लड़ रहे हैं. हमें मुस्लिम वोटों की चिंता नहीं है. ये देश हिंदुओं का था और हिंदुओं का ही रहेगा'. उनके इन भाषणों के आधार पर दोनों को चुनाव में भ्रष्ट आचरण का दोषी पाया जाता है."
बाल ठाकरे छह साल के लिए मताधिकार से वंचित

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सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस फैसले के जरिए डॉ. रमेश प्रभु का चुनाव रद्द करने के बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा यानी डॉ. प्रभु को तो सजा मिल गई लेकिन उनका चुनाव जिन बाल ठाकरे के भ्रष्ट आचरण से प्रभावित हुआ था, वे तो किसी भी सार्वजनिक पद पर या किसी सदन के निर्वाचित सदस्य नहीं थे, इसलिए उनकी सजा क्या हो!
देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएस कृष्णमूर्ति के मुताबिक ऐसे मामलों में छह साल के लिए मताधिकार से वंचित किया जाना अधिकतम सजा है. ऐसे मामले अंतिम निर्णय के लिए राष्ट्रपति के पास जाते हैं, अपने पास आए संबंधित मामले पर राष्ट्रपति चुनाव आयोग से राय मांगते हैं और चुनाव आयोग की राय मिलने के बाद वे फैसला करते हैं.
सुप्रीम कोर्ट की ओर से बाल ठाकरे का मामला राष्ट्रपति को भेजा गया, उस समय राष्ट्रपति थे केआर नारायणन. मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर उस समय डॉ. मनोहर सिंह गिल थे और उनके साथ जेएम लिंग्दोह और टीएस कृष्णमूर्ति चुनाव आयुक्त थे.
राष्ट्रपति नारायणन ने तय प्रक्रिया के तहत बाल ठाकरे का मामला चुनाव आयोग के पास भेजा, चुनाव आयोग ने 22 सितंबर 1998 को अपनी सिफ़ारिश राष्ट्रपति कार्यालय को भेजी, इस सिफ़ारिश में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त डॉ. मनोहर सिंह गिल ने लिखा था कि अदालत में दोषी पाए जाने के कारण बाल ठाकरे को छह साल (11 दिसंबर 1995 से 10 दिसंबर 2001 तक) के लिए मताधिकार से वंचित कर दिया जाए.
चुनाव आयोग की इस सिफारिश पर तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन ने 28 जुलाई 1999 को छह साल के लिए बाल ठाकरे के मताधिकार पर रोक लगा दी थी.
यह पूरा वाकया बताता है कि उस समय देश की संवैधानिक संस्थाएं अपने आपमें कितनी मजबूत और अपने दायित्वों के प्रति कितनी मुस्तैद थीं.
इस समूचे मामले से जुड़ा एक दिलचस्प वाकया यह भी है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महाराष्ट्र की एक चुनावी रैली में भाषण देते हुए बाल ठाकरे के रद्द किए गए मताधिकार को उनकी नागरिकता और उनके मानवाधिकार से जोड़ते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा था जबकि यह निर्णय अदालत और चुनाव आयोग का था.
पीएम मोदी ने 9 अप्रैल 2019 को लातूर की चुनावी रैली में कहा था, ''मैं कांग्रेस वालों से कहता हूँ कि जरा दर्पण में अपना मुंह देखो, आपके मुंह से मानवाधिकार की बातें शोभा नहीं देती है, आप कांग्रेस वालों हिंदुस्तान के एक-एक बच्चे को जवाब देना पड़ेगा, आप कांग्रेस वालों ने बाला साहेब ठाकरे की नागरिकता छीन ली थी, उनका मतदान करने का अधिकार छीन लिया था."
लातूर की जिस सभा के मंच से मोदी ने यह बात कही थी, उस मंच पर उस समय बाल ठाकरे के बेटे और शिव सेना के मुखिया उद्धव ठाकरे भी मौजूद थे. जब चुनाव आयोग की सिफ़ारिश पर राष्ट्रपति ने बाल ठाकरे को छह साल के लिए मताधिकार से वंचित करने का फैसला सुनाया था तब कांग्रेस विपक्ष में थी और केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी.
खुद बाल ठाकरे ने अपना मताधिकार रद्द किए जाने के फैसले की आलोचना ज़रूर की थी लेकिन इसके लिए उन्होंने कांग्रेस को कभी जिम्मेदार नहीं ठहराया.
सज़ा के कारण बाल ठाकरे 1999 के लोकसभा चुनाव और महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव में वोट नहीं डाल पाए थे, उन्होंने 2004 में प्रतिबंध हटने के बाद पहली बार वोट डाला था.
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