इलेक्टोरल बॉन्ड से भारतीय लोकतंत्र पर क्यों उठ रहे हैं गंभीर सवाल

स्टेट बैंक ऑफ इंडिया

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राजनीतिक दलों को गुप्त तरीक़े से चंदा देने वाली स्कीम इलेक्टोरल बॉन्ड से जुड़ी जानकारियां अब धीरे-धीरे सामने आ रही हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने 18 मार्च यानी सोमवार को स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से कहा है कि इलेक्टोरल बॉन्ड से जुड़ी सभी जानकारियां साझा करें.

कोर्ट ने कहा कि 21 मार्च की शाम तक एसबीआई शपथ पत्र दाखिल कर कहे कि कोई जानकारी छिपाई नहीं गई है.

इलेक्टोरल बॉन्ड से जुड़ी जानकारियां साझा करने को लेकर अब तक कई तरह के सवाल उठे हैं.

पहले ये सवाल सुप्रीम कोर्ट ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया यानी एसबीआई के सामने जानकारी साझा ना करने को लेकर उठाए.

फिर ये सवाल उठा कि जैसी जानकारियां साझा की गईं, उससे ये मालूम नहीं चल रहा कि किसने किस राजनीतिक दल को कितने रुपये इलेक्टोरल बॉन्ड के ज़रिए दिए.

इन सवालों के जवाब सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद मिलने तो लगे हैं, मगर एक सवाल अब भी कायम है.

भारतीय तिरंगा

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राजनीतिक दल और इलेक्टोरल बॉन्ड से मिले चंदे

बीजेपी: 6986 करोड़ रुपये

टीएमसी: 1397 करोड़ रुपये

कांग्रेस: 1334 करोड़ रुपये

बीआरएस: 1322 करोड़ रुपये

बीजेडी: 944 करोड़ रुपये

डीएमके: 656 करोड़ रुपये

इलेक्टोरल बॉन्ड किन कंपनियों ने सबसे ज़्यादा ख़रीदा

चुनाव आयोग

इलेक्टोरल बॉन्ड पर राजनीतिक दलों ने क्या बताया, क्या नहीं?

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राजनीतिक पार्टियों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में चंदा देने वालों की जो जानकारी साझा की गई थी, उसे अब चुनाव आयोग ने सार्वजनिक किया है. ये जानकारी सील कवर में साझा की गई थी.

डीएमके को सबसे ज़्यादा चंदा क़रीब 509 करोड़ रुपये फ्यूचर गेमिंग कंपनी से मिला. डीएमके को इलेक्टोरल बॉन्ड के ज़रिए कुल 656 करोड़ रुपये मिले हैं.

डीएमके उन कुछ राजनीतिक दलों में से एक है, जिसने चंदा देने वालों की जानकारी साझा की थी. बीजेपी, कांग्रेस, टीएमसी और आम आदमी पार्टी ने ये जानकारियां चुनाव आयोग से साझा नहीं की थीं.

बीजेपी ने कहा था कि चंदा देने वालों के नाम का कोई रिकॉर्ड नहीं रखा गया.

टीएमसी और जनता दल यूनाइटेड यानी जेडीयू ने 2018-19 में चंदा देने वालों की पहचान सार्वजनिक नहीं की है.

जेडीयू ने दो चंदा देने वालों के नाम बताए हैं. ये नाम हैं श्रीसीमेंट और भारती एयरटेल.

टीएमसी ने किसी भी चंदा देने वाले का नाम नहीं बताया. टीएमसी ने इस बारे में कहा, ''कई सारे बॉन्ड्स हमारे पार्टी कार्यालय के ड्रॉप बॉक्स में डाले गए या पार्टी समर्थकों के ज़रिए हम तक पहुंचाए गए. हमारे पास चंदा देने वालों की जानकारी नहीं है.''

जेडीयू ने भी ऐसा ही कारण चुनाव आयोग को दिए जवाब में बताया था.

प्रशांत भूषण

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भारत का लोकतंत्र और इलेक्टोरल बॉन्ड की व्यवस्था

इलेक्टोरल बॉन्ड को कई जानकार लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक बता चुके हैं.

जब सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड को असंवैधानिक क़रार दिया था, तब वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहा था कि इस फ़ैसले का भारत के लोकतंत्र पर लंबा असर होगा.

ऐसे में अब लौटते हैं मूल सवाल पर कि क्या इलेक्टोरल बॉन्ड लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक साबित हुए?

इलेक्टोरल बॉन्ड से मिली जानकारी से पारदर्शिता, चंदे के बदले सरकार से फ़ायदा, केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग जैसे कई सवाल सतह पर आ गए हैं.

बीजेपी और कांग्रेस

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पारदर्शिता

ज़्यादातर राजनीतिक दलों की ओर से चुनाव आयोग को भी चंदा देने वालों के नाम नहीं बताए गए हैं.

बीजेपी, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, टीएमसी की ओर से जो जवाब दिए गए, उनमें किसी डोनर का नाम नहीं है. डीएमके और जेडीयू ने कुछ डोनर्स के नाम बताए हैं.

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने 18 मार्च को एसबीआई से इलेक्टोरल बॉन्ड के अल्फान्यूमरिक नंबर देने के लिए कहा है. इस नंबर के ज़रिए बॉन्ड ख़रीदने वाले और उसे भुनाने वाले राजनीतिक दल के बारे में पता चल सकेगा.

वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने सोशल मीडिया पर लिखा, ''सुप्रीम कोर्ट ने जो अल्फा न्यूमरिक नंबर से जुड़ी जानकारी साझा करने के लिए कहा है, उससे ये पता चलेगा कि किस डोनर ने किस पार्टी को चंदा दिया. सरकार इसे छिपाने पर तुली हुई थी. सीआईआई, फिक्की, एसोचैम जैसी संस्थाएं भी इसे छिपाना चाहती थीं.''

बीबीसी से बातचीत में कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने भी कहा था, ''पहले कॉर्पोरेट घराने राजनीतिक दलों को खुले और पारदर्शी तरीक़े से चंदा दे रहे थे, लेकिन वे अपने मुनाफ़े का कुछ निश्चित फ़ीसद रक़म ही चंदा दे रहे थे. घाटा उठाने वाली कंपनी चंदा नहीं दे पा रही थी. हमें वापस वही तरीक़ा अपनाना चाहिए कि खुले और पारदर्शी तरीक़े से कोई भी चंदा दे पाए."

हालांकि इलेक्टोरल बॉन्ड के ज़रिए चंदा देने वालों के नाम कांग्रेस ने भी नहीं बताए हैं और वो पारदर्शिता के मामले में सवालों से परे नहीं है.

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई क़ुरैशी ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा था, ''ये काफ़ी अहम मुद्दा है क्योंकि राजनीतिक फंडिंग से जुड़ा मामला है. ये मुद्दा हमारे लोकतंत्र के चरित्र और विश्वसनीयता को प्रभावित करता है. क्या सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बावजूद राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता को लेकर जगी उम्मीद धूमिल हो गई है. ''

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का सबको सम्मान करना चाहिए, मगर इलेक्टोरल बॉन्ड में सुधार करके इसे वापस लाना चाहिए.

ईडी और सीबीआई
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केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल

बीते कुछ सालों में जिन कंपनियों ने सबसे ज़्यादा इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदे, उनमें कुछ ऐसी कंपनियां भी हैं जो केंद्रीय एजेंसियों के रडार पर रही हैं.

रिपोर्टर्स कलेक्टिव के सदस्य और वरिष्ठ पत्रकार नितिन सेठी ने बीबीसी हिंदी से कहा, ''ऐसी कंपनियां हैं जिनके यहां छापा पड़ा तो पार्टी फंड में पैसा दिया गया.''

नितिन सेठी की कही बात को कुछ उदाहरणों से समझा जा सकता है.

फ्यूचर गेमिंग एंड होटल सर्विसेज़ प्राइवेट लिमिटेड कंपनी ने क़रीब 1300 करोड़ रुपये के इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदे. इसमें से 509 करोड़ रुपये के इलेक्टोरल बॉन्ड डीएमके ने भुनाए. तमिलनाडु में डीएमके की सरकार है.

11 मई 2023 को ईडी ने इस कंपनी के ठिकानों पर छापेमारी की थी. ईडी का कहना था कि फ्यूचर गेमिंग एंड होटल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड ने कई राज्य सरकारों से समझौता किया था कि वो उनकी लॉटरियां पूरे देश में बेचेगी, मगर लॉटरी की बिक्री से हुई आय को जमा ना करके लॉटरी जारी करने वाले राज्य को धोखा दिया गया.

जब फ्यूचर गेमिंग एंड होटल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड पर छापा मारा गया, इसके कुछ दिन बाद इस कंपनी ने इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदे.

मेघा इंजीनियरिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड, वेदांता लिमिटेड भी केंद्रीय एजेसियों की जांच के दायरे में हैं. हेट्रो फार्मा कंपनी, हीरो मोटोकॉर्प, रश्मि ग्रुप और डीएलएफ ग्रुप ने भी केंद्रीय एजेंसियों की छापेमारी के बाद इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदे.

कांग्रेस ने बीजेपी पर आरोप लगाते हुए कहा, ''बीजेपी ने केंद्रीय एजेंसियों का ग़लत इस्तेमाल करके इन कंपनियों से इलेक्टोरल बॉन्ड के ज़रिए 400 करोड़ रुपये लिए.''

चुनावी बॉन्ड के ज़रिए 2019 से 2024 तक चंदा देने वाली टॉप 5 कंपनियों में से तीन कंपनियां ईडी और आयकर विभाग के जाँच के दायरे में थी.

सात अप्रैल 2022 को ईडी के संपत्ति जब्त किए जाने के पांच दिन बाद फ्यूचर गेमिंग कंपनी ने 100 करोड़ रुपये के इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदे थे.

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स्टेट बैंक ऑफ इंडिया पर उठते सवाल

इलेक्टोरल बॉन्ड के मामले में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं.

स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने इलेक्टोरल बॉन्ड की जानकारी देने के लिए 30 जून तक का समय मांगा था. सुप्रीम कोर्ट ने एसबीआई को राहत ना देते हुए पहले से तय डेडलाइन 12 मार्च 2024 तक ही सारी जानकारी मुहैया कराने के लिए कहा था.

30 जून तक का समय मांग रहे एसबीआई ने सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद 12 मार्च तक ही जानकारी मुहैया करवा दी.

सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने ये भी लिखा कि क्या एसबीआई जानबूझकर लोकसभा चुनाव तक जानकारी छिपाने की कोशिश कर रहा है?

एसबीआई ने जानकारी तो मुहैया करवाई मगर अधूरी. इस बात पर 15 मार्च और फिर 18 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने एसबीआई से नाराज़गी ज़ाहिर की. अब सुप्रीम कोर्ट ने 21 मार्च तक एसबीआई को शपथपत्र के साथ चुनाव आयोग को सारी जानकारी देने के लिए कहा है.

पत्रकार पूनम अग्रवाल ने सोशल मीडिया पर लिखा, ''मैंने साल 2018 में हज़ार-हज़ार रुपये के दो इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदे थे. लेकिन डेटा देखने पर मेरा नाम 20 अक्टूबर 2020 को दिखा रहा है. क्या ये ग़लती है या फिर मेरे नाम वाले किसी शख्स ने बॉन्ड ख़रीदे हैं. ये बड़ा इत्तेफ़ाक होगा. यूनिक नंबर से शक दूर हो जाएंगे. अभी 2020 की लिस्ट में मेरा नाम होना गंभीर सवाल खड़े करता है.''

साल 2022 में पीएम मोदी और अदार पूनावाला

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तुम मुझे चंदा दो, मैं तुम्हें फ़ायदा दूंगा

इलेक्टोरल बॉन्ड से जुड़ी जानकारी सामने आने से ये भी पता चला है कि चंदा देने वाली कंपनियों को कुछ राज्यों में फ़ायदा मिला है.

वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने चुनावी बॉन्ड ख़रीदने वाली दूसरे नंबर की कंपनी मेघा इंजीनियरिंग एंड इन्फ़्रास्ट्रक्चर लिमिटेड को लेकर सवाल किए हैं.

प्रशांत भूषण ने सोशल मीडिया पर लिखा, "11 अप्रैल 2023 को मेघा इंजीनियरिंग ने 100 करोड़ के इलेक्टोरल बॉन्ड किसको दिए? लेकिन एक महीने के अंदर ही उसे बीजेपी की महाराष्ट्र सरकार से 14,400 करोड़ रुपये कॉन्ट्रैक्ट मिल जाता है. हालांकि, एसबीआई ने इस जानकारी में बॉन्ड के नंबर छिपा लिए हैं लेकिन फिर भी कुछ डोनर और पार्टियों के मिलान करके एक अनुमान लगाया जा सकता है. ज़्यादातार चंदे 'एक हाथ दे, दूसरे हाथ ले' जैसे लग रहे हैं."

मेघा इंजीनियरिंग को लेकर अन्य सोशल मीडिया यूज़र्स भी सवाल कर रहे हैं.

सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का संसद में दिए एक बयान का वीडियो शेयर किया. इसमें वह मेघा इंजीनियरिंग की सराहना करते हुए सुनाई दे रहे हैं.

सीरम इंस्टीट्यूट के अदार पूनावाला के भी चंदा देने की जानकारी सामने आई है.

सोशल मीडिया पर पूनावाला के प्रूडेंट चुनावी ट्रस्ट के ज़रिए बीजेपी को चंदा देने की तारीख़ और इसके कुछ दिनों बाद पीएम मोदी से मिलने की तस्वीर साझा करके भी लोग सवाल उठा रहे हैं.

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आंध्र प्रदेश में टीडीपी के सांसद सी.एम. रमेश जिन्होंने ईडी की रेड के बाद बीजेपी का रुख़ किया था. उनकी कंपनी ने हिमाचल में क़रीब एक हज़ार करोड़ रुपये का कॉन्ट्रेक्ट हासिल किया और फिर पहले पांच और बाद में 40 करोड़ रुपये का इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदा.

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ऐसे कई और उदाहरण हैं, जिनकी इलेक्टोरल बॉन्ड के ज़रिए पड़ताल की जा रही है.

फ्यूचर गेमिंग एंड होटल सर्विसेज़ कंपनी के मालिक सैंटियागो मार्टिन

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आमदनी से ज़्यादा चंदा कहाँ से

इलेक्टोरल बॉन्ड के ज़रिए चंदा देने वाली कई ऐसी कंपनियाँ हैं, जिनका मुनाफ़ा अठन्नी है लेकिन चंदा रुपया है.

जानकारों का कहना है कि शैल कंपनियों के ज़रिए इलेक्टोरल बॉन्ड राजनीतिक दलों तक पहुंचाए गए. ताकि सीधा कनेक्शन ना निकाला जा पाए.

नितिन सेठी कहते हैं, ''ऐसी कंपनियां भी हैं, जिनका अपना कोई धंधा या मुनाफ़ा नहीं है लेकिन वो भी पार्टियों को चंदा दिये जा रही हैं. ऐसे कई व्यक्ति हैं जो बड़ी कंपनियों से जुड़े हैं लेकिन वो निजी तौर पर करोड़ों रुपये फंड दे रहे हैं.''

''ऐसी कंपनियां भी हैं जो ऐसे समय चंदा तो दे रही हैं, जब कोई मक़सद स्पष्ट नहीं है और न तो उनके पास इतना पैसा है, लेकिन वो कहीं और से पैसा लाकर राजनीतिक दलों को गोपनीय तरीक़े से फंड दे जाती हैं."

गेमिंग फ्यूचर कंपनी का दफ़्तर इतना साधारण दिखता है कि लोग हैरत जता रहे हैं कि ये कंपनी इलेक्टोरल बॉन्ड की सबसे बड़ी ख़रीदार कैसे हो सकती है?

नितिन सेठी बोले, ''असल में यह क़ानून का जामा पहना कर भ्रष्टाचार को वैध बनाने का मामला है. फ़्यूचर गेमिंग एंड होटल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड, जिसे एक लॉटरी किंग के नाम से जाने जाने वाले सैंटियागो मार्टिन चलाते हैं. इसका कोई भी मुनाफा नहीं है. इसका दफ़्तर भी नहीं मिलेगा, उसने हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा चंदा दिया.''

नितिन सेठी ने बीबीसी के कहा, ''नामी कंपनियों ने ख़ुद सीधे चंदा नहीं दिया, बल्कि एक छोटी सी निजी मालिकाने वाली कंपनी के मार्फत राजनीतिक दलों को कई सौ करोड़ रुपये चंदा दिया. उस कंपनी का आम तौर पर नाम तक पता नहीं चलेगा और ना ही उसका कोई मुनाफ़ा है. यह कंपनी हज़ारों करोड़ रुपये का कारोबार करती है लेकिन उसका कहना है कि उसे कोई मुनाफ़ा नहीं होता. लेकिन वो फिर राजनीतिक दलों को कई सौ करोड़ रुपये का फंड दे देती है.''

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