बृजभूषण शरण सिंह की सीट पर बीजेपी अब तक क्यों नहीं कर सकी है उम्मीदवार का फ़ैसला? - ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, प्रवीण कुमार
- पदनाम, कैसरगंज से बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से कैसरगंज लोकसभा सीट वर्तमान में सबसे ज़्यादा चर्चा में है.
दरअसल, महिला पहलवानों के यौन उत्पीड़न के आरोपों का कोर्ट में सामना कर रहे भारतीय कुश्ती संघ के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह इस सीट से बीजेपी के सांसद हैं.
दूसरी सबसे बड़ी वजह ये है कि बीजेपी समेत अन्य विपक्षी दलों ने अब तक इस सीट के लिये अपने उम्मीदवारों की घोषणा नहीं की है.
बीजेपी उत्तर प्रदेश में अपने सहयोगी दलों के लिए पांच सीट छोड़कर बाक़ी 75 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. 73 सीटों पर बीजेपी प्रत्याशियों की घोषणा कर चुकी है लेकिन रायबरेली और कैसरगंज सीट के लिये प्रत्याशियों की घोषणा अब तक नहीं हुई है.
कैसरगंज लोकसभा सीट से प्रत्याशी की घोषणा करने में बीजेपी का आलाकमान देरी क्यों कर रहा है, इसको लेकर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं.
राज्य की राजनीति पर नज़र रखने वाले ज़्यादातर विश्लेषकों का यही कहना है कि पार्टी बृजभूषण शरण सिंह पर अब तक कोई फ़ैसला नहीं कर सकी है.
'दो चरण खत्म होने का इंतज़ार कर रही थी बीजेपी'
वरिष्ठ पत्रकार नवलकांत सिन्हा कहते हैं, "महिला पहलवानों के यौन उत्पीड़न का आरोप झेल रहे बृजभूषण शरण सिंह की छवि को ही न केवल नुकसान पहुंचा है बल्कि इसके चलते भाजपा को भी बैकफुट पर रहना पड़ा था, चूंकि भाजपा की रणनीति हर सीट को जीतने की है इसलिये भाजपा कहीं न कहीं उत्तर प्रदेश में पहले और दूसरे चरण के चुनाव के बीत जाने का इंतज़ार कर रही थी क्योंकि इन्हीं दो चरणों में जाट बाहुल्य क्षेत्रों में चुनाव था जहां पर पार्टी को नुकसान होने की आशंका थी."
अब जबकि दो चरणों का मतदान हो चुका है और कैसरगंज में नामांकन दाखिल करने की प्रक्रिया भी 26 अप्रैल से शुरू हो चुकी है, इलाके के मतदाताओं को उम्मीदवार के नाम का इंतज़ार है.
इस सीट पर नामांकन की प्रक्रिया तीन मई तक चलेगी. चार मई तक नामांकन पत्रों की जांच की जाएगी और छह मई तक जो प्रत्याशी अपना नाम वापस लेना चाहेंगे, वो वापस ले सकते हैं.

ऐसे में एक बात तो साफ़ है कि बृजभूषण शरण सिंह को लेकर पार्टी अंतिम समय तक का इंतज़ार करना चाहती है, क्योंकि माना जाता है कि कैसरगंज ही नहीं, आसपास की कुछ सीटों पर उनका प्रभाव है.
वैसे दिलचस्प ये है कि लखीमपुर खीरी के सांसद और केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र टेनी के बेटे पर किसानों को कुचलने का मामला दर्ज है लेकिन उनकी उम्मीदवारी की घोषणा पार्टी ने दो मार्च को जारी पहली लिस्ट में की थी.
चुनाव प्रचार जारी रखे हुए हैं बृजभूषण शरण सिंह
हालांकि, इन सबके बीच बृजभूषण शरण सिंह इलाके में लोगों के बीच अपना चुनाव प्रचार जारी रखे हुए हैं.
बीते सप्ताह करनैलगंज विधानसभा क्षेत्र में बृजभूषण शरण सिंह के उनके अपने सरयू डिग्री कॉलेज में उनका चुनावी मंच लगा हुआ था. इस ‘चुनाव प्रबंधन बैठक’ में बायीं तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बड़ी सी तस्वीर है तो दाहिने तरफ़ बृजभूषण शरण सिंह की तस्वीर है.
पहले से निश्चित समय के मुताबिक दोपहर के ठीक तीन बजे बृजभूषण शरण सिंह गाड़ियों के लंबे काफ़िले के साथ कार्यक्रम में पहुंचते हैं.
वे वहां मौजूद कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहते हैं, "पार्टी तय करेगी कि प्रत्याशी कौन बनेगा लेकिन कैसरगंज की माला मोदी के नाम से जाएगी, हम 53 दिन पीछे चल रहे हैं. दो मार्च को पहली लिस्ट आयी थी तब से आज 53 दिन बीत चुके हैं, हमें मात्र 20 दिन के अंदर ढाई महीने का काम करना है."

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उन्हें भी मौजूदा असमंजस की स्थिति का पता है. वे कहते हैं, "ऐसा नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी वॉकओवर देगी. कोई न कोई प्रत्याशी होगा, हमें लगता है कि तीन मई के पहले तो प्रत्याशी घोषित हो ही जायेगा. प्रत्याशी को लेकर बड़ी जिज्ञासा है आप लोगों के अंदर, हम इतना ज़रूर कहेंगे कि प्रत्याशी का नाम जब आप लोग सुनेंगे तो खुश हो जायेंगे और जहां तक मेरा सवाल है ‘होइहि सोइ जो राम रचि राखा’(रामचरित मानस के एक दोहे का अंश)."
इस बात पर उत्साहित कार्यकर्ता समर्थन में ताली बजाते हुये नारे लगाते हैं. साथ ही वह मंच से यह भी कहते हैं, "अगर 53 दिन से हम पीछे हैं तो हमसे लड़ने वाले भी 53 दिन पीछे हैं, सबसे बड़ा प्रचार कैसरगंज का ई टिकटवा करावत है, कैसरगंज नाम बहुत बड़ा हो गया है, कैसरगंज का मतदाता बृजभूषण सिंह के साथ खड़ा है, यह पूरी दुनिया देख रही है."
कैसरगंज के लोग क्या कह रहे हैं?
कार्यक्रम में मौजूद बृजभूषण शरण के समर्थक मैन बहादुर सिंह अब तक टिकट नहीं मिलने के सवाल पर कहते हैं, "देरी क्यों हो रही है यह तो हमें नहीं पता लेकिन टिकट सांसद जी को मिलेगा. नहीं मिलने का सवाल ही नहीं है, यह हो सकता है कि सांसद जी के परिवार से किसी को टिकट दे दिया जाए लेकिन टिकट तो इन्हीं के पास ही रहेगा."
दरअसल, कैसरगंज की सीट के उम्मीदवार की अब तक घोषणा नहीं होने से ये कयास भी लगाया जा रहा है कि इस सीट से बृजभूषण शरण सिंह के बेटे या पत्नी को टिकट मिल सकता है.
कैसरगंज कस्बे में हमारी मुलाकात गोडहियां गांव के निवासी 55 वर्षीय सुंदरलाल यादव से हुई. वो अवधी अंदाज़ में कहते हैं, "टिकस तौ रायबरेली मा भी लटका हुवा है भैया, निशाखतिर (निश्चिंत) रहौ, टिकस भईया (बृजभूषण सिंह) का ही मिली.”

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कैसरगंज कस्बे में मिले 35 वर्षीय कलाम बताते हैं, "सांसद बृजभूषण शरण की छवि अच्छी है. व्यक्तिगत छवि के कारण हिंदू- मुसलमान दोनों धर्म के लोग इनको वोट देते हैं, क्षेत्र में आने पर दोनों धर्मों के लोगों से मिलते हैं सबके घर जाते हैं कोई भेद-भाव नहीं रखते, अगर भाजपा इनको टिकट देगी तो यही जीतेंगे नहीं तो सपा यहां से निकलेगी."
वहीं पयागपुर विधानसभा के करिमुल्लापुर निवासी राजू निषाद कहते हैं, "हमारे क्षेत्र में विकास का जितना काम होना चाहिये उतना हुआ नहीं है, मेरे गांव के पास की सड़क सालों से बेकार पड़ी है. आज तक नहीं बनी. नाली का काम भी नहीं हुआ है. सांसद जी विकास के काम पर ध्यान दिए बिना चुनाव जीत जाते हैं."
वहीं करनैलगंज विधानसभा क्षेत्र के ध्रुपराज रकसड़िया गांव के पूर्व प्रधान हैं. वे कहते हैं, "अपने लोकसभा क्षेत्र में बच्चों के लिए स्कूल खोला है. दंगल करवाते हैं. अपने लोगों का ध्यान रखने वाला ऐसा व्यक्ति या तो मोदी जी हैं या सांसद बृजभूषण शरण सिंह हैं."
बृजभूषण शरण सिंह का अपने क्षेत्र में दबदबा
चुनाव प्रबंधन बैठक के दौरान बृजभूषण शरण सिंह बताते हैं, "पूरे क्षेत्र में मेरे 55 छोटे-बड़े महाविद्यालय हैं जिसमें लगभग डेढ़ लाख छात्र पढ़ते हैं, कॉलेजों में पढ़ने वाले सभी छात्र-छात्रायें जो सभी धर्मों से आते हैं वो खुद और उनका परिवार मेरा परिवार है, उनके सुख में तो नहीं लेकिन दुख में मैं हमेशा खड़ा रहता हूं. मेरे क्षेत्र के लोगों का मुझसे लगाव ही मेरा बाहुबल है."
नाम न बताने की शर्त पर गोंडा ज़िले के एक बीजेपी कार्यकर्ता बताते हैं, "बृजभूषण शरण सिंह के कॉलेजों में पढ़ने वाले ज्यादातर छात्र चुनाव के समय में अपने अपने गांव में प्रचार में जुट जाते हैं. कॉलेजों के शिक्षक जातिगत समीकरण के आधार पर अपने क्षेत्रों में चुनाव प्रचार की कमान संभालते हैं. एक तरह से बृजभूषण शरण सिंह अपने क्षेत्र में पार्टी के समानांतर अपना अलग संगठन चलाते हैं.”
यहां भी देखना दिलचस्प है कि कैसरगंज लोकसभा ठाकुर बाहुल्य नहीं है, बल्कि ब्राह्मण वोटरों की संख्या ठाकुर वोटों से ज़्यादा है. लेकिन बृजभूषण शरण सिंह की ओबीसी जातियों में भी पकड़ दिखती है और यही इनकी सबसे बड़ी ताक़त है.
कैसरगंज और रायबरेली को छोड़ दिया जाये तो उत्तर प्रदेश की हर सीट पर प्रत्याशियों की घोषणा हो चुकी है.
कैसरगंज सीट से प्रत्याशी घोषणा में देरी क्यों हो रही है इस पर गोंडा के बीजेपी ज़िलाध्यक्ष अमर किशोर कश्यप कहते हैं, "देरी का कोई कारण नहीं है, सांसद जी पूरे प्रयास मे लगे हुये हैं कि उनका टिकट हो जाए. उन पर जो आरोप लगा है वो ग़लत है तो संगठन उनको टिकट दे सकता है. प्रत्याशी चयन को लेकर सर्वे कराये गये हैं. बूथ स्तर से लेकर, मंडल प्रभारी और ज़िले की पूरी टीम से सर्वे करके शीर्ष नेतृत्व को रिपोर्ट भेज दी गयी है. जल्द ही पार्टी की तरफ से इस पर फ़ैसला हो जाएगा."

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हालांकि अब तक उम्मीदवार के नाम का ऐलान नहीं होने से किस तरह की मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं, इस बारे में पूछे जाने पर अमर किशोर कश्यप कहते हैं, "जब देरी होती है तो कार्यकर्ता और पदाधिकारी भी परेशान हो जाते हैं कि कब उम्मीदवार का नाम आयेगा, कौन सा उम्मीदवार आयेगा हम उसे कैसे लड़ायेंगे? अगर प्रत्याशी के तौर पर वर्तमान सांसद को ही टिकट मिले तो आसानी होती है."
अगर पार्टी ने कैसरगंज से बृजभूषण शरण सिंह और उनके परिवार के बदले किसी और को उम्मीदवार बनाया, तब क्या होगा, इस बारे में कश्यप दावा करते हैं, "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने पूरे देश में जो काम किया है. उसको देखते हुए भाजपा पूरे देश में 400 से ज़्यादा सीटें जीतने जा रही है. केवल गोंडा ही नही कैसरगंज में कोई भी प्रत्याशी हो उसे हम पांच लाख वोटों के अंतर से जिताकर भेजेंगे."
कैसरगंज और गोंडा के आसपास की सीटों पर प्रभाव
कैसरगंज के आम मतदाताओं पर बृजभूषण शरण सिंह का प्रभाव दिखता है. यही वजह है कि पार्टी उनकी उपेक्षा करते हुए दिखना नहीं चाहती है. लेकिन आस पास की सीटों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर एक वरिष्ठ वरिष्ठ कार्यकर्ता ने कहा, "कैसरगंज की सीट पर उनकी अच्छी पकड़ है लेकिन यह कहना कि आस-पास की सीटों पर उनका इतना प्रभाव है कि वहां की भी जीत हार वो तय करते हैं, ये ठीक नहीं है."
करीब चार दशकों से पार्टी से जुड़े इस कार्यकर्ता ने दिलचस्प ढंग से इसे समझाया.
वो कहते हैं, "उनके बेटे प्रतीक भूषण गोंडा से विधायक हैं. 2017 में वे महज़ 11678 वोटों से जीते जबकि ज़िले के बाकी भाजपा विधायकों का जीत का अंतर 30 हज़ार से अधिक का था. 2022 विधानसभा चुनाव में ज़िले के बाकी विधायकों के जीत का अंतर 20 हज़ार से ज़्यादा का रहा, लेकिन सांसद जी के बेटे प्रतीक भूषण के गोंडा से जीत का अंतर 7055 तक आ गया. भाजपा और मोदी जी की लहर के बावजूद अपने बेटे को जैसे-तैसे जिता पा रहे हैं."

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क्या है विपक्ष की रणनीति
बहरहाल, कैसरगंज में दिलचस्प स्थिति ये है कि विपक्षी समाजवादी पार्टी ने अब तक अपने उम्मीदवार का एलान नहीं किया है.
गोंडा के सपा ज़िलाध्यक्ष अरशद ख़ान कैसरगंज से सपा प्रत्याशी का नाम घोषित करने में हो रही देरी पर कहते हैं, "हम तो भाजपा के प्रत्याशी के नाम का इंतज़ार कर रहे हैं. भाजपा के प्रत्याशी के नाम की घोषणा के बाद ही हम सामाजिक समीकरण के आधार पर अपने प्रत्याशी को चुनाव में उतारेंगे."
यह किस तरह की रणनीति है, इस बारे में पूछे जाने पर अरशद ख़ान बताते हैं, "अगर वो ठाकुर समाज से प्रत्याशी देते हैं तो हम ब्राह्मण प्रत्याशी देंगे. अगर वो किसी ब्राह्मण को अपना चेहरा बनाते हैं तो हम ठाकुर को उतारेंगे. अगर वो ओबीसी वर्ग से किसी को लाते हैं तो हमारी तरफ से लड़ने के लिए जिताऊ ओबीसी कैंडीडेट भी तैयार है. हम तो बस उनका इंतज़ार कर रहे हैं."

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अरशद ख़ान दावा करते हैं कि भले नामांकन का अंतिम दिन आ जाए, लेकिन समाजवादी पार्टी बीजेपी के उम्मीदवार के ऐलान के बाद ही अपने उम्मीदवार की घोषणा करेगी.
हालांकि एक चर्चा ये भी है कि क्या समाजवादी पार्टी कैसरगंज के वर्तमान सांसद बृजभूषण शरण सिंह के बीजेपी से टिकट कटने का इंतज़ार कर रही है कि ऐसी दशा में सपा बृजभूषण शरण सिंह को अपना उम्मीदवार बनाकर 2009 की तरह ही कैसरगंज से चुनाव लड़ाए.
इसके जवाब मे सपा ज़िलाध्यक्ष कहते हैं, "हम इस तरह के किसी इंतज़ार में नहीं हैं और ना ही इसको लेकर कोई चर्चा ही हुई है. लेकिन यदि कैसरगंज के वर्तमान सांसद का भाजपा टिकट काटती है और बृजभूषण शरण सिंह हमारी पार्टी से लड़ने की इच्छा ज़ाहिर करते हैं तो शीर्ष नेतृत्व से इस पर विचार करने के लिए मैं अनुरोध करूंगा."

कैसरगंज लोकसभा का समीकरण
ऐसे में कैसरंगज लोकसभा क्षेत्र में मतदाताओं का गणित जानना ज़रूरी है. यह चुनाव क्षेत्र गोंडा की तीन विधानसभाओं तरबगंज, करनैलगंज, कटरा और बहराइच ज़िले की दो विधानसभा कैसरगंज और पयागपुर से मिलकर बना है.
पिछले तीन बार से लगातर बृजभूषण शरण सिंह यहां से सांसद निर्वाचित हुए हैं. 2009 में समाजवादी पार्टी से जीते उसके बाद 2014 और 2019 में बीजेपी प्रत्याशी के तौर पर जीत दर्ज की थी.
मौजूदा समय में कैसरगंज लोकसभा की पांच विधानसभाओं में से चार विधानसभा तरबगंज, करनैलगंज, कटरा और पयागपुर पर बीजेपी का कब्ज़ा है जबकि कैसरगंज विधानसभा सपा के पास है यहां से आनंद यादव विधायक हैं.
यहां सपा की स्थिति भी ठीक ठाक रही है. 1996,1998, 1999 और 2004 चार बार लगातार सपा से बेनी प्रसाद वर्मा कैसरगंज से सांसद रहे.
यहां कुल मतदाताओं की संख्या करीब 18 लाख है. इसमें ठाकुर और यादव 7-7 प्रतिशत हैं. जबकि ब्राह्मण करीब 14 प्रतिशत हैं. मुसलमानों की अनुमानित संख्या 16 प्रतिशत है, तो अनुसूचित जाति के मतदाताओं की संख्या करीब 17 प्रतिशत है.
बृजभूषण शरण सिंह का राजनीतिक सफ़र
बृजभूषण शरण सिंह ने अपनी राजनीति की शुरुआत छात्र राजनीति से की थी, 1979 में साकेत महाविद्यालय से छात्र महासंघ का चुनाव जीता, 1987 में गन्ना समिति के चेयरमैन का चुनाव लड़ा और जीते.
1988 में एमएलसी का चुनाव लड़ा लेकिन 14 वोटों से हार गये. 1990 में बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा के गोंडा ज़िले के प्रभारी रहे. इसके बाद राम मंदिर आंदोलन की लहर में बीजेपी के टिकट पर 1991 में गोंडा से लोकसभा का चुनाव लड़े और जीत हासिल की.
1999 में बीजेपी से गोंडा से फिर निर्वाचित हुए. 2004 में बृजभूषण शरण ने अपनी सीट बदली और बीजेपी के टिकट पर बलरामपुर से जीत हासिल की. 2008 में बीजेपी के खिलाफ क्रॉस वोटिंग के कारण बीजेपी से निष्कासित हुए और 2009 का चुनाव सपा के टिकट पर कैसरंगज से लड़े और जीते.
2014 चुनाव से ठीक पहले बीजेपी में वापसी हुयी और कैसरगंज से बीजेपी प्रत्याशी के तौर पर जीत हासिल की. 2019 में भी कैसरगंज सीट से चुनाव लड़े और जीते.
बृजभूषण शरण सिंह 1996 में चुनाव नहीं लड़ पाए थे, तब दाउद इब्राहिम के लोगों को शरण देने के आरोप में उन पर टाडा लगा था और वे जेल भी गए थे. लेकिन उन्होंने अपनी पत्नी केतकी सिंह को 1996 में गोंडा से लोकसभा सीट से चुनाव लड़वाया और 80, 000 से ज़्यादा वोटों से जीत दिलायी.

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महिला पहलवानों ने लगाए हैं आरोप
वे 12 सालों तक भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष भी रहे और महिला पहलवानों के आरोप लगाए जाने के बाद उन्हें अपना पद छोड़ना पड़ा. दिल्ली पुलिस ने 354, 354ए, 354डी और 506 धारा के अंतर्गत मामला दर्ज किया था.
बृजभूषण शरण सिंह के विरोध में महिला पहलवान साक्षी मलिक और विनेश फोगाट के नेतृत्व में पहलवानों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर कई दिनों तक धरना दिया. विरोध स्वरूप कई पहलवानों ने अपने पदक भी वापस लौटाए.
इससे पहले 1996 में बृजभूषण शरण सिंह पर दाउद इब्राहिम के शूटरों के मदद का आरोप लगा था.
हालांकि बाद में कोर्ट से इस मामले में बरी किए गए थे. इससे पहले बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में 35 से ज़्यादा अभियुक्तों में उनका नाम शामिल रहा था, लेकिन 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें इस मामले में बरी किया था.
उनके बेटे प्रतीक भूषण गोंडा से विधायक हैं. वे लगातार दूसरी बार विधायक बने हैं जबकि उनके दूसरे बेटे करण भूषण सिंह वर्तमान में उत्तर प्रदेश कुश्ती संघ के अध्यक्ष हैं.
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