राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए महाराष्ट्र की महिलाओं का चुनावी घोषणापत्र क्या है?

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- Author, टीम बीबीसी मराठी
- पदनाम, .
बीबीसी न्यूज़ की मराठी टीम ने लोकसभा चुनाव, 2024 को देखते हुए महाराष्ट्र में महिलाओं के मुद्दों को राजनीतिक दलों, जन प्रतिनिधियों और सरकार तक पहुंचाने के लिए कामकाजी महिलाओं से बातचीत की है और इसके आधार पर ' महिलाओं का घोषणापत्र' जारी किया गया है.
ये महिलाएं अपने लिए, अपने परिवार के लिए, अपने समुदाय के लिए कुछ चाहती हैं. वे अपना विकास करते हुए दूसरों के विकास का सपना देख रही हैं. उन्हीं मांगों और सपनों के आधार पर ये चुनावी घोषणापत्र तैयार किया गया है.
महिलाओं का ये घोषणापत्र बुधवार को जारी कर दिया गया. बीबीसी मराठी ने महाराष्ट्र के पुणे में आयोजित एक कार्यक्रम में इसे लॉन्च किया और इस मौके पर अलग अलग क्षेत्रों में एक मुकाम हासिल करने वाली महिलाओं के साथ चर्चा की गई. चर्चा के दो सेशन हुए.
पहले सेशन में पैनल का संचालन बीबीसी मराठी पत्रकार दिपाली जगतप ने किया.
इस पैनल में- कांग्रेस नेता कमल व्यवहारे, एनसीपी (अजित पवार) नेता रूपाली थोंबरे, बीजेपी की राज्यसभा सांसद मेधा कुलकर्णी, सीपीएम नेता किरण मोघे और एनसीपी (शरद पवार) नेता विद्या चव्हाण ने अपना नज़रिया और सोच सामने रखी.
वहीं दूसरे सेशन में पैनल का संचानल बीबीसी मराठी पत्रकार अनघा पाठक ने किया.
पैनल में- महिलाओं के मुद्दों पर केंद्रित न्यूज़ वेबसाइट बहन बॉक्स की पत्रकार प्रियंका तुपे, इंडी जर्नल की पत्रकार प्राजक्ता जोशी, शिवसेना (यूबीटी) नेता सुषमा अंधारे और प्रोफेसर प्रतिमा परदेशी, दैनिक सकाल की संपादक शीतल पवार शामिल हुईं और अपने विचार साझा किए.
महिलाओं के मुद्दों पर चर्चा के लिए बीबीसी मराठी ने 1 मई 2024 को पुणे में एक सेमिनार का भी आयोजन किया था
इस सेमिनार में उम्र ज़ाहिर नहीं करने की शर्त के साथ पिंकी शिंदे ने बीबीसी मराठी से अपनी बात साझा करते हुए कहा, “मैंने बाथरूम में बैठकर महिलाओं को रोते हुए देखा है. ऐसा केवल यहीं नहीं है, बल्कि खेतों में, मिलों और कार्यस्थलों पर भी ऐसा है. मेरा मानना है कि महिलाओं को राष्ट्रीय अवकाश की तरह ही मासिक धर्म के दौरान चार दिन की छुट्टी मिलनी चाहिए. जहां भी महिलाएं कड़ी मेहनत करती हैं, उन्हें मासिक धर्म के दौरान दो या तीन दिन नहीं तो वेतन के साथ अवकाश मिलना चाहिए."
चाहे वह मासिक धर्म के दौरान सवैतनिक छुट्टी हो या काम के लिए समान वेतन, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की एकसमान उपलब्धता से लेकर समय से न्याय, हिंसा का उन्मूलन, रोज़गार के अवसर, कृषि की चिंताएं, जल प्रबंधन और नशे से मुक्ति जैसी कई मांगों को लेकर महाराष्ट्र की महिलाएं मुखरता से अपनी मांग रख रही हैं.
लोकसभा चुनाव के लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष सभी राजनीतिक दल इस समय ज़ोर-शोर से प्रचार कर रहे हैं. प्रचार के दौरान बड़े-बड़े वादे किये जा रहे हैं. सभी राजनीतिक दलों ने अपने घोषणापत्र में कई वादे किये हैं, जबकि सत्ताधारी दल अपने कामों की गिनती करा रहे हैं. लेकिन इन सबमें महिलाओं की उपेक्षा होती है और महाराष्ट्र की महिलाओं की शिकायत है कि राजनीतिक दलों के एजेंडे में महिलाओं के मुद्दों को गंभीरता से नहीं लिया जाता है.
बीबीसी मराठी ने महाराष्ट्र के पांच ज़िलों में महिला कार्यकर्ताओं से बात की और उनकी समस्याओं और मांगों को समझने की कोशिश की.
न्यूनतम मज़दूरी की मांग

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हम विदर्भ की गोंद आदिवासी महिलाओं से बात करने के लिए गोंदिया ज़िले के कुछ गांवों में गए. ये अपनी आजीविका के लिए पूरी तरह जंगल पर आश्रित हैं. इन महिलाओं का कहना है कि कृषि मज़दूरी या मनरेगा का काम रोज़गार की गारंटी नहीं है. यहां की महिलाएं सुबह पांच या छह बजे ही गांव के पास जंगल में पहुंच जाती हैं. वहां दोपहर के 12 बजे तक ये महिलाएं महुआ के फूल चुनती हैं और फिर से सिटी मार्केट में जाकर बेचती हैं.
मई और जून के मौसम में यही महिलाएं जंगल से तेंदू पत्ता इकट्ठा करती हैं, फिर उसे बेचने जाती हैं लेकिन आदिवासी महिलाओं की शिकायत है कि बाज़ार के भाव से पैसे नहीं मिलते हैं.
ये महिलाएं निराशा से कहती हैं, “मोदी जी दावा करते हैं कि उन्होंने महिलाओं को इतनी सारी चीज़ें दी हैं, लेकिन हमें आज तक कुछ नहीं मिला है.”
बीबीसी की टीम ने आंगनवाड़ी सेविकाओं और आशा वर्करों से भी बातचीत की है. आशा वर्करों ने कुपोषण की समस्या का ज़िक्र करते हुए कहा, “यहां कुपोषण है. बच्चे कुपोषित पैदा होते हैं. महिलाएं पूरा दिन जंगल में बिताती हैं, इसलिए वे अपने भोजन पर ध्यान नहीं दे पाती हैं. उन्हें पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता. सरकार की ओर से भी समय पर कुछ नहीं मिलता और मध्याह्न भोजन भी पर्याप्त नहीं मिलता. बच्चों का वज़न भी कम रहता है.”
आदिवासी महिलाओं के एक समूह ने बताया, “गांव में स्कूल और शौचालय नहीं है. आदिवासियों का फंड भी हम तक नहीं पहुंचता. ये सभी सुविधाएं मिलनी चाहिए. सरकारी घर का इंतज़ार करते-करते बूढ़े हो गए. आज भी हम झोपड़ियों में रहते हैं.”
टीबी और कैंसर का ख़तरा

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महाराष्ट्र के सोलापुर ज़िले में बीड़ी बनाने का काम खूब होता है. सोलापुर में कपड़े का काम कम होने के बाद बीड़ी बनाने का काम बढ़ गया. यहां घर में एक से ज़्यादा महिलाएं पूरे दिन बीड़ी बनाने का काम करती हैं.
इन महिलाओं ने हमें बताया, “तेंदू पत्ते से सिगार और बीड़ी बनाए जाते हैं. हमारे साथ बहुत सी महिलाएं बीड़ी बनाने का काम करती हैं. हमें टीबी और कैंसर होने का ख़तरा होता है, लेकिन हमारे कोई स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं हैं.”
इन महिलाओं के लिए सबसे मुश्किल मुद्दा यह है कि अगर बीड़ी बनाने की फैक्ट्री में कोई यौन उत्पीड़न या अन्याय होता है तो शिकायत करने के लिए उनके पास कोई तरीक़ा नहीं है. इतना ही नहीं, इन महिलाओं को कम भुगतान में काम करना होता है.
इन महिलाओं ने बताया, “हमें 1000 बीड़ी बनाने पर 180 रुपये मिलते हैं जबकि नियम के मुताबिक हमें 365 रुपये मिलने चाहिए. हमें कभी नियमानुसार भुगतान नहीं मिला है.”
जिन महिलाओं से हमलोग बात कर रहे थे उन एक महिला की गोद में बच्चा दूध पी रहा था. बच्चे को दूध पिलाते समय भी वह हाथ में तंबाकू लिए हुए थीं. जब उनसे पूछा गया कि इसका बच्चे के स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
महिला ने बताया, “कभी-कभी छोटे बच्चे मुंह में तंबाकू जाते ही उल्टी कर देते हैं. हम महिलाओं को टीबी, कैंसर, सीने में दर्द, खांसी, उल्टी जैसी कई बीमारियां हो जाती हैं. लेकिन इलाज का ख़र्च उठाने के लिए ना तो कोई स्वास्थ्य सुविधा है और ना ही कोई योजना. हमारे पास आजीविका का कोई दूसरा साधन भी नहीं है.”
इस महिला ने कामकाजी मुश्किलों का ज़िक्र करते हुए कहा, “गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को कोई छुट्टी नहीं मिलती है. हम केवल तीन महीने की अवैतनिक छुट्टी ले सकते हैं. हमें सवैतनिक अवकाश की सुविधा नहीं है. हमें कम से कम कुछ महीनों का अवकाश वेतन के साथ मिलना चाहिए.”
कपड़ा मिल महिला मज़दूरों का हाल

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कोल्हापुर ज़िले के इचलकरंजी शहर को 'महाराष्ट्र का मैनचेस्टर' कहा जाता है. देश में कपड़ा निर्माण और निर्यात का एक महत्वपूर्ण केंद्र है. भारत विश्व में वस्त्रों का तीसरा सबसे बड़ा निर्यातक है.
इसमें इचलकरंजी के कपड़ा उद्योग की बड़ी हिस्सेदारी है. लेकिन पावरलूम श्रमिक और मिल मालिकों की शिकायत यह है कि इचलकरंजी में कपड़ा उद्योग आज संकट में है.
कई कपड़ा मिलें बंद हो गई हैं और हैंडलूम ठप नज़र आ रहा है. इचलकरंजी में कपड़ा मिलों में बड़ी संख्या में महिलाएं काम कर रही हैं.
इनमें से कई महिलाएँ दस से पंद्रह वर्षों से भी अधिक समय से काम कर रही हैं. सूत कताई मिल में काम करते समय महिलाओं को लगातार आठ से नौ घंटे तक खड़े होकर काम करना पड़ता है. इन महिलाओं ने बताया कि इतने सालों तक काम करने और पूरे दिन कपास और सूत कातने से स्वास्थ्य संबंधी कई मुश्किलें आती हैं.
एक महिला ने कहा, “मासिक धर्म बहुत परेशानी का कारण बनता है. कुछ महिलाओं को बहुत तकलीफ होती है लेकिन कोई इलाज नहीं होता और उन्हें काम पर आना पड़ता है. मैंने कुछ महिलाओं को बाथरूम में रोते हुए भी देखा है. हम इसमें कई घंटों तक खड़े होकर काम करते हैं. इस दौरान असहनीय दर्द होता है. मेरा मानना है कि सरकार को राष्ट्रीय अवकाश की तरह मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को अवकाश देना चाहिए.”
इन महिलाओं पर घरेलू काम का बोझ होता है. ये अपने लिए स्वास्थ्य सुविधाएं और सरकारी बीमा योजनाओं का लाभ मांग रही हैं.
गन्ने की खेती करने वाली महिलाओं का हाल

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बीड ज़िले की पहचान गन्ने की खेती को लेकर है. साल के छह महीने गन्ना काटने वाले श्रमिक गांव और ज़िला छोड़कर मज़दूरी के लिए कोल्हापुर, सतारा या कर्नाटक चले जाते हैं. लेकिन उनकी समस्याएं वर्षों से जस की तस बनी हुई हैं.
गन्ने की खेती में काम करने वाली महिला मज़दूरों का हाल जानने के लिए हम एक गांव में पहुंचे. वहां एक महिला ने बताया, “गन्ना को काटने, उसे बांधने और ट्रक पर लोड करने में काफी मेहनत लगती है. इसका हमारे शरीर पर असर पड़ता है."
वहीं कुछ मज़दूरों को चीनी मिल जाना होता है. वे बताती हैं, “इसके लिए सुबह पांच बजे उठना पड़ता है. खाने के लिए कुछ बनाकर जाने के बाद वापस आने में कभी-कभी रात के 11 या 12 बज जाते हैं. फिर जब हम देर रात आते हैं तो अक्सर भूखे पेट ही सो जाते हैं. बच्चे भूख से मर रहे हैं.”
जिन 12-13 गन्ना श्रमिकों से हमने बातचीत की उनमें से अधिकांश की गर्भाशय की थैली निकाल दी गई थी. जब एक महिला से इसका कारण पूछा गया तो उसने कहा, ''हमारे पास इसका कोई इलाज नहीं है. गन्ने के काम से पेट पर बहुत ज़ोर पड़ता है. 13-14 साल की उम्र में हमारी शादी हो गई. तब से हम गन्ने की कटाई और ढुलाई का काम कर रहे हैं.”
“तब से हम यही करते आ रहे हैं चाहे मासिक धर्म हो या गर्भावस्था. गन्ने बहुत भारी होते हैं. इन्हें बांधकर ट्रक पर लादना पड़ता है. इससे बहुत दर्द होता है और बैग पर बहुत अधिक दबाव पड़ता है. इस मुसीबत में भी हमें कोई राहत नहीं मिलती. ना ही कोई साधारण गोली दी जाती है. हम इसे तीन-तीन, चार-चार साल तक झेलते रहते हैं. जब यह असहनीय हो जाता है तो अस्पताल जाते हैं और डॉक्टर कहते हैं कि इसे हटाना होगा.”
सभी महिलाओं ने गर्भाशय हटाने का एक ही कारण बताया. महिला गन्ना श्रमिकों के बच्चे भी एक बड़ी समस्या हैं. चूँकि गाँव में घर पर बच्चों की देखभाल करने वाला कोई नहीं है, इसलिए श्रमिक बच्चों को अपने साथ ले जाते हैं. लेकिन महिलाओं का कहना है कि वहां बच्चों को भी तकलीफ होती है.

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बीबीसी मराठी की टीम ने रत्नागिरी ज़िले के हार्ने बंदरगाह की मछुआरे समुदाय की महिला मज़दूरों से भी बात की.
हार्ने बंदरगाह की एक विशेषता यहां होने वाली करोड़ों रुपये की मछली की नीलामी है. हार्ने बंदरगाह से मछलियां मुंबई भेजी जाती हैं और वहां से मछलियां गोवा, कर्नाटक, केरल जैसे कई राज्यों और यहाँ तक कि विदेशों में भी निर्यात की जाती हैं. लेकिन यहां काम करने वाली महिलाओं का कहना है कि उनकी समस्याओं पर किसी का ध्यान नहीं है.
हार्ने बंदरगाह पर 25 साल से मछली बेच रही एक महिला ने बीबीसी मराठी से कहा, “हम महिलाओं की एक बड़ी समस्या यह है कि हमारे पास यहां शौचालय नहीं है. बंदरगाह पर कोई शौचालय नहीं है. हम यहां घंटों बैठे रहते हैं लेकिन शौचालय नहीं जा पाते. साथ ही पीने के पानी की भी कोई सुविधा नहीं है.”
ये महिलाएं ये कहते हुए भावुक हो जाती हैं कि मछली का कारोबार करने से ही उनका घर चलता है और सबकुछ इसी पर निर्भर है. इन महिलाओं की एक मांग ये भी है कि परंपरागत मछली मारने की विधि को आधुनिकतम तकनीक के सामने सुरक्षा दी जाए.
संपत्ति में समान हिस्सेदारी नहीं

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हमने महाराष्ट्र में ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में मौलिक अधिकारों की वकालत करने वाली महिलाओं से बातचीत की. हमारा उद्देश्य उनके मुद्दों और मांगों को समझना था. 'अट्टा डीप एकेडमी फॉर ग्रासरूट लीडरशिप' ने महिलाओं के मुद्दों पर शोध किया है.
इस शोध के आधार पर उन्होंने सरकार से यह सुनिश्चित करने की मांग की है कि कृषि भूमि का स्वामित्व पति और पत्नी के नाम पर संयुक्त रूप से हो और उत्तराधिकार का क़ानून सही ढंग से लागू हो.
कोरो इंडिया की अमिता जाधव कहती हैं, "वैश्विक स्तर पर केवल 12 से 13% महिलाओं के नाम पर कृषि भूमि है. भारत में यह 13% है. उत्तराधिकार क़ानून महिलाओं को अपने वैवाहिक घर में संपत्ति और संपत्ति का अधिकार देता है. हालांकि, महिलाओं पर अक्सर विरासत में मिली संपत्ति को छोड़ने के लिए दबाव डाला जाता है. सरकार और प्रशासनिक नौकरशाही अक्सर अपने नाम पर संपत्ति चाहने वाली महिलाओं के लिए बाधाएं पैदा करती हैं."
अमिता जाधव ने बताया, "पिता की मृत्यु के बाद कानूनी उत्तराधिकारियों के पंजीकरण की मांग, विवाह पंजीकरण अधिनियम का कार्यान्वयन, संपत्ति में क़ानूनी उत्तराधिकारियों के बारे में ग्राम सभा में जानकारी अपडेट करना और उत्तराधिकार अधिनियम के बारे में सरकारी जागरूकता अभियान से महिलाओं को संपत्ति में हिस्सेदारी सुनिश्चित कर सकते हैं."
सूखे का समाधान ढूंढती महिलाएं

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सूखा प्रभावित इलाक़ों में महिलाएं जल संरक्षण में अहम भूमिकाएं निभाती हैं. ग्राम सभा और ग्राम विकास परिषदों में महिलाओं की संख्या बढ़ाने की वकालत भी की जा रही है क्योंकि महिलाओं का मानना है कि गांवों में पानी की कमी का खामियाज़ा सबसे ज़्यादा उन्हें ही भुगतना होता है.
गांवों और समुदायों में नशामुक्ति, बाल विवाह को रोकने के लिए कार्रवाई, महिला मज़दूरों का पंजीकरण, ग्राम पंचायत में एकल महिलाओं का अलग पंजीकरण, घरेलू हिंसा और दहेज़ पर रोक लगाने वाले कानूनों के कार्यान्वयन के साथ-साथ एलजीबीटीक्यू समुदाय के लिए रोज़गार की गारंटी देने के उपायों की भी महिलाओं ने वकालत की है.
तालाबों और झीलों को पुनर्जीवित करने में जुटी महिलाएं सरकार से महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा देने के अलावा स्वरोज़गार के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों को बढ़ावा देने का आग्रह कर रही हैं.
घरेलू हिंसा पर चिंता
2005 में महिलाओं को घरेलू हिंसा से बचाने के लिए कानून बनाए जाने के बावजूद, मुंबई की यास्मीन शेख इसे ठीक से लागू करने की आवश्यकता पर ज़ोर देती हैं.
उन्होंने कहा, "पतियों को अपनी पत्नियों के साथ दुर्व्यवहार करने की अनुमति देने की पारंपरिक सोच को त्यागना चाहिए. घरेलू हिंसा के दायरे को समझना और उससे घरों को बचाना ज़रूरी है. क़ानून के साथ-साथ जागरूकता भी ज़रूरी है."
बीबीसी मराठी से बातचीत में कुछ महिलाएं मनपसंद पोशाक पहनने की आज़ादी की मांग भी करती हैं जबकि कुछ यौन शिक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग करती हैं. दरअसल महाराष्ट्र की महिलाओं का ये घोषणापत्र उन मुद्दों को भी प्राथमिकता देता है, जिन्हें समाज में अक्सर नजरअंदाज़ कर दिया जाता है.
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