जयशंकर: दुनिया में भारत की सशक्त आवाज़ या आक्रामकता से देश में मिलती लोकप्रियता?

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- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत का मानना है कि यूक्रेन युद्ध ने दुनिया को और विभाजित कर दिया है और पश्चिमी देशों की बनाई हुई विश्व व्यवस्था में बड़े पैमाने पर बदलाव की ज़रूरत है.
लेकिन ये खरी बात अमेरिका जैसे ताक़तवर देश से कहे कौन?
चीन ये बात खुलकर कहता रहा है और ख़ुद को विकासशील देशों का अगुआ कहने वाले भारत ने भी ये ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ले ली है.
आज भारत के विदेश मंत्री डॉक्टर सुब्रमण्यम जयशंकर, एक ऐसे व्यक्ति के रूप में उभरे हैं, जो विकासशील देशों की सोच को बिना किसी संकोच के सधे हुए लफ़्ज़ों में व्यक्त कर रहे हैं.
भारतीय पक्ष का दावा है कि जयशंकर ये काम बख़ूबी कर रहे हैं. भारत पर उसके शक्तिशाली पश्चिमी साझीदार देशों का भारी दबाव है कि वो रूस से अपने रिश्ते तोड़ ले, और इस संघर्ष में पश्चिमी खेमे के साथ आ जाए लेकिन भारत ने ऐसा नहीं किया.
भारत ने साफ़ कर दिया है कि वो इस युद्ध में 'किसी भी पक्ष का साथ नहीं देगा'. भारत ने दुनिया के दबाव का मुक़ाबला करने में ये जो नया आत्मविश्वास दिखाया है, उसका सबसे बड़ा चेहरा जयशंकर ही हैं.
विदेश मंत्री जयशंकर की भारत में बढ़ती लोकप्रियता की सबसे बड़ी वजह यही है कि लोग देख रहे हैं कि वो अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसी दुनिया की बड़ी ताक़तों के सामने खड़े हैं.
जयशंकर के बयान निडर, तीखे और कुछ लोगों की नज़र में चिढ़ाने वाले रहे हैं.

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हाल के वर्षों में लोकतंत्र की रेटिंग करने वाली पश्चिमी देशों बड़ी संस्थाएं, भारत के लोकतंत्र में गिरावट और अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे बर्ताव को लेकर चिंता जताती रही हैं. इन चिंताओं को लेकर जयशंकर का रुख़ बेहद आक्रामक रहा है.
उन्होंने कहा, "ये तो ढोंग है. दुनिया में कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्होंने ख़ुद को ऐसे सर्टिफिकेट जारी करने का ठेकेदार बना रखा है. वो इस बात को पचा नहीं पा रहे हैं कि भारत अब उनकी रज़ामंदी का तलबगार नहीं है."
जयशंकर के इस बयान में चौंकाने वाली बस एक ही बात थी. उनका ये तीखा बयान कूटनीतिक मुहावरों की चाशनी में घोलकर नहीं दिया गया था.
ज़ाहिर है, जयशंकर को ये पता है कि भारत के आम लोग भी अपने देश की आलोचना का जवाब इसी ज़ुबान में देते. ऐसे बयानों ने जयशंकर को आम भारतीयों और ख़ास तौर से राष्ट्रवादियों की नज़र में हीरो बना दिया है.

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इस साल जनवरी में, जब पश्चिमी मीडिया ने बीजेपी की अगुआई वाली सरकार को 'हिंदू राष्ट्रवादी सरकार' कहा तो जयशंकर ने इसका तीखा जवाब दिया था.
तब उन्होंने कहा था, "अगर आप विदेशों के अख़बार पढ़ें तो वो हिंदू राष्ट्रवादी सरकार जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं. अमेरिका या यूरोप में वो ईसाई राष्ट्रवादी नहीं कहते. ऐसे जुमले तो वो ख़ास तौर से हम लोगों के लिए बचाकर रखते हैं."
राजनीतिक और विदेशी मामलों के जानकार डॉक्टर सुव्रोकमल दत्ता कहते हैं कि वो पश्चिमी देशों के प्रति जयशंकर के आक्रामक रवैये का पूरी तरह समर्थन करते हैं.

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डॉक्टर सुव्रोकमल कहते हैं, "जब बात दुनिया के देशों और ख़ास तौर से पश्चिमी देशों से निपटने की होती है तो जयशंकर की नज़र में भारत के हित सर्वोपरि होते हैं. यूक्रेन के मौजूदा संकट के दौरान रूस से तेल ख़रीदने को लेकर उन्होंने जिस तरह पश्चिमी देशों को जवाब दिया, उससे वो भारत में बेहद लोकप्रिय हो गए हैं."
हालांकि 'मोदीज़ इंडिया: हिंदू नेशनलिज़्म ऐंड द राइज़ ऑफ़ एथनिक डेमोक्रेसी' के लेखक, और लंदन में किंग्स कॉलेज के प्रोफ़ेसर क्रिस्टॉफ जैफरलो तर्क देते हैं कि 'जयशंकर का तौर-तरीक़ा, एक लोकप्रिय राष्ट्रवादी का है. और, वो ये बातें अपने देश की जनता का दिल जीतने के लिए करते हैं.'
क्रिस्टॉफ जैफरलो कहते हैं, "जिस तरह जयशंकर पश्चिमी देशों के बारे में बात करते हैं, उसका असल मक़सद घरेलू स्तर पर अपनी बातों का असर छोड़ना होता है. उनके इस आक्रामक रवैए की बड़ी वजह यही है. लेकिन, ये रवैया कोई नया नहीं."
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वो कहते हैं, "आज दुनिया के बहुत से राष्ट्रवादी नेता ऐसी ही ज़ुबान बोलते हैं. तुर्की के अर्दोआन भी इसी अंदाज़ में बोलते हैं. हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बान भी इसी तरह के जुमले इस्तेमाल करते हैं. ये सब अपने देश की जनता को लुभाने के लिए ये तरीक़ा अख़्तियार करते हैं. आम जनता को व्यंग्य-भरी और बेलाग भाषा पसंद आती है."
लंदन की यूनिवर्सिटी ऑफ़ वेस्टमिंस्टर में सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ डेमोक्रेसी की निदेशक प्रोफ़ेसर निताशा कौल कहती हैं, "भारत और पश्चिमी देशों के बीच मध्यस्थ के रूप में जयशंकर बहुत सावधानी और चतुराई से रिवर्स इंजीनियरिंग का इस्तेमाल कर रहे हैं."
"वो ऐसे तर्कों का इस्तेमाल करते हैं, जो बुनियादी तौर पर तो तरक़्क़ीपसंद मालूम होते हैं. लेकिन, वो उन्हीं तर्कों को पुरातनपंथी और स्वदेशी रवैये को जायज़ ठहराने के काम में लाते हैं."
निताशा कौल कहती हैं कि पश्चिम में ऐसे बहुत से लोग हैं, जो जयशंकर की पश्चिमी देशों के औपनिवेशिक इतिहास की आलोचना का समर्थन करेंगे. लेकिन वो उन्हीं तर्कों का प्रयोग अपने देश की जनता को लुभाने के लिए भी करते हैं, जो पश्चिमी देशों की पुरानी करतूतों की आलोचक है.

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दोस्त और दुश्मन देश किस तरह देखते हैं?
प्रोफ़ेसर हुआंग युनसॉन्ग, चीन के चेंगडू शहर में सिचुआन यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ के एसोसिएट डीन हैं. जयशंकर, चीन में भारत के सबसे लंबे कार्यकाल वाले राजदूत रहे थे.
प्रोफ़ेसर हुआंग कहते हैं, "चीन के बौद्धिक और सामरिक हलकों में कुछ लोग हैं, जो जयशंकर से परिचित हैं. वो जयशंकर का एक ऐसे यथार्थवादी राजनेता के तौर पर सम्मान करते हैं, जो सख़्त मिज़ाज, धूर्त और साहसिक हैं."
"वो अपने कूटनीतिक हुनर में शांत और तेज़ दिमाग़ भी हैं. उनका ज़हन हमेशा इस बात को लेकर सतर्क रहता है कि भारत की सामरिक स्वायत्तता को कैसे बरक़रार रखा जाए."
प्रोफ़ेसर निताशा कौल का कहना है, "निश्चित रूप से हम इस बात से इनकार नहीं कर सकते हैं कि मानवाधिकारों के नाम पर दूसरे देशों में दख़लंदाज़ी से लेकर, लोकतंत्र को बढ़ावा देने के नाम पर पश्चिमी देश पाखंडी रवैया अपनाते आए हैं."

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लेकिन वो ये भी कहती हैं कि पश्चिमी देशों के प्रति जयशंकर के बयान और जुमले, "असल में नैतिकता का जामा पहनाकर पेश की गई चालाकी है".
वो कहती हैं, "मैंने जो काम किया है उसमें इसे उपनिवेशवाद के ज़ख़्म को नैतिकता का हथियार बनाकर उसे पश्चिम के ख़िलाफ़ इस्तेमाल करने की तरह देखा है. ये स्वदेशी आक्रामकता और अहंकार के रूप में दिखाई देती है."
"मुझे लगता है कि जयशंकर आज जो कुछ कर रहे हैं, और भारत की विदेश नीति का जो मौजूदा सिद्धांत है, उसका मक़सद जयशंकर जैसे चेहरों की मदद से पश्चिमी देशों को उनके इतिहास और मानवता के हवाले से कठघरे में खड़ा करना है. रूस और यूक्रेन का युद्ध इसकी मिसाल है."

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प्रोफ़ेसर निताशा कौल कहती हैं कि पश्चिमी देशों को आम तौर पर जयशंकर की इन तीखी तक़रीरों का अंदाज़ा है. लेकिन जब वो इसकी तुलना अपनी मुख्य चुनौती चीन से करते हैं, तो उन्हें जयशंकर के बयान कम बुरे मालूम होते हैं.
वो कहती हैं, "जयशंकर का ये दांव कारगर है क्योंकि साफ़ कहें तो इसमें चीन भारत का सबसे बड़ा साझेदार है. . पश्चिमी देशों के जानकार जो जयशंकर के इन बयानों के पीछे की सच्चाई जानते हैं, वो यही मानते हैं कि चीन की तुलना में उनके लिए भारत कोई ख़ास ख़तरा नहीं है."
वहीं प्रोफ़ेसर क्रिस्टॉफ जैफरलो ये मानते हैं कि जयशंकर के इन साहसिक बयानों और भाषणों की जड़ उनके उस यक़ीन में है, जिसके मुताबिक़ वो ये मानते हैं कि पश्चिमी देशों के दबदबे वाली विश्व व्यवस्था बदल रही है.
अपनी किताब, 'द इंडिया वे: स्ट्रैटेज़ीस फॉर ऐन अनसर्टेन वर्ल्ड' (2020) में जयशंकर ने बार-बार इसका हवाला दिया है. उन्होंने लिखा है, "आज हमारे सामने ऐसा बदलाव आ रहा है, जैसा हमने पहले कभी नहीं देखा."
प्रोफ़ेसर जैफरलो तर्क देते हैं, "ये इशारा दुनिया में सत्ता की धुरी के खिसकने की तरफ़ है. आज उभरते हुए देश हक़ीक़त बयान करने का साहस कर सकते हैं. पश्चिमी देश ढोंग करते हैं. अगर आप ख़ुद अनैतिक काम करते हैं, तो फिर आप दूसरों को नैतिकता पर भाषण नहीं सुना सकते."

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जयशंकर की तरक़्क़ी
मोदी सरकार के भीतर ये सोच है कि मंत्रिमंडल में जयशंकर के सितारे बुलंदी पर हैं. ख़ास तौर से जयशंकर ने जिस तरह से यूक्रेन युद्ध और रूस से तेल ख़रीदने के मसलों को संभाला है, उससे उनकी शोहरत बढ़ी है.
जयशंकर के समर्थक ये मानते हैं कि मोदी के मंत्रिमंडल में वो सबसे ज़्यादा पसंद किए जाने वाले मंत्रियों में शुमार होते हैं.
डॉक्टर सुव्रोकमल दत्ता कहते हैं, "विदेश मंत्री के तौर पर मैं उनको दिवंगत सुषमा स्वराज के दर्जे पर रखता हूं. विदेश मंत्री के तौर पर मेरे लिए तो डॉक्टर एस. जयशंकर की उपलब्धियाँ पंडित जवाहरलाल नेहरू से भी कही ज़्यादा बड़ी हैं."
निश्चित रूप से ये बहुत बड़ा दावा है. लेकिन भारत के विदेश मंत्री बनने तक का जयशंकर का सफ़र निश्चित रूप से किसी पेशेवर राजनयिक की कामयाबी की उल्लेखनीय मिसाल है.
1955 में दिल्ली में पैदा हुए जयशंकर, सरकारी अधिकारियों के एक प्रतिष्ठित परिवार से ताल्लुक़ रखते हैं. उनके पिता के. सुब्रमण्यम एक जाने-माने नौकरशाह थे. जयशंकर ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों में डॉक्टरेट की डिग्री दिल्ली की मशहूर जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी से ली थी.
उस दौर के उनके साथी ये मानते हैं कि वो एक खुले विचारों वाले उदारवादी इंसान हैं, जो पश्चिमी लोकतंत्र में यक़ीन रखते हैं.
जयशंकर ने राजनयिक के तौर पर अपने सफ़र की शुरुआत 1977 में की थी और उन्होंने कई देशों में कूटनयिक के तौर पर अपनी सेवाएँ दीं.
अमेरिका में भारत के राजदूत (2013-2015) के तौर पर जयशंकर ने अमेरिका के नीति-निर्माताओं के साथ क़रीबी तालमेल से काम करते हुए उसके साथ भारत के आर्थिक रिश्तों को विस्तार दिया था.
उन्होंने दोनों देशों के बीच मज़बूत सामरिक साझेदारी विकसित करने में भी काफ़ी अहम भूमिका निभाई थी.
हालांकि विदेश नीति के जानकार ये कहते हैं कि असल में उनके वैचारिक सफ़र में एक अहम मोड़ तब आया था, जब 2009 से 2013 के बीच वो चीन में भारत के राजदूत थे.
इसी दौरान 2011 में वो पहली बार नरेंद्र मोदी से मिले थे, जो उस वक़्त गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर चीन के दौरे पर गए थे.
हाल ही में समाचार एजेंसी एएनआई को दिए गए एक इंटरव्यू में जयशंकर ने उन दिनों को याद करते हुए कहा था, "मैं पहली बार उनसे (नरेंद्र मोदी) 2011 में चीन में मिला था. वो गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में चीन के दौरे पर आए थे. तब उन्होंने मुझ पर गहरी छाप छोड़ी थी."
"2011 तक मैं बहुत से मुख्यमंत्रियों को ऐसे दौरों पर आते हुए देख चुका था. लेकिन मैंने किसी को भी इतनी ज़बरदस्त तैयारी के साथ दौरा करते नहीं देखा था."

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जयशंकर का वैचारिक सफ़र
जब तक 2014 में नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बनते, तब तक जयशंकर की नियुक्ति अमेरिका में भारतीय राजदूत के तौर पर हो चुकी थी.
आलोचक कहते हैं कि ये कहना मुश्किल है कि ये जयशंकर के विचारों में बदलाव का नतीजा था या नहीं, मगर जब सितंबर 2014 में नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री के तौर पर पहली बार अमेरिका गए तो जयशंकर के साथ उनका बेहतरीन तालमेल दिखा.
राजदूत के तौर पर जयशंकर ने नरेंद्र मोदी के इस पहले अमेरिका दौरे की तैयारी में अहम भूमिका अदा की थी.
न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वॉयर गार्डेन में 'हाउडी मोदी' का आयोजन हुआ जिसका ख़ासी चर्चा हुई.
ख़ुद जयशंकर ने पिछले साल एक कार्यक्रम में कहा था, "मैडिसन स्क्वॉयर के कार्यक्रम के दौरान मैं अमेरिका में भारत का राजदूत था. बहुत से लोग ये मानते हैं कि वो कार्यक्रम एक ऐतिहासिक आयोजन था.
जब नरेंद्र मोदी ने उन्हें विदेश सचिव (2015-2018) नियुक्त किया, तो उन्होंने भारत की विदेश नीति को आकार देने में बहुत अहम भूमिका अदा की.
ख़ास तौर से 'नियमों पर आधारित विश्व व्यवस्था' को लेकर भारत का नज़रिया गढ़ने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा.
जयशंकर कहते हैं कि विदेश सचिव के तौर पर उन्होंने नरेंद्र मोदी के साथ विदेश के बहुत से दौरे किए.
हालाँकि जयशंकर पर ये भी आरोप लगे कि उन्होंने विदेश सेवा के अधिकारी के दायरे में रहने के बजाय अपने सियासी आक़ा की ख़िदमत कुछ ज़्यादा ही की.
2019 का लोकसभा चुनाव जीतने के बाद, प्रधानमंत्री मोदी ने जब जयशंकर को विदेश मंत्री नियुक्त किया, तो वो विदेश सचिव पद से रिटायर होकर अपनी नई ज़िंदगी की तैयारी कर रहे थे.

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विदेश नीति के जानकार कहते हैं कि किसी रिटायर हो चुके विदेश सचिव को सीधे कैबिनेट मंत्री बनाना अभूतपूर्व फ़ैसला था. एएनआई को हाल ही में दिए गए एक इंटरव्यू में जयशंकर ने माना था कि उन्हें इसकी कोई उम्मीद नहीं थी.
एक इंटरव्यू में जयशंकर ने बताया कि उन्होंने ये प्रस्ताव स्वीकार करने से पहले एक महीने तक सोच-विचार किया. और आख़िर में उन्होंने विदेश मंत्री बनने से पहले औपचारिक रूप से सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ली.
जब उन्हें विदेश मंत्री पद की शपथ दिलाई गई, तो एक बड़े अख़बार ने हेडलाइन में लिखा, "मोदी के संकटमोचक को दिलाई गई कैबिनेट मंत्री की शपथ'.
ये कहना बेमानी होगा कि मोदी के प्रति उनकी वफ़ादारी का भरपूर इनाम दिया गया था. चार साल बाद वो मोदी मंत्रिमंडल के सबसे चमकदार चेहरों में से एक बनकर उभरे हैं.
उनके विरोधी ये मानते हैं कि एक वक़्त में उदारवादी सोच रखने वाले जयशंकर ने चोला बदल लिया है.

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क्या जयशंकर की विदेश नीति का सिद्धांत तार्किक है?
जयशंकर की किताब के मुताबिक़, उनकी विदेश नीति तीन सिद्धांतों पर टिकी है:
- गठबंधन से परहेज़: वो गठबंधनों से ज़्यादा साझेदारियों में यक़ीन रखते हैं. वो बहुलतावाद या बहुपक्षीय राजनीति की वकालत करते हैं.
- वो बहुध्रुवीय दुनिया में विश्वास रखते हैं और इस विश्व व्यवस्था में निहित संघर्षों का लाभ उठाना चाहते हैं.
- उन विरोधाभासों को स्वीकार करते हैं, जो इन दोनों बातों के नतीजे में पैदा होते हैं.
जयशंकर की किताब 2020 में प्रकाशित हुई थी. उसके बाद से बहुत कुछ बदल चुका है.

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क्या जयशंकर अब भी इन सिद्धांतों का पालन करते हैं?
प्रोफ़ेसर जैफरलो कहते हैं कि विरोधाभासों का हमेशा लाभ उठाना संभव नहीं होता, "चीन हिमालय की चोटियों पर घुसपैठ कर रहा है, फिर भी भारत ब्रिक्स जैसे मंचों पर चीन के प्रति अच्छा बर्ताव करता रहे, ये कब तक चल सकता है."
"अगर चीन आक्रामक बना रहता है, तो फिर भारत को निर्णायक रूप से पश्चिम की तरफ़ झुकना ही पड़ेगा. कोई और विकल्प है नहीं. अब रूस भी एक विकल्प नहीं रहा, क्योंकि रूस और चीन लगातार क़रीब होते जा रहे हैं."
दो-ध्रुवीय होती दुनिया के एक ध्रुव के तौर पर चीन का उभार, भारत के लिए चिंता की बात हो सकती है. लेकिन, इस बात से अमेरिका भी परेशान है. यही वजह है कि भारत और जयशंकर, आक्रमक होकर मज़बूती से अपनी बात कहने का साहस कर सकते हैं.
लेकिन प्रोफ़ेसर जैफरलो कहते हैं कि आज भारत ख़ुद को जिस महत्वपूर्ण स्थिति में देख रहा है, वो हालात ज़्यादा लंबे समय तक नहीं रहने वाले हैं.
वो कहते हैं, "आज की तारीख़ में हर कोई भारत को इस उम्मीद में रिझाने में जुटा हुआ है कि वो उनके पाले में आ जाए. आप अमेरिका से पूछें, तो वो यही चाहता है."
"अगर आप रूस जाएं, तो उनकी सोच भी यही नज़र आती है. दुनिया ज़्यादा से ज़्यादा दो-ध्रुवीय होती जा रही है, ऐसा समय आ सकता है कि आप अपनी निष्पक्षता बनाए न रख सकें."
सच तो ये है कि जयशंकर ये मानते हैं कि चीन के साथ मिलकर भारत, इक्कीसवीं सदी को एशिया की सदी बना सकता है. वो अपनी किताब में भी इसी विचार को आगे बढ़ाते हैं."
"जिसने भी जयशंकर की किताब पढ़ी हो, उसे ये पता होगा कि वो चीन की तेज़ी से तरक़्क़ी के क़ायल हैं. वो चाहते हैं कि भारत भी चीन से सीख ले.

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अंतरविरोध
चीन के विद्वान, प्रोफ़ेसर हुआंग युनसॉन्ग तर्क देते हैं, "जयशंकर का चीन और भारत का मिलकर 21वीं शताब्दी को एशिया की सदी बनाने का सुझाव, उनकी आक्रामक नीति और चीन के प्रति उनके रवैये से बिल्कुल भी मेल नहीं खाता है."
प्रोफ़ेसर हुआंग इसकी वजह बताते हुए कहते हैं, "चीन और भारत दो अलग-अलग पूर्वी सभ्यताएँ हैं, जो एक दूसरे से बिल्कुल जुदा संस्कृतियों और भौगोलिक क्षेत्रों में विकसित हुई हैं. इतिहास में उन्हें बहुत सीमित समय के लिए पराजय मिली है."
वो कहते हैं, "1980 के दशक में एक एशियाई सदी के जिस नज़रिए को हमारे नेताओं ने अभिव्यक्त किया था, वो हम दोनों ही देशों की विकास और समृद्धि की आकांक्षाओं से नज़दीकी से जुड़ा हुआ था. हालांकि, आज तेज़ी से उभरते राष्ट्रवाद और ग़लत सामरिक फ़ैसलों ने भारत और चीन के बीच मतभेदों और विवादों को बढ़ाने का ही काम किया है."
प्रोफ़ेसर हुआंग कहते हैं, "आज दोनों देशों के रिश्ते सामरिक साझीदारी से घटकर दुश्मन पड़ोसी वाले हो गए हैं. दोस्ताना रिश्तों की जगह अब दुश्मनी और बेरुख़ी ने ले ली है."
प्रोफ़ेसर जैफरलो भी भारत और चीन के नज़दीकी सहयोग से एशियाई सदी को आकार देने के जयशंकर के विचार के क़ायल नहीं हैं. वो इसे बहुत दूर की कौड़ी मानते हैं.
प्रोफ़ेसर जैफरलो कई सवाल उठाते हैं, "आख़िर चीन किस तरह भारत की मदद कर सकता है? पश्चिमी देशों को उनकी शक्तिशाली हैसियत से हटाने में भारत, किसी तरह से चीन की मदद करेगा? भले पश्चिमी देशों की पकड़ कमज़ोर हो भी जाए. लेकिन तब उनकी जगह कौन शक्तिशाली बनेगा, जवाब है-चीन. अगर ऐसा है, तो चीन को दुनिया का नया दादा बनाने में भारत को क्यों मदद करनी चाहिए?"
प्रोफ़ेसर जैफ़रलो कहते हैं, "आने वाले समय में भारत के सामने दो तरह की चुनौतियाँ हो सकती हैं. सिर्फ़ इसलिए नहीं कि दुनिया फिर से दो ख़ेमों में बँटने जा रही है. बल्कि, विकासशील देशों के बीच भी भारत चीन से पीछे रह जाएगा क्योंकि एक बड़ी ताक़त बनने के लिए आपके पास संसाधन होने चाहिए."
डॉक्टर सुव्रोकमल दत्ता, जयशंकर के उस सिद्धांत पर भरोसा करते हैं कि चीन और भारत मिलकर एक एशियाई सदी का निर्माण कर सकते हैं. लेकिन, वो चाहते हैं कि 'पहले चीन अपनी हरकतें सुधारे'.
वो कहते हैं, "निश्चित रूप से दो विशाल एशियाई ताक़तें मिलकर एशियाई सदी के सपने को हक़ीक़त में तब्दील कर सकती हैं. ये बात मुमकिन भी है और तार्किक भी. लेकिन, शर्त ये है कि चीन, अपने भारत विरोधी दुस्साहस पर लगाम लगाए."

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कितने क़ामयाब हैं जयशंकर?
एक बड़े राजनेता, जिनके पास विदेश में भारत के दोस्त और दुश्मन देशों से निपटने का लंबा तजुर्बा रहा है, वो ये मानते हैं कि भारत का असर सिमटा है.
वो कहते हैं, "अगर आप सऊदी अरब से चीन तक एक लंबी लाइन खींचें, तो उसके पश्चिम का हर इलाक़ा अब चीन, रूस, सऊदी अरब और ईरान की धुरी के ख़ेमे में है. हम हाशिए पर खड़े हैं, और दूसरे दर्जे के खिलाड़ी बनकर रह गए हैं. मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में जो कुछ हासिल किया था, उसमें इतनी भारी गिरावट हमने पहले तो कभी नहीं देखी."
चीन के मुक़ाबले भी भारत दुनिया में पिछड़ता जा रहा है.
हाल ही में सऊदी अरब और ईरान ने जब दुश्मनी ख़त्म करके कूटनीतिक रिश्ते बहाल किए तो मध्यस्थ की भूमिका चीन ने निभाई थी जबकि सऊदी अरब और ईरान, दोनों ही देशों को भारत का नज़दीकी माना जाता है.
इसमें कोई दो राय नहीं कि जयशंकर से ज़्यादा चीन की समझ रखने वाला कोई दूसरा पेशेवर राजनयिक नहीं है.
इसी तरह मोदी जैसा कोई दूसरा राजनेता भी नहीं, जिसने नौ बार चीन का दौरा किया हो. चार बार गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर और पांच बार भारत के प्रधानमंत्री के रूप में.
इन दोनों से उम्मीद थी कि वो चीन और भारत के रिश्तों में तनाव को कम करेंगे.
लेकिन, ऐसा लगता है कि इस रिश्ते में तनाव तो और बढ़ ही गया है, शांति समझौते की उम्मीद भी फ़िलहाल दिखाई नहीं दे रही है.

एस जयशंकर का सफ़रनामा
- 1977में भारतीय विदेश सेवा में शामिल हुए.
- 1985-1988 के बीच मास्को में भारतीय दूतावास में तैनात.
- 1990-1993 के बीच टोक्यों के भारतीय दूतावास में डिप्टी बनाए बने.
- 1993-1995 में विदेश मंत्रालय में डायरेक्टर बने (पूर्वी एशिया)
- 1995-1998 के दौरान विदेश मंत्रालय में ज्वाइंट सेक्रेटरी (अमेरिका)
- 2000-2004 में सिंगापुर में भारतीय उच्चायुक्त बनाए गए.
- 2007-2009में विदेश मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव बने और अमेरिका-भारत नागरिक परमाणु समझौते में भारतीय की अगुवाई की.
- 2009-2013 तक चीन में भारत के राजदूत रहे और दोनों देशों के रिश्ते सुधारने में अहम भूमिका निभाई.
- 2013-2015 के बीच अमेरिका में भारतीय राजदूत रहे और मोदी की न्यूयॉर्क रैली के प्रमुख आर्किटेक्ट माना जाता है.
- 2015-2018 के बीच भारत के विदेश सचिव रहते हुए पेरिस पर्यावरण समझौते में भारतीय टीम की अगुवाई की.
- 2019 में विदेश मंत्री बने और उन्होंने भारतीय कूटनीति को और प्रसारित करने पर ध्यान दिया.

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