मोदी की विदेश नीति की पताका क्या वाक़ई जयशंकर ने बुलंद की

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- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
नवंबर के आख़िरी हफ़्ते में मैं भूटान गया था. भूटान के कुछ युवाओं से पूछा कि वे भारत में अभी किस नेता को पसंद करते हैं?
उनमें से फुब शेरिंग नाम के एक युवा ने कहा, एस जयशंकर. फुब के जवाब से वहाँ के सभी युवाओं ने सहमति जताई. फुब से पूछा कि वह जयशंकर को क्यों पसंद करते हैं?
इसका जवाब उन्होंने हिन्दी में ही देते हुए कहा, ''जयशंकर जो भी बोलते हैं, सीधा बोलते हैं. यूक्रेन पर हमले के बाद रूस से भारत के तेल ख़रीदने पर यूरोप और अमेरिका ने सवाल उठाए तो जयशंकर ने बिल्कुल दो टूक जवाब दिया था. मुझे तो सुनकर मज़ा आ गया था. मैंने अब तक दक्षिण एशिया के विदेश मंत्रियों को पश्चिम को इस तरह से जवाब देते हुए नहीं देखा था.''
जयशंकर की तारीफ़ करने वाले पड़ोसी मुल्क के केवल फुब नहीं हैं बल्कि पश्चिम के डिप्लोमैट भी हैं.
इसी साल जून महीने के पहले हफ़्ते में भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने स्लोवाकिया की राजधानी ब्रटिसलावा में एक कॉन्फ़्रेंस में कहा था, ''यूरोप इस माइंडसेट के साथ बड़ा हुआ है कि उसकी समस्या पूरी दुनिया की समस्या है लेकिन दुनिया की समस्या यूरोप की समस्या नहीं है.''
भारत में जर्मनी के राजदूत रहे वाल्टर जे. लिंडनेर ने छह दिसंबर को जयशंकर की इसी टिप्पणी का वीडियो ट्विटर पर पोस्ट करते हुए लिखा था, ''इनका तर्क बिल्कुल वाजिब है.''
जिन देशों को जयशंकर निशाने पर ले रहे थे, उन्हीं में एक देश का डिप्लोमैट कह रहा है कि भारतीय विदेश मंत्री बिल्कुल सही हैं.
इसी साल अप्रैल में जयशंकर वॉशिंगटन में अमेरिकी विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री के साथ पत्रकारों के सवालों का जवाब दे रहे थे.
एक पत्रकार ने रूस से भारत के तेल ख़रीदने पर सवाल पूछा था.
इसके जवाब में एस जयशंकर ने कहा था, ''आप भारत के तेल ख़रीदने से चिंतित हैं लेकिन यूरोप रूस से जितना तेल एक दोपहर में ख़रीदता है, उतना भारत एक महीने में भी नहीं ख़रीदता है.''
जयशंकर की यह टिप्पणी भी सोशल मीडिया पर वायरल हो गई थी.

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भारत की चुनौतियाँ
एस जयशंकर मई 2019 में भारत के विदेश मंत्री बने थे. उससे पहले वे मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में 2018 तक विदेश सचिव थे.
विदेश सचिव से पहले जयशंकर चीन, रूस और अमेरिका जैसे अहम देशों में भारत के राजदूत रहे थे.
नरेंद्र मोदी का दूसरा कार्यकाल विदेशी नीति के लिहाज़ से काफ़ी चुनौतीपूर्ण रहा है.
कोविड महामारी 2019 के दिसंबर महीने में शुरू हुई थी और 2020 में पूरा भारत बुरी तरह से इसकी चपेट में आ गया था.
2020 में ही पूर्वी लद्दाख के गलवान में चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर हिंसक झड़प हुई और भारत के 20 सैनिकों की मौत हो गई थी.
अब भी एलएसी पर कई जगह दोनों देशों के सैनिक आमने-सामने खड़े हैं.
2021 में पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था में मंदी देखने को मिली और भारत की अर्थव्यवस्था पर भी इसका बहुत ही बुरा असर पड़ा.
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अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमत आसमान छूने लगी. कोविड के कारण पूरी सप्लाई चेन बाधित हो गई थी.
भारत दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्थाओं में से एक था लेकिन प्रगति की दर धड़ाम से गिर गई.
2022 शुरू ही हुआ था कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने 24 फ़रवरी को यूक्रेन पर हमले का आदेश दे दिया.
यूक्रेन में रूस का हमला अब भी जारी है और कोई झुकने को तैयार नहीं है.
रूस के ख़िलाफ़ लगभग पश्चिमी देश एकजुट हैं और भारत पर भी दबाव है वह यूक्रेन के पक्ष में बोले.
विदेश नीति के लिहाज़ से एस जयशंकर या मोदी सरकार के लिए साल 2022 काफ़ी मुश्किलों से भरा रहा.

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महाशक्तियों का टकराव
इस साल के अंत में फ़ाइनैंशियल टाइम्स के एडिटोरियल बोर्ड ने एक टिप्पणी प्रकाशित की है.
इसमें कहा गया है कि 2022 में यूक्रेन पर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के हमले ने शीत युद्ध के बाद रूस और अमेरिका के बीच सुलह की संभावनाओं को ख़त्म कर दिया है.
चीन और अमेरिका के बीच भी प्रतिद्वंद्विता बढ़ गई है. दूसरी तरफ़ चीन ने ताइवान पर सैन्य दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया है.
अमेरिका ने भी चीन में तकनीक के निर्यात को लेकर नियम कड़े कर दिए हैं. महाशक्तियों के बीच टकराव का दौर वापस आ गया है.
यूरोप इस माइंडसेट के साथ बड़ा हुआ है कि उसकी समस्या पूरी दुनिया की समस्या है लेकिन दुनिया की समस्या यूरोप की समस्या नहीं है
फ़ाइनैंशियल टाइम्स ने लिखा है, ''जो देश यूक्रेन को सैन्य सहायता नहीं भेज रहे हैं या रूस और चीन के साथ अपना कारोबार सीमित कर रहे हैं, उन्हें भी चिंतित होने की ज़रूरत है. रूस ने जैसा कि संकेत दिया है, उस हिसाब से परमाणु हथियारों का इस्तेमाल कर सकता है. अगर ऐसा हुआ तो पूरी दुनिया ख़तरनाक दौर में समा सकती है. महाशक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिद्वंद्विता से आर्थिक प्रतिबंधों का प्रसार होगा. इससे व्यापार और निवेश की गति बुरी तरह से प्रभावित होगी. ऐसी स्थिति में ग्लोबल साउथ के देश भी बुरी तरह से प्रभावित होंगे क्योंकि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में डॉलर का प्रभुत्व है.''
ग्लोबल साउथ में अफ़्रीका, लातिन अमेरिका, कैरिबियन पैसिफ़िक, आइलैंड्स और एशिया के देश आते हैं.
कहा जा रहा है कि अमेरिकी नेतृत्व वाले पश्चिमी गुट से रूस-चीन की बढ़ती प्रतिद्वंद्विता मध्यम शक्ति वाले देशों के लिए मौक़े और ख़तरे दोनों हैं.

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एफ़टी के अनुसार, ''अमेरिका, ईयू, चीन और रूस वर्ल्ड ऑर्डर को अपनी ओर झुकाने की कोशिश करेंगे. ऐसे में तुर्की, सऊदी अरब, भारत, इंडोनेशिया और अफ़्रीका का रुख़ क्या होगा, यह बहुत मायने रखेगा. तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन अपने मुल्क में कई मुश्किलों का सामना कर रहे हैं. लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंच पर बहुत ही चालाकी से अपनी चाल चल रहे हैं.''
''नेटो के सदस्य होने के बावजूद तुर्की रूस के ख़िलाफ़ पश्चिमी प्रतिबंध में शामिल नहीं हुआ. यहाँ तक कि अर्दोआन ने फ़िनलैंड और स्वीडन के नेटो में शामिल होने के आवेदन को रोक दिया. तुर्की इस मौक़े का फ़ायदा उठाना चाहता है. तुर्की अपनी चाल चल सकता है क्योंकि यूक्रेन संकट से उसे फ़ायदा मिला है. तुर्की ने ब्लैक सी के ज़रिए अनाज के व्यापार को लेकर समझौता कराया था. भविष्य में किसी भी शांति वार्ता में तुर्की अहम भूमिका निभा सकता है.''
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यूक्रेन संकट के कारण तेल की क़ीमतें भी बेतहाशा बढ़ी हैं और इसका फ़ायदा सऊदी अरब को मिला है.
एक वक़्त था जब जो बाइडन सऊदी अरब को सबक सिखाने की बात कर रहे थे लेकिन इसी साल जुलाई महीने में ख़ुद ही रियाद गए थे.
इसी महीने की शुरुआत में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी सऊदी के दौरे पर गए थे.
एफ़टी ने लिखा है, ''भारत इस सदी में ख़ुद को महाशक्ति बनाना चाहता है और उसने भी मध्य मार्ग अपनाया है. रूस से सस्ता तेल ख़रीदने के कारण पश्चिम के कई देश भारत से असहज हैं लेकिन भारत को पता है कि चीन को रोकने में वह एक अहम देश है.''

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भारत ने अपनी बात मनवाई?
मनोहर पर्रिकर इंस्टिट्यूट फोर डिफेंस स्टडीज़ एंड एनलिसिस में यूरोप एंड यूरेशिया सेंटर की असोसिएट फेलो डॉ स्वास्ति राव कहती हैं, ''तुर्की, भारत, सऊदी अरब, ब्राज़ील, इंडोनेशिया और दक्षिण अफ़्रीका मिडिल पावर हैं. अगर यूक्रेन संकट में रूस और पश्चिम के बीच शांति स्थापित कराने की बात होगी तो मिडिल पावर की ओर ही देखना होगा. जिन देशों को मध्यम शक्ति की श्रेणी में रखा गया है, उनमें भारत की विश्वसनीयता सबसे ज़्यादा है. तुर्की भले रूस के ख़िलाफ़ पश्चिम की प्रतिबंध व्यवस्था में शामिल नहीं है लेकिन वह नेटो का सदस्य है. फिनलैंड और स्वीडन को लेकर भी उसे अमेरिका की सुननी पड़ेगी. सऊदी के पास तेल के अलावा कुछ है नहीं. लेकिन भारत को लेकर भरोसा रूस और अमेरिका दोनों में है.''
स्वास्ति राव कहती हैं, ''पीएम मोदी ने भले कहा था कि युद्ध का दौर नहीं है लेकिन महशक्तियाँ फिर से आपस में टकराने को तैयार हैं और भारत इस संकट को बहुत ही समझदारी से डील कर रहा है. भारत ने रूस से एस-400 लिया. अमेरिका अपने क़ानून के तहत भारत पर प्रतिबंध लगा सकता था लेकिन नहीं लगाया. भारत पश्चिम को यह समझाने में कामयाब रहा है कि उसकी मज़बूती से अमेरिका या यूरोप को ख़तरा नहीं है बल्कि फ़ायदा है. वहीं तुर्की ने रूस से एस-400 लिया था तो अमेरिका ने प्रतिबंध लगा दिया था.''
स्वास्ति कहती हैं, ''मैं विदेश मंत्री एस जयशंकर की तारीफ़ करना चाहूँगी कि उन्होंने बहुत ही धारदार तरीक़े से भारत का पक्ष रखा और पश्चिम को समझना पड़ा है. शीत युद्ध के बाद एक बार फिर से वर्ल्ड ऑर्डर बदलता दिख रहा है. भारत के लिए यह संकट और मौक़ा दोनों है. इसके लिए बहुत सतर्क होकर डिप्लोमैसी आगे बढ़ानी होगी और मुझे लगता है कि जयशंकर ऐसा ही कर रहे हैं.''
एफ़टी ने लिखा है, ''अपने आर्थिक हितों की रक्षा और पश्चिम के देशों के दोहरे मापदंड पर सवाल उठाना ठीक है लेकिन रूस और चीन की अनियंत्रित आक्रामकता भी आख़िरकार मध्यम शक्ति वाले देश तुर्की, इंडोनेशिया, इंडिया और खाड़ी के देशों के लिए ख़तरा बनेगी.''

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जयशंकर का रुख़
इन सारी चुनौतियों के बीच विदेश नीति को भारत के हक़ में रखना बहुत जटिल है और यह ज़िम्मेदारी एस जयशंकर के कंधों पर है.
इस मुश्किल समय में जयशंकर ने पश्चिम के प्रति आक्रामक रुख़ अपनाया.
यूक्रेन-रूस जंग में भारत के लिए किसी पक्ष को चुनना बहुत मुश्किल रहा.
एक तरफ़ पश्चिम और यूरोप से भारत की रणनीतिक साझेदारी है तो दूसरी ओर रूस से पारंपरिक संबंध.
इस जटिल परिस्थिति में एस जयशंकर ने बिल्कुल सीधा और स्पष्ट रुख़ अपनाते हुए कहा कि रूस से आयात पर पश्चिम और यूरोप की आपत्ति पाखंड के सिवा कुछ नहीं है.
भारत में एस जयशंकर के इस रुख़ की काफ़ी प्रशंसा हुई. हालाँकि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन की आक्रामकता को लेकर मोदी सरकार की विदेश नीति की आलोचना भी हो रही है.
यूक्रेन संकट के दौरान भारत ने ख़ुद को गुटनिरपेक्ष नीति के तहत किसी खेमे में नहीं जाने दिया.
गुटनिरपेक्षता भारत की विदेशी नीति की बुनियाद मानी जाती है. इसकी शुरुआत भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने की थी.
तब दुनिया दो ध्रुवीय थी. एक महाशक्ति अमेरिका था और दूसरी सोवियत यूनियन.
इस बार भी जब यूक्रेन पर रूस ने हमला किया, तो भारत पर दबाव था.
यूक्रेन पर हमले के बाद दुनिया ध्रुवीकृत हुई. एक गुट अमेरिका और ईयू का बना और दूसरा रूस और चीन का.
कई जानकार कहते हैं कि भारत नॉन अलाइनमेंट (गुट निरपेक्ष) के बदले अब मल्टी-अलाइनमेंट (बहुपक्ष) की नीति पर चल रहा है.
मिसाल के तौर पर भारत चीन और रूस की अगुआई वाले ब्रिक्स, एससीओ और आरआईसी में भी है और अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान के गुट क्वॉड में भी.
लेकिन ये बात भी कही जा रही है कि जो हर गुट में होता है, वह किसी भी गुट में नहीं होता है.
मल्टीअलाइनमेंट टर्म का सबसे पहले इस्तेमाल 2012 में शशि थरूर ने किया था.
तब शशि थरूर मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री थे.
शशि थरूर ने कहा था, ''नॉन अलाइनमेंट यानी गुटनिरपेक्ष नीति अपना प्रभाव खो चुकी है. 21वीं सदी मल्टी-अलाइनमेंट की सदी है. भारत समेत कोई भी देश दूसरे देशों से सहयोग के बिना आगे नहीं बढ़ सकता है. हम एक ऐसी दुनिया में रह रहे हैं, जहाँ अलग नहीं रहा जा सकता. भारत भी ज़्यादा वैश्विक हुआ है.''
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इस टर्म के लिए शशि थरूर को श्रेय भी दिया था. जयशंकर के श्रेय देने के बाद शशि थरूर ने उन्हें शुक्रिया कहा था.

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रूस और अमेरिका दोनों का साथ
पिछले 10 महीनों से यूक्रेन में जंग जारी है. इसमें हज़ारों की मौत हुई है और 80 लाख से ज़्यादा लोगों ने यूक्रेन छोड़ा है.
पश्चिम और यूरोप के देशों ने रूस पर कड़े से कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए.
पश्चिम का लक्ष्य था कि रूस की अर्थव्यवस्था को चोट किया जाए. लेकिन इसका सीधा असर खाद्य और ऊर्जा की क़ीमतों पर पड़ा.
भारत के लिए भी यह काफ़ी निराशाजनक रहा.
मोदी सरकार के लिए पूरा साल विदेश नीति के लिहाज़ के काफ़ी मुश्किल भरा रहा.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति पुतिन के मुँह पर कैमरे के सामने कहा कि यह युद्ध का दौर नहीं है.
पश्चिम के देशों ने पीएम मोदी की टिप्पणी को हाथोंहाथ लिया.
लेकिन भारत ने रूस के ख़िलाफ़ पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों का समर्थन नहीं किया और ख़ुद को इससे अलग रखा.
दूसरी तरफ़ भारत का रूस से तेल आयात और सैन्य सहयोग बढ़ता गया. दोनों देशों ने अपनी-अपनी मुद्रा में द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देने पर सहमति जताई.
सबसे अहम बात यह रही कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, संयुक्त राष्ट्र महासभा , इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी, मानवाधिकार आयोग और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर रूस के ख़िलाफ़ एक दर्जन से ज़्यादा प्रस्ताव लाए गए और सबमें भारत वोटिंग से बाहर रहा.
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत का रुख़ राष्ट्र हित से तय होगा.
भारतीय विदेश मंत्री ने कहा था, ''जो उम्मीद करते हैं कि भारत उनका पक्ष ले उनसे यही कहूँगा, अगर आपकी उम्मीदों पर हम खरे नहीं उतरे तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है.''

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भारत के लिए 2023 ख़ासा अहम
2023 भी भारतीय डिप्लोमैसी के लिहाज़ के बेहद ख़ास रहने वाला है. 2023 में दुनिया की 20 बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के समूह जी-20 की अध्यक्षता भारत के पास है.
इसके अलावा शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइज़ेंशन की अध्यक्षता भी भारत के पास है.
इसका मतलब यह हुआ कि 2023 में दुनिया के सभी बड़े देशों के नेता नई दिल्ली आएंगे.
2022 में मोदी सरकार ने कई मुक्त व्यापार समझौता या फ़्री ट्रेड एग्रीमेंट को स्वीकार किया.
भारत ने यूएई और ऑस्ट्रेलिया के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट किया है. इसके साथ ही ब्रिटेन,गल्फ़ कोऑपरेशन, काउंसिल और कनाडा से भी एफ़टीए के लिए बात चल रही है.
भारत अमेरिका के नेतृत्व वाले इंडो पैसिफ़िक फ़ोरम में भी शामिल हुआ है.
नवंबर महीने में इंडोनेशिया के बाली में जी-20 समिट में यूक्रेन पर रूस के हमले को लेकर जो प्रस्ताव पास किया गय था, उसमें भी सहमति बनाने में भारत की बड़ी भूमिका रही थी.
जी-20 समिट के बाद अमेरिका के उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन फिनर ने भारत को लेकर कहा था, ''अमेरिका के साझेदारों की लिस्ट में भारत की जगह काफ़ी अहम है. भारत हमारे वैश्विक एजेंडा में अगली पंक्ति में है.''
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थक और भारतीय जनता पार्टी हमेशा इस बात को रेखांकित करती है कि भारत वैश्विक मंच पर मज़बूती से उभरा है.
बीजेपी के लोग यह भी कहते हैं कि भारत विश्व गुरु बनने की ओर है.
2019 में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने चौथे रामनाथ गोयनका मेमोरियल लेक्चर में भारत की विदेशी नीति में बदलाव को रेखांकित किया था.
जयशंकर ने कहा था, ''भारत का राष्ट्रवाद व्यापक अंतरराष्ट्रीयवाद को आगे बढ़ा रहा है.''

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अमेरिका से क़रीबी
1990 दशक से भारत की क़रीबी अमेरिका से बढ़ रही है.
अमेरिका से भारत की बढ़ती क़रीबी को चीन से काउंटर के रूप में देखा जाता है.
अमेरिका से बढ़ती क़रीबी को इस रूप में भी देखा जाता है कि भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति को अब छोड़ दिया है.
भारत ने 2013 में आधिकारिक रूप से नए सिद्धांत स्ट्रैटिजिक स्वात्तता की नीति को स्वीकार किया था. लेकिन इसमें यह नहीं बताया गया था कि क्या बदलने वाला है.
1979 के बाद 2016 में नरेंद्र मोदी पहले प्रधानमंत्री थे, जो 120 देशों के गुटनिरपेक्ष आंदोलन की वार्षिक बैठक में शामिल नहीं हुए थे.
गुटनिरपेक्ष आंदोलन की स्थापना में नेहरू की अहम भूमिका थी. मोदी सरकार में अमेरिका से क़रीबी और बढ़ी.
भारत ने अमेरिका से रक्षा सहयोग को विस्तार दिया. मोदी ने अमेरिका को स्वाभाविक सहयोगी बताया था जो गुट-निरपेक्षता की परंपरा के उलट था.
कई लोगों का मानना है कि भारत की अमेरिका से बढ़ती क़रीबी अवसरवादी है और इसमें वो भरोसा नहीं है, जो सोवियत यूनियन के साथ था.
2019 में भारत के विदेश सचिव विजय गोखले ने कहा था कि भारत और अमेरिका सहयोगी हैं लेकिन मुद्दा आधारित सहयोग है.
कहा जाता है कि दोनों देशों का सहयोग वैचारिक नहीं है. कई विश्लेषकों का यह भी मानना है कि चीन से अमेरिकी बादशाहत को चुनौती मिल रही है, इसलिए वह भारत के साथ सहानुभूति रखता है.
स्वास्ति राव कहती हैं कि अंतराराष्ट्रीय डिप्लोमैसी में वैचारिक क़रीबी जैसी कोई चीज़ नहीं होती है.
वे कहती हैं, ''इंडो पैसिफिक में भारत को पश्चिम की ज़रूरत है और सेंट्रल एशिया में रूस की. भारत अपने दोनों हितों को साधना चाहेगा.''

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पड़ोसी देशों से संबंधों के लिहाज़ से भी 2022 काफ़ी अहम रहा. श्रीलंका आर्थिक रूप से दिवालिया हुआ, तो भारत ने कई मौक़ों पर मदद की.
भारत ने इसी साल भूटान, बांग्लादेश और नेपाल के साथ व्यापार और ऊर्जा समझौता किया.
भारत ने मध्य एशियाई देशों में भी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश की. भारत ने अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान से संपर्क का दरवाज़ा खोल रखा है और अपना प्रतिनिधिमंडल भी भेजा.
म्यांमार में सैन्य शासन के साथ भी बाचतीत का दरवाज़ा खुला रखा गया है और यूएन में उसके ख़िलाफ़ वोटिंग से परहेज़ किया.
भारत चीन के साथ लगी सरहद पर अब भी कोई समाधान नहीं निकाल पाया है.
पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव के बीच अरुणाचल के तवांग में भारत और चीन के सैनिक आपस में भिड़े हैं.
आने वाले साल में चीन के साथ ऐसी और झड़पों की आशंका है. सरकार संसद में इस मुद्दे पर खुली बहस के लिए तैयार नहीं है.
प्रधानमंत्री मोदी ने इंडोनेशिया के बाली में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से हाथ मिलाया था.
2023 में अगर सब कुछ ठीक रहा तो शी जिनपिंग भारत दो बार आ सकते हैं. एक जी-20 बैठक में और दूसरी बार एससीओ की बैठक में.
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