पुतिन का वो अंतहीन दुख जो ख़त्म होने का नाम नहीं ले रहा

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- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
जर्मनी की पूर्व चांसलर एंगेला मर्केल ने एक बार रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से पूछा था कि उनकी अब तक की सबसे बड़ी ग़लती क्या है? पुतिन ने अपने जवाब में कहा था- आप पर भरोसा करना.
पुतिन साल 2000 में 47 साल की उम्र में रूस के राष्ट्रपति बने थे. राष्ट्रपति बनने के बाद वह रूस की पहचान को यूरोप से जोड़कर देखते थे.
25 सितंबर, 2001 को पुतिन ने जर्मनी की संसद को संबोधित करते हुए कहा था कि रूस एक मित्रवत यूरोपीय देश है. रूसी राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कहा था कि यूरोप में स्थिरता और शांति ही उनके देश का अहम मक़सद है.
पुतिन ने जर्मन संसद में कहा था कि लोकतांत्रिक अधिकार और स्वतंत्रता ही रूस की घरेलू नीति का लक्ष्य है.
पुतिन जब ऐसा कह रहे थे तो जर्मन सांसद खड़े होकर ताली बजा रहे थे और इसमें एंगेला मर्केल भी शामिल थीं. तब मर्केल सांसद की हैसियत से वहाँ मौजूद थीं.
पेरिस में न्यूयॉर्क टाइम्स के मुख्य संवाददाता रोज़र कोहेन ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि पुतिन उस बर्लिन शहर में ये बातें कर रहे थे, जो लंबे समय तक पश्चिम और सोवियत संघ के बीच विभाजन का प्रतीक रहा है.
लेकिन यह कोई पहला मौक़ा नहीं था, जब पुतिन रूस को यूरोप की संस्कृति से जोड़कर देखते थे और समृद्ध यूरोप की बात करते थे.

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पुतिन नेटो में शामिल होना चाहते थे?
जॉर्ज रॉबर्टसन ब्रिटेन के पूर्व रक्षा मंत्री हैं और वह 1999 से 2003 के बीच नेटो के महासचिव थे.
उन्होंने 2021 के नवंबर महीने में कहा था कि पुतिन रूस को शुरुआत में नेटो में शामिल करना चाहते थे, लेकिन वह इसमें शामिल होने की सामान्य प्रक्रिया को नहीं अपनाना चाहते थे.
जॉर्ज रॉबर्टसन ने कहा था, ''पुतिन समृद्ध, स्थिर और संपन्न पश्चिम का हिस्सा बनना चाहते थे.''
जॉर्ज रॉबर्टसन ने पुतिन से शुरुआती मुलाक़ात को याद करते हुए बताया है, ''पुतिन ने कहा, आप हमें नेटो में शामिल होने के लिए कब आमंत्रित करने जा रहे हैं? मैंने जवाब में कहा, हम नेटो में शामिल होने के लिए लोगों को बुलाते नहीं हैं. जो इसमें शामिल होना चाहते हैं, वे आवेदन करते हैं. इसके जवाब में पुतिन ने कहा था, मैं उन देशों में नहीं हूँ कि इसमें शामिल होने के लिए आवेदन करूँ.''
जॉर्ज रॉबर्टसन ने यह बात सीएनएन के पूर्व पत्रकार माइकल कोसिंस्की के 'वन डिसिज़न पॉडकास्ट' में कही थी.
पुतिन ने पाँच मार्च 2000 को बीबीसी के डेविड फ़्रॉस्ट को दिए इंटरव्यू में भी कुछ ऐसा ही कहा था.
डेविड फ़्रॉस्ट ने अपने सवाल में पुतिन से पूछा था, "नेटो को लेकर आप क्या सोचते हैं? नेटो को आप संभावित साझीदार के तौर पर देखते हैं या एक प्रतिद्वंद्वी या फिर दुश्मन के तौर पर?"
इसके जवाब में पुतिन ने कहा था, ''रूस यूरोप की संस्कृति का हिस्सा है. मैं ख़ुद अपने देश की कल्पना यूरोप से अलगाव में नहीं कर सकता. हम इसे ही अक्सर सभ्य दुनिया कहते हैं.
ऐसे में नेटो को दुश्मन के तौर पर देखना मेरे लिए मुश्किल है. मुझे लगता है कि इस तरह का सवाल खड़ा करना भी रूस या दुनिया के लिए अच्छा नहीं होगा. इस तरह के सवाल ही नुक़सान पहुँचाने के लिए काफ़ी हैं.''
पुतिन ने कहा था, ''रूस अपने साझीदारों से बराबरी और न्यायसंगत संबंध चाहता है. जिन साझे हितों पर पहले से सहमति है, उनसे अलग होना मुख्य समस्या है. ख़ासकर अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों को हल करना अहम है.
हम बराबरी के सहयोग और साझीदारी के लिए तैयार हैं. हम नेटो के साथ सहयोग के लिए बात कर सकते हैं, लेकिन यह तभी संभव होगा, जब रूस को बराबरी के साझीदार के तौर पर रखा जाएगा. आप जानते हैं कि हम पूरब में नेटो के विस्तार का विरोध करते रहे हैं.''
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जब बुश ने की पुतिन की तारीफ़
जर्मन संसद में भाषण देने से कुछ महीने पहले जून 2001 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश से पुतिन की मुलाक़ात हुई थी.
इस मुलाक़ात के बाद बुश ने पुतिन के बारे में कहा था, ''मैंने पुतिन की आँखों में देखा तो वह संवेदनशील लगे. मुझे वह बेबाक और भरोसे लायक़ दिखे.''
16 जून, 2001 को स्लोवेनिया में पुतिन और बुश ने मुलाक़ात के बाद संयुक्त प्रेस कॉन्फ़्रेंस की थी.
इसी प्रेस कॉन्फ़्रेंस में बुश ने पुतिन के बारे में कहा था, ''पुतिन अपने मुल्क को लेकर काफ़ी प्रतिबद्ध हैं. वह अपने देश के हितों को लेकर सजग रहते हैं. मैं बेबाक बातचीत के लिए उनकी प्रशंसा करता हूँ. अगर मुझे पुतिन पर भरोसा नहीं होता तो उन्हें आमंत्रित ही नहीं करता. रूस और अमेरिका को शीत युद्ध की मानसिकता से बाहर निकलकर नये सिरे से संबंध मज़बूत करने चाहिए.''
पुतिन अपने मुल्क को लेकर काफ़ी प्रतिबद्ध हैं. वह अपने देश के हितों को लेकर सजग रहते हैं. मैं बेबाक बातचीत के लिए उनकी प्रशंसा करता हूँ.
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साल 2022 तो पुतिन के ख़िलाफ़ पूरे पश्चिम के एकजुट होने या फिर पूरे पश्चिम की धमकी से पुतिन के बेपरवाह रहने के रूप में देखा जाएगा.
नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइज़ेशन यानी नेटो दूसरे विश्व युद्ध के बाद 1949 में बना था.
इसे बनाने वाले अमेरिका, कनाडा और अन्य पश्चिमी देश थे. इसे इन्होंने सोवियत यूनियन से सुरक्षा के लिए बनाया था.
तब दुनिया दो ध्रुवीय थी. एक महाशक्ति अमेरिका था और दूसरी सोवियत यूनियन.
शुरुआत में नेटो के 12 सदस्य देश थे. नेटो ने बनने के बाद घोषणा की थी कि उत्तरी अमेरिका या यूरोप के इन देशों में से किसी एक पर हमला होता है तो इस संगठन में शामिल सभी देश अपने ऊपर हमला मानेंगे.
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नेटो के विस्तार से ख़फ़ा पुतिन
नेटो में शामिल हर देश एक दूसरे की मदद करेगा. लेकिन दिसंबर 1991 में सोवियत संघ के पतन के बाद कई चीज़ें बदलीं.
नेटो जिस मक़सद से बना था, उसकी एक बड़ी वजह रहा सोवियत संघ बिखर चुका था. दुनिया एक ध्रुवीय हो चुकी थी.
अमेरिका एकमात्र महाशक्ति बचा था. सोवियत यूनियन के बिखरने के बाद रूस बना और रूस आर्थिक रूप से टूट चुका था.
2004 में शीत युद्ध के बाद नेटो का दूसरा विस्तार हुआ. इस विस्तार में एस्टोनिया, लिथुआनिया, लात्विया, बुल्गारिया, रोमानिया और स्लोवाकिया नेटो में शामिल हो गए.
नवंबर, 2003 में जॉर्जिया में रोज़ रिवॉल्युशन हुआ था और वह पश्चिम के पाले में चला गया. 2004 में यूक्रेन की सड़कों पर भारी संख्या में लोग विरोध-प्रदर्शन के लिए उतरे और इसे ऑरेंज रिवॉल्युशन कहा गया.
प्रदर्शनकारी रूस को ख़ारिज कर अपना भविष्य पश्चिम के साथ देख रहे थे. क्रोएशिया और अल्बानिया भी 2009 में नेटो में शामिल हो गए.
पुतिन को लगता है कि 2.5 करोड़ रूसी USSR के टूटने के बाद अपनी मातृभूमि से बाहर फँसे हुए हैं. सोवियत यूनियन का बिखरना पुतिन के लिए अंतहीन दुख की तरह है.
यूक्रेन भी नेटो में शामिल होने के लिए औपचारिक आवेदन कर चुका है, लेकिन अभी शामिल नहीं किया जा सका है.
पुतिन के लिए यह चिढ़ाने वाला था. वह अपने पड़ोसियों या सोवियत यूनियन का हिस्सा रहे देशों के नेटो में शामिल किए जाने को अमेरिका के धोखे के तौर पर देखने लगे.
कई लोग मानते हैं कि पुतिन अपने पड़ोस में नेटो के आने से ज़्यादा लोकतंत्र आने से डरे हुए थे.
न्यूयॉर्क टाइम्स से जर्मनी के पूर्व विदेश मंत्री योशिका फ़िशर ने कहा है, ''पुतिन के डर का कारण नेटो नहीं बल्कि लोकतंत्र था.''
यूक्रेन की वर्तमान सरकार को लगता है कि अगर वह नेटो का सदस्य होता, तो रूस हमला नहीं करता.
इसी साल अप्रैल महीने में यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की ने कहा था कि यूक्रेन पर रूसी हमले के लिए आंशिक रूप से एंगेला मर्केल भी ज़िम्मेदार हैं क्योंकि उन्होंने ही इसे 2008 में नेटो में शामिल होने से रोका था.
मर्केल के दफ़्तर ने इसका लिखित जवाब दिया था और अपने फ़ैसले का बचाव किया था.
मर्केल ने कहा था कि उन्होंने इसलिए नेटो में शामिल होने से रोका था क्योंकि यूक्रेन बुरी तरह से बँटा हुआ था और वहां व्यापक भ्रष्टाचार था.

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नेटो का विस्तार वजह या यूएसएसआर के टूटने का ग़म?
कई लोग मानते हैं कि पुतिन केवल नेटो के विस्तार से पश्चिम विरोधी नहीं हुए, बल्कि वे सोवियत यूनियन के टूटने से काफ़ी आहत थे और उनके मन में इसे एकजुट करने की तमन्ना कहीं न कहीं दबी हुई है.
पुतिन का जन्म 1952 में लेनिनग्राद में हुआ था. वह सोवियत और नाज़ी जमर्नी के युद्ध की छाया में पले-बढ़े.
रूस के लोगों के लिए यह एक देशभक्ति वाली लड़ाई थी. पुतिन के पिता इस जंग में बुरी तरह से ज़ख़़्मी हुए थे और एक बड़े भाई की मौत हो गई थी.
लेनिनग्राद शहर महीनों तक जर्मनी के नियंत्रण में रहा था. पुतिन के दादा स्टालिन के कुक का काम करते थे.
पुतिन के परिवार ने नाज़ीवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में रेड आर्मी के लिए बड़ा त्याग किया था.
जेएनयू में मध्य एशिया और रूसी अध्यययन केंद्र में असोसिएट प्रोफ़ेसर राजन कुमार कहते हैं, ''पुतिन मार्क्सवादी नहीं हैं. उन्होंने रूस और जर्मनी में केंद्रीकृत और नियोजित अर्थव्यवस्था का हश्र देखा था. 1985 से 1990 तक पुतिन सोवियत यूनियन की एजेंसी केजीबी के एजेंट थे. पुतिन ने सोवियत यूनियन को तबाह होते देखा था.
सोवियत यूनियन के बिखरने के बाद बोरिस येल्तसिन के हाथ में रूस की कमान आई. कम्युनिस्ट युग के बाद यानी 1990 के दशक के रूस का नेतृत्व बोरिस येल्तसिन ने किया. वह रूस के पहले निर्वाचित नेता थे.
बोरिस येल्तसिन जिस तरह से पश्चिम से आर्थिक मदद ले रहे थे, यह पुतिन को पसंद नहीं था. सोवियत यूनियन की यादें रूसी भूले नहीं थे. इसके मिथ उनमें मज़बूती से ज़िंदा थे.''

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राजन कुमार कहते हैं, ''पुतिन पिछले 22 सालों से रूस की सत्ता में हैं. इस दौरान अमेरिका में पाँच राष्ट्रपति बन चुके. चीन बहुत आगे निकल चुका है. अमेरिका ने इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान में हमला किया और मुँह की खानी पड़ी. पूरी दुनिया में तकनीक का विस्तार हुआ, लेकिन पुतिन किसी रहस्य की तरह अब भी बने हुए हैं.''
राजन कुमार कहते हैं, ''अमेरिका में 09/11 के हमले के बाद पुतिन पहले राष्ट्राध्यक्ष थे जिन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति को फ़ोन कर हर तरह की मदद करने की बात कही थी. लेकिन नेटो के विस्तार और यूरोप की सुरक्षा से रूस को अलग करना - इन दोनों वजहों ने पुतिन के पश्चिम विरोधी होने में अहम भूमिका अदा की.
रूस के लोग आज भी ख़ुद को एशिया से जोड़कर नहीं देखते हैं. वे ख़ुद को यूरोप की संस्कृति का ही हिस्सा मानते हैं. यूरोप को भी रूस को इसी रूप में देखना चाहिए था, लेकिन अमेरिका ने ऐसा होने नहीं दिया. सोवियत यूनियन के टूटने के बाद भी रूस क्षेत्रफल के माामले में सबसे बड़ा देश है. इसका विस्तार यूएसएसआर की तरह ही 11 टाइम ज़ोन तक है.''

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पुतिन के लिए यूएसएसआर का बिखरना एक कचोट
पुतिन की शुरुआती बातों को यूरोप के विश्लेषक झूठ के रूप में लेते हैं.
मॉस्को में फ़्रांस की राजदूत रहीं सुवी बर्मन ने एक टीवी प्रोग्राम में कहा था, ''आपको यह बात समझनी चाहिए कि पुतिन केजीबी से हैं और झूठ बोलना उनका पेशा है. यह कोई पाप नहीं है. पुतिन एक आईने की तरह हैं. जो उन्हें दिखता है, उसे ही अपनाते हैं. उनकी यही ट्रेनिंग है.''
अमेरिका की पूर्व विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस कई बार पुतिन से मिल चुकी हैं.
एक बार पुतिन को लेकर उन्होंने कहा था, ''वह हमेशा इस मोह के साथ रहते हैं कि 2.5 करोड़ रूसी सोवियत यूनियन के टूटने के बाद अपनी मातृभूमि से बाहर फँसे हुए हैं. बार-बार वह इसे दुख के तौर पर ज़ाहिर करते रहते हैं. 20वीं सदी में सोवियत यूनियन का बिखरना पुतिन के लिए अंतहीन दुख की तरह है.''
वर्ल्ड बैंक के पूर्व अध्यक्ष रॉबर्ट बी ज़ोएलिक ने वॉल स्ट्रीट जर्नल में लिखा है, ''रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन की स्वतंत्रता और संप्रभुता को कभी स्वीकार नहीं किया. यूक्रेन के पूरी तरह पश्चिमी पाले में जाने से पहले 70 साल के पुतिन ग्रेटर रूस को फिर से हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध हैं.
अमेरिका के एक ख़ुफ़िया अधिकारी ने मुझसे बताया था कि उन्होंने पुतिन को यूक्रेन पर हमले को लेकर चेताया था तो उन्होंने रिप्लाई किया था कि उनके पास विकल्प क्या है?''

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यूक्रेन से जंग छिड़ने के बाद बदले हालात
पुतिन ने इसी साल फ़रवरी के आख़िर हफ़्ते में यूक्रेन पर हमला किया तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ा.
यूरोप में स्वीडन और फ़िनलैंड हर स्थिति में निष्पक्ष रहने के लिए जाने जाते थे, लेकिन अब इन्होंने भी नेटो में शामिल होने के लिए आवेदन किया है.
जर्मनी ने भी अपना रक्षा बजट बढ़ाने की घोषणा की है.
यूरोपियन यूनियन ने रूस पर अपनी ऊर्जा निर्भरता बड़े पैमाने पर कम करने की घोषणा की और इससे आम लोगों को काफ़ी परेशानी हो रही है.
जो यूरोपियन उद्योग रूसी गैस पर निर्भर थे, उन्हें अपना सेटअप देश से बाहर बनाना पड़ा. अभी यूरोप किसी तरह से अपनी ऊर्जा ज़रूरतें पूरी कर रहा है, लेकिन आने वाले समय में स्थिति और भयावह हो सकती है.
यूक्रेन पर हमले के ख़िलाफ़ अमेरिका ने अपने सहयोगियों के साथ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस को लेकर निंदा प्रस्ताव कई बार पेश किया, लेकिन कई अहम देशों का समर्थन नहीं मिला.
भारत समेत पर्शियन गल्फ़ में अमेरिका के कई सहयोगी और इसराइल ने संयुक्त राष्ट्र में रूस के ख़िलाफ़ वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया.
वोटिंग से बाहर रहने को इस रूप में देखा गया कि इनके हित अलग हैं.
कहा गया कि इन देशों ने अपनी अर्थव्यवस्था और सुरक्षा चिंताओं को प्राथमिकता दी. यूक्रेन पर हमले से पहले चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने पुतिन के साथ 'साझेदारी की कोई सीमा नहीं' वाली दोस्ती की घोषणा की थी.
लेकिन चीन ने परमाणु हथियारों के इस्तेमाल को लेकर रूस को सतर्क किया था. अमेरिकी एकाधिकार के ख़िलाफ़ रूस के साथ चीन का लंबे समय से सहयोग है, लेकिन उसका कारोबार अमेरिका के साथ भी अरबों डॉलर का है.
कई विशेषज्ञों का मानना है कि रूस को अंदाज़ा नहीं था कि यूक्रेन के साथ उसका युद्ध इतना लंबा जाएगा. कहा जा रहा है कि रूस अब ख़ुद भी इस जंग में फँस चुका है.

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यूक्रेन से जंग में जीत किसकी?
पिछले एक दशक में यह पहली बार हो रहा है कि रूसी राष्ट्रपति पुतिन इस महीने साल के अंत वाली प्रेस कॉन्फ़्रेंस नहीं करेंगे.
पिछले हफ़्ते रूसी सरकार के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा था कि नए साल से पहले कोई प्रेस कॉन्फ़्रेंस नहीं होगी.
पेस्कोव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं होने का कोई कारण नहीं बताया.
2012 में पुतिन दोबारा जब रूस के राष्ट्रपति बने थे तब से हर साल के अंत में दिसंबर महीने में प्रेस कॉन्फ़्रेंस करते थे.
इस प्रेस कॉन्फ़्रेंस में रूस और रूस से बाहर के सैकड़ों पत्रकार शामिल होते थे. ब्लूमबर्ग के मुताबिक़, यह प्रेस कॉन्फ़्रेंस कई बार तीन घंटों तक चलती थी.
पुतिन की वार्षिक प्रेस कॉन्फ़्रेंस रद्द होने को इस बात से जोड़ा जा रहा है कि सब कुछ ठीक नहीं है.
यूक्रेन पर हमले में रूस का भी भारी नुक़सान हुआ है. न केवल सैन्य नुक़सान बल्कि रूस की अर्थव्यवस्था भी अलग-थलग पड़ गई है.
अटलांटिक काउंसिल यूक्रेन अलर्ट सर्विस के एडिटर पीटर डिकिंसन ने लिखा है, ''यूक्रेन पर पुतिन का हमला दूसरे विश्व युद्ध के बाद यूरोप के लिए सबसे बड़ा टकराव है. पुतिन की योजना थी कि चंद दिनों में यूक्रेन को झुका देंगे और पूरी तरह से अपने खेमे में कर लेंगे. लेकिन युद्ध ख़त्म होने का नाम नहीं ले रहा है.
10 महीने हो गए हैं और यूक्रेन झुका नहीं है. यूक्रेन के कई शहरों से पुतिन के सैनिकों को वापस जाना पड़ा है. बड़ी संख्या में रूसी सैनिक मारे गए हैं. रूस की अंतरराष्ट्रीय छवि भी बुरी तरह से ख़राब हुई है. लाखों की संख्या में यूक्रेन के आम लोग विस्थापन पर मजबूर हुए हैं. रूस के सुपरपावर वाली छवि भी शक़ के दायरे में आ गई है. चाहे जिस भी रूप में देखें, पुतिन 2022 के नाकाम राष्ट्रपति रहे हैं.''

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पुतिन के दो लक्ष्य
थिंक टैंक कार्नेगी मॉस्को सेंटर के निदेशक रहे दिमित्री त्रेनिन ने लिखा है, ''रूस में पुतिन युग की विदेश नीति का मूल्यांकन कई आधार पर किया जा सकता है. 1999 से जहाँ तक मैं देखता हूँ राष्ट्रपति पुतिन ने दो लक्ष्यों का पीछा किया है. रूस की एकता को बहाल करना और वैश्विक मंच पर रूस को महाशक्ति बनाना.
मेरा मानना है कि पुतिन ने इन दोनों लक्ष्यों को हासिल किया है. पूरे रूसी फ़ेडरेशन में केंद्रीय सत्ता को मान्यता मिली. रूस वैश्विक मंच पर एक बार फिर से लौटा. यूएसएसआर के टूटने के बाद रूस को फिर से एकजुट करने में पुतिन कामयाब रहे हैं.''
दिमित्री त्रेनिन ने लिखा है, ''पुतिन ने रूसी संप्रभुता को बहाल किया है और इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता. 2000 के दशक में तेल की क़ीमत तेज़ी से बढ़ी और इससे रूस की अर्थव्यवस्था को ख़ूब फ़ायदा हुआ.
2000 के दशक के मध्य में तेल इंडस्ट्री का पुतिन ने राष्ट्रीयकरण किया. इससे ऊर्जा नीति बनाने में मदद मिली. 2010 के दशक के पहले पाँच सालों में फ़ौज में भी सुधार किया गया.''
2022 ख़त्म होने वाला है. यूरोप के लोग जमा देने वाली सर्दी में ऊर्जा संकट से जूझ रहे हैं.
यूक्रेन के राष्ट्रपति ने अमेरिका में जाकर घोषणा की है कि वह पुतिन के सामने झुकेंगे नहीं. किसी समझौते के आसार नज़र नहीं आ रहे हैं.
इस युद्ध को जीतना पुतिन के लिए आसान नहीं है. लेकिन यूरोप का ऊर्जा संकट में समाना, महंगाई और मंदी का आना या फिर अमेरिकी चुनाव में महंगाई के मुद्दा बनने को भी पुतिन जीत की तरह देख सकते हैं.
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नए शीत युद्ध की तरफ़ बढ़ती दुनिया?
कहा जा रहा है कि दुनिया एक बार फिर से शीत युद्ध की ओर बढ़ रही है और इस बार चुनौती रूस के साथ चीन भी है.
यरूशलम पोस्ट के पूर्व संपादक और जाने-माने पुलित्ज़र विजेता स्तंभकार ब्रेट स्टीफ़ेंस ने इसी साल 29 मार्च को न्यूयॉर्क टाइम्स में 'हम दूसरा शीत युद्ध कैसे जीत सकते हैं' शीर्षक से एक कॉलम लिखा था.
इस कॉलम की शुरुआत में ही स्टीफ़ेंस ने लिखा है, ''पहले शीत युद्ध में सोवियत यूनियन और उसके सैटलाइट के ख़िलाफ़ अमेरिका और हमारे सहयोगियों के पास एक गोपनीय हथियार था. यह हथियार न तो सीआईए ने बनाया था और न ही ये DARPA या किसी लैब से आया था. यह हथियार कम्युनिज़्म था.''
स्टीफ़ेंस ने लिखा था, ''रूसी कम्युनिज़्म के कारण पश्चिम को बढ़त मिली थी क्योंकि मुक्त बाज़ार के सामने यह व्यवस्था टिक नहीं पा रही थी. उनकी नीतियाँ सोवियत यूनियन के भीतर ही नाकाम हो रही थीं.
यूएसएसआर में श्रमिकों को लेकर एक कहावत थी, 'वे हमें भुगतान करने का नाटक करते हैं और हम काम करने का'. इस नीति के कारण हज़ारों परमाणु हथियारों से लैस सोवियत यूनियन बिखर गया.''
स्टीफ़ेंस ने लिखा है, ''अब हम दूसरे शीत युद्ध की तरफ़ बढ़ रहे हैं. इस बार सामने चीन है. दोनों देश साफ़ कह रहे हैं कि उनके हित ही नहीं बल्कि मूल्य भी टकरा रहे हैं. अमेरिका कह रहा है कि चीन नियम आधारित वैश्विक व्यवस्था को चुनौती दे रहा है. चीन कह रहा है कि वो अपने लोकतंत्र को दुनिया के बाक़ी हिस्सों में थोपना बंद करे.''
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