माओ को चीन में 'गौरैया सफ़ाया अभियान' के बाद क्यों बहुत पछताना पड़ा था

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- Author, टीम बीबीसी हिन्दी
- पदनाम, नई दिल्ली
सवालों से परे हो चुका एक सर्वशक्तिमान नेता कैसे-कैसे क़दम उठा सकता है और उन क़दमों के क्या परिणाम हो सकते हैं, इसे समझने के लिए चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के सर्वोच्च नेता माओ के फ़ैसलों को देखा जा सकता है.
माओ एक-के-बाद एक अभियान चलाते रहे, उनमें से कुछ कामयाब रहे और कुछ नाकाम भी हुए. जब कोई अभियान नाकाम हो जाता था, वे फ़ौरन कोई दूसरा अभियान छेड़ देते थे.
मिसाल के तौर पर 'गौरैया सफ़ाया अभियान' की वजह से हुए नुक़सान के बाद उन्होंने 'खटमल ख़ात्मा अभियान' शुरू कर दिया, और गौरैया सफ़ाया अभियान के बुरे असर को ज़्यादातर चीनी मानो भूल गए.
दरअसल, गौरैया सफ़ाया 'मारो चार' अभियान का हिस्सा था जो 1958 में शुरू हुआ. 'मारो चार' का मक़सद चार जीवों का पूरी तरह अंत करना था, ये जीव थे--मक्खी, मच्छर, चूहे और गौरैया. यह 'ग्रेट लीप फ़ॉरवर्ड' अभियान का हिस्सा था जिसका शाब्दिक अनुवाद होगा 'विकास की लंबी छलांग'.
गौरैया सफ़ाया अभियान
'मारो चार' के पहले तीन शिकार तो काफ़ी हद तक सही थे--मच्छर मलेरिया फैला रहे थे, चूहों से प्लेग फैल रहा था, अनाज का नुक़सान हो रहा था, जबकि मक्खियों को ख़त्म करने को सफ़ाई से जोड़ा गया, लेकिन छोटी-सी गौरैया को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अभियान ने 'अत्यंत ख़तरनाक जीव' के रूप में पेश किया.
बीबीसी के पूर्व संवाददाता फ़िलिप शॉर्ट ने 'माओ ए लाइफ़' नाम से पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना के संस्थापक की जीवनी लिखी है जिसमें उन्होंने लिखा है, "माओ का निष्कर्ष था कि एक गौरैया एक साल में चार किलो तक अनाज खा जाती है इसलिए चीनी नागरिकों का पेट भरने के लिए गौरैया का मारा जाना बहुत ज़रूरी है."
कम्युनिस्ट पार्टी के अख़बार बीजिंग पीपुल्स डेली ने पाँच मई 1958 को लिखा, "किसी भी योद्धा को तब तक रुकना नहीं चाहिए जब तक यह लड़ाई जीत नहीं ली जाती, इस लड़ाई में सभी क्रांतिकारियों को पूरे उत्साह और प्रतिबद्धता से हिस्सा लेना चाहिए ताकि घटिया चिड़िया के ख़िलाफ़ लड़ाई जीती जा सके."

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लाखों गौरैया मार दी गई
'टाइम' पत्रिका ने मई 1958 के अपने अंक में दर्ज किया कि यह अभियान काफ़ी योजनाबद्ध ढंग से चलाया गया.
पत्रिका ने 'रेड चाइना, डेथ टू स्पैरो' हेडलाइन से लिखा, "पिछले हफ़्ते गौरैया मारने का अभियान बड़े पैमाने पर शुरू हुआ, स्कूल-कॉलेज के छात्र, सरकारी कर्मचारी और अधिकारी बर्तनों, पतीलों और कड़छी के साथ सुबह पाँच बजे जमा हुए. रेडियो बीजिंग ने इस अभियान में हिस्सा लेने वाले लोगों की संख्या 30 लाख बताई है. सुबह पाँच बजे बिगुल और सीटियाँ बजने लगीं लोगों ने गौरैयों पर धावा बोल दिया."
फुर्तीली छोटी चिड़िया को मारना आसान काम नहीं था, कुछ चिड़ियों को तो कम्युनिस्ट पार्टी के स्टूडेंट विंग के कार्यकर्ताओं ने गुलेलों से मारा, लेकिन लाखों-लाख चिड़ियों को मारने के लिए अलग ही रणनीति अपनाई गई.
लोग बर्तन-भांडे पीटते हुए शहरों और गाँवों में इतना हंगामा मचाते कि गौरैया लगातार उड़ते रहने पर मजबूर हो जातीं, मक़सद था--उन्हें बैठने और खाने न देना, दो-तीन दिन तक लगातार बिना खाए-पिए उड़ने की वजह से गौरैया बड़ी तादाद में मरने लगी.
फ़िलिप शॉर्ट ने अपनी किताब में लिखा है कि किस तरह गौरैयों को ढूँढ-ढूँढ कर मारा गया.
उन्होंने लिखा है कि बीजिंग में पोलिश दूतावास में गौरैयों ने शरण ली थी. चीनियों ने उन गौरैयों को मारने की कोशिश की, लेकिन पोलिश अधिकारियों ने उन्हें दूतावास में घुसने नहीं दिया. इसके बाद बड़ी तादाद में लोग ढोल-नगाड़े के साथ दूतावास के बाहर जमा हो गए और लगातार दो दिन तक गौरैयों को लगातार उड़ने पर मजबूर करते रहे.
फ़िलिप शॉर्ट ने लिखा है, "दो-तीन दिन के बाद पोलिश दूतावास के कर्मचारियों ने बेलचे से उठाकर सैकड़ों मरी हुई चिड़ियों को बाहर फेंक दिया."
इस अभियान की वजह से साल भर के भीतर गौरैया दिखनी बंद हो गई. कॉकेशियन ट्री स्पैरो जो हर जगह दिखती थी वह तक़रीबन विलुप्त हो गई. उस वक़्त लोगों को लगा कि उन्होंने सामूहिक अभियान के ज़रिए एक बड़ी कामयाबी हासिल की है, लेकिन जल्दी ही लोगों की समझ में आया कि इकोलॉजी यानी पारिस्थितिकी के संतुलन को कितना बड़ा नुक़सान पहुँचाया गया है.
चीन में किसी ने पारिस्थितिकी से इतनी बड़ी छेड़छाड़ पर कोई सवाल नहीं उठाया, लेकिन 1959 आते-आते इस अभियान का विनाशकारी परिणाम सामने आना शुरू हुआ.
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फ़सल बचाने वाली गौरैया
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के सर्वोच्च नेता ने ये तो देखा था कि गौरैया अनाज और फल खाती है, लेकिन उन्होंने गौरैया के एक अहम काम की ओर ध्यान नहीं दिया था. जैसे ही गौरैया ख़त्म हुई कीड़ों-मकौड़ों की तादाद बहुत तेज़ी से बढ़ने लगी जिन्हें चिड़िया बड़े होने से पहले ही खा जाती थी.
कीड़े-मकौड़े फ़सलों को नुक़सान तो पहुँचा रहे थे, लेकिन फ़सलों पर असली धावा टिड्डियों ने बोला जिन्होंने चीन में पहले से चल रहे खाद्यान्न संकट को और गहरा कर दिया. 1958 से 1960 के बीच चीन ने कई बाढ़ों का सामना किया था और अब गौरैयों के न होने से बची-खुची फ़सल भी कीड़े और टिड्डे चर गए.
इसके बाद चेयरमैन माओ ने अप्रैल 1960 में 'गौरैया सफ़ाया अभियान' वापस लेने की घोषणा की, लेकिन 'ग्रेट लीप फॉरवर्ड' से जो भी कामयाबी हासिल हुई थी उसे 'ग्रेट चाइनीज़ फ़मीन' (1959-1961) ने तबाह कर दिया, चीन में लाखों-लाख लोग भूख से तड़पकर मर गए.
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तीन साल चले भयावह अकाल की दूसरी वजहें भी थीं, लेकिन 'गौरैया सफ़ाया अभियान' को भी चीन की बदहाली की एक बड़ी वजह माना गया.
एलेक्ज़ेंडर पैंटशोव ने अपनी किताब 'माओ, द रियल स्टोरी' में लिखा है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी और उसके शीर्ष नेता को अपनी ग़लती का एहसास हुआ और "उन्होंने भूल-सुधार के तौर पर सोवियत संघ से ढाई लाख गौरैयों की खेप मँगवाई ताकि नन्ही गौरैया टिड्डियों को बड़ा होने से पहले खाकर फ़सलों को बचाए."
इसके बाद मक्खी, मच्छर और चूहों वाली 'मारो चार' की सूची से गौरैया का नाम काट दिया गया और 'खटमल ख़ात्मा अभियान' शुरू हो गया, माओ इसके बाद भी तरह-तरह के अभियान बेरोक-टोक चलाते रहे.
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