चीन 'अपमान की सदी' से गुज़रकर कैसे बना वैश्विक महाशक्ति

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    • Author, राना मित्तर
    • पदनाम, प्रोफ़ेसर, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी

ताइवान के साथ बढ़े तनाव की वजह से एक बार फिर सबकी निगाहें चीन पर चली गई हैं.

कई लोग इस बात पर भी हैरत जताते हैं कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग अपने मुल्क को किस मुकाम पर देखना चाहते हैं. शायद इस सवाल का जवाब अतीत में छुपा है. चीन अब एक वैश्विक शक्ति है. कुछ दशक पहले ये वो बात थी, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी.

कई बार चीन बाहरी दुनिया से अपने गठजोड़ के बूते ताक़त जुटाता है, जैसे पेरिस जलवायु समझौते पर उसका दस्तखत करना. और कई बार इसका मतलब बाहरी दुनिया से प्रतिस्पर्धा करना भी होता है. जैसे कि बेल्ट एंड रोड इनिशटिव जिसे दुनिया चीन के सिल्क रूट प्रोजेक्ट के नाम से भी जानती है.

60 से भी ज़्यादा देशों में चीन इस प्रोजेक्ट के तहत बुनियादी ढांचा विकास परियोजनाओं का जाल खड़ा कर रहा है. इस प्रोजेक्ट से जुड़ने वाले देश अब तक पश्चिमी देशों से मिलने वाले कर्ज़ों से महरूम रहे थे. फिर भी दुनिया के फलक पर चीन के उभार के ख़िलाफ़ कई तरह की बातें कही-सुनी जाती रही हैं.

अमेरिका ने जब चीन को रोकने के लिए ऑस्ट्रेलिया के साथ ऑकस समझौता किया, तो बीजिंग ने इसकी आलोचना की. चीन ने ब्रिटेन को भी इस बात के लिए चेतावनी दी कि अगर कड़े राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून की वजह से हांगकांग छोड़ने वाले लोगों को उसने अपने यहां पनाह दी तो उसे इसका अंजाम भुगतना होगा.

लगभग दो हज़ार सालों तक कन्फ्यूशियस का दर्शन चीनी लोगों की ज़िंदगी और उनके रहन सहन को प्रभावित करता रहा

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चीन ने ताइवान को अपनी धमकी में कहा कि उसे चीन की मुख्यभूमि में विलय के लिए तैयार रहना चाहिए. राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपने पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों की तुलना में वैश्वक मंच चीन को कहीं अधिक मजबूती से पेश किया है.

अतीत में शीत युद्ध के दिनों में चीन के सर्वोच्च नेता रहे माओ ज़ेडांग ने भी चीन को इतने सशक्त तरीके से पेश नहीं किया था. लेकिन आज जो दिख रहा है, उसकी जड़ें कहीं अतीत में छुपी हुई हैं. इनमें कुछ बहुत पुराना है तो कुछ हाल की घटनाएं हैं. हम आगे ऐसी ही पांच बातों पर ग़ौर करेंगे.

कन्फ्यूशियस का तरीका

लगभग दो हज़ार सालों तक कन्फ्यूशियस का दर्शन चीनी लोगों की ज़िंदगी और उनके रहन सहन को प्रभावित करता रहा. कन्फ्यूशियस ने नैतिकता पर आधारित समाज की ऐसी रूपरेखा रखी थी जिसमें लोग समाज में अपनी जगह के बारे में जानते थे.

ये व्यवस्था हैसियत पर आधारित थी जिसमें बड़े छोटों के लिए परोपकार की भावना रखते थे और अपने से कमज़ोर लोगों की देखभाल करना जिम्मेदारी की बात समझी जाती थी. साल 1911 की क्रांति के होने तक चीन के शाही राजवंशों की हुकूमत के दौरान कन्फ्यूशियस का तरीका चीनी समाज की जीवन शैली का अभिन्न हिस्सा बना रहा.

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लेकिन इस क्रांति में चीन के अंतिम सम्राट को सत्ता से बेदखल किए जाते ही कन्फ्यूशियस और उनकी विरासत के ख़िलाफ़ भी भावनाएं उभरनी शुरू हुईं. इसमें कट्टरपंथी ताक़तों के अलावा नई कम्युनिस्ट पार्टी के लोग शामिल थे.

इन्हीं कम्युनिस्टों में माओत्से तुंग भी एक थे. माओ अपने कार्यकाल (साल 1949 से 1976 तक) के दौरान चीन के पारंपरिक दर्शन के विरोध में मुखर बने रहे. लेकिन अस्सी के दशक आते-आते चीनी समाज में एक बार फिर से कन्फ्यूशियस का दर्शन लौट आया.

इस बार कम्युनिस्ट पार्टी इसके समर्थन में थी. पार्टी ने कन्फ्यूशियस को समकालीन चीन को संदेश देने वाला महान व्यक्तित्व करार दिया. आज के चीन में 'सौहार्द' को एक 'सामाजिक मूल्य' के रूप में देखा जाता है. ये कन्फ्यूशियस के दर्शन का एक हिस्सा है.

चीन एक अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कन्फ्यूशियस के दर्शन की एक और बात अक्सर चर्चा में रहती है और वो है 'परोपकार'. माना जाता है कि बाहरी दुनिया के साथ चीन के संबंधों पर चीन की इस नीति का असर रहता है.

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त्सिंगुआ यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर यान श्वेतोंग ने इस बारे में किताब लिखी है कि चीन को किस तरह से 'प्रभुत्व' के बजाय अपने 'परोपकार की सत्ता' स्थापित करने की कोशिश करनी चाहिए. प्रोफ़ेसर यान श्वेतोंग इसकी तुलना अमेरिका से करते हुए कहते हैं कि परोपकार के मामलों में उसकी भूमिका सीमित है.

यहां तक कि शी जिनपिंग ने 'साझा भविष्य रखने वाले जिस विश्व समुदाय' की अवधारणा रखी है, उसमें कन्फ्यूशियस के दर्शनशास्त्र की झलक देखी जा सकती है. शी जिनपिंग कन्फ्यूशियस के जन्मस्थान कुफु का दौरा कर चुके हैं और उनकी उक्तियों को सार्वजनिक तौर पर उद्धृत करते रहे हैं.

'अपमान की सदी'

19वीं और 20वीं सदी का चीन का इतिहास आज भी बहरी दुनिया को लेकर उसकी सोच का प्रभावित करता है. चीन 19वीं सदी के मध्य में अफीम युद्ध का गवाह रहा है. पश्चिमी ताक़तों ने चीन के दरवाज़े खुलवाने के लिए ताक़त का इस्तेमाल किया था.

साल 1840 से 1940 के इस दौर को चीन में 'अपमान की सदी' के रूप में याद किया जाता है. इस दौर में चीन को यूरोपीय ताक़तों और जापानी हमलों के सामने घुटने टेकने पड़े थे. इसी दौर में चीन को हांगकांग ब्रिटेन को और पूर्वोत्तर के इलाके में स्थित मंचूरिया को जापान को सौंपना पड़ा था.

चीन ने हाल ही में जापान के ख़िलाफ़ जीत की वर्षगांठ मनाई है

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इतना ही नहीं, चीन को कई क़ानूनी और व्यावसायिक विशेषाधिकार पश्चिमी देशों को देना पड़ा था. विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद तत्कालीन सोवियत संघ ने चीन के मंचूरिया और शिनजियांग जैसे सीमावर्ती इलाकों पर अपना प्रभाव बनाने की कोशिश की.

इन अनुभवों की वजह चीन बाहरी दुनिया को शंकालु नज़रिये से देखने लगा. साल 2001 में जब चीन विश्व व्यापार संगठन का हिस्सा बना तो कई लोगों के जेहन में उस दौर की यादा ताज़ा हो गईं जब चीन के व्यापार पर विदेशी ताक़तों ने 'ग़ैरवाजिब' संधियों के सहारे नियंत्रण स्थापित कर रखा था.

आज की कम्युनिस्ट पार्टी ने ये शपथ ले रखी है कि वे कभी पहले जैसे हालात पैदा होने नहीं देंगे. इस साल मार्च में अलास्का में चीनी और अमेरिकी वार्ताकारों की एक तीखी बहस के बाद चीन ने अपने मेजबानों पर पाखंड और धौंस जमाने का आरोप लगाया था.

शी जिनपिंग का चीन उस विचार का समर्थन नहीं करता जिसमें कोई बाहरी ताक़त उसे आंख दिखाए और यूं ही बचकर निकल जाए.

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भुला दिया गया गठबंधन

कभी-कभी नकारात्क बातों में भी सकारात्मक संदेश छुपे होते हैं. द्वितीय विश्व युद्ध के समय चीन को भी ऐसा ही एक सबक मिला था. साल 1937 में जापान ने जब उस पर हमला किया तो वो अकेला ही उसका सामना कर रहा था.

लेकिन साल 1941 में अमेरिकी बंदरगाह पर्ल हार्बर पर जापान के हमले के बाद पश्चिमी ताक़तों ने एशिया के मैदान में अपना मोर्चा खोला. युद्ध के उन दिनों चीन में एक करोड़ से भी ज़्यादा लोगों की जानें गई थीं लेकिन उसने पांच लाख से भी ज़्यादा जापानी सैनिकों को अपनी ज़मीन पर क़ैद करके रखा था.

चीन अपनी इस वीरता का बखान अक्सर ही इतिहास की किताबों, फ़िल्मों और टेलीविज़न पर करता रहता है. आज की तारीख़ में चीन खुद को अमेरिका, ब्रिटेन और सोवियत संघ के साथ 'फ़ासीवाद विरोध ताक़तों के गठबंधन' के हिस्से के तौर पर पेश करता है.

वो दुनिया को ये याद दिलाना चाहता है कि जर्मनी, इटली और जापान के गठबंधन के ख़िलाफ़ वो विश्व युद्ध का एक विजेता देश था. माओ के ज़माने में तीसरी दुनिया के नेता के तौर पर चीन अपनी ऐतिहासिक भूमिका पर भी ख़ासा जोर देता है.

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इस सिलसिले में ग़ैरपश्चिमी ताक़तों के बीच साल 1955 के बांडुंग कॉन्फ्रेंस और सत्तर के दशक में पूर्वी अफ्रीका में तंज़ाम रेलवे के निर्माण में चीन की भूमिका का जिक्र किया जाता है. चीनी कम्युनिस्ट पार्टी अपनी अहमियत का एहसास दिलाने के लिए आधुनिक इतिहास का भी सहारा लेती है.

लेकिन उसी इतिहास के एक कालखंड (1958-62) में बर्बाद कर देने वाली आर्थिक नीतियों के कारण जब भीषण अकाल पड़ा था और आज के चीन में उस घटना का जिक्र तक नहीं किया जाता है. और इस बीच चीन कुछ आधुनिक लड़ाइयों का भी गवाह रहा.

पिछले साल जब अमेरिका और चीन के संबंध तनावपूर्ण चल रहे थे तो साल 1950-53 के दौरान हुए कोरियाई युद्ध की याद में नई फ़िल्में बनाई गईं. चीन इस लड़ाई 'अमेरिका के ख़िलाफ़ प्रतिरोध का युद्ध' करार देता है.

मार्क्स और लेनिन

चीन की राजनीतिक विचारधारा में मार्क्स और लेनिन का वजूद बड़ी गहराई तक है. शी जिनपिंग के दौर में इसे सक्रियता से महसूस किया जा सकता है. 20वीं सदी में माओत्से तुंग और कम्युनिस्ट पार्टी के अन्य प्रमुख राजनेता मार्क्सवाद के सिद्धांतों पर बहस किया करते थे.

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उदाहरण के लिए 'वर्ग युद्ध' की अवधारणा के नाम पर माओ के शासनकाल की शुरुआत में लाखों भूस्वामियों की हत्या की गई. चीनी समाज की जीवनशैली में 'वर्ग भेद' को ख़राब नज़र से देखा जाता रहा है. आज भी चीन की राजनीतिक भाषा में पूंजीवाद के ख़िलाफ़ समाजवाद की संकल्पनाओं और संघर्ष के विचारों का पुट देखने में मिलता है.

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की सैद्धांतिक शाखा क्विशी में चीनी समाज के विरोधाभासों पर नियमित रूप से होने वाली बहसों में मार्क्स के सिद्धांतों का असर साफ़ तौर से महसूस किया जा सकता है.

अमेरिका और चीन की प्रतिस्पर्धा को भी मार्क्स के सिद्धांतों के चश्मे से देखा जा सकता है. शी जिनपिंग का चीन इसे संघर्ष की तरह पेश करता है. चीनी समाज की आर्थिक ताक़तों पर भी ये बात लागू होती है. उसके भी अपने विरोधाभास हैं.

ताइवान का मु्द्दा

चीन के लिए ताइवान भी एक बड़ा मुद्दा रहा है. वो ये कहता है कि ताइवान एक विद्रोही प्रांत है जिसका विलय चीन की मुख्यभूमि से किया जाना है. ताइवान के इतिहास की पिछली सदी चीन की राजनीति के बारे में काफी कुछ बयान करती है.

साल 1895 में जापान के साथ भीषण युद्ध के बाद चीन को ताइवान छोड़ना पड़ा था. इसके बाद आधी सदी तक ताइवान जापान का उपनिवेश बना रहा. इसके बाद राष्ट्रवादियों द्वारा थोड़े समय के लिए साल 1945 से 1949 के बीच ताइवान और चीन की मुख्यभूमि का एकीकरण हो गया.

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माओ के दौर में चीन इस द्वीप को अपने अधिकार क्षेत्र में लेने से चूक गया. तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रुमैन माओ को ऐसा करने भी देते लेकिन तभी साल 1950 में कोरियाई युद्ध शुरू हो गया और दक्षिण कोरिया के ख़िलाफ़ युद्ध में चीन उत्तर कोरिया के साथ शामिल हो गया.

इस घटनाक्रम के कारण ताइवान शीत युद्ध के दौरान पश्चिमी ताक़तों का एक प्रमुख सहयोगी बन गया. माओत्से तुंग ने ताइवान के तट पर साल 1958 में हमला किया लेकिन फिर अगले 20 सालों के लिए उसे नज़रअंदाज़ कर दिया.

साल 1979 में अमेरिका-चीन के संबंधों की बहाली के बाद इस बात पर सहमति बनी कि दोनों पक्ष एकीकृत चीन को मानेंगे. लेकिन दोनों ही देश इस बात पर सहमत नहीं हो पाए कि ताइवान या बीजिंग में किस सरकार को वैध गणतांत्रिक सरकार माना जाएगा.

इस बात को 40 साल गुजर गए हैं. शी जिनपिंग इस बात पर जोर देते हैं कि एकीकरण जल्द किया जाएगा. हांगकांग के भविष्य और चीन की तल्ख बयानबाज़ियों के कारण ताइवान के लोग मुख्यभूमि के साथ नज़दीकी संबंधों को लेकर सशंकित रहते हैं.

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