चीन 'साउथ चाइना सी' को लेकर दुनिया से भिड़ने को क्यों है तैयार? - दुनिया जहान

फायरी क्रॉस आइलैंड की तस्वीर

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    • Author, मानसी दाश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पश्चिमी प्रशांत सागर का साउथ चाइना सी यानी दक्षिण चीन सागर बीते कई सालों से चर्चा में है. इस इलाक़े को चीन अपना कहता है और एक बेहद महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत वो यहां कृत्रिम द्वीप बना रहा है.

मामला केवल चीन का होता तो विवाद नहीं था लेकिन साउथ चाइना सी के आसपास के देश भी इसके कुछ हिस्सों पर अपना दावा जताते हैं. वहीं अमेरिका और पश्चिमी देश, यहां तक कि नैटो ने भी इस इलाक़े में चीन की परियोजना को लेकर कई बार चिंता जताई है.

जानकार मानते हैं कि साउथ चाइना सी का विवाद कुछ देशों के बीच के झगड़े से कहीं अधिक है. चीन का यहां बढ़ता दखल विश्व मानचित्र में नए बदलाव की ओर भी इशारा है और आने वाले वक्त में ये बड़े संघर्ष का कारण बन सकता है.

लेकिन साउथ चाइना सी चीन के लिए इतना अहम क्यों है? और ऐसी क्या वजह है कि चीन हर हाल में इस इलाक़े को अपने कब्ज़े में चाहता है?

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चीन की राष्ट्र निर्माण की कोशिश

साल 2018 में जब अमेरिकी वायुसेना का एक विमान साउथ चाइना सी के क़रीब पहुंचा तो चीनी सेना ने उसे वापस लौटने की चेतावनी दी. इस विमान में बीबीसी की एक टीम भी थी. ये टीम कुछ साल पहले भी साउथ चाइना सी गई थी. टीम ने देखा कि चीन तेज़ी से यहां निर्माण कार्य कर रहा है.

साउथ चाइना सी में क़रीब 250 छोटे-बड़े द्वीप हैं. लगभग सभी द्वीप निर्जन हैं. इनमें से कुछ ज्वार भाटे के कारण कई महीने पानी में डूब रहते, तो कुछ अब पूरी तरह डूब चुके हैं. ये इलाक़ा हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के बीच है और चीन, ताइवान, वियतनाम, मलेशिया, इंडोनेशिया, ब्रूनेई और फ़िलीपीन्स से घिरा है. इंडोनेशिया के अलावा अन्य सभी देश इसके किसी न किसी हिस्से को अपना कहते हैं.

ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी में चीनी अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ डॉक्टर फेंग जंग कहते हैं कि चीन दावा करता है कि दो हज़ार साल पहले चीनी नाविकों और मछुआरों ने इस इलाक़े को सबसे पहले ढ़ूंढा, इसे नाम दिया और यहां काम शुरू किया.

डॉक्टर फेंग जंग कहते हैं, "दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान 1939 से लेकर 1945 तक साउथ चाइनी सी के पूरे इलाक़े पर जापान का कब्ज़ा था. जापान की हार के बाद चीन ने इस पर फिर से कब्ज़ा करने के लिए अपने नौसेनिक युद्धपोत यहां भेजे."

फेंग जंग कहते हैं कि युद्ध के बाद चीनी सरकार ने आधिकारिक तौर पर एक मानचित्र जारी किया जिसमें एक लकीर के ज़रिए तीस लाख वर्ग किलोमीटर के साउथ चाइना सी के एक बड़े हिस्से और लगभग सभी द्वीपों को अपने हिस्से में दिखाया. इस लकीर को नाइन डैश लाइन कहा जाता है. हालांकि चीन ने इस लकीर को लेकर कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया.

वो कहते हैं, "स्कॉलर्स के बीच अभी भी इस बात को लेकर विवाद है कि उस वक्त चीनी सरकार इस लकीर के ज़रिए क्या बताने की कोशिश कर रही थी. साउथ चाइना सी को लेकर मौजूदा चीनी सरकार के दावे के केंद्र में अब भी वही मानचित्र और अनसुलझा विवाद है."

साउथ चाइना सी

चीन कहता है कि साउथ चाइना सी में मुल्कों की दिलचस्पी तब हुई जब वहां उसने तेल की खोज शुरू की.

डॉ फेंग जंग कहते हैं कि चीन का ये दावा कुछ हद तक सही भी लगता है क्योंकि 1970 के दशक से पहले किसी और ने चीन के दावे को चुनौती नहीं दी.

वो कहते हैं, "चीन की एक दलील ये रही है कि ऐतिहासिक तौर पर वही लगातार इस इलाक़े पर दावा करता कहा है जबकि दूसरे देशों के साथ ऐसा नहीं है. आज अपने खोए इलाक़े को फिर से अपने कब्ज़े में लेना, उस पर अपनी संप्रभुता क़ायम करना और हक साबित करना, चीनी सरकार आधुनिक राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में इसे बेहद महत्वपूर्ण मानती है."

तो क्या चीन के लिए समुद्र का ये टुकड़ा सिर्फ़ इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसने ऐतिहासिक तौर पर इसे अपना कहा है या फिर इसके पीछे कोई ठोस आर्थिक कारण है.

चीनी प्रीमियर ली केचियांग

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संसाधनों का अथाह खज़ाना

ऑस्ट्रेलियन नेशनल सेंटर फ़ॉर ओशन रिसोर्सेस एंड सिक्योरिटी के पूर्व निदेशक र्प्रोफ़ेसर क्लाइव स्कोफ़ील्ड कहते हैं चीन और दूसरे मुल्कों को ये एहसास होने लगा है कि आर्थिक और सामरिक तौर पर ये जगह अहम साबित हो सकती है.

वो कहते हैं, "कई देशों की दिलचस्पी इस इलाक़े में बढी है क्योंकि उनका मानना है कि इस जगह पर उन्हें कच्चे तेल की ख़ज़ाना मिल सकता है. हालांकि यहां पर संभावित ख़ज़ाना होने की बात पर मुझे संदेह है."

इस इलाक़े में असल में कितना तेल मिल सकता है इसे लेकर कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है. हालांकि प्रोफ़ेसर क्लाइव कहते हैं यहां एक अलग तरह की संपदा है जो चीन के लिए महत्वपूर्ण है. यहां तीस हज़ार प्रकार की मछलियां हैं. और मत्स्य उत्पादन के मामले में वैश्विक स्तर क़रीब 15 फ़ीसदी का मछली उत्पादन करता है और ये काम होता है साउथ चाइना सी से.

वो कहते हैं, "साउथ चाइना सी में समुद्र के संसाधनों को लेकर कंम्पीटीशन काफी अधिक है और इन संसाधनों के लिए इस इलाक़े में जाने को लेकर मुल्कों के बीच टकराव की स्थिति पैदा कतई असंभव नहीं."

इस कारण इस इलाक़े में तनाव बढ़ा है और इससे निपटने के लिए चीन यहां अपनी स्थिति और मज़बूत करना चाहता है.

एक बेहद दिलचस्प मामला साल 2012 में यहां के स्कारबोरो शोआल में सामने आया जब चीन ने फ़िलीपीन्स से मछुआरों को यहां मछली पकड़ने से रोक दिया. फ़िलिपीन्स के अनुसार ये इलाक़ा उसके विशेष आर्थिक ज़ोन का हिस्सा है. विवाद बढ़ा और फ़िलीपीन्स ने अंतराष्ट्रीय कोर्ट का रुख़ किया.

मामले की जांच के लिए संयुक्त राष्ट्र के 'लॉ ऑफ़ द सी' कन्वेन्शन के तहत एक ट्राइब्यूनल बनाया गया. ट्राइब्यूनल ने फ़ैसला फ़िलीपीन्स के हक में दिया . कोर्ट ने कहा "चीन के पास ऐतिहासिक तौर पर समुद्री क्षेत्रों के भीतर संसाधनों पर दावा करने का कोई क़ानूनी आधार नहीं है."

स्कारबोरो शोआल

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प्रोफ़ेसर क्लाइव बताते हैं कि इस मामले में चीन की प्रतिक्रिया अलग रही. कोर्ट के फ़ैसले की प्रतिक्रिया में चीन ने कहा कि ये फ़ैसला केवल एक कागज़ का टुकड़ा है जिसे फेंक दिया जाना चाहिए और मसले का हल बातचीत से किया जाना चाहिए."

प्रोफ़ेसर क्लाइव कहते हैं, "चीन सुनवाई में शामिल नहीं हुआ और उसने ट्राइब्यूनल के अधिकारक्षेत्र को मानने से भी इनकार कर दिया. इसके साथ ही साउथ चाइना सी के आसपास के मुल्कों और चीन के नज़रिए का फर्क खुल कर सामने आ गया और इस छोटे इलाक़े को लेकर तनाव की संभावना और बढ़ने लगी."

इसके बाद अब तक इस मामले से दूर रहे इंडोनेशिया के साथ भी चीन का तनाव शुरू होने लगा.

लेकिन ऐसा नहीं है कि साउथ चाइना सी को लेकर मुल्कों के बीच तनाव केवल मछली पकड़ने के अधिकार या दूसरे संसाधनों को लेकर रहा है. साउथ चाइना सी दुनिया के सबसे व्यस्ततम समुद्री मार्गों में से भी एक है.

संयुक्त राष्ट्र कॉन्फ्रेंस ऑन ट्रेड एंड डेवेलपेन्ट के एक अनुमान के अनुसार दुनिया में होने वाले व्यापार का 80 फीसदी समुद्री मार्ग से होता है और इस व्यापार का क़रीब एक तिहाई साउथ चाइना सी से हो कर गुज़रता है.

सेंटर फ़ार स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़ के अनुसार इस रास्ते से सालाना क़रीब 3.37 ट्रिलियन डॉलर का बिज़नेस होता है. ऐसे में कई मुल्कों की इसमें दिलचस्पी होना स्वाभाविक ही है.

प्रोफ़ेसर क्लाइव कहते हैं "कई जानकार मानते हैं कि चीन इस इलाक़े पर अपनी संप्रभुता का जो दावा करता है उसका सीधा नाता यहां के रास्ते होने वाले व्यापार पर नियंत्रण हासिल करने से है."

वीडियो कैप्शन, चीन और फिलिपींस हुए आमने-सामने, दक्षिण चीन सागर में फिर हलचल

इस इलाक़े पर किसी एक देश का कब्ज़ा न हो, इसमें अमेरिका की भी खासी दिलचस्पी है. मावलवाहक जहाज़ों के साथ-साथ उसके युद्धपोत भी इस इलाक़े से नियमित तौर पर गुज़रते रहते हैं. अमेरिका इसे 'नेविगेशन की आज़ादी' कहता लेकिन चीन इसे उसका आक्रामक रवैय्या करार देता है.

अपने विदेश मंत्री के कार्यकाल के दौरान माइक पोम्पियो ने ये भी स्पष्ट कर दिया था. उन्होंने कहा था "साउथ चाइना सी समुद्र में चीन के साम्राज्य का विस्तार नहीं है. हम आसियान देशों के नेताओं का समर्थन करते हैं कि इस इलाक़े के विवाद का निपटारा अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के तहत किया जाना चाहिए."

लेकिन इस इलाक़े में चीन की महत्वाकांक्षा केवल आर्थिक हितों तक सीमित नहीं है. ऑस्ट्रेलियन स्ट्रैटेजिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट के कार्यकारी निदेशक पीटर जेनिंग मानते हैं की इस इलाक़े में उसने अपनी सैन्य गतिविधियां काफी बढ़ा दी हैं और इस कारण उसके पड़ोसियों की चिंता बढ़ी है.

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फ़िलीपीन्स में विरोध प्रदर्शन

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इमेज कैप्शन, साल 2019 में फ़िलीपीन्स में दक्षिण चीन सागर में चीन के 'आक्रामक रवैय्ये के ख़िलाफ़' विरोध प्रदर्शन

चीन के ख़तरनाक इरादे

पीटर जेनिंग कहते हैं, "कहा जाए तो चीन साउथ चाइनी सी में डूबे चट्टानों के ऊपर चीन लाखों करोड़ों किलो कॉन्क्रीट और पत्थर डाल रहा है. इस तरह वो समुद्र के भीतर मज़बूत नींव तैयार कर उसके ऊपर कृत्रिम द्वीप बना रहा है."

चीन साउथ चाइना सी के पारासेल, स्पार्टली, फायरी, मिसचिफ़, सूबी और वूडी द्वीपों को बड़ा करने और वहां सैन्य अड्डे और बंदरगाह बनाने का काम कर रहा है.

पीटर जेनिंग कहते हैं कि चीन अब तक समुद्र के भीतर तीन हज़ार हेक्टेयर की नई ज़मीन तैयार कर चुका है.

वोकहते हैं, "चीन ने यहां तीन हज़ार मीटर लंबे तीन रनवे बना लिए हैं. ये सैन्य रनवे हैं यानी यहां वो लड़ाकू विमान उतार सकता है. वो कच्चे तेल के बड़े-बड़े टैंक ज़मीन के नीचे समुद्र में धंसा कर वहां तेल के विशाल भंडार बना रहा है. द्वीप की सुरक्षा के लिए उसने यहां मिसाइल सिस्टम लगाया है और ये सारा काम उसने 36 महीनों से कम समय में किया जो अपने आप में बड़ी उपलब्धि है."

विवादित स्कारबोरो द्वीपों के पास गश्त लगाते चीनी कोस्टगार्ड

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पीटर जेनिंग कहते हैं कि आधुनिक इतिहास में ये अब तक का सबसे बड़ा विनाशकारी कदम में जिसने पर्यावरण को गंभीर नुक़सान पहुंचाया है. इसका असर यहां के समुद्र में पाई जाने वाली प्रजितियों पर पड़ा है.

वो कहते हैं, "लंबे वक्त से चीनी सेना की कोशिश रही है कि चीन की मुख्यभूमि की तरफ आने वाले सभी रास्तों पर उसका नियंत्रण हो. ऐसा कर के वो समुद्री रास्तों से आने वाले अमेरिका या किसी और देश की नौसेना को अपने तट से दूर रख सकता है."

साउथ चाइना सी

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पीटर जेनिंग के अनुसार ऐसा कर के चीन अपनी ताकत का भी प्रदर्शन कर रहा है.

2013 में चीन ने ईस्ट चाइना सी में एयर डिफेन्स आइडेन्टिफिकेशन ज़ोन (एडीआईज़ेड) बनाया. साउथ चाइना सी में भी वो ऐसा एक ज़ोन बनाना चाहता है ताकि इसे नो फ्लाई ज़ोन करार दे सके. अब तक वो ऐसा कर नहीं पाया है लेकिन इस इलाक़े से गुज़रने वाले लड़ाकू विमानों पर वो रोक लगाता है. 2020 अगस्त में उसने अमेरिका को चेतावनी देते हुए साउथ चाइना सी में दो मिसाइलें भी दाग़ दी थीं.

पीटर जेनिंग कहते हैं "चीन अपने सैन्य हितों की सुरक्षा चाहता है और दक्षिण पूर्व एशिया में अपना प्रभुत्व बढ़ाना चाहता है."

लेकिन चीन के इस आक्रामक रवैय्ये को लेकर दूसरे देश किस तरह की प्रतिक्रिया दे रहे हैं?

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स्पार्टली आइलैंड्स

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विवादों का केंद्र

बॉनी ग्लेज़र फिलहाल अमेरिका के जर्मन मार्शल फंड की एशिया प्रोग्राम की निदेशक हैं. वो सेंटर फ़ॉर स्ट्रैटेजिक एंड इन्टरनेशनल स्टडीज़ में चाइना पावर प्रोजेक्ट की निदेशक रह चुकी हैं.

वो कहती हैं कि अमेरिका चीन की महत्वाकांक्षा के बारे में तब तक जान नहीं पाया जब तक साउथ चाइना सी में कृत्रिम द्वीप दिखना शुरू नहीं हुए और इसकी पुष्टि करने वाली सैटलाइट तस्वीरें सामने नहीं आईं.

वो कहती हैं, "अमेरिकी सरकार को खुफ़िया सूत्रों से पता चला कि चीन साउथ चाइना सी में तेज़ी से निर्माण कार्य कर रहा है, लेकिन मुझे लगता कि उनके पास इस बारे में कोई जानकारी या ब्लू प्रिंट नहीं था कि चीन दरअसल वहां करना क्या चाहता है."

बॉनी ग्लेज़र मानती हैं कि शुरूआत में अमेरिका ने इस इलाक़े में चल रहे निर्माण कार्य को गंभीरता से नहीं लिया. अमेरिका का ध्यान उत्तर कोरिया और चीन के साथ व्यापार पर अधिक रहा न कि साउथ चाइना सी पर.

ऐसे में इस इलाक़े के छोटे देश इस समस्या को सुलझाने के लिए अपने तरीक़े अपना रहे हैं और चीन के विरोध में खड़े होने की बजाय उसके साथ समझौते कर रहे हैं.

वो कहती हैं, "कोई भी देश सीधे तौर पर चीन से लड़ना नहीं चाहता. उनकी उम्मीदें अमेरिका के साथ बंधी है कि क्या वो इस इलाक़े में शांति और स्थायित्व के लिए प्रतिबद्ध होगा. मुझे लगता है कि इसी संदेह और उम्मीद के कारण अधिक देशों ने चीन के साथ हाथ मिलाना ज़्यादा पसंद किया."

यहां तक कि फ़िलीपीन्स जिसने साउथ चाइना सी में अपने अधिकारों के लिए अंतरराष्ट्रीय कोर्ट का रुख़ किया था उसने भी चीन के यहां सैन्य अड्डा बनाने को लेकर ऐतराज़ नहीं किया.

पगासा आइलैंड

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इमेज कैप्शन, स्पार्टली द्वीप समूह में से एक पगासा आइलैंड

बॉनी ग्लेज़र कहती हैं कि फ़िलीपीन्स में सिंचाई और रेल परियोजना में चीन भारी निवेश कर रहा है. ऐसे में इन देशों के लिए आर्थिक तौर पर काफी कुछ दांव में है. साथ ही चीन के साथ सैन्य टकराव का डर भी है.

वो कहती हैं, "मुझे लगता कि इस इलाक़े को लेकर अमेरिका और चीन के बीच भी टकराव बढ़ने का ख़तरा है. अगर अमेरिका कहता है कि चीन इन द्वीपों के ज़रिए सैन्य गतिविधियों को अंजाम नहीं दे सकता तो दोनों के बीच सैन्य टकराव की संभावना भी और ऐसे में संकट गहरा सकता है."

हालांकि बॉनी ग्लेज़र ये भी कहती हैं अगर सूरत ऐसी बनती है कि अमेरिका अपने एजेंडे में साउथ चाइना सी को अधिक महत्व न दे, तो इसका सीधा फायदा चीन को होगा.

वो कहती हैं, "शतरांज की इस बिसात पर अगर चीन बड़ा खिलाड़ी बन कर उभरता है और अमेरिका सक्रिय रूप से इस इलाक़े में दखल नहीं देता, तो असल मायनों में चीन के लिए इस इलाक़े के सभी द्वीपों, पूरे समुद्र और एयरस्पेस पर कब्ज़ा करने का रास्ता साफ़ हो जाएगा."

वीडियो कैप्शन, दक्षिण चीन सागर पर अपने दावे को लेकर क्यों जूझ रहे हैं ये देश?

जानकार कहते हैं कि साउथ चाइना सी, चीन के लिए वो जगह है जहां पर पैर रख कर वो दक्षिण एशिया के पूरे इलाक़े से अमेरिका को बाहर धकेल सकता है और उसके ख़िलाफ़ एक मज़बूत प्रतिद्वंदी के रूप में खुद को स्थापित कर सकता है.

दुनिया के मछली उद्योग के सबसे बड़े स्रोत और व्यस्ततम समुद्रीमार्ग पर अपना अधिकार साबित कर चीन खुद को इस इलाक़े की अकेली बड़ी शक्ति के रूप में देखना चाहता है.

साथ ही यहां पर हो रही उसकी भारी भरकम सैन्य गतिविधियां इस बात की तरफ भी इशारा है कि वो अमेरिका को केवल इस इलाक़े से नहीं बल्कि इस एकध्रुवीय दुनिया के केंद्र से भी निकालने की कोशिश कर रहा है.

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