ताइवान पर चीन से टकराने के मूड में अमरीका

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ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकन एयरलाइंस और अपने यहाँ के अन्य विमान सेवा देने वाली कंपनियों से आग्रह किया है कि वो ताइवान को लेकर चीनी मांगों को नज़रअंदाज़ करें.
चीन और अमरीका के बीच तनाव बढ़ने का यह ताज़ा उदाहरण है.
अमरीकी अधिकारियों ने अमेरिकन एयरलाइंस और डेल्टा से कहा है कि वो चीन की उस मांग को नहीं मानें जिसमें ताइवान को ''ताइवान चाइना'' कहने के लिए कहा गया है.
अमरीका ने यह निर्देश तब जारी किया है जब चीन ने 36 विदेशी एयरलाइंस को आदेश दिया कि चाहे जिस भी भाषा में केवल ताइवान लिखा है उसे हटा दे. ताइवान एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक द्वीप है, लेकिन चीन दावा करता है यह उसका हिस्सा है.
वाइट हाउस ने चीन के इस आदेश को बकवास बताया है. अमरेकिन एयरलाइंस ने इस पर कोई भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है.
चीन ने दुनिया भर की एयरलाइंस से कहा है कि वो अपनी वेबसाइट पर ताइवान, हॉन्ग कॉन्ग और मकाउ को चीन का हिस्सा बताए न कि स्वतंत्र देश. इस मांग की ऑस्ट्रेलिया, ताइवान और अमरीका ने आलोचना की है.
ताइवान को चीन वन चाइना पॉलिसी के तहत अपना आंतरिक हिस्सा बताता है. वहीं चीन हॉन्ग कॉन्ग और मकाउ को विशेष प्रशासनिक क्षेत्र बताता है.
कई पर्यक्षकों का कहना है कि चीन दुनिया भर के देशों पर दबाव बना रहा है ताकि ताइवान को अलग-थलग किया जाए.
अमरीका भेजेगा युद्धपोत
दूसरी तरफ़ समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार अमरीका ताइवान जलडमरूमध्य के ज़रिए एक युद्धपोत भेजने की योजना बना रहा है.
रॉयटर्स ने यह ख़बर अमरीकी अधिकारियों के हवाले से दी है. चीन ने अमरीका के इस रुख़ पर कड़ी आपत्ति जताई है. अमरीका और चीन में ट्रेड वॉर और उत्तर कोरियाई परमाणु संकट को लेकर पहले से ही तनाव है.
अमरीकी अधिकारियों ने रॉयटर्स से कहा कि अमरीका की पहले से ही इस साल ताइवान को एक लड़ाकू विमान भेजने की योजना थी, लेकिन अंजाम तक नहीं पहुंचाया जा सका था.
इससे पहले अमरीकी लड़ाकू विमान 2007 में वियतनाम जलडमरूमध्य के ज़रिए पहुंचा था. तब अमरीका के राष्ट्रपति जॉर्ज डब्लयू बुश थे और तब से ही और युद्धपोत भेजने की योजना थी.

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अमरीका की योजना पर चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुआ चुनयींग ने कहा है कि अमरीका-चीनी संबंध में ताइवान का मुद्दा काफ़ी महत्वपूर्ण और संवेदनशील है.
चीन के सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स का कहना है कि अमरीका ऐसा करके ताइवान का भला नहीं करेगा यह चीन को उकसाने वाला क़दम साबित होगा.
अख़बार का कहना है कि अमरीका को सोच समझकर ताइवान मुद्दे को हैंडल करना चाहिए. अख़बार ने अपनी टिप्पणी में लिखा है कि अगर अमरीका ताइवान के मामले में सोच-समझकर फ़ैसला नहीं करता है तो द्विपक्षीय संबंधों को भारी नुक़सान पहुंचेगा.
ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि चीनी आर्मी देश की संप्रभुता की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगी. ताइवान में स्वतंत्रता के समर्थन में आंदोलन चल रहा है.
ग्लोबल टाइम्स का कहना है कि ताइवन को अमरीका, जापान और भारत से मदद मिल रही है. अख़बार ने लिखा है कि ताइवान पर चीन फ़ैसला करेगा न कि अमरीका.
ट्रंप ने अपने चुनावी अभियान में ही वन चाइना पॉलिसी को चुनौती दी थी. 2016 में ट्रंप ने प्रोटोकॉल को तोड़ते हुए ताइवान की राष्ट्रपति को फ़ोन किया था.

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12 जून को ताइवान में अमरीकी दूतावास
चीन ने ट्रंप के इस रुख़ पर कड़ी आपत्ति जताई थी. हालांकि इसके बाद ट्रंप का रुख़ ताइवान पर नरम पड़ता गया, क्योंकि उन्हें उत्तर कोरिया परमाणु संकट पर चीन की मदद चाहिए थी. हालांकि अमरीका का ताइवान के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं है.
12 जून को अमरीकन इंस्टिट्यूट ताइवान में अनाधिकारिक अमरीकी दूतावास खोलने जा रहा है. हालांकि ट्रंप प्रशासन ने इस मौक़े पर किसी कैबिनेट स्तर के अधिकारी को नहीं भेजने का फ़ैसला नहीं किया है.
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट का कहना है कि ऐसा तनाव को बढ़ने से रोकने के लिए किया गया है.
द अमरीकन इंस्टिट्यूट इन ताइवान (एआईटी) ग़ैर-लाभकारी संगठन है. इसे अमरीकी सरकार से वित्तीय मदद मिलती है. यह संगठन ताइवान के साथ अनाधिकारिक रूप से संबंधों को आगे बढ़ाने का काम करता है.
ताइवान में यह 1979 से काम कर रहा है. चीनी पर्यवेक्षकों का मानना है कि अमरीका के इस क़दम पर चीन कड़ी प्रतिक्रिया दे सकता है. यहां तक कि वो बीजिंग से अमरीकी राजदूत को जाने के लिए कह सकता है.

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क्या ताइवान को ख़ुद में मिला लेगा चीन
वॉशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार चीन जिस तरह से अपनी सेना का आधुनिकीकरण कर रहा है उसमें एक अनुमान के अनुसार एक तिहाई आर्मी का बजट ताइवान के विलय की तैयारी में लगाया जा रहा है.
इस रिपोर्ट के अनुसार अगर ताइवान को सुरक्षित रहना है तो उसे अमरीका के साथ मिलकर काम करना होगा. ताइवान को सुरक्षा खर्च बढ़ाने की ज़रूरत है. जुलाई में ताइवान सुरक्षा बजट में तीन फ़ीसदी की बढ़ोतरी कर सकता है. ट्रंप प्रशासन भी ताइवान की सुरक्षा पर खर्च को और बढ़ा सकता है.

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चीन-ताइवान तनाव की जड़
चीन ताइवान के बीच तनाव की जड़ें इन देशों के अतीत में हैं. इसकी जड़ें 1930 के दशक में चीन के गृह युद्ध तक जाती हैं, ये चीन की नेशनलिस्ट पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी के बीच जंग का नतीजा है.
1949 में जब माओत्से तुंग की कम्युनिस्ट पार्टी जीत गई तो चीन के बड़े हिस्से पर इसका प्रभुत्व स्थापित हो गया. चांग काई शेक अपने समर्थकों के साथ ताइवान चले गए थे. तब से लेकर अब तक इस बात को लेकर संघर्ष जारी है कि कौन असली चीन का प्रतिनिधित्व करता है.
एक ओर पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना (पीआरसी), जिसे आम तौर पर चीन कहा जाता है, वो साल 1949 में बना था. इसके तहत मेनलैंड चीन और हांगकांग-मकाऊ जैसे दो विशेष रूप से प्रशासित क्षेत्र आते हैं.
दूसरी तरफ़ रिपब्लिक ऑफ़ चाइना (आरओसी) है, जिसका साल 1911 से 1949 के बीच चीन पर कब्ज़ा था, लेकिन अब उसके पास ताइवान और कुछ द्वीप समूह हैं. इसे आम तौर पर ताइवान कहा जाता है.
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