ज़ेलेंस्की की अमेरिकी कांग्रेस में स्पीच, क्यों याद आया चर्चिल का वो 81 बरस पुराना भाषण

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- Author, कायला एपेस्टीन
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, न्यूयॉर्क
एक निर्मम युद्ध ने यूरोप को अपनी गिरफ़्त में ले रखा था. पड़ोसी देश एक दूसरे पर बम और गोलियां बरसा रहे थे, और ऐसा लग रहा था कि ये सिलसिला अंतहीन है.
इसी जंग के बीच में एक बहुचर्चित नेता ने अटलांटिक महासागर पार का एक ख़तरनाक सफ़र किया था, ताकि वो अमेरिका के सबसे ताक़तवर नेताओं से सीधे अपील कर सके.
ये बात दिसंबर 1941 की है. जब विंस्टन चर्चिल ने अमेरिकी संसद में खड़े होकर 30 मिनट तक वो भाषण दिया था, जिसे इतिहास में वॉशिंगटन आने वाले किसी विदेशी नेता का सबसे अहम दौरों में से एक माना जाता है.
81 साल बाद, लगभग उसी तारीख़ के आस-पास, अमेरिकी संसद ने युद्ध के बीच में एक और चर्चित नेता का स्वागत किया है. वो हैं, यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदोमीर ज़ेलेंस्की, जिनका देश पिछले 10 महीनों से रूस की बमबारी झेल रहा है.
उनके अमेरिकी संसद में भाषण पर लोगों के ज़हन में विंस्टन चर्चिल के उस ऐतिहासिक और निर्णायक भाषण की यादें ताज़ा हो गई हैं.
अमेरिकी संसद के निचले सदन, हाउस ऑफ़ रिप्रेज़ेंटेटिव्स की स्पीकर नैंसी पेलोसी ने ज़ेलेंस्की के भाषण के बारे में कहा कि, 'एक और ऐतिहासिक नेता ऐसे युद्ध के समय अमेरिकी संसद को संबोधित करने जा रहा है, जब ख़ुद लोकतंत्र दांव पर लगा है.'
जब वॉशिंगटन में छा गए थे विंस्टन चर्चिल

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दूसरे विश्व युद्ध ने पहले ही विंस्टन चर्चिल को घर घर में मशहूर शख़्सियत बना दिया था. वो नाज़ी जर्मनी के ख़िलाफ़ खड़े होने की ब्रिटेन की मज़बूत इच्छाशक्ति का प्रतीक बन गए थे.
जब दिसंबर 1941 में चर्चिल वॉशिंगटन पहुंचे, उससे ठीक पहले विश्व युद्ध अमेरिका के दरवाज़े तक आ पहुंचा था. चर्चिल के अमेरिका पहुंचने के तीन हफ़्ते से भी कम समय पहले, जापान ने पर्ल हार्बर पर हमला किया था. जिसके बाद, अमेरिका के राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डिलानो रूज़वेल्ट ने जापान के ख़िलाफ़ जंग का एलान कर दिया था और इसी के साथ देर से ही सही, मगर अमेरिका भी दूसरे विश्व युद्ध में शामिल हो चुका था.
वॉशिंगटन में विंस्टन चर्चिल की मौजूदगी ने ज़बरदस्त उत्साह पैदा कर दिया था. उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति रूज़वेल्ट के साथ एक प्रेस कांफ्रेंस की और राष्ट्रीय क्रिसमस ट्री को रौशन करने के कार्यक्रम में भी शामिल हुए. तब वॉशिंगटन पोस्ट ने लिखा था, 'अमेरिकी जनता, विंस्टन चर्चिल की तमाम ख़ूबियों में से एक की गिरफ़्त में आ गई है- भीड़ को रोमांचित करने की उनकी क्षमता.'
लेकिन, चर्चिल के वॉशिंगटन दौरे की सबसे बड़ी घटना 26 दिसंबर 1941 को अमेरिकी संसद में उनका भाषण थी.
चर्चिल को सुनने के लिए जुटी कई हस्तियां

विंस्टन चर्चिल ने ये भाषण अमेरिकी सीनेट के चैंबर में दिया था, जिसे सुनने के लिए वहां पर अमेरिकी सांसदों, कैबिनेट के अधिकारियों और अन्य माननीय हस्तियों की भीड़ उमड़ पड़ी थी (अमेरिकी संसद के निचले सदन की मौजूदा स्पीकर नैंसी पेलोसी के पिता थॉमस डि अलेसांद्रो जूनियर भी उस वक़्त संसद के निचले सदन के सदस्य थे).
शानदार स्वागत के बाद, चर्चिल सदन के मंच पर पहुंचे, अपना चश्मा निकाला और उन्होंने अपने सियासी करियर की सबसे अहम तक़रीरों में से एक की शुरुआत की.
प्रधानमंत्री ने अपने भाषण के शुरू में तो अमेरिका की तारीफ़ों के पुल बांधे. उन्होंने दुनिया की दो बड़ी ताक़तों के दोस्ताना ताल्लुक़ात की बात की.
अमेरिका और ब्रिटेन के मज़बूत रिश्तों और सांस्कृतिक समानताओं का ज़िक्र किया. लेकिन, बहुत जल्द उन्होंने अपने भाषण में और गंभीर मसलों को उठाया.
चर्चिल ने कहा, "मुझे यक़ीन है कि आप उस अग्निपरीक्षा की गंभीरता को कम करके नहीं आंक रहे होंगे, जिससे होकर हमें और आपको अभी गुज़रना है. हमारे ख़िलाफ़ जो ताक़तें खड़ी हैं, वो बहुत भयानक हैं. वो निर्मम हैं. ज़हर से भरे हैं."
इसके बाद चर्चिल ने धुरी राष्ट्रों का एक भयानक ख़ाका खींचा.
वो दुष्ट लोग...

चर्चिल ने कहा, 'वो दुष्ट लोग और उनके गिरोह जिन्होंने अपने यहां की जनता को जंग और जीत की राह पर धकेला है, उन्हें पता है कि अगर वो उन लोगों को अपने हथियारों के बल पर नहीं हरा पाते, जिन पर उन्होंने हमला किया है, तो फिर उन्हें इसका जवाब देना होगा."
"वो रुकेंगे नहीं. उन्हें किसी भी बात से तसल्ली नहीं होगी. उन्होंने हर तरह के हथियारों का बड़ा ज़ख़ीरा बना लिया है. उनके पास बेहद प्रशिक्षित और हुनरमंद सेनाएं, नौसेनाएं और वायुसेनाएं हैं. उनकी जो योजनाएं और साज़िशें हैं, उन्हें अंजाम तक पहुंचाने के लिए वो लंबे समय से तैयारी कर रहे थे. वो हिंसा और विश्वासघात की कोई भी हद पार करने के लिए तैयार हैं.'
चर्चिल ने चेतावनी दी कि 'संकट का ये वक़्त हमारे इम्तिहान की घड़ी है.' लेकिन, उन्होंने ये भी कहा अब अमेरिका की मदद मिलने के बाद, मित्र राष्ट्र आने वाले तीन वर्षों में अपनी तक़दीर बदल डालेंगे.
अपने धुरी दुश्मनों के बारे में चर्चिल ने एलान किया कि, 'उन्हें अंदाज़ा नहीं है कि हम उनके ख़िलाफ़ तब तक पीछे नहीं हटेंगे. तब तक नहीं झुकेंगे, जब तक उन्हें ऐसा सबक़ नहीं सिखा देंगे, जिसे वो ख़ुद और बाक़ी दुनिया हमेशा याद रखेगी.'
तालियों की गड़गड़ाहट के चलते, चर्चिल को कुछ देर के लिए अपना भाषण रोकना भी पड़ा था. चर्चिल ने कहा कि, 'स्वतंत्र लोगों को जो कुछ भी प्रिय है, उसकी हिफ़ाज़त के लिए हम एकजुट हैं.'
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के इस भाषण को अगले दिन के अख़बारों में प्रमुखता से जगह दी गई थी. न्यूयॉर्क टाइम्स ने हेडलाइन लगाई: 'रोमांच में डूबी संसद'. अख़बार ने लिखा कि, 'चर्चिल के भाषण के बाद अमेरिकी सदन में मौजूद श्रोता ज़बरदस्त उत्साह और ख़ुशी से झूम उठे.'
"यूक्रेन कभी सरेंडर नहीं करेगा."

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आठ दशक बाद यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की का ये चौंकाने वाला वॉशिंगटन का दौरा उसी तरह की कवरेज और अपेक्षाएं जगाने वाला है. चर्चिल के उस दौरे की तरह ही, ज़ेलेंस्की ने अमेरिका की राजधानी पहुंचकर पहले राष्ट्रपति जो बाइडेन से मुलाक़ात की.
चर्चिल की तरह ही, पूरे यूक्रेन युद्ध के दौरान ज़ेलेंस्की की जनता के बीच मौजूदगी ने उन्हें उन लोगों का हीरो बना दिया है, जो इस जंग में उनके देश का साथ दे रहे हैं.
युद्ध के शुरुआती दिनों में ज़ेलेंस्की ने इस साल मार्च में अमेरिकी संसद के लिए वीडियो संदेश भेजा था. इसमें ज़ेलेंस्की ने अपनी तक़रीर से संसद के दोनों पालों में मौजूद सदस्यों की आंखों में आंसू ला दिए थे.
लेकिन, इस वक़्त वॉशिंगटन का सियासी ख़ेमा बुरी तरह बंटा हुआ है. चर्चिल की तुलना में ज़ेलेंस्की शायद ज़्यादा बंटी हुई अमेरिकी संसद से मुख़ातिब हुए. क्योंकि, रिपब्लिकन पार्टी के सांसदों के बीच यूक्रेन को भारी मात्रा में सैन्य और वित्तीय मदद देने का विरोध बढ़ता जा रहा है.
आज जब रूस के साथ यूक्रेन का युद्ध भयंकर ठंड की ओर बढ़ चला है, तो निश्चित रूप से ज़ेलेंस्की का बहुत कुछ दांव पर लगा.
वैसे आज ज़ेलेंस्की ने भी अमेरिकी कांग्रेस में अंग्रेज़ी में दिए अपने भाषण में दूसरे विश्व युद्ध की याद दिलाई.
उन्होंने कहा, "ठीक वैसे ही जैसे 1944 के क्रिसमस में अमेरिकी सेनाओं ने हिटलर का जमकर सामना किया था, यूक्रेनी सेना भी इस क्रिसमस पुतिन की फौज के साथ लड़ने वाली है."
"यूक्रेन कभी सरेंडर नहीं करेगा."
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