एस जयशंकर के सामने बिलावल भुट्टो कहाँ टिकते हैं?

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2004 में जब मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी तो राहुल गांधी की उम्र 34 साल थी. तब सोनिया गांधी यूपीए गठबंधन और कांग्रेस की चेयरपर्सन थीं.
अगर राहुल गांधी चाहते तो कोई भी मंत्रालय ले सकते थे. मनमोहन सिंह ने राहुल को सरकार में शामिल होने के लिए कहा भी था.
मनमोहन सिंह 2004 से मई 2014 तक भारत के 10 साल तक प्रधानमंत्री रहे लेकिन राहुल गांधी सरकार में शामिल नहीं हुए. हालांकि वह लोकसभा सांसद बने रहे. अब राहुल गांधी 51 साल के हैं और अभी कांग्रेस के लिए केंद्र की सत्ता में वापसी की कोई उम्मीद नज़र नहीं आती.
पाकिस्तान के भुट्टो परिवार की तुलना भी भारत के नेहरू गांधी परिवार से की जाती है. सोशल मीडिया पर राहुल गांधी और बिलावल भुट्टो की तुलना होती है.
बिलावल की मां बेनज़ीर भुट्टो की हत्या एक रैली में हुई थी और राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी भी आत्मघाती हमलावर के शिकार बने थे.

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बिलावल ने ब्रिटेन की ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है जबकि राहुल गांधी ने अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से.
राहुल ने इसी महीने नौ अप्रैल को एक किताब के लोकार्पण समारोह में कहा था कि उनका जन्म सत्ता के बीच हुआ लेकिन सत्ता में उनकी तनिक भी दिलचस्पी नहीं है.
2019 में कांग्रेस को जब आम चुनाव में हार मिली तो उन्होंने पार्टी के अध्यक्ष पद से भी इस्तीफ़ा दे दिया था. राहुल गांधी को अक्सर अनिच्छुक राजनेता कहा जाता है.
लेकिन बिलावल को 19 साल में पार्टी का उत्तराधिकारी बना दिया गया और बुधवार को 33 साल की उम्र में विदेश मंत्री भी बन गए. भारत और पाकिस्तान की राजनीति में राजनीतिक परिवारों का दबदबा कोई नई बात नहीं है.
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27 दिसंबर, 2007 में बिलावल भुट्टो को माँ बेनज़ीर भुट्टो की हत्या के बाद पाकिस्तान पीपल्स पार्टी का उत्तराधिकार घोषित किया गया था.
तब बिलावल महज़ 19 साल के थे और ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के क्राइस्ट कॉलेज में इतिहास से ग्रैजुएशन कर रहे थे. अब बिलावल जब 33 साल के हैं तो उन्हें पाकिस्तान का विदेश मंत्री बना दिया गया है.
2009 में बिलावल को अमेरिका-पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान के एक समिट में पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा बनाया गया था. तब बिलावल 21 साल के थे और उनके पिता आसिफ़ अली ज़रदारी पाकिस्तान के राष्ट्रपति. कहा जाता है कि इस अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल के अलावा कूटनीतिक मामलों में बिलावल के पास कोई अनुभव नहीं है.
कहा जा रहा है कि जब पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय संबंधों के मामले में सबसे मुश्किल दौर में है तब विदेश मंत्रालय की बागडोर ऐसे व्यक्ति के हाथ में सौंप दी गई है, जिनके पास कोई अनुभव नहीं है.
दूसरी तरफ़ भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर से तुलना की जा रही है. एस जयशंकर के पास डिप्लोमैसी का विशाल अनुभव है. वह चीन, अमेरिका और रूस जैसे बड़े मुल्कों में भारत के राजदूत भी रहे हैं. उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि भी कूटनीति से जुड़ी है. जयशंकर के पिता के सुब्रमण्यम को भारतीय कूटनीति का गुरु कहा जाता है.
बिलावल भुट्टो के साथ काम करने वाले पाकिस्तान के अर्थशास्त्री कैसर बंगाली कहते हैं, ''बिलावल उम्र और तजुर्बे में भले कमतर हैं लेकिन उनके पास विज़न है. वह बहुत ही प्रतिभाशाली और शालीन हैं. कोई मंत्रालय किसी एक व्यक्ति से नहीं चलता है. उसके पास एक टीम होती है. अहम यह है कि उस टीम में आप किन लोगों को रखते हैं.''
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कैसर बंगाली कहते हैं, ''दुनिया के कई ऐसे देश हैं, जहाँ की कमान युवाओं के पास है. हम युवा प्रतिभा पर शक नहीं कर सकते. मुझे लगता है कि बिलावल अच्छा काम करेंगे. जहाँ तक भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर की बात है तो वह एक टैलेंटेड शख़्सियत हैं. उनको मैं सुनता रहता हूँ. उन्हें मैंने पाकिस्तान में भी सुना है. उनके पास ज्ञान बहुत है. अंतरराष्ट्रीय राजनीति की वह गहरी समझ रखते हैं.''
बिलावल के विदेश मंत्री बनाए जाने पर पाकिस्तान के अंग्रेज़ी अख़बार द डॉन ने लिखा है, ''युवा बिलावल की तुलना उनके नाना ज़ुल्फिकार अली भुट्टो से होने लगी है. ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो भी 1963 से 66 तक पाकिस्तान के विदेश मंत्री रहे थे. लेकिन क्या युवा बिलावल पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय राजनीति में वह मुकाम दिला पाएंगे, जिसकी अभी सख़्त ज़रूरत है?'' बाद में ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो 1971 से 1977 तक पाकिस्तान के विदेश मंत्री रहे थे.
डॉन ने लिखा है, ''बिलावल की परवरिश पाकिस्तान के अहम राजनीतिक घराने में हुई है और इसका तर्जुबा उन्हें काम आएगा. लेकिन डिप्लोमैसी में अनुभव का ना होना भी एक चिंता का विषय है. पार्टी का मानना है कि बिलावल के लिए मौक़ा है कि वह इस पोजिशन का फ़ायदा अपना नाम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय करने में उठाएं.''
डॉन से पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के एक सीनियर नेता ने कहा, ''यह धारणा बिल्कुल ग़लत है कि बिलावल हर फ़ैसला अपने पिता से पूछकर करते हैं. मैंने कई बार देखा है कि वह अपने पिता से खुलकर असहमति जताते हैं. पार्टी में कोई भी फ़ैसला होता है तो सहमति के आधार पर ही होता है. आप विदेश नीति के मोर्चे पर बिलावल की प्रतिभा से प्रभावित होंगे.''
भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर की पारिवारिक पृष्ठभूमि डिप्लोमैसी और स्कॉलर वाली है. जयशंकर के पिता के सुब्रमण्यम की प्रतिष्ठा भारत में सभी राजनीतिक दलों के बीच रही है.
दूसरी तरफ़ बिलावल के पिता की पहचान पाकिस्तान में बहुत ही विवादित है. जिस शहबाज़ शरीफ़ के मातहत बिलावल भुट्टो विदेश मंत्री बने हैं, वह भी ज़रदारी को भ्रष्ट नेता कहते थे.
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आसिफ़ अली ज़रदारी को पाकिस्तान में भ्रष्टाचार के मामले में मिस्टर 10 पर्सेंट कहा जाता था. ज़रदारी जेल में भी रहे.
दूसरी तरफ़ के सुब्रमण्यम को भारत की कूटनीति का भीष्म पितामह कहा जाता है. उन्हें कई सरकारों ने सम्मानित करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने सम्मान ठुकरा दिया था.
जयशंकर अंग्रेज़ी, रूसी, चीनी के साथ हिन्दी और तमिल भी बोलते समझते हैं. वहीं पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान कई बार बिलावल की उर्दू का मज़ाक उड़ा चुके हैं.
पिछले महीने पाकिस्तान में एक जनसभा को संबोधित करते हुए इमरान ख़ान ने कहा था, ''आसिफ़ अली ज़रदारी ख़ुदा के वास्ते अपने बेटे को उर्दू तो सीखा दो. 15 साल हो गए उसके लिए अब भी बारिश आता है. चीनी उगता है. ख़ुदा का वास्ता है. मैंने अंग्रेज़ों को दो साल में उर्दू सीखते देखा है. अब भी उसे पता नहीं है कि लड़की आती है कि आता है. ये चोरों का टोला मुल्क को बचाने के लिए निकला है.''
बिलावल भुट्टो ने 2018 में इंडिया टुडे को दिए इंटरव्यू में कहा था कि भारत के प्रधानमंत्री की छवि सकारात्मक नहीं है. बिलावल ने कहा था, ''गुजरात में दंगे के बाद से उनकी छवि पाकिस्तान में सकारात्मक नहीं है. मोदी जब पाकिस्तान आए थे तब यह एक अच्छा संकेत था. लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ था.
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