भारत इस सम्मेलन के ज़रिए अपनी विदेश नीति को देना चाहता है और धार

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- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत विदेश नीति में नए और अनूठे प्रयास के तहत 12-13 जनवरी को वॉयस ऑफ़ ग्लोबल साउथ के नाम से एक वर्चुअल सम्मेलन का आयोजन कर रहा है.
भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के मुताबिक़ इस सम्मेलन में 120 देशों के प्रतिनिधि शामिल हो सकते हैं.
भारत इस साल जी-20 का अध्यक्ष भी है और इस वर्चुअल सम्मेलन को भारत के जी-20 की अध्यक्षता के प्रभाव को बढ़ाने के प्रयास के रूप में भी देखा जा रहा है.
इससे पहले इतने बड़े पैमाने पर ग्लोबल साउथ के देशों का सम्मेलन नहीं हुआ है.
क्या है ग्लोबल साउथ?
आर्थिक और सामाजिक विकास के आधार पर दुनिया को बाँटने की संकल्पना में दुनिया को दो हिस्सों में बाँटा गया है.
एक है ग्लोबल नॉर्थ और दूसरा है ग्लोबल साउथ.
ग्लोबल नॉर्थ में दुनिया के अधिक विकसित, समृद्ध और ओद्योगिक विकास वाले देश हैं. जैसे अमेरिका, यूरोपीय देश, जापान, दक्षिण कोरिया आदि.
वहीं ग्लोबल साउथ में आर्थिक और सामाजिक विकास के आधार पर कम विकसित देश हैं. इनमें लातिन अमेरिका, अफ़्रीका, एशिया और ओसिनिया के देश हैं.
भौगोलिक आधार पर भी ये देश दुनिया के दक्षिणी हिस्से में आते हैं.
अभी तक दुनिया के आर्थिक और राजनीतिक फ़ैसलों में ग्लोबल नॉर्थ का प्रभाव रहा है.
वॉयस ऑफ़ ग्लोबल साउथ में क्या होगा?

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भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के मुताबिक़ दो दिन तक चलने वाले इस वर्चुअल सम्मेलन में 10 सत्र होंगे, जिनमें अलग-अलग देशों के मंत्री और राष्ट्राध्यक्ष हिस्सा लेंगे.
इस सम्मेलन का मक़सद ग्लोबल साउथ में आने वाले देशों को अलग-अलग वैश्विक मुद्दों पर अपना पक्ष रखने के लिए प्लेटफ़ॉर्म उपलब्ध कराना है.
विदेश मंत्रालय का कहना है कि ये प्रयास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विज़न 'सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास' पर आधारित है.
विश्लेषकों के मुताबिक़ भारत जी-20 में अपनी अध्यक्षता के दौरान ग्लोबल साउथ के देशों के मुद्दों को भी उठाना चाहता है और एक तरह से इस क्षेत्र का नेतृत्व हासिल करना चाहता है.
इस सम्मेलन में आर्थिक विकास, पर्यावरण, स्वास्थ्य, शिक्षा और कारोबार के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर भी चर्चा होगी.
इसके अलावा जलवायु परिवर्तन जैसे अहम मुद्दों पर ग्लोबल साउथ के देशों के पक्ष पर भी चर्चा होगी.
भारत ये सम्मेलन क्यों कर रहा है?

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भारत इस समय जी-20 का अध्यक्ष भी है. ये पहली बार है जब भारत के पास जी-20 की अध्यक्षता है और ये भी पहली बार है जब लगातार तीन साल जी-20 की अध्यक्षता ग्लोबल साउथ के देशों के पास होगी.
2022 में इंडोनेशिया अध्यक्ष था, इस साल भारत है और अगले साल ब्राज़ील होगा. यानी लगातार तीन साल तक जी-20 की अध्यक्षता ग्लोबल साउथ में आने वाले देशों के पास होगी. यही नहीं ब्राज़ील के बाद दक्षिण अफ़्रीका अध्यक्ष बनेगा, वो भी ग्लोबल साउथ में ही आता है.
विश्लेषक मानते हैं कि ऐसे में ये भारत के पास मौक़ा है कि वो जी-20 में अपनी अध्यक्षता के दौरान ग्लोबल साउथ में अपने प्रभाव को बढ़ाए और अपने आप को एक नैचुरल लीडर के रूप में पेश करे.
मनोहर पर्रिकर इंस्टिट्यूट फोर डिफेंस स्टडीज़ एंड एनलिसिस में यूरोप एंड यूरेशिया सेंटर की असोसिएट फेलो स्वास्ति राव कहती हैं, "इस बार जी-20 में सबसे अहम आवाज़ ग्लोबल साउथ की होगी. इसे और भी वास्तविक और मज़बूत बनाने के लिए भारत ये सम्मेलन कर रहा है. क्योंकि जी-20 में ग्लोबल साउथ के सभी देश शामिल नहीं है, ऐसे में भारत अपनी अध्यक्षता को और प्रभावी बनाने के लिए और अपने आप को ग्लोबल साउथ के लीडर के तौर पर पेश करने के लिए ये सम्मेलन कर रहा है."
भारत चाहता है कि जी-20 में और दुनिया के दूसरे मंचों पर ग्लोबल साउथ के एजेंडा को भी जगह मिले.
स्वास्ति राव कहती हैं, "ग्लोबल साउथ के देशों के एजेंडा को वैश्विक मंच पर लाने और उन पर चर्चा करने के लिए भारत ने ये मंच बनाया है. ये अपनी तरह का पहला सम्मेलन है जिसमें इतनी बड़ी तादाद में ग्लोबल साउथ के देश शामिल हो रहे हैं."
इसका मतलब ये है कि ग्लोबल साउथ में दुनिया की एक बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व होगा. इन देशों में प्राकृतिक संसाधन भी हैं.
विश्लेषकों का मानना है कि भले ही बड़ी आबादी ग्लोबल साउथ के देशों में रहती हो, लेकिन दुनिया का एजेंडा ग्लोबल नॉर्थ निर्धारित करता है.
इस ग्लोबल एजेंडे में आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े देशों की आवाज़ नहीं पहुँच पाती है.
भारत ने जी-20 सम्मेलन की थीम वासुदैव कुटंबकम रखी है.
इस सम्मेलन के ज़रिए भारत इस विचार को भी बल देना चाहता है कि वो सिर्फ़ अपने बारे में नहीं बल्कि पूरी दुनिया के बारे में सोच रहा है.
विश्लेषक मानते हैं कि भारत इस सम्मेलन के ज़रिए अपने आप को ग्लोबल साउथ के चैंपियन के रूप में भी पेश करना चाहता है.

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स्वास्ति राव कहती हैं, "भारत एक बड़ा वैश्विक प्लेयर बनकर उभर रहा है. कोविड महामारी के दौरान भारत ने दुनियाभर के देशों को वैक्सीन दी. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत अपनी छवि को और मज़बूत करने के प्रयास कर रहा है. ये ग्लोबल साउथ में अपने प्रभाव को बढ़ाने का भारत का प्रयास भी है."
भारत बार-बार ये ज़ोर देकर कहता रहा है कि वो वैश्विक गठबंधनों में विश्वास नहीं करता है.
भारत की नीति रणनीतिक स्वायत्ता की रही है. भारत नेटो जैसे सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं है.
शीत युद्ध के दौरान भी वो खुलकर किसी गुट में नहीं गया था. भारत गुटनिरपेक्ष आंदोलन का अगुआ भी था.
स्वास्ति राव कहती है, "ग्लोबल साउथ के मुद्दों को उठाना भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता का हिस्सा भी है. जी-20 की अध्यक्षता भी भारत के पास है. ऐसे में वो इसका भी फ़ायदा उठा रहा है."
हाल के सालों में भारत ने अपनी विदेश नीति को मज़बूत किया है. पश्चिमी और यूरोप से अच्छे रिश्ते बनाए हैं और रूस से भी अपने संबंध ख़राब नहीं किए हैं.
जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ भारत क्वाड का हिस्सा है. यूक्रेन युद्ध पर तमाम दबाव के बावजूद भारत का अपना अलग पक्ष रहा है.
अब भारत ग्लोबल साउथ के देशों के साथ आवाज़ मिला रहा है.
स्वास्ति राव कहती हैं, "ये भारत का नया राजनयिक प्रयास है. दुनिया की एक बड़ी आबादी ग्लोबल साउथ में रहती हैं. भारत ये दिखाना चाहता है कि वो दुनिया के पिछड़े देशों के मुद्दों को मज़बूती से रखने की स्थिति में है."
कौन-कौन शामिल होगा

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भारत के विदेश मंत्रालय का कहना है कि इस सम्मेलन में लगभग 120 देशों का प्रतिनिधित्व होगा.
इसमें बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना और श्रीलंका के राष्ट्रपति रनिल विक्रमसिंघे समेत दुनिया और बड़े नेता शामिल हो सकते हैं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में देशों के राष्ट्राध्यक्षों का एक सत्र भी इस सम्मेलन में होगा.
यानी कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष इसमें शामिल हो सकते हैं.
चीन, पाकिस्तान और यूक्रेन की मौजूदगी को लेकर भी कोई जानकारी नहीं दी गई है.
बीबीसी ने इस संबंध में भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता से जानकारी मांगी थी लेकिन कोई जानकारी नहीं मिल सकी.
चीन भी अपने आप को ग्लोबल साउथ परिवार का हिस्सा बताता रहा है और इस क्षेत्र में अपने प्रभाव को बढ़ाने के प्रयास करता रहा है.
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