पुतिन की 'ज़िद' के कारण क्या बढ़ेंगी भारत की मुश्किलें

पुतिन

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    • Author, रजनीश कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी चीन, रूस और भारत को साहेब, बीवी और ग़ुलाम कहते हैं. स्वामी चीन को साहेब, रूस को बीवी और भारत को ग़ुलाम बताते हैं. स्वामी कहते हैं कि चीन अपने हितों के लिए 'बीवी' का इस्तेमाल करता ही है और 'ग़ुलाम' के पास हाथ मलने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है.

अब कई विशेषज्ञ इस बात को मान रहे हैं कि यूक्रेन युद्ध ने रूस को चीन पर ज़्यादा निर्भर बना दिया है और भारत के लिए स्थिति ज़्यादा जटिल हो गई है.

पिछले साल सितंबर महीने में उज़्बेकिस्तान में शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन (एससीओ) समिट से अलग चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की बैठक हुई थी.

इस बैठक में शी जिनपिंग ने पुतिन को 'प्रिय और पुराना दोस्त' कहा था. हालांकि पुतिन ने इस बात को स्वीकार किया था कि चीनी राष्ट्रपति ने यूक्रेन संकट को लेकर चिंता जताई थी. राष्ट्रपति पुतिन ने भी यूक्रेन संकट में चीन के 'संतुलित रुख़' की तारीफ़ की थी.

एसएसीओ समिट में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी गए थे और उनकी भी पुतिन के साथ द्विपक्षीय बैठक हुई थी. पीएम मोदी ने कैमरे के सामने पुतिन से कहा था कि यह युद्ध का दौर नहीं है.

भारतीय प्रधानमंत्री ने आग्रह किया था कि वह संवाद के ज़रिए यूक्रेन से युद्ध ख़त्म करें. लेकिन चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ऐसा कुछ भी नहीं कहा था.

यूक्रेन और दुनिया के बाक़ी हिस्सों में जारी संघर्ष में चीन और रूस के हित आपस में टकराते भी हैं, तब भी दोनों एक दूसरे के साथ दिखते हैं.

दोनों देश अमेरिका और उसके सहयोगियों के कथित ख़तरे को लेकर साथ दिखते हैं. कई लोग यह भी कहते हैं कि शी और पुतिन अपनी सत्ता की सुरक्षा को लेकर भी एक दूसरे के साथ रहते हैं और ये अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को अपने हिसाब से गढ़ना चाहते हैं.

चीन और रूस को लगता है कि केवल पश्चिमी लोकतंत्र के नाम पर ही अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था नहीं रह सकती.

पुतिन ने यूक्रेन पर पिछले साल 24 फ़रवरी को हमले का आदेश दिया था. इसके ठीक 20 दिन पहले पुतिन और शी जिनपिंग ने एक बयान जारी किया था, जिसमें घोषणा की गई थी कि रूस और चीन की साझेदारी सीमाओं से परे है और कोई भी क्षेत्र वर्जित नहीं है.

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सीमाओं से परे की साझेदारी की हक़ीक़त

इस बयान के कई मायने निकाले गए और कहा गया कि रूस-चीन की दोस्ती अटूट होती जा रही है. 'रूस और चीन की साझेदारी सीमाओं से परे है' वाली टिप्पणी चीनी विदेश मंत्रालय की ओर से आई थी.

इसमें यह भी कहा गया था कि दोनों देशों का रिश्ता व्यापक है और किसी गुट की ज़रूरत नहीं है. चीन अपनी विदेश नीति को 'तीन ना' से पारिभाषित करता है. ये तीन ना हैं- (नो अलायंस) कोई गुट नहीं, (नो कॉन्फ्रंटेशन) कोई टकराव नहीं और (नो टार्गेटिंग थर्ड पार्टीज़) किसी तीसरे पक्ष पर निशाना नहीं. ये तीन ना डेंग श्याओपिंग के ज़माने से ही हैं.

रूस के आधिकारिक दस्तावेज़ भी अलायंस के ख़िलाफ़ दलील देते रहे हैं. चीन के साथ भी अलायंस को लेकर स्पष्ट कहा गया है कि एक उदार व्यवस्था ज़्यादा ठीक है, किसी अलायंस के बरक्स.

यूक्रेन पर हमले में चीन ने रूस को अपने हितों के हिसाब से ही समर्थन किया है. चीनी अधिकारी और वहाँ के मीडिया का कहना है कि अमेरिका और नेटो यूक्रेन को हथियार देकर आग से खेल रहे हैं.

संयुक्त राष्ट्र में भी चीन का रुख़ बहुत सधा हुआ रहा है. यूक्रेन पर रूस के हमले की निंदा से जुड़े यूएन में दो प्रस्तावों पर चीन वोटिंग से बाहर रहा था. वहीं पिछले साल सात अप्रैल को रूस को यूएन के मानवाधिकार परिषद से बाहर करने को लेकर वोटिंग हुई तो चीन ने ख़िलाफ़ में वोट किया था.

वहीं 16 सितंबर को यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदोमीर ज़ेलेंस्की को संयुक्त राष्ट्र की आम सभा को वर्चुअली संबोधित करने की अनुमति के लिए प्रस्ताव आया तो चीन वोटिंग से बाहर रहा. 21 सितंबर को पुतिन ने यूक्रेन में सैनिकों की तादाद बढ़ाने की घोषणा की तो चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा कि संवाद के ज़रिए संकट का समाधान निकालना चाहिए.

पुतिन और मोदी

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रूस का इस्तेमाल

द अटलांटिक ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है कि यूक्रेन संकट में चीन रूस का इस्तेमाल कर रहा है.

अटलांटिक ने रिपोर्ट में लिखा है, ''1960 के दशक में चीन और रूस ने पश्चिम को मात देने का मौक़ा हाथ से निकल जाने दिया था क्योंकि शीत युद्ध के दौरान दोनों कट्टर प्रतिद्वंद्वी बन गए थे. दुनिया के दो शक्तिशाली स्वेच्छाचारी शासन वाले देश अमेरिका के नेतृत्व वाली उदार व्यवस्था के ख़िलाफ़ साथ आ गए हैं. लोकतांत्रिक देश यूक्रेन पर रूस का चीन के समर्थन से हमला उदार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए गंभीर ख़तरा है. ऐतिहासिक रूप से चीन और रूस का संबंध टकराव भरा रहा है. 1960 के दशक के आख़िर में शीत युद्ध के दौरान दोनों देशों में तनाव इतना बढ़ गया था कि परमाणु युद्ध के क़रीब पहुँच गए थे.''

द अटलांटिक ने लिखा है, ''हालांकि दोनों देश पारस्परिक हितों को लेकर अब साथ आ गए हैं. आर्थिक रूप से दोनों के बीच बढ़ता व्यापार पारस्परिक फ़ायदे वाला है. चीनी को अपनी इंडस्ट्री की भूख मिटाने के लिए तेल, गैस, कोयला और अन्य कच्चे माल की ज़रूरत है, जिसकी पूर्ति रूस कर रहा है. पुतिन और शी जिनपिंग को क़रीबी दोस्त के रूप में देखा जाता है. 2019 में शी जिनपिंग ने पुतिन को सबसे अच्छा दोस्त कहा था. दोनों अमेरिकी की वैश्विक हैसियत से चिढ़े रहते हैं. दोनों अपने वैश्विक मक़सद में अमेरिका को सबसे बड़ा अवरोध मानते हैं. यह डर बढ़ता जा रहा है कि पश्चिम का वर्चस्व एशिया और यूरोप में रहेगा या नहीं.''

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रूस को प्रतिबंधों के ज़रिए पश्चिम ने अलग-थलग करने की ख़ूब कोशिश की लेकिन चीन से बढ़ते व्यापार के कारण उसका बहुत असर नहीं हुआ. 2022 में चीन और रूस के व्यापार में क़रीब एक तिहाई की बढ़ोतरी हुई है और यह 172 अरब डॉलर तक पहुँच गया है. दूसरी तरफ़ रूस का अमेरिका के साथ व्यापार आधे से भी कम हो गया है.

थिंक टैंक कार्नेगी मॉस्को सेंटर के सीनियर फेलो एलेक्जेंडर गैबुएव का कहना है, ''रूस अब ज़्यादा से ज़्यादा राजस्व पैदा करना चाहता है ताकि युद्ध में कोई कमी ना आए. रूस और पश्चिम के बीच संबंध दोनों तरफ़ से नष्ट हो चुका है. अब रूस के लिए राजस्व का स्रोत वेस्ट के बदले ईस्ट हो गया है और इसमें भी चीन सबसे बड़ा ज़रिया बनकर उभरा है. यूक्रेन जंग का नतीजा चाहे जो भी हो लेकिन रूस और चीन के बीच रिश्ते और गहरे हुए हैं. शी और पुतिन दोनों अपनी अर्थव्यवस्था की निर्भरता अमेरिका, यूरोप और इनके एशियाई पार्टनर पर कम करना चाहते हैं. ऐसे में दोनों एक दूसरे के यहाँ निवेश कर रहे हैं.''

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सैन्य साझेदारी

अमेरिका के नवल वॉर कॉलेज रिव्यू में हाल ही में एक पेपर पब्लिश हुआ है. इसमें कहा गया है कि रूस और चीन के बीच सैन्य सहयोग भी व्यापक स्तर पर बढ़ रहा है. इस पेपर में कहा गया है कि चीन को रूसी पोर्ट पर उसके युद्ध पोतों तक पहुँच मिल सकती है. इसके अलावा समुद्र के भीतर युद्ध से जुड़ी टेक्नॉलजी भी रूस चीन को दे सकता है. इस रिव्यू में कहा गया है कि हिन्द महासागर में भी दोनों का सहयोग बढ़ सकता है.

कई लोग मानते हैं कि रूस और चीन की दोस्ती बराबरी की दोस्ती नहीं है. ऐसे में चीन पर रूस की बढ़ती निर्भरता किसी भी लिहाज़ से सही नहीं है.

यूक्रेन के साथ जंग जिस तरह से खींच रही है, उसे लेकर कहा जा रहा है कि रूस की महशक्ति का रूतबा बेपर्दा हो गया है. जिस तरह से पश्चिम ने रूस को अलग-थलग किया, उसमें चीन के क़रीब जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था.

चीन को रूस से सस्ता तेल मिल रहा है. रूसी कारोबार के लिए डॉलर में कारोबार करना मुश्किल हो गया है. ऐसे में चीनी मुद्रा यूआन में रूसी बिज़नेस बढ़ रहा है. चीन का यह एजेंडा लंबे समय से रहा है कि डॉलर की बादशाहत कमज़ोर हो और उसकी मुद्रा का प्रसार बढ़े.

एलेक्जेंडर गैबुएव ने द अटलांटिक से कहा है कि रूस और चीन की दोस्ती में फ़ायदा चीन को है. हालांकि थिंक टैंक कार्नेगी मॉस्को के निदेशक रहे दिमित्री त्रेनिन ने द डिप्लोमैट को दिए इंटरव्यू में कहा था, ''एडवांस सैन्य तकनीक के मामले में चीन से रूस आगे है. दूसरी तरफ़ आर्थिक शक्ति के मोर्चे पर चीन बहुत आगे है. दोनों देशों के बीच सीमा विवाद का समाधान हो गया है और शीर्ष के नेतृत्व में एक दूसरे पर पर्याप्त भरोसा है.''

पुतिन और मोदी

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भारत के लिए बढ़ता ख़तरा

चीन और रूस की बढ़ती क़रीबी का असर भारत पर क्या पड़ेगा? दिमित्री त्रेनिन ने इसी इंटरव्यू में कहा था, ''रूस का भारत सैद्धांतिक रूप से चीन की तरह एक रणनीतिक साझेदार है. लेकिन रूस और भारत का ट्रेड चीन और रूस के तुलना में दसवां हिस्सा है. भारत अमेरिका के ज़्यादा क़रीब हो रहा है और यह रूस के लिए कोई मुद्दा नहीं होना चाहिए. भारत अपने विदेशी संबंध को किसी एक देश तक सीमित नहीं रखना चाहता है.''

दिमित्री ने कहा है, ''रूस से भारत में हथियारों की आपूर्ति के क्षेत्र में अमेरिका का दखल बढ़ता दिख रहा है. भारत और रूस के संबंध में दो दिक़्क़तें हैं. पहला यह कि दोनों देशों के संबंधों में पर्याप्त भरोसे के बावजूद सहयोग सरकार के स्तर पर ज़्यादा है. इसका विस्तार निजी क्षेत्र में नहीं हुआ तो यह संबंध बहुत व्यापक नहीं होगा. भारत की अर्थव्यवस्था पर अब सरकार का उतना नियंत्रण नहीं है जितना प्राइवेट सेक्टर का है. ऐसे में दोनों देशों का संबंध सरकारी दायरे से बाहर निकलना होगा. दूसरी दिक़्क़त यह है कि चीन और भारत के बीच प्रतिद्वंद्विता बढ़ रही है. दोनों देश रूस के क़रीबी साझेदार हैं लेकिन रूस मध्यस्थता करने की स्थिति में नहीं है.''

भारत और रूस के बीच अप्रैल 2022 से द्विपक्षीय व्यापार बढ़कर 27 अरब डॉलर का हो गया है लेकिन यह पूरी तरह से एकतरफ़ा है. इस बात को रूस में भारत के राजदूत पवन कपूर ने भी स्वीकार किया है.

पिछले महीने के आख़िरी हफ़्ते में पवन कपूर ने रूस-इंडिया बिज़नेस डायलॉग फोरम में कहा था कि 27 अरब डॉलर में भारत का निर्यात महज़ दो अरब डॉलर का था. वित्तीय वर्ष 2021-22 में भारत और रूस का द्विपक्षीय व्यापार 13 अरब डॉलर था. 13 अरब से 27 अरब डॉलर होने में सबसे बड़ा योगदान भारत के तेल और उर्वरक आयात का है. पिछले साल फ़रवरी में यूक्रेन पर रूस ने हमला किया तब से भारत को रूस से सस्ता तेल मिलना शुरू हुआ था.

रूस और चीन

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रूस का कमज़ोर होना

मनोहर पर्रिकर इंस्टिट्यूट फोर डिफेंस स्टडीज़ एंड एनलिसिस में यूरोप एंड यूरेशिया सेंटर की असोसिएट फेलो डॉ स्वास्ति राव कहती हैं, ''यूक्रेन की जंग रूस जीते या हारे लेकिन इतना तय है कि वह कमज़ोर होकर सामने आएगा. रूस जितना विशाल है, जितने प्राकृतिक संसाधन हैं, उस देश की कमान उस व्यक्ति के हाथ में है, जो बिल्कुल ही सच से मुँह मोड़कर बैठा है. यूक्रेन को पुतिन ने नाक का सवाल बना दिया है और इस चक्कर में चीन जमकर फ़ायदा उठा रहा है. रूस से यूरोप ने एनर्जी का आयात लगभग ना के बराबर कर दिया है. ऐसे में पुतिन मजबूरी में तेल चीन, भारत और तुर्की को सस्ते में बेच रहे हैं.''

स्वास्ति राव कहती हैं, ''पुतिन की यह मजबूरी आने वाले वक़्त में और बढ़ेगी. रूस हमेशा चीन का जूनियर पार्टनर रहा है. यूक्रेन युद्ध के बाद रूस की ऐसी हालत होगी कि उससे चीन हाथ मरोड़कर तेल लेगा. मतलब पुतिन अपना तेल खपाने के लिए चीन को औने-पौने दाम में देंगे. रूस आर्थिक रूप से लगातार कमज़ोर हो रहा है. उसके पास ऊर्जा है लेकिन व्यापार के लिए इन्फ़्रास्ट्रक्चर नहीं है. चीन भी रूस से तेल तब तक ही लेगा जब तक उसकी इंडस्ट्री में बने सामान का निर्यात जारी रहेगा. लेकिन यूक्रेन संकट के कारण जो स्थिति बन रही है, उससे तो यही लग रहा है कि चीन भले तात्कालिक फ़ायदा उठा ले लेकिन लंबी अवधि में उसे भी नुक़सान होने जा रहा है. चीन का अमेरिका से द्विपक्षीय व्यापार 500 अरब डॉलर से भी ज़्यादा है. चीन के बड़े ट्रेड पार्टनर यूएस और यूरोप हैं न कि रूस. चीन को आर्थिक शक्ति बनना है तो वह रूस के भरोसे नहीं बन सकता बल्कि उसे अपना सामान पश्चिम में ही बेचना होगा.''

स्वस्ति राव कहती हैं, ''यूक्रेन संकट के कारण रूस का कमज़ोर होना और चीन पर निर्भर होना भारत के लिए ख़तरनाक स्थिति हो सकती है. भारत की रणनीतिक स्वायत्तता में रूस का मज़बूत होना बेहद ज़रूरी है. चीन के साथ जब भी संकट बढ़ता है तो रूस इसे मैनेज करता था. इस मामले में रूस से ज़्यादा भरोसेमंद भारत के लिए कोई नहीं था. रूस की निर्भरता चीन पर बढ़ेगी तो वह भारत के हितों का ख़्याल नहीं रख पाएगा. मध्य एशिया और मध्य-पूर्व में भारत के हितों के लिए रूस बहुत ज़रूरी देश है. कमज़ोर रूस यहाँ भारत के हितों की रक्षा नहीं कर सकता है. आने वाला समय बहुत जटिल होने वाला है. रूस के कमज़ोर होने पर भारत किस तरफ़ जाएगा या इसे कैसे डील करेगा, इसका अभी जवाब देना मुश्किल है.''

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स्वास्ति कहती हैं, ''अभी रूस और चीन के बीच जो व्यापार बढ़ा है, उसमें तेल सबसे बड़ा हिस्सा है. लेकिन व्यापार केवल तेल तक सीमित नहीं होता है. यह ट्रेड बदली हुई परिस्थिति का नतीजा है न कि स्थायी है. चीन को पता है कि रूस का इस्तेमाल कहाँ तक किया जा सकता है. रूस कमज़ोर होगा तो चीन के साथ उसकी पुरानी प्रतिद्वंद्विता भी बढ़ेगी.''

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में मध्य-एशिया और रूसी अध्ययन केंद्र में असोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ राजन कुमार कहते हैं, ''कमज़ोर और चीन पर ज़्यादा निर्भर रूस भारत के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं है. इसका मतलब यह होगा कि चीन की हर बात मानने पर रूस मजबूर होगा और वह पाकिस्तान को भी साथ देने के लिए कह सकता है. रूस से भारत का जो भी व्यापार होता है वह मध्य एशिया और ईरान के ज़रिए होता है. मध्य एशिया में भारत के हित तभी तक सुरक्षित रख सकते हैं, जब तक रूस मज़बूत रहेगा. अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी रूस भारत के हितों की रक्षा करता रहा है. रूस के कमज़ोर होने से ब्रिक्स, एससीओ, जी-20 और यूएनएससी में भारत के हितों को चोट पहुँच सकती है. रूस खुलकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन करता है लेकिन चीन के मातहत आने पर ऐसा नहीं होगा.''

यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद पश्चिम के दबदबे वाली विश्व व्यवस्था को ख़तरे में बताया जा रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन कह चुके हैं कि चीन ने बलपूर्वक ताइवान को मिलाने की कोशिश की तो अमेरिका ताइवान के साथ खड़ा होगा. यूरोपियन यूनियन भी चीन को अपना प्रतिद्वंद्वी बता रहा है. ब्रिटेन में भी बहस चल रही है कि चीन को औपचारिक रूप से ख़तरा घोषित किया जाए. आने वाले समय में वैश्विक राजनीति के हिसाब से बहुत ही मुश्किल होने की आशंका जाताई जा रही है और भारत के लिए भी इस मुश्किल से निकलना आसान नहीं होगा.

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