लोकसभा चुनाव 2024: नरेंद्र मोदी के चार चुनावी मुद्दे, पहले जैसा कमाल दिखाने से कैसे चूके
- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता

इमेज स्रोत, ANI
तारीख़: 5 फ़रवरी, 2024
जगह: लोकसभा, भारतीय संसद
मौक़ा: राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव
वक्ता: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
"अध्यक्ष जी, मैं आँकड़ों में नहीं पड़ता. मैं बस देश का मिजाज़ देख रहा हूँ जो इस बार एनडीए को 400 सीट पार तो करवा के ही रहेगा ही, अकेले भाजपा को 370 सीट मिलेंगी."
तारीख़: 4 जून, 2024
मौक़ा: लोकसभा चुनाव के नतीजे
- भाजपा अपने दम पर बहुमत से तकरीबन 20 सीटें पीछे
- लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का पिछले दस सालों का सबसे अच्छा प्रदर्शन


बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
19वीं सदी में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बेंजमिन डिज़राइली ने कहा था, "मज़बूत विपक्ष के बिना कोई सरकार लंबे समय तक सुरक्षित नहीं हो सकती."
भारत के पहले प्रधानमंत्री और कांग्रेस पार्टी नेता जवाहरलाल नेहरू ने 52 साल पहले यानी 1962 में लगातार तीन आम चुनावों को जीतने का रिकॉर्ड बनाया था.
2024 आम चुनावों के नतीजे बता रहे हैं कि नरेंद्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री तो बन सकते हैं लेकिन पिछले दो चुनावों की तरह इस बार बहुमत के आंकड़े को अपने दम पर नहीं छू पा रहे हैं.
एनडीए गठबंधन का इन चुनावों में 400 सीटों से ज़्यादा हासिल करने का दावा ग़लत नाकाम साबित हुआ.
ज़्यादातर एक्ज़िट पोल अनुमान ग़लत साबित हुए क्योंकि न तो बीजेपी और न ही एनडीए गठबंधन वैसा प्रदर्शन दिखा सका जैसा बताया जा रहा था.
इस आम चुनाव में विपक्षी कांग्रेस के साथ कई और राजनीतिक दलों ने 'इंडिया ब्लॉक' बनकर सत्ताधारी भाजपा को चुनौती दी और नतीजों में एक्ज़िट पोल के आँकड़ों से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया.
विश्लेषकों के मुताबिक़ "अख़िरकार मुक़ाबले का केंद्र-बिंदु ख़ुद प्रधानमंत्री ही बने."
यानी चुनाव का एक प्रमुख मुद्दा 'वोट फॉर मोदी या वोट अगेंस्ट मोदी' बन गया था और नतीजे इशारा कर रहे हैं कि 'वोट फॉर मोदी' का नारा उतना नहीं चला जितनी भाजपा को उम्मीद थी.
एक नज़र उन प्रमुख मुद्दों पर जिनकी वजह से गठबंधन बहुमत के आंकड़े को पार कर सका, लेकिन बीजेपी अपने दम पर बहुमत से पीछे रह गई.
1. मोदी की गारंटी

इमेज स्रोत, Salman Ali/Hindustan Times via Getty Images
आम चुनावों के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि देश के सबसे बड़े सत्ताधारी राजनीतिक दल ने अपने पीएम के नाम पर ही इलेक्शन मैनिफ़ेस्टो जारी कर दिया.
14 अप्रैल को जारी किए 'संकल्प पत्र' में हर वादे पर 'मोदी की गारंटी' की मुहर थी और साफ़ था पार्टी अपने सबसे बड़े नेता को 'चुनावी चेहरा' बनाकर प्रोजेक्ट कर रही है.
यानी 2013 में जब से मोदी पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बने थे, तब से अब तक कुछ नहीं बदला था. इस दौरान पार्टी न सिर्फ़ केंद्र में आसीन रही बल्कि भाजपा ने दूसरे राज्यों पर भी अपनी पकड़ मज़बूत की. लेकिन इस चुनाव में 'मोदी की गारंटी' का मनचाहा असर नहीं हुआ.
वरिष्ठ पत्रकार और हिंदुस्तान टाइम्स अख़बार के एडिटोरियल डायरेक्टर रहे वीर सांघवी को लगता है, "भाजपा की रणनीति शुरू से आख़िर तक अपने प्रधानमंत्री पर ही पूरा दांव लगाने की थी."
"इसमें तो कोई शक नहीं था कि मोदी फ़िलहाल भारत के सबसे लोकप्रिय नेता हैं और भाजपा ने इसी बात को अपना ट्रंप-कार्ड बना रखा था. इस पार्टी का इतिहास बताता है कि किसी भी चुनाव में सिर्फ़ एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द इतनी व्यापक चुनावी कैंपेन नहीं हुई थी जितनी 2024 में हुई. दरअसल, नरेंद्र मोदी का प्रोजेक्शन उससे भी बड़ा किया गया जैसा इंदिरा गांधी का 1971 कैंपेन में किया गया था."
दरअसल, भाजपा का आकलन कुछ नतीजों पर आधारित था.
2014 के आम चुनाव से पहले भाजपा और उसके गठबंधन वाली सरकारों की तादाद सात थी जबकि 2024 चुनावों के ठीक पहले देश के 16 राज्यों में भाजपा की अपनी सरकार थी और चार राज्यों में गठबंधन सरकारें, यानी कुल आंकड़ा 20 का है.
ज़ाहिर है, मोदी फ़ैक्टर का बड़ा रोल रहा था पार्टी को सत्ता में बनाए रखने में.
लेकिन ताज़ा नतीजे इस ओर भी इशारा कर रहे हैं कि सभी को 'मोदी की गारंटी' में पूर्ण विश्वास नहीं था वरना 2014 के चुनाव में भाजपा को 282 सीटें, 2019 के लोकसभा चुनाव में 303 सीटें जिताने वाले नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को 2024 बहुमत से पहले ही रुक गई.
टेलीग्राफ़ और हिंदुस्तान टाइम्स अख़बरों के संपादक रह चुके वरिष्ठ पत्रकार भारत भूषण के मुताबिक़, "प्रधानमंत्री के चुनावी भाषणों में कांग्रेस मैनिफ़ेस्टो पर निशाना बनाया जाना उतना सफल नहीं रहा जितनी उम्मीद थी. वोटरों की याद्दाश्त में राम मंदिर जैसे मुद्दे उतने नहीं ठहर सके जितना सोचा गया था, वरना भाजपा की अपनी सीटें ज़्यादा होतीं. अब तो सहयोगियों पर ही निर्भरता रहेगी."
2. कल्याणकारी स्कीमों की राजनीति

इमेज स्रोत, ANI
भारतीय जनता पार्टी ने 'मोदी की गारंटी' वाले अपने मैनिफ़ेस्टो में जिन चार वर्गों पर फ़ोकस बनाए रखा, वे थे गरीब, युवा, किसान और महिलाएँ, पीएम मोदी ने कहा था कि भारत में यही चार जातियाँ हैं.
बीजेपी ने 'फ़्रीबी पॉलिटिक्स' यानी मुफ़्त में दी जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं से जुड़ी स्कीमों पर भरपूर ध्यान दिया.
'पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना' के तहत अगले पांच वर्षों तक 80 करोड़ भारतीयों को मुफ़्त राशन देने का दावा हो, 'आयुष्मान भारत' जैसी स्कीमों के ज़रिए मुफ़्त इलाज की सुविधाएँ हों या फिर 'पीएम आवास योजना' और एलपीजी मुहैया कराने वाली 'पीएम उज्ज्वला योजना', सभी का लक्ष्य सरकार की लोकप्रियता को बनाए रखना था.
मोदी सरकार ने पिछले 10 वर्षों में क़रीब 22 करोड़ परिवारों को ऐसी कई स्कीमों के दायरे में लाने का दावा किया था, जिसकी वजह से उसे कई चुनावी जीतें भी मिलीं.
30 मई को अपने चुनाव प्रचार के आख़िरी दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने होशियारपुर में कहा था, "हमने ग़रीबों को खाना और इलाज की सुविधा दी है, लोगों के पास अब राशन कार्ड और आयुष्मान कार्ड हैं."
इस चुनाव के पहले उत्तर प्रदेश का लंबा दौरा करने के बाद ब्राउन यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर आशुतोष वार्ष्णेय ने बताया था, "बुंदेलखंड और अवध में तमाम लोग कह रहे थे बिजली है, पानी है लेकिन रोज़गार नहीं है. 'लाभार्थी' स्कीमें अच्छी तो होती हैं लेकिन भविष्य की गारंटी नहीं देती जो सिर्फ़ रोज़गार दे सकता है."
उधर, विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने इसके विपरीत राहुल गांधी की 'न्याय गारंटी' पर ज़ोर दिया और इसकी वजह थी कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और तेलंगाना विधानसभा चुनावों में उनकी 'कल्याणकारी स्कीमों' का सफल साबित होना.
चार जून के नतीजे बताते हैं कि कई राज्यों में विपक्षी 'इंडिया ब्लॉक' को बढ़ती महंगाई और बेरोज़गारी पर हमला करने की रणनीति से फ़ायदा हुआ है जिसका असर भाजपा के कम हुए आँकड़ों से साफ़ है.
3. भारत और मोदी की 'विश्वगुरु' की छवि

इमेज स्रोत, ANI
विदेश नीति पर भारत के सभी राजनीतिक दल 'सामरिक स्वायत्तता' बनाए रखने पर ज़ोर देते हैं लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने आक्रामक विदेश नीति अपनाई हुई है जिसके तहत 'नए भारत के दुश्मनों को घर में घुस कर मारने' तक की बात कही गई है.
बीजेपी के चुनाव प्रचार में 'दुनिया के मंच पर बढ़ती भारत की साख' को मुख्य स्थान दिया गया.
साउथ एशियन यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंधों की एसोसियेट प्रोफ़ेसर श्वेता सिंह को लगता है, "जी-20 की अध्यक्षता, अमेरिका के साथ सामरिक रिश्ते और रूस से अपने हितों को पूरा करवाने की मोदी सरकार की मंशा को लेकर भाजपा चुनाव में उतरी थी. पुलवामा जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे या आर्टिकल 370 को हटाने के फ़ैसले पर अदालत की मुहर जैसे मुद्दों को भी वोटरों तक पहुँचाया गया लेकिन उसका असर नतीजों में नहीं दिखता. पाकिस्तान के ख़िलाफ़ सख़्त रवैया हमेशा से कारगर साबित हुआ था लेकिन इस बार मतदाताओं में उसकी चर्चा कम दिखी."
ब्रिटेन के प्रतिष्ठित 'थिंकटैंक' चैटम हाउस के सीनियर फ़ेलो चैतिग बाजपेयी ने इन आम चुनावों नतीजों पर लिखा, "हिंदू राष्ट्रवादी एजेंडा को आगे बढ़ाने के बावजूद अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता और आपसी व्यापार के मद्देनज़र पश्चिमी देश भारत के साथ इंगेजमेंट तो बरकरार रखेंगे लेकिन अब भारत को इस बात पर गौर करना होगा कि डॉमेस्टिक पॉलिटिक्स में ये कितना काम कर रहा है."
रहा सवाल इस सरकार की 'दुश्मनों को घर में घुस कर मारने' की नीति का तो विश्लेषकों का मत है कि वो दक्षिण एशिया या चीन तक के ख़िलाफ़ 'बयानबाज़ी' में तो काम आ सकती है लेकिन ग्लोबल स्तर पर उसे संशय से देखा जाता है.
फ़ॉरेन पॉलिसी जर्नल में माइकल कुगेलमैन लिखते हैं, "कनाडा एक ऐसा देश है जिसकी ग्लोबल इमेज आक्रामक क़तई नहीं है, कनाडा ने अपने नागरिकों की हत्या की कोशिश करवाने जैसे गंभीर आरोप भारत पर लगाए, जिनका भारत ने खंडन किया है. ऐसे आरोप एक ख़ास तरह का संदेश देते हैं."
वैसे चुनावों के दौरान दक्षिण एशिया में भारतीय विदेश नीति की बात पर ख़ासा वाद-विवाद भी रहा. विपक्ष ने सरकार पर 'जुमलेबाज़ी' के आरोप लगाते हुए ये भी दोहराया कि सरकार ने 2019 के चुनावों में सभी सीमाओं पर स्मार्ट-फेंसिंग का वादा किया था जो अभी तक अधूरा है.
अमेरिका के हार्वर्ड विश्विद्यालय में विज़िटिंग फ़ेलो रहे प्रोफ़ेसर एमके झा के मुताबिक़, "इतिहास गवाह है कि किसी भी देश के राजनीतिक बदलाव में स्थानीय के अलावा ग्लोबल फ़ैक्टर्स की भी बड़ी भूमिका रहती है. अगर जियोपॉलिटिकल स्तर पर थोड़ी भी अनिश्चितता और संशय रहता है तो लोकतांत्रिक देशों में भी उसका कुछ न कुछ असर दिख ही जाता है."
4. धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण की 'राजनीति'

इमेज स्रोत, ANI
2024 आम चुनाव के पहले चरण और 2019 के पहले चरण में एक बड़ा फ़र्क़ था--वह है मतदान के प्रतिशत में गिरावट.
प्रधानमंत्री मोदी ने राजस्थान के बांसवाड़ा में दिए गए एक भाषण में कहा, "अगर कांग्रेस सत्ता में आई तो लोगों की संपत्ति को ज्यादा बच्चे वालों में बाँट देगी."
इस बयान को 'ध्रुवीकरण की कोशिश' और 'अल्पसंख्यकों पर कटाक्ष' करार देते हुए कांग्रेस और विपक्षी दलों ने इसकी शिकायत चुनाव आयोग से की थी.
कुछ विश्लेषकों ने प्रधानमंत्री की ओर से आए इस बयान पर हैरानी जताते हुए इसे "अपने वोटरों को एकजुट करने की कोशिश से जोड़कर देखा."
वरिष्ठ पत्रकार वीर सांघवी के अनुसार, "शायद पहली बार प्रधानमंत्री ने इतने खुले तौर पर चुनाव अभियान में हिंदू-मुस्लिम राजनीति वाला कार्ड चला था क्योंकि आम तौर पर वे पिछले चुनावों में इस तरह की सीधी बयानबाज़ी से बचते रहे थे."
चुनाव के ठीक पहले केंद्रीय गृह मंत्रालय ने विवादास्पद नागरिकता (संशोधन) नियमों की अधिसूचना को भी एकाएक जारी किया जबकि नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली तमाम याचिकाएँ की सुनवाई अदालतों में विचाराधीन हैं.
इस कदम को भी शायद मतदाताओं ने 'ध्रुवीकरण की राजनीति' से जोड़कर देखा.
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय संबंधों और राजनीति के पूर्व प्रोफ़ेसर पुष्पेश पंत को लगता है, "इस समय भारत में ध्रुवीकरण की राजनीति चरम पर है."
उनके मुताबिक़, "महीने भर से ज़्यादा चले इस लंबे चुनाव में सभी ने देखा कि कैसे एक-एक करके कुछ ख़ास समुदायों को मंदिर-मस्जिद या जैसे मुद्दों पर निशाना बनाया गया. ये सब जोश में नहीं होता, सोची-समझी रणनीति के तहत होता है."
आख़िरी में उस मुद्दे की बात जो भाजपा के 'संकल्प पत्र' से लेकर हर चुनाव प्रचारक के भाषण का हिस्सा रहा. इसी साल जनवरी महीने में अयोध्या में राममंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा समारोह का प्रधानमंत्री की अगुवाई में संपन्न होना.
अयोध्या में 10 हज़ार करोड़ रुपये की लागत से शहर की कायाकल्प करवाने के दावे और उसे 'ग्लोबल सिटी' बनाने की भाजपा की मुहिम उस इलाक़े के मतदाताओं के गले नहीं उतरी.
अयोध्या मंडल के तहत आने वाली सभी पाँचों सीटों (फ़ैज़ाबाद, बाराबंकी, अमेठी, अंबेडकर नगर और सुल्तानपुर) पर भाजपा हार की तरफ़ बढ़ रही है.
अयोध्या में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के वरिष्ठ पत्रकार अरशद अफ़जाल ख़ान के मुताबिक़, "राम मंदिर उद्घाटन से भाजपा ने एक रेस शुरू की थी और उस समय लग रहा था विपक्ष बहुत पीछे छूट गया है, लेकिन अवाम की नब्ज़ कुछ और ही थी. फैजाबाद (अयोध्या), अंबेडकर नगर, सुल्तानपुर, अमेठी और बाराबंकी की उसकी हार यही दर्शाती है."


















