इंस्टाग्राम: जातिगत राजनीति के इस नए अखाड़े में मुखर होती लड़कियां

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इमेज कैप्शन, सिमी मिलिंद जाधव (बाएं), शिवि दीक्षित (दाएं)
    • Author, दिव्या आर्य
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

कैमरा एक काली ड्रेस पहनी लड़की पर फोकस करता है. उनके हाथ में आसमान की ओर मुंह की हुई राइफल है और उंगली ट्रिगर पर है.

पीछे से आवाज़ आती है, "कौन हो तुम", फिर जवाब आता है, "हम ब्राह्मण हैं". लड़की मुस्कुराती है और पीछे से दो गोलियां चलने की आवाज़ आती है.

छोटे शहरों और गांवों में लड़कियां इंस्टाग्राम पर अपनी जातीय पहचान पर रील्स बना रही हैं. बीबीसी ने ऐसे 100 अकाउंट्स की पड़ताल की और एक दर्जन से बात की और जाना कि जातिगत राजनीति के इस नए अखाड़े में लड़कियां क्यों मुखर हो रही हैं.

राइफल वाली रील बनाने वाली 24 साल की इंस्टाग्राम इंफ्लुएंसर शिवि दीक्षित के डेढ़ लाख फॉलोअर्स हैं. अपने अकाउंट से वो अपनी ब्राह्मण जाति के बारे में सैकड़ों रील्स बना चुकी हैं जिनको लाखों की संख्या में लोग देखते हैं.

अपनी रील्स में शिवि ब्राह्मणों को 'सर्वश्रेष्ठ', अंतरजातीय रिश्तों को गलत और दलितों के लिए आरक्षण जैसी नीतियों को अनुचित बताती हैं.

'मैं हमारे मूल्यों को फैलाना चाहती हूं'

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इमेज कैप्शन, शिवि दीक्षित

मेरठ में अपने परिवार के मंदिर की छत पर शिवि मुझे समझाती हैं, "जो ब्राह्मण फैमिली से होते हैं उनके घर में काफी संस्कार होते हैं. हमारे यहां सभी लोग पंडिताई करते हैं. मैं हमारे मूल्यों को फैलाना चाहती हूं और हमारी जाति के बारे में फैले भ्रम मिटाना चाहती हूं."

शिवि उन हज़ारों लड़कियों में से एक हैं जो अपनी जाति के बारे में अपनी राय रखने के लिए नए तरीके से इंस्टाग्राम का इस्तेमाल कर रही हैं.

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इसका एक नया पहलू ये भी है कि इनमें से ज़्यादातर छोटे शहरों और गांवों से हैं - जहां आम तौर पर लड़कों के मुकाबले लड़कियां धर्म और जातीय पहचान पर सार्वजनिक मंच पर नहीं बोलती हैं.

इन लड़कियों का कहना है कि सोशल मीडिया तक पहुंच ने उन्हें बेबाकी से अपनी राय रखने और पितृसत्तात्मक नियंत्रण से बाहर निकलने का मौका दिया है.

सेंटर फॉर द स्ट्डी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज़ (सीएसडीएस) के साल 2014-19 के बीच किए गए शोध के मुताबिक, ख़ास तौर पर "कम पढ़े-लिखे और ग्रामीण इलाकों में रहने वालों" के बीच "सोशल मीडिया का लोकतांत्रिकरण" हुआ है.

ये चलन सिर्फ कथित ऊंची जाति की लड़कियों में ही नहीं है, दलित लड़कियां भी जवाबी रील्स बनाने लगी हैं.

भीमाची शेरनी

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22 साल की ब्यूटीशियन सिमी मिलिंद जाधव का इंस्टाग्राम पर नाम है भीमाची शेरनी, यानी भीमराव अंबेडकर की शेरनी.

मुंबई से कुछ घंटे की दूर पर वसई-विरार के अपने फ्लैट में वो मुझे बताती हैं, "मैं बाबा साहेब अंबेडकर को पिता समान मानती हूं, तो मैं अपने पापा की शेरनी हूं."

सिमी ने अपनी जाति पर रील्स बनाना तब शुरू किया जब उन्होंने देखा कि "ऊंची जाति के लोग इंस्टाग्राम के ज़रिए किस तरह की फेक न्यूज़ और गलत जानकारी फैला रहे हैं."

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "मैंने बाबा साहेब के बारे में जानकारी इकट्ठा की, उनकी जीवनी पढ़ी, और धीरे-धीरे मुझे इंटरनेट पर उनकी बातों को बढ़ावा देने वाले और दलित मिले."

सिमी ने कहा, "अब हम मिलकर सोचते हैं और ऊंची जाति के वीडियोज़ के जवाब में अपनी रील्स बनाते हैं."

'आदर्श' ब्राह्मण और हिंदू राष्ट्र

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जिन लड़कियों से हमने बात की उनमें से ज़्यादातर ने इंटरनेट पर वीडियोज़ बनाने की शुरुआत चाइनीज़ ऐप टिकटॉक से की थी. साल 2020 में भारत सरकार द्वारा टिकटॉक बैन किए जाने के बाद वो इंस्टाग्राम पर रील्स बनाने लगीं.

सभी लड़कियों की रील्स में कुछ विषय आम हैं, जैसे 'आदर्श' ब्राह्मण या दलित लड़के की व्याख्या और अंतरजातीय विवाह की भर्त्सना.

आंकड़े बताते हैं कि भारत की आधुनिक छवि से अलग लगने वाले ये विचार अब भी काफी आम है.

शोध करनेवाली संस्था, पीयू रिसर्च सेंटर के साल 2019-20 के एक सर्वे में पाया गया कि 60 प्रतिशत लोगों का मानना था कि महिलाओं और पुरुषों को एक-दूसरे की जाति में शादी करने से रोकना ज़रूरी है.

इन इंफ्लुएंसर्स की रील्स देश में खिंची हुई धार्मिक और जातीय रेखाओं को उकेरती हैं.

ब्राह्मण लड़कियां 'हिंदू राष्ट्र के निर्माण' में योगदान के लिए ब्राह्मणों और हिंदुओं को एकजुट करने के बारे में बोलती हैं.

पर सिमी जैसी दलित लड़कियां इसके ख़िलाफ़ हैं. उन्हें डर है कि अगर ऐसा हुआ तो उनके समुदाय ने शिक्षा, रोज़गार के मौके और इज़्ज़त की ज़िंदगी जीने की जो लड़ाइयां लड़ी हैं वो बेकार हो जाएंगी और वो फिर हाशिए पर चला जाएगा.

इंस्टाग्राम की कार्रवाई

वीडियो कैप्शन, अपनी जाति का दम ठोंकती इंस्टा गर्ल्स की कहानी...

सीएसडीएस में असिस्टेंट प्रोफेसर हिलाल अहमद के मुताबिक, ये चलन दर्शाता है कि महिलाएं इस आम समझ को नकार रही हैं कि वो राजनीति में रुचि नहीं रखतीं.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "लड़कियों को संस्कृति और रीति-रिवाज़ का प्रतीक माना जाता है जो धर्म और जाति से ही तय होते हैं. अब जब लड़कियों के पास अपनी बात कहने का रखने का माध्यम है तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं कि वो अपनी धार्मिक और जातीय पहचान को अपनाकर उन पर अपनी राय रखें."

लेकिन प्रोफेसर अहमद के मुताबिक, गौरव के नाम पर ये लड़कियां मौजूदा सामाजिक भेदभाव को बढ़ावा दे रही हैं.

वो कहते हैं, "ये विरोधाभासी है, एक तरफ वो खुद को पीड़ित बता रही हैं क्योंकि उनका समुदाय निशाने पर है और दूसरी तरफ वो ये भी जता रही हैं कि उन्हें किसी का डर नहीं."

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कुछ रील्स ज़्यादा भड़काऊ हैं, घृणा फैलाने वाली और हिंसा को बढ़ावा देने वाली भाषा का उपयोग करती हैं.

बीबीसी को जब कुछ ऐसे वीडियो मिले तो हमने उन्हें इंस्टाग्राम चलाने वाली कंपनी मेटा को सूचित किया. जिसके बाद उनमें से कुछ वीडियो हटा दिए गए.

मेटा के एक प्रवक्ता ने कहा कि कंपनी के 'कम्यूनिटी स्टैन्डर्ड्स' ऐसे किसी भी कॉन्टेंट को गलत मानते हैं जो किसी व्यक्ति या समूह को उनकी जाति, जो 'एक प्रोटेक्टिड कैरेक्टरिस्टिक' हैं, के आधार पर निशाना बनाए.

प्रवक्ता ने कहा, "हिंसा की धमकी देने वाले या हिंसा भड़काने वाला कॉन्टेंट वर्जित हैं."

भेदभाव से इनकार

लड़कियां जाति के आधार पर भेदभाव फैलाने और हिंसा भड़काने के आरोपों को खारिज करती हैं और दावा करती हैं कि वो केवल अपने समुदाय को जोड़ने का काम कर रही हैं.

24 साल की समीक्षा शर्मा, जो इंस्टाग्राम पर खुद को ब्राह्मण बताती हैं, कहती हैं कि उनपर अक्सर "लोगों को बांटने" का आरोप लगाया जाता है और उनकी रील्स पर ऐसे कमेंट भी आते हैं.

समीक्षा कहती हैं, "लेकिन मैं इसको ऐसे नहीं देखती. मैं और ब्राह्मण हैंडल्स से प्रेरणा लेती हूं और अपने समुदाय को बढ़ावा देती हूं."

जहां भारत में अब भी वयस्क लड़कियों को भी मोबाइल फोन रखने के लिए मां-बाप की अनुमति लेनी पड़ती है, वहां सिमी के लिए इंस्टाग्राम तरीका है टेक्नोलॉजी के ज़रिए पितृसत्ता से लड़ने का.

साल 2019 में जब उन्होंने रील्स बनानी शुरू की थी, अपने मां-बाप को इसके बारे में नहीं बताया था.

तब वो घर का खर्च चलाने में मदद करने के लिए एक पार्लर में काम करती थीं और वहीं छिपकर रील्स बनाने लगीं.

वक्त के साथ जब उन्हें इंटरनेट और इंस्टाग्राम पर अपने जैसे साथी मिले तो अपनी पहचान जताने और सच्चाई बताने का हौसला मिला.

सिमी कहती हैं, "मां-बाप को बताया तो उन्हें धक्का तो लगा पर गर्व भी हुआ कि मैं समुदाय के लिए ऐसा कर रही हूं. तो अब मुझे छिपने-छिपाने की ज़रूरत नहीं है."

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