मर्दाना बचाव का एक ख़ास मामला और ये तरीका... ब्लॉग

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- Author, नासिरुद्दीन
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
यह मर्दाना बचाव का एक ख़ास मामला है.
यौन उत्पीड़न के दाग़ से मुक्त होने के लिए महिला को निशाना बनाया गया और प्रताड़ित किया गया. उनकी निजता भंग की गई.
इस महीने की शुरुआत में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सीवी आनंद बोस पर राजभवन की एक महिला कर्मचारी ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया. उसने अपने साथ हुए उत्पीड़न की शिकायत कोलकाता पुलिस से की.
संविधान की धारा 361 के मुताबिक राज्यपाल के उनके पद पर रहने के दौरान किसी तरह की आपराधिक कार्यवाही नहीं की जा सकती है. इसलिए इस मामले में कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं हुई है.
पुलिस इस शिकायत के क़ानूनी पहलूओं पर विचार कर रही है, वहीं राज्यपाल ने अपने ऊपर लगे आरोप से इनकार किया.

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बचाव में उठाया गया कदम
लेकिन, इस बीच राज्यपाल के एक क़दम से और सवाल खड़े हो गए हैं. उन्होंने राजभवन में लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज कुछ लोगों को दिखाई.
मीडिया रिपोर्ट्स में राजभवन के हवाले से कहा गया है कि नौ मई को राजभवन में 90 से 100 लोगों की मौजूदगी में दो मई के सीसीटीवी फुटेज दिखाए गए.
यह कवायद बचाव के लिए थी.
इस फुटेज में आरोप लगाने वाली पीड़ित महिला भी थी. लोगों को दिखाए गए फुटेज़ में उसके चेहरे को छिपाया नहीं गया था.
ज़ाहिर है, वहाँ मौजूद लोगों ने उस महिला के चेहरे को भी देखा. यानी उसकी पहचान उजागर हो गई.
महिला का कहना है कि इससे उसकी और उसके परिवार की बेइज़्ज़ती हुई.

पहचान पर इतना ज़ोर क्यों है?
इस पूरे मामले में कुछ बातें बहुत साफ़ दिखती हैं.
एक- आरोप यौन उत्पीड़न का है.
दो- यौन उत्पीड़न का आरोप जिन पर लगा है, वे संवैधानिक पद पर हैं.
तीन- आरोप लगाने वाली महिला की पहचान उजागर की गई.
चौथा- पहलू महिला को इंसाफ़ मिलने की राह की मुश्किलों से जुड़ा है.
हमारे समाज में यौन हिंसा को ख़ास नज़र से देखा जाता है. अकसर सर्वाइवर लड़की या महिला को ही कलंकित किया जाता है. यहां तक कि कई बार तो उसे ही अपराध की वजह बना दिया जाता है.
समाज में उसके बारे में ही तरह-तरह की बातें की जाती हैं. इसमें सबसे अहम बात ‘इज़्ज़त’ की होती है. यानी किसी के साथ यौन हिंसा हुई, तो उसकी ही इज़्ज़त पर बट्टा लग गया.
व्यक्ति की इज़्ज़त को समेटकर कर शरीर के कुछ अंगों तक सीमित कर दिया जाता है. उसी से इज़्ज़त और बेइज़्ज़ती का पूरा विचार रचा जाता है. यही नहीं, पहचान उजागर होने पर उसे ही प्रताड़ित किया जाता है. उसे ही ‘बुरी स्त्री’ बना दिया जाता है. लड़की या महिला का समाज में चलना दूभर हो जाता है.
कई बार उस पर मामले को रफ़ा-दफ़ा करने के लिए दबाव भी बनाया जाता है. यह सब स्त्री के साथ-साथ उसके पूरे परिवारजनों को झेलना पड़ता है. इसीलिए पहचान ज़ाहिर न करने पर इतना ज़ोर है.
इसीलिए क़ानून और ऊपरी अदालत के फैसलों में भी इसका ख़्याल रखा गया है. इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि पहचान ज़ाहिर न हो.

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क़ानून क्या कहता है?
पहचान न ज़ाहिर करने की बात क़ानून में भी है. भारतीय दण्ड संहिता की धारा 228 ए के मुताबिक, जिसके साथ यौन हिंसा हुई है, किसी भी रूप में उसकी पहचान ज़ाहिर करना अपराध है. इसके लिए दो साल तक की सज़ा हो सकती है. साथ ही, जुर्माना भी लग सकता है.
इसीलिए मीडिया को भी पहचान न ज़ाहिर करने की सख़्त हिदायत दी जाती है. नाम छापना या चेहरा दिखाना मना है. मगर सिर्फ़ नाम छापना या चेहरा दिखाना ही पहचान उजागर नहीं करता. कोई भी बात जो पीड़ित या उसके परिवारजनों तक इशारे से भी ले जाती है, वह पहचान उजागर करना ही है.
यही नहीं कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से रोकने वाला क़ानून भी शिकायत करने वाली की पहचान उजागर करने से रोकता है. महिलाओं के लिए पहचान उजागर न करने के जो प्रावधान हैं, वैसा ही प्रावधान बच्चे-बच्चियों के मामले में भी है. यानी अगर सर्वाइवर बच्चे-बच्ची हैं तो पॉक्सो क़ानून के तहत उनकी पहचान ज़ाहिर करना भी अपराध है.
सुप्रीम कोर्ट ने साल 2018 में एक फैसले में (निपुण सक्सेना बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया) पहचान पर बहुत महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बलात्कार की व्यस्क पीड़ित और यौन हिंसा के शिकार बच्चे-बच्चियों की पहचान ज़ाहिर नहीं होनी चाहिए. क्यों नहीं होनी चाहिए… ताकि बेवजह उनका मज़ाक न बनाया जाए. उनका बहिष्कार न हो. उन्हें प्रताड़ित न किया जाए.
कोर्ट ने यह रेखांकित किया कि यौन हिंसा और ख़ासकर बलात्कार झेलने वाली महिला को अभियुक्तों से ज़्यादा बुरे सलूक का सामना करना पड़ता है. यही नहीं अदालती जिरह में भी स्त्री के सम्मान का ख़्याल करना निहायत ज़रूरी है.
सुप्रीम कोर्ट का फ़ोकस भले ही बलात्कार की सर्वाइवर हों, लेकिन यह बातें यौन हिंसा के सभी मामलों पर लागू होती हैं…क्योंकि हमारे पितृसत्तात्मक समाज में यौन हिंसा के सभी मामलों में स्त्री के साथ सुलूक एक जैसा ही होता है. उसे ही झेलना पड़ता है. उसका मज़ाक बनाया जाता है. उसे ही बदनामी का शिकार बनाया जाता है.
इसलिए क़ानून और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के दायरे को व्यापक तौर पर देखे जाने की ज़रूरत है. उसे उसी रूप में लागू करने की ज़रूरत है. यहाँ यह याद रखे जाने की ज़रूरत है कि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि पहचान का मतलब सिर्फ़ नाम नहीं है. कोई भी चीज़ जो सर्वाइवर तक पहुँचाने में मददगार है, वह सब पहचान के दायरे में है.
… तो महामहिम ने क्या किया?
महामहिम राज्यपाल ने संभवत अपने बचाव में वह किया जो उन्हें नहीं करना चाहिए था.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उनके इस क़दम से शिकायत करने वाली महिला की पहचान उजागर हुई. उसकी गोपनीयता और निजता भंग हुई.
यह मानने का मन नहीं करता कि उन्हें यह कैसे पता नहीं होगा कि ऐसे मामलों में पहचान नहीं उजागर करते हैं.
फुटेज में महिला को दिखाकर उन्होंने उसे और प्रताड़ित करने का ही काम किया है. यह उसके साथ मानसिक हिंसा है.

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यह तरीक़ा असंवेदनशील है
आमतौर पर अभियुक्त पुरुष ऐसा ही तरीक़ा अपनाते हैं.
वे शिकायत करने वाली महिला को ही निशाना बनाते हैं. उस पर ही शक़ पैदा करने की कोशिश करते हैं. यही मर्दाना पितृसत्ता है.
मर्द को कई बार तो अपने व्यवहार में किसी तरह की दिक़्क़त नहीं दिखती. उसे सब सामान्य लगता है. इसीलिए पुरुषों और लड़कों को अपराध के दायरे और असर को समझना होगा.
तब ही उन्हें अंदाज़ा होगा कि बचाव में उठाया गया क़दम कितना स्त्री विरोधी है.
बचाव में उठाया गया महामहिम का क़दम भी स्त्री के ख़िलाफ़ खड़ा होता है. उन्हें अपने को बेगुनाह साबित करने का कोई और संवेदनशील तरीक़ा तलाशना चाहिए था.
(लेखक के निजी विचार हैं.)
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