18 से कम उम्र की पत्नी के साथ बिना मर्ज़ी के सेक्स बलात्कार, एलजी की सिफ़ारिश का हुआ स्वागत

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    • Author, सुशीला सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

दिल्ली के लेफ़्टिनेंट गवर्नर (एलजी) वीके सक्सेना ने गृह मंत्रालय को प्रस्ताव भेज विवाह में बिना मर्जी से बनाए गए शारीरिक संबंध को बलात्कार बताए जाने की सिफ़ारिश की है.

बीबीसी को मिली जानकारी के मुताबिक़ वीके सक्सेना ने सिफ़ारिश की है कि 15 से 18 साल की उम्र की पत्नी के साथ असहमति से सेक्स किया जाता है, तो वो बलात्कार माना जाए और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत इसमें सज़ा दी जाए.

महिला संगठनों ने इस सिफ़ारिश का स्वागत किया है लेकिन वे ये भी कहती हैं कि इसका दायरा केवल 18 की उम्र तक ही सीमित नहीं किया जाना चाहिए.

गृह मंत्रालय को भेजे गए इस प्रस्ताव में एलजी वीके सक्सेना ने आईपीसी की धारा 375 के अपवाद 2 को हटाने की सिफ़ारिश की है.

इसके तहत अगर 15 से 18 साल की एक विवाहित लड़की की बिना सहमति के उनके पति शारीरिक संबंध बनाते हैं, तो उसमें सज़ा का प्रावधान नहीं है.

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विरोध का कारण

भारत में वैवाहिक बलात्कार (मैरिटल रेप) को क़ानून की नज़र में अपराध नहीं माना गया है.

इसलिए आईपीसी की किसी धारा में न तो इसकी परिभाषा है और न ही इसके लिए किसी तरह की सज़ा का प्रावधान है.

इस साल की शुरुआत में दिल्ली हाई कोर्ट में वैवाहिक बलात्कार को अपराध मानने और आईपीसी की धारा 375 के अपवाद 2 की वैधता को चुनौती दी गई थी.

भारतीय दंड संहिता की धारा 375 में बलात्कार की परिभाषा बताई गई है और उसे अपराध बताया गया है. इन याचिकाओं में इस धारा के अपवाद 2 पर आपत्ति जताई गई है.

ये अपवाद कहता है कि अगर शादी में कोई पुरुष अपनी पत्नी के साथ बिना उसकी सहमति के शारीरिक संबंध बनाता है, जिसकी उम्र 15 साल या उससे ऊपर है तो वो बलात्कार नहीं कहलाएगा.

इस सिलसिले में संस्थाओं ने याचिका डाली थी और इसे संविधान की धारा 14 और 21 का उल्लंघन बताया गया था.

क़ानूनी बहस में क्या कहा गया?

हाई कोर्ट ने इस मामले में केंद्र से सवाल पूछा था, जिसके जवाब में केंद्र ने एक हलफ़नामा दायर कर कहा था कि क़ानून में प्रस्तावित संशोधन के लिए विचार-विमर्श चल रहा है और उसने इस संबंध में राज्य सरकारों, केंद्र शासित राज्यों और याचिकाकर्ताओं से सुझाव मांगे हैं.

साथ ही सरकार ने अपने हलफ़नामे में कहा था कि सभी दावेदारों से सलाह-मशविरा किए बगैर फ़ैसला लेना विवेकपूर्ण नहीं होगा, क्योंकि इसके समाजिक और क़ानूनी प्रभाव हो सकते हैं.

हालांकि इसी साल मई के महीने में दिल्ली हाई कोर्ट की दो सदस्यीय बेंच ने इस मामले में बँटा हुआ फ़ैसला सुनाया था.

इस मामले में जहाँ एक जस्टिस ने कहा कि बिना अपनी पत्नी की सहमति के ज़बरदस्ती संबंध बनाना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है तो दूसरे जस्टिस इस फैसले से सहमत नहीं दिखे.

साथ ही कोर्ट ने कहा था कि याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट का रुख़ कर सकते हैं. ऐक्ट्रेस नयनतारा के शादी के चार महीने बाद जुड़वां बच्चे और सरोगेसी क़ानून पर उठते सवाल

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क्या है इस मामले में राय ?

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इस मामले में दिल्ली पुलिस कह चुकी है कि धारा 375 का अपवाद दो असंवैधानिक, मनमाना और प्रतिगामी प्रकृति का है.

बाल विवाह की रोकथाम के लिए वर्षों से काम कर रहीं सामाजिक कार्यकर्ता कृति भारती लेफ़्टिनेंट गवर्नर की इस सिफ़ारिश को सकारात्मक क़दम बताती हैं.

वे मानती हैं कि भारत में बाल विवाह निषेध क़ानून है, लेकिन भारत में अभी भी ऐसे विवाह हो रहे हैं.

उनके अनुसार, ''शादी में आमतौर पर एक महिला की भूमिका घरेलू कामकाज और शारीरिक संबंध बनाए जाने को लेकर देखी जाती है. ऐसे में लड़की ससुराल जाती है, तो कई बार ये देखा जाता है कि शारीरिक संबंध बिना आमसहमति के बनते हैं. ऐसे में इस पर रोक लगेगी.''

वे आगे कहती हैं, ''इन मामलो को पॉक्सो एक्ट के दायरे में लाया जाए या नहीं इसे लेकर चुनौती पेश आती है. साथ ही लड़की विदाई की उम्र जो आमतौर पर 15 से 18 देखी जाती है वो उम्र बढ़ेगी तो उसमें भी फ़ायदा होगा.''

क़ानून में भी कई विसंगतियाँ दिखती हैं. भारत में अगर 18 साल से कम उम्र की शादीशुदा लड़की के साथ पति जबरन शारीरिक संबंध बनाता है, तो उसे वैवाहिक बलात्कार नहीं माना जाता है. हालांकि इस पर बहस जारी है.

लेकिन अगर कोई 18 साल से कम उम्र की लड़की के साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाता है तो वो यौन हिंसा में आता है और इसमें पॉक्सो के तहत सज़ा का प्रावधान है.

वहीं इसी उम्र की किसी लड़की या पत्नी के साथ कोई पति जबरन शारीरिक संबंध बनाता है तो न बलात्कार और न ही पॉक्सो एक्ट के दायरे में आता है.

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पॉक्सो एक्ट क्या कहता है?

नाबालिग बच्चों के प्रति यौन उत्पीड़न और यौन शोषणसे सरंक्षण के लिए बने अधिनियम 2012 को पॉक्सो एक्ट भी कहा जाता है.

ये क़ानून 18 साल से कम उम्र के लड़के और लड़कियों को लैंगिक या यौन हमले से बचाने के लिए लाया गया था.

ऐसे अपराध साबित होने पर सज़ा का प्रावधान किया गया है.

अगर 16 साल के कम उम्र के बच्चे के साथ ऐसा हमला होता है तो उसके लिए कड़ी सज़ा का प्रावधान है.

हाई कोर्ट की वकील सोनाली कड़वासरा का कहना है कि शादीशुदा मामले में सहमति एक ऐसी चीज़ है जो रिश्ते में कभी भी बदल सकता है.

उनके अनुसार, ''विवाह दो व्यक्तियों के बीच ऐसा संबंध है जहां कई बार ये साबित करना मुश्किल हो जाता है कि सहमति कब थी और कब नहीं. ये ज़्यादातर मामलों में साबित करना अव्यावहारिक होता है और यही कारण है कि अदालतें इस मामले में प्रगतिशील क़दम नहीं उठा पाती.''

वे आगे बताती हैं कि क़ानून का काम केवल एक पक्ष को सुनना नहीं है बल्कि शिकायतकर्ता और जिसपर आरोप लगे हैं, दोनों के अधिकारों की तब तक रक्षा करना है जब तक अपराध साबित नहीं हो जाता.

इस मामले में याचिकाकर्ताओं या संस्थाओं का मानना है कि शादी किसी भी महिला पर यौन हिंसा करने का साधन नहीं बनना चाहिए.

साथ ही महिलाओं को ये भी समझना होगा कि वे शादी में होने वाली इस तरह की यौन हिंसा के ख़िलाफ़ घरेलू हिंसा क़ानून 2005 का भी सहारा ले सकती है.

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