कर्नाटक में ज्ञानवापी जैसा मामला, अदालत ने कहा बंद हो निर्माण

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बेंगलुरु, बीबीसी हिंदी के लिए
कर्नाटक के मंगलुरु में सिविल कोर्ट ने कहा है कि मलालीपेटे मस्जिद से जुड़ी याचिका की सुनवाई करना उसके अधिकार क्षेत्र में आता है.
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मंगलुरु के बाहरी इलाके में स्थित मलालीपेटे मस्जिद के नीचे मंदिर जैसे ढांचे को तोड़ने पर स्थाई रूप से रोक लगाने का आग्रह किया था.
लेकिन मस्जिद समिति ने इसे सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से बाहर करार दिया था.
हालांकि, अतिरिक्त सिविल जज निकिता अक्की ने अपने फ़ैसले में अधिकार क्षेत्र से जुड़े तर्क को ख़ारिज कर दिया.
समिति की ओर से तर्क दिया गया था कि मस्जिद के वक़्फ़ बोर्ड की ज़मीन पर स्थित होने की वजह ये मामला सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से बाहर और सिर्फ वक़्फ़ ट्राइब्यूनल इस मामले में सुनवाई कर सकता है.
याचिकाकर्ताओं के वकील चिदानंद केदल्या ने बताया है कि “अदालत ने कहा है कि यह मामला उसके अधिकार क्षेत्र में आता है.’
वहीं, मस्जिद समिति के वकील एमपी शिनॉय ने बताया है, “हम अधिकार क्षेत्र का मसला कर्नाटक हाई कोर्ट में लेकर जाएंगे. हमने सुप्रीम कोर्ट के ऐसे तमाम मामलों को सामने रखा है जिसके तहत ये मामला वक़्फ़ ट्राइब्यूनल के सामने जाना चाहिए.”
इस मस्जिद के नीचे मंदिर जैसे ढांचे निकलने के मामले की तुलना वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद विवाद से की जा रही है.

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आख़िर क्या है मामला?
तटीय क्षेत्र में बनी ये मस्जिद एक साधारण टाइल्स वाली पारंपरिक संरचना है जो 4,350 वर्ग फुट के क्षेत्र में फैली है.
इस मस्जिद में स्थानीय निवासी नियमित तौर पर प्रार्थना में शामिल होते हैं. मस्जिद के बगल में एक कब्रिस्तान है.
कहा जाता है कि लगभग 500 साल पहले उल्लाल अब्बाकदेवी के शासन के दौरान ये मस्जिद अस्तित्व में आयी थी.
एक स्थानीय निवासी ने पहचान ज़ाहिर नहीं करने की शर्त पर बीबीसी हिंदी को बताया, "यह साबित करने के लिए दस्तावेज़ हैं कि यह मस्जिद मौजूद थी क्योंकि सड़क को मस्जिद रोड के रूप में वर्णित किया गया है."
मंगलुरु के पास थेनका उलपडी गांव के मलालीपेटे में बने असैद अब्दुल्लाही मदीन मस्जिद को लेकर विवाद इसी साल 21 अप्रैल को सामने आया था.
इस मस्जिद की मंदिर जैसी संरचना पर लोगों का ध्यान तब गया जब जीर्णोद्धार के लिए निर्माण सामग्री को अंदर लाने के लिए दीवार के एक हिस्से को तोड़ा जा रहा था.
जैसी ही ये तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए, वैसे ही लोग इस मस्जिद की ओर देखने लगे थे.

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ज्ञानवापी विवाद से तुलना
ये लगभग तभी हो रहा था उत्तर प्रदेश के वाराणसी में ज्ञानवापी मस्जिद चर्चा के केंद्र में थी.
दशकों से सांप्रदायिक तौर पर संवेदनशील समझे जाने वाले इस इलाके में कोई असहज स्थिति उत्पन्न नहीं हो, इसके लिए स्थानीय पुलिस ने निषेधाज्ञा लागू कर दी.
इस मामले के दोनों वादियों धनंजय और मनोज कुमार के बारे में उनके वकील एम. चिदानंद केदल्या ने कहा, "मस्जिद के अंदर एक पुराने मंदिर को देखकर वे लोग अचरज में थे.
इन दोनों ने मस्जिद समिति के सदस्यों से मंदिर जैसी संरचना नहीं गिराने की अपील की.
जब मस्जिद समिति ने इनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया तो दोनों वादियों ने पुलिस, तहसीलदार और जिला उपायुक्त को सूचित किया.
इसके बाद स्थानीय प्रशासन के आला अधिकारी मौके पर पहुंचे और निर्माण कार्य रोक दिया गया."
वादियों के वकील के मुताबिक, "पुलिस प्रशासन ने वादियों को बताया कि मस्जिद समिति के पास निर्माण कार्य कराने की अनुमति है, इसलिए कोर्ट के आदेश के बिना निर्माण कार्य को लंबे समय तक रोका नहीं जा सकता है."
अगले ही दिन धनंजय और मनोज कुमार ने निर्माण कार्य और पुराने ढांचे को गिराने के काम पर रोक लगाने की अपील सिविल अदालत से की.
इसके बाद 21 अप्रैल को सिविल अदालत ने मस्जिद में निर्माण कार्य पर अस्थायी तौर पर रोक लगा दी.
हालांकि, बाद में स्थानीय सर्वेक्षण के लिए अदालत ने आयुक्त की मांग को स्वीकार नहीं किया गया. हाई कोर्ट ने इस मामले में सिविल कोर्ट के फ़ैसले को बरकरार रखा है.

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क्या कह रहे हैं दोनों पक्ष
इस मामले में वादी धनजंय और मनोज कुमार और प्रतिवादी मलालीपेटे मस्जिद समिति के अध्यक्ष मामू मानेल ने ये दलीलें दी हैं.
करीब 30 साल के युवाओं धनजंय एवं मनोज कुमार ने कहा है, "वे स्थानीय निवासी हैं और उनकी दिलचस्पी इस मंदिर में है जो एक प्राचीन विरासत है. उनके पूर्वज इस मंदिर में पूजा उपासना करते थे."
इन दोनों के मुताबिक, इस मस्जिद का निर्माण सरकारी ज़मीन पर हुआ है और दोनों पुराने मंदिर को ऐतिहासिक स्मारक घोषित करने और उसे संरक्षित करने के लिए पुरातत्व विभाग को सौंपने की मांग कर रहे हैं.
कोर्ट में मलालीपेटे मस्जिद समिति के अध्यक्ष मामू मानेल की ओर से उनका पक्ष वकील एम शेनॉय रख रहे हैं.
मामू मानेल कहते हैं कि ‘दोनों वादी मस्जिद से 10 किलोमीटर की दूरी पर रहते हैं. दोनों विश्व हिंदू परिषद के सदस्य हैं. मस्जिद के निकट जाने माने वकील और विधायक भी रहते हैं लेकिन इन दोनों ने कोई मामला दर्ज नहीं कराया है.
मुक़दमा क़ानूनन चलाए जाने लायक नहीं हैं क्योंकि विचाराधीन संपत्ति वक्फ़ बोर्ड की संपत्ति है. मामले को वक्फ़ ट्रायब्यूनल के सामने उठाना चाहिए और वक्फ़ बोर्ड को भी एक पक्ष बनाया जाना चाहिए.’
इसके साथ ही उन्होंने कहा है कि ‘मस्जिद 1550 ईस्वी से अस्तित्व में है. पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियिम, 1991 की धाराएं 3,4 और 6 यहां लागू होती हैं.
विचाराधीन संपत्ति पर कभी मंदिर मौजूद नहीं था. मंदिर के अस्तित्व को साबित करने के लिए प्राचीन समय का कोई सबूत पेश नहीं किया गया है.’
इसके साथ ही प्रतिवादियों ने अदालत में कहा है कि वादियों ने याचिका केवल इसलिए दायर की है क्योंकि राज्य में अगले साल चुनाव होने हैं.
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