प्रयागराज में कथित तौर पर 'दहेज के कारण' दुल्हन की मौत और उसका भयानक बदला

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- Author, गीता पांडे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, प्रयागराज
प्रयागराज में एक ऐसी भयावाह त्रासदी हुई है, जिसमें दो परिवार तबाह हो गए. इसकी वजह से तीन लोगों की मौत हुई और सात लोगों को जेल जाना पड़ा है.
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (इलाहाबाद) में 18 मार्च को ऐसी घटना हुई, जिसने शहर के दो मध्यमवर्गीय मोहल्लों के बाशिंदों को हिलाकर रख दिया है.
(चेतावनी: इस रिपोर्ट में कई ऐसी बातों का ज़िक्र है, जिनसे कुछ लोग विचलित हो सकते हैं.)
शिवानी केसरवानी बताती हैं, ''उस दिन रात के 11 बजे का वक़्त रहा होगा, जब 60-70 लोगों ने हमारे घर पर हमला किया था. उन्होंने हमें बड़ी बेरहमी से मारना-पीटना शुरू कर दिया.''
शिवानी कहती हैं कि ये हमलावर उनके भाई अंशु की पत्नी अंशिका के परिवार के सदस्य और रिश्तेदार थे.
हमले से कुछ घंटों पहले ही अंशिका का शव, अपनी ससुराल में फाँसी के फंदे से लटकता हुआ मिला था.
शिवानी और पुलिस का कहना है कि अंशिका की मौत ख़ुदकुशी की वजह से हुई थी. लेकिन, अंशिका के परिजन और पड़ोसियों का इल्ज़ाम है कि दहेज के लिए उनकी हत्या कर दी गई थी.
(आत्महत्या एक गंभीर मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समस्या है.
अगर आप भी तनाव से गुज़र रहे हैं तो भारत सरकार की जीवनसाथी हेल्पलाइन 18002333330 से मदद ले सकते हैं. आपको अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से भी बात करनी चाहिए.)

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'आवाज़ लगाई पर जवाब नहीं मिला'
केसरवानी परिवार का लकड़ी का ख़ानदानी कारोबार है और वो संयुक्त परिवार में रहते हैं.
उनके मकान के ग्राउंड फ्लोर और बेसमेंट में दुकान और गोदाम था. ऊपरी मंज़िलों पर केसरवानी परिवार रहता था.
मकान की हर मंज़िल पर एक बेडरूम था. एक साल पहले शादी होने के बाद से अंशु अपनी पत्नी के साथ इसके टॉप फ्लोर पर रह रहे थे. उनके माता-पिता इसी मकान की पहली मंज़िल पर और बहन शिवानी दूसरी मंज़िल पर रहा करते थे.
उस रात के बारे में शिवानी ने बीबीसी को बताया, ''अंशिका आम तौर पर रात को आठ बजे डिनर के लिए अपने बेडरूम से नीचे आया करती थी. लेकिन, उस रात वो डिनर के लिए नीचे नहीं आई, तो हमें लगा कि हो सकता है कि वो सो गई हो.'
शिवानी ने बताया कि जब उनके भाई रात दस बजे दुकान से घर लौटे, तो वो अपनी पत्नी को बुलाने के लिए कमरे में गए.
शिवानी बताती हैं, ''भइया ने कई बार दरवाज़ा खटखटाया. मोबाइल पर कॉल किया. लेकिन, कोई जवाब नहीं मिला. तब उन्होंने कमरे के ऊपर बनी कांच की खिड़की तोड़कर दरवाज़ा खोला, तो अंशिका उन्हें फंदे से लटकती दिखी. भइया ज़ोर से चीखे. चीख सुनकर हम सब ऊपर की ओर भागे.''
दोनों परिवारों के बीच शुरू हुआ झगड़ा

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अंशु और उनके चाचा ने फ़ौरन अंशिका की मौत की ख़बर नज़दीकी पुलिस थाने को दी, जो उनके घर से आधे किलोमीटर से भी कम दूरी पर है. उन्होंने अंशिका के परिवार को भी इस हादसे की ख़बर दे दी.
पुलिस का कहना है कि एक घंटे भी नहीं गुज़रे होंगे कि अंशिका के परिजन अपने दर्जनों रिश्तेदारों के साथ जमा हो गए और दोनों परिवारों के बीद भयंकर झगड़ा शुरू हो गया.
शिवानी ने अपने मोबाइल फ़ोन में हमें वो वीडियो दिखाए, जिसमें दोनों पक्षों के लोग एक दूसरे के ऊपर चीख़-चिल्ला रहे थे और लकड़ी के डंडों से मार-पीट कर रहे थे. वीडियो में दोनों पक्षों के बीच में एक पुलिसवाला भी खड़ा दिख रहा है, जो दोनों पक्षों को शांत कराने की नाकाम कोशिश कर रहा है
जब अंशिका का शव घर से बाहर निकाला गया, तो इल्ज़ाम है कि उनके परिवार वालों ने घर को आग लगा दी.
मकान के ग्राउंड फ्लोर और बेसमेंट में रखी लकड़ी में आग भड़क उठी. शिवानी, उनके माता-पिता और चाची इस आग में फँस गए.
शिवानी और उनकी चाची तो दूसरी मंज़िल की खिड़की तोड़कर रेंगते हुए पड़ोस के मकान में चली गईं, जो उनके चाचा का था. लेकिन, शिवानी के माता-पिता इतने ख़ुशक़िस्मत नहीं थे.
फायर ब्रिगेड की टीम तीन घंटे की मशक़्क़त के बाद इस आग को बुझा सकी. उसके बाद जब वो रात के लगभग तीन बजे इमारत में दाख़िल हुए, तो उन्हें शिवानी के बुज़ुर्ग मां-बाप का जला हुआ शव मिला.
अपने आंसू पोछते हुए शिवानी बताती हैं, ''मेरी मां सीढ़ियों पर बैठी मिली. उन्हें बोरे में भरकर पोस्टमॉर्टम के लिए ले जाया गया था.''
पुलिस ने क्या बताया?

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पुलिस में दर्ज कराई गई शिकायत में शिवानी ने अंशिका के परिवार के 12 सदस्यों के ख़िलाफ़ नामज़द रिपोर्ट की है. इसके अलावा 60-70 अज्ञात लोगों पर भी केस किया गया है.
एक पुलिस अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि इस घटना के बाद अंशिका के पिता, उनके चाचा और उनके बेटों समेत कुल सात लोगों को गिरफ़्तार किया गया था. वो सब अभी भी जेल में क़ैद हैं.
उनका कहना है कि अंशिका के पिता ने भी एक जवाबी शिकायत दर्ज कराई है, जिसमें उन्होंने 'अंशु, उनके मां-बाप और उनकी बहनों के ऊपर अपनी बेटी को दहेज के लिए तंग करने और उनका क़त्ल करने का इल्ज़ाम लगाया है.'
शिवानी अपने परिवार के ऊपर लगे इल्ज़ामों को ग़लत बताती हैं.
हालांकि, वो ये मानती हैं कि उन्हें शादी के वक़्त अंशिका के परिवार से काफ़ी सामान मिला था. इसमें एक कार भी शामिल थी.
वो कहती हैं, ''उन्होंने जो कुछ दिया, अपनी बेटी को दिया. हमने उनसे कुछ नहीं मांगा था.''
अपनी पत्नी की मौत वाली रात के बाद से अंशु घर नहीं लौटे हैं.
शिवानी कहती हैं, ''वो छुपकर ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं क्योंकि अंशिका के ज़्यादातर रिश्तेदार जेल से बाहर हैं. ऐसे में मेरे भाई को अपनी जान पर ख़तरा महसूस होता है.''
क़ानून और आंकड़े

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भारत में 1961 से ही दहेज देना और दहेज लेना जुर्म है.
हाल के एक अध्ययन के मुताबिक़, इस क़ानून के बावजूद भारत में 90 फ़ीसदी शादियों में दहेज लिया और दिया जाता है.
भारत में पुलिस को हर साल हज़ारों महिलाओं से दहेज के लिए प्रताड़ित किए जाने की शिकायत मिलती है.
अपराध के आंकड़ों के मुताबिक़, साल 2017 से 2022 के दौरान भारत में 35 हज़ार 493 दुल्हनों की हत्या पर्याप्त दहेज न लाने की वजह से कर दी गई थी.
लेकिन, दहेज की वजह से मौत का इतने भयावह बदले की घटना अब तक नहीं सुनी गई थी.
शिवानी अब अपने घर के पड़ोस में चाचा के परिवार के साथ रहती हैं. वो हमें उस इमारत में लेकर जाती हैं, जहां अभी हाल के दिनों तक उनका परिवार रहा करता था.
उस रात की तबाही के निशान जगह जगह बिखरे नज़र आते हैं.
आग और धुएं की वजह से दीवारों पर स्याही पसरी है और ज़मीन पर राख का ढेर लगा हुआ है, बर्तन और जले हुए फ़र्नीचर के टुकड़े नज़र आते हैं.
शिवानी कहती हैं, ''मुझे इंसाफ़ चाहिए. मेरी तो ज़िंदगी तबाह हो गई. मेरा घर बर्बाद हो गया, परिवार ख़त्म हो गया. मैं चाहती हूं कि इस मामले की निष्पक्ष तहक़ीक़ात हो और जो भी इसका मुजरिम हो उसको सज़ा मिले.''
शिवानी ये भी कहती हैं, ''आख़िर उन्होंने मेरा घर क्यों जला दिया. अब हमें कोई सुबूत कैसे मिलेगा?''
पुलिस से नाराज़गी

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शिवानी पुलिस पर भी बेहद ख़फ़ा हैं.
उस वक़्त हमारे घर के बाहर कम से कम दो दर्जन पुलिसवाले थे. लेकिन, मेरे मां-बाप को बचाने के लिए कोई अंदर नहीं गया.
वो इल्ज़ाम लगाती हैं, ‘वो बस खड़े रहकर तमाशा देख रहे थे.’
हालांकि, पुलिस इस इल्ज़ाम का सख़्ती से खंडन करती है.
नाम न बताने की शर्त पर एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बीबीसी से कहा, ‘ये एक संवेदनशील मामला था. लोग भड़के हुए थे. हमारा पूरा ज़ोर शव को वहां से हटाने और पोस्टमॉर्टम के लिए अस्पताल ले जाने पर लगा हुआ था. हमारी कोशिश ये थी कि हम भीड़ को कम करें और तनाव बढ़ने से रोकें.’
उन्होंने कहा, ‘किसी को ये आशंका नहीं थी कि घर को आग लगा दी जाएगी. ये तो बिल्कुल अप्रत्याशित था. हमने तुरंत आग बुझाने वालों को बुलाया. हमने पांच लोगों को घर से बाहर निकालने में भी मदद की थी.’
इस दोहरी त्रासदी ने अंशिका के परिवार को भी गहरे ज़ख़्म दिए हैं. इस हादसे में उनका पक्ष जानने के लिए हम अंशिका के माता-पिता के घर भी गए, जहां ख़ुद अंशिका भी पिछले साल शादी होने से पहले तक रहा करती थी.
मकान के दरवाज़े पर एक बड़ा सा ताला लटका हुआ है.
अंशिका के घर से बस दो किलोमीटर की दूरी पर उनके चाचा का मकान है. गिरफ़्तार किए गए लोगों में अंशिका के चाचा और उनके बेटे भी हैं.
अंशिका का परिवार अब तक मीडिया से कोई बात करने से इनकार करता आया है.
अंशिका का परिवार क्या बोला

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जब हमने अंशिका के चाचा के घर पर दस्तक दी, तो उनके दादा जवाहर लाल केसरवानी बाहर आए.
जवाहरलाल की उम्र 90 साल से ज़्यादा है. उनके नाती-पोतों में से एक घर के अंदर से एक प्लास्टिक की कुर्सी ले आया और वो उस पर बैठ गए. जवाहर लाल को सांस लेने में दिक़्क़त हो रही थी.
कुछ देर के बाद उन्होंने कहा, ''मैं आपसे क्या बता सकता हूं? मेरा पूरा परिवार जेल में है. मेरे बेटे, मेरे पोते सब क़ैद हैं.''
वो आगे कहते हैं, ''उन्होंने अंशिका को मार डाला और फिर उसे आत्महत्या बताने के लिए लटका दिया.''
जवाहर लाल बताते हैं कि उनके परिवार ने अंशिका की शादी पर काफ़ी पैसे ख़र्च किए थे.
उन्होंने कहा, ''हमने शादी में 50 लाख रुपए ख़र्च किए थे. हमने उसको वो सब कुछ दिया था, जिसकी ज़रूरत गृहस्थी में पड़ती है. हमने उन्हें एक कार और 16 लाख रुपए नक़द भी दिए थे.''
जवाहर लाल ये भी जोड़ते हैं कि आख़िरी बार अंशिका उनके यहां फरवरी में आई थी.
अफ़सोस जताते हुए वो कहते हैं, ''तब उसने बताया था कि उसे तंग किया जा रहा था. हमने उससे कहा कि वो अपनी ससुराल में रहकर वहां के हालात से तालमेल बिठाए. धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा.''
सदमे में पड़ोसी

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केसरवानी परिवार अपने इलाक़े का जाना माना ख़ानदान है.
लोग उन्हें बहुत दोस्ताना, मददगार और विनम्र स्वभाव वाला बताते हैं.
इस दोहरी त्रासदी की बातों से उनके पड़ोसी भी सदमे में हैं.
केसरवानी परिवार के मकान से कुछ दूरी पर रहने वाले एक शख़्स ने हमें बताया, ''वो तो बहुत अच्छे लोग हैं. हम तो ये कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि ऐसा हो सकता था. वो लड़ाई झगड़ा करने वाले लोग थे ही नहीं.''
वो आगे बताते हैं, ''हमको नहीं पता कि आग किसने लगाई. लेकिन, अपनी बेटी की लाश देखकर किसी को भी ग़ुस्सा ही आएगा.''
पड़ोस की एक महिला कहती हैं, ''अंशिका बहुत अच्छे स्वभाव की लड़की थी. वो बहुत प्यारी बच्ची थी.''
उन्होंने अंशिका के परिवार के बारे में कहा, ''बेहद साधारण परिवार है…उनके ऊपर जो इल्ज़ाम लगा है, वैसा भयानक अपराध वो कर ही नहीं सकते.''
वो कहती हैं, ''ये बड़े अफ़सोस की बात है कि उसके सास-ससुर आग में जलकर मारे गए. मगर मुझे सबसे ज़्यादा दु:ख तो इस बात का है कि अब इस बार में कोई चर्चा नहीं करता कि अंशिका को क्या हुआ था? उसकी मौत कैसे हो गई?''
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