हीरामंडी: तवायफ़ों का कितना सच दिखा पाए हैं संजय लीला भंसाली?

हीरा मंडी

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    • Author, अर्णब बनर्जी
    • पदनाम, समीक्षक, बीबीसी हिंदी के लिए

संजय लीला भंसाली की फ़िल्मों ने उनके लिए ख़ास जगह बनाई है.

वो एक ऐसे शख़्स के तौर पर उभरे हैं जो छोटी चीज़ों से संतुष्ट नहीं हैं. वो वैभव और भव्यता के समर्थक हैं, जो अपनी फ़िल्मों में जुनून की हद तक लाइट से लेकर तमाम दूसरी बारीकियों पर ध्यान देते हैं.

उनकी हालिया सिरीज़ 'हीरामंडी: द डायमंड बाज़ार' इस नेटफ़्लिक्स पर रिलीज़ हो चुकी है.

इस सिरीज़ को अपनी वैराइटी के लिए पसंद किया जा रहा है. आठ एपिसोड में बंटी सिरीज़ में जो चमक-दमक और भव्यता है उससे दर्शक मंत्रमुग्ध हैं.

हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री के कुछ मशहूर सितारों के साथ बनाई गई इस सिरीज़ में भंसाली लाहौर (भारत विभाजन से पहले) के एक समय के चर्चित रेडलाइट एरिया की कहानी दिखाते हैं.

शानदार ढंग से बनाई गई ये सिरीज़ सिर्फ अपनी भव्यता की वजह से सिने प्रेमियों को नहीं लुभा रही है बल्कि ओटीटी पर अब तक की सबसे महंगी सिरीज़ इसे बताया जा रहा है. इस सिरीज़ ने एक बहस खड़ी कर दी है. और वो ये कि आख़िर तवायफ़ें कौन थीं और उनकी असल भूमिका क्या थी?

लेकिन सबसे पहले बात करते हैं आठ घंटे की इस लंबी सिरीज़ की.

संजय लीला भंसाली का ज़ोर इस बात पर नहीं है कि लाहौर का रेड लाइट एरिया हीरामंडी उस दौर में कैसा दिखता था. इतिहासकार और संस्कृति विशेषज्ञ भी ये नहीं मानते हैं कि अपने उरूज के वक़्त भी हीरामंडी ऐसी रही होगी जैसा कि सिरीज़ में दिखाया गया है.

भंसाली ने जिस शानदार शैली में आज़ादी से पहले की तवायफ़ों की ज़िंदगी में प्रेम और धोखे की कहानियां दिखाई है वो सब पुराने लाहौर के रेडलाइट एरिया में रहने वाली महिलाओं के जीवन में घटित होती हैं.

ये उनकी ज़िंदगी, संघर्ष और उनके रिश्तों की कहानी कहती है. और यह कहानियां एक शाही अंदाज़ में कही जाती हैं.

दिग्गज अभिनेत्री दीप्ति नवल कहती हैं, ''भंसाली की अद्भुत और आलीशान कहानी कहने की शैली के ज़रिये मैंने उन शानदार महिलाओं की ज़िंदगी और अतीत का अनुभव लिया और इसे पसंद किया. सभी अभिनेत्रियां ज़बरदस्त हैं.''

कहानी में क्या है?

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इमेज कैप्शन, हीरामंडी के एक किरदार में शेखर सुमन
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कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

संजय लीला भंसाली की ‘हीरामंडी’ की प्रमुख कहानी दो प्रभावशाली तवायफ़ों मल्लिका जान (मनीषा कोइराला) और फ़रीदन (सोनाक्षी सिन्हा) पर आधारित है.

ये दोनों नियंत्रण लिए प्रतिस्पर्द्धा कर रही हैं. मल्लिका जान हर वक्त़ चाल चलने में माहिर तवायफ़ों के एक ख़ास ऊंचे घराने की मालकिन हैं.

वहीं फ़रीदन ब्रिटिश शासित भारत में उनकी सत्ता को चुनौती देती है. दोनों ओर से हीरामंडी के उत्तराधिकार की लड़ाई चलती है.

हीरामंडी की कहानी 1920 के दशक की शुरुआत से शुरू होती है जब मल्लिका जान एक नाजायज़ बेटे को जन्म देती है.

जल्द ही शाही महल को चलाने वाली मल्लिका जान की बहन रेहाना (सोनाक्षी सिन्हा) बच्चे को बेच देती है. इसके बाद उसकी कुटिल चाल और जाल से पैदा घटनाक्रम एक हत्या की ओर ले जाते हैं.

इस घटना की चश्मदीद गवाह होती है वहीदा, जिसे मुख़बिरी के आरोप में एक स्थायी दाग झेलना पड़ता है. अपनी ज़िंदगी को लेकर उसे हमेशा डर बना रहता है.

इसके बाद ये कहानी 1940 के दशक में प्रवेश कर जाती है, जहां मल्लिका जान का हर कोई आदर करता है और उसे लोग हुज़ूर कहते हैं. वो शाही महल की मालकिन बन जाती है जहां कई युवा लड़कियां- बीब्बो जान (अदिति राव हैदरी), लज्जो (ऋचा चड्ढा) और वहीदा रहती हैं. ये तवायफ़ों के तौर पर काम करती हैं.

उनके साथ होते हैं उस्ताद जी (इंद्रेश मलिक) और दो सेवादार सत्तो और फत्तो, नौकरानी साइना, तांगा चालक इकबाल जो बातें करता है और सौदेबाज़ी में मदद करता है. दो धूर्त ब्रिटिश अफसर भी होते हैं और कई डरपोक नवाब भी.

मल्लिका जान (मनीषा कोइराला) लाहौर की हीरामंडी की स्वयंभू मलिका होती है जो अपनी बहन वहीदा (संजीदा शेख) उसकी दो बेटियों बीब्बो जान, आलमज़ेब (शर्मिन सेगल) और उनकी नौकरानियों फत्तो (जयती भाटिया) और सत्तो (निवेदिता भार्गव) की एक तरह से मालकिन की तरह हैं.

भंसाली के लिए 28 साल बाद काम कर रही मनीषा कोइराला कहती हैं, "मुझे मल्लिका जान के रूप में आने और उनके कैरेक्टर के सुर को पकड़ने में थोड़ा समय लगा.’’

इससे पहले कोइराला ने भंसाली की पहली फिल्म ख़ामोशी- द म्यूज़िकल में काम किया था.

वो कहती हैं, "मुझे तवायफ़ों के इतिहास के बारे में कुछ भी मालूम नहीं था. मैंने पूरी तरह भंसाली के विज़न को मान लिया है.’’

स्वदेशी आंदोलन और हीरामंडी

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सिर्फ़ महिलाएं ही नहीं बल्कि कुलीन लोग भी मल्लिका जान का कहा मानते थे कि तवायफ़ों के साथ कैसे व्यवहार किया जाना चाहिए. और ये भी किसी तवायफ़ को प्यार में नहीं पड़ना चाहिए.

उसे चुनौती देने वाली एक ही महिला है, फ़रीदन (सोनाक्षी सिन्हा) जो अपनी शर्तों पर जीती है.

मल्लिका के नज़दीकियों का उसे पूरा समर्थन है. चाहे वहीदा हो या धूर्त ब्रिटिश अफ़सर कार्टराइट (जेसन शाह), सभी उसके जाल में फंसते हैं.

वे सभी एक दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं. फ़रीदन इसका फ़ायदा उठाती है.

बनारस से आने के बाद फ़रीदन एक और कोठी ख़्वाबगाह पर कब्ज़ा कर लेती है. वो मल्लिका की मरहूम बड़ी बहन है और वो अपनी मां की हत्या का बदला लेने के लिए शाही महल में रहने वालों का इस्तेमाल करना चाहती है.

इन महिलाओं की आपस में प्रतिद्वंद्विता है और पूरी सिरीज़ में ये भंसाली का फ़ोकस है.

लेकिन ठीक इसी समय देश में स्वदेशी आंदोलन तेज़ी से ज़ोर पकड़ रहा होता है. बीब्बो जान और आलमज़ेब स्वतंत्रता संग्राम की ओर खिंचे चले जाते हैं. ये सब स्वेच्छा से और अचानक होता है.

बाकी तवायफ़ों के पास भी दो विकल्प हैं. या तो रीढ़विहीन नवाबों के साथ हो जाएं या फिर स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हो जाएं.

भंसाली ने अपने विषय को बारीकी से पकड़ा है. ऐसा लगता है कि भंसाली को उन तवायफ़ों के बारे में सब कुछ मालूम है.

बीब्बोजान का किरदार निभाने वाली अदिति राव हैदरी कहती हैं, ''मैं बिल्कुल कोरे स्लेट की तरह इस किरदार में घुसी. चूंकि मैं जानती थी कि संजय सर को संगीत से लेकर आर्ट और डांस तक सब मालूम है इसलिए मुझे ज़्यादा रिसर्च नहीं करनी पड़ेगी. मेरी मां को शायद उन तवायफ़ों के बारे में जानकारी हो सकती थी लेकिन शूटिंग से पहले तो मुझे इन लोगों के बारे में बहुत कम पता था.''

भंसाली ने तवायफ़ों की ज़िंदगी को कैसा दिखाया है?

संजय लीला भंसाली

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इमेज कैप्शन, संजय लीला भंसाली (फाइल फोटो)

भंसाली ने अपनी सिरीज़ में जिन तवायफ़ों को दिखाया है वो अपने पेशे में काफ़ी सफल हैं लेकिन बाद में विकल्पों की कमी की वजह से उन्हें देह व्यापार में उतरने को मजबूर होना पड़ता है.

ये कहानी साज़िश, ईर्ष्या, रहस्य, घृणा, प्रेम, धोखा और बलिदान की दूसरी कहानियों से अलग नहीं है. इसके अलावा इस कहानी को बेहद चमक-दमक और भव्यता से फ़िल्माया गया है.

लेकिन सिरीज़ को देखने से पता चलता है कि उस दौर में क्या हो रहा था. इसका मक़सद ये दिखाना है कि एक तवायफ़ कैसे व्यवहार करती है. साथ ही ये उसकी काबिलियत, शिष्टाचार, बर्ताव और व्यवहार को भी दिखाती है.

भंसाली के सिनेमैटिक विज़न के अलावा किरदारों ने जो छोटी-छोटी जानकारियां दी हैं, उससे सिरीज़ और भी लुभावनी और मनोरंजक बन जाती है. जैसे मल्लिका जान, ब्रिटिश अफ़सर कार्टराइट से कहती हैं- ''तवायफ़ों के कोठे पर नवाब तौर तरीके सीखने आते रहे हैं बरसों से...''

निर्देशक ने जिस तरीके से कोठे को दिखाया है, साथ ही भंसाली के परफ़ेक्शन वाले नज़रिए ने नाटकीयता को और बेहतर बना दिया है.

सिरीज़ के सिनेमाटोग्राफ़र सुदीप चटर्जी, महेश लिमये और ह्युनत्सांग महापात्रा ने इसमें अहम योगदान दिया है. इसी के साथ कोरियोग्राफ़ी और किरदारों की परिपक्वता कविता की तरह नज़र आती है.

तवायफ़ों की ज़िंदगी पर व्यापक शोध कर चुकीं इतिहासकार नवीना जाफ़ा मानती हैं, ''तवायफ़ों की ज़िंदगी के बारे में बहुत कुछ गलत समझा गया है.''

उन्होंने तवायफ़ों की लालसा, इच्छाओं और उनके साथ किए गए दुर्भाग्यपूर्ण व्यवहार पर कई क़िताबें लिखी हैं.

वो इस बात से ख़ुश हैं कि उनके गुरु बिरजू महाराज के शिष्य विजयश्री चौधरी सिरीज़ में दो गानों की कोरियोग्राफ़र हैं.

''उस दौर के डांस के लिए जिस शैली और नज़ाकत की ज़रूरत होती है, उसे कला और संस्कृति में डूबे हुए गुरु ही समझ सकते हैं और भंसाली के पास अपना दृष्टिकोण है साथ ही वो इतिहास के महत्व को समझते हैं.''

सिंगर, एक्टर, डांसर और रिसर्च स्कॉलर रीता गांगुली ने भी तवायफ़ों पर गहन शोध किया है.

वो कहती हैं, ''बहुत कम लोग ही इस बात को जानते हैं, और जो जानते हैं वो मानते नहीं हैं कि तवायफ़ों की ज़िंदगी ने कैसे उन्हें वास्तविक नायिका बनाया है. लेकिन उनके बारे में बात नहीं होती है. इतिहास की किताबों में इन महिलाओं के बारे में बहुत कम जानकारी है, जिन महिलाओं का ज़िक्र कुछ रिपोर्ट में है भी तो उन्हें नज़रंदाज किया गया है. ऐसे में किसी रिसर्च स्कॉलर के लिए इनकी ज़िंदगी, शोध का विषय होती है.''

तवायफ़ों के बारे में कई मिथकों को तोड़ती है ये सिरीज़

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इन सशक्त महिलाओं में से कई ने हाई प्रोफ़ाइल, निर्दयी और प्रभुत्वशाली अंग्रेज़ अफ़सरों का मुक़ाबला किया. इन सबके बारे में कभी-कभार ही सकारात्मक तौर पर बात की जाती है.

दिलचस्प बात ये है कि, तवायफ़ों में से कई ने जहां अपनी सुंदर शारीरिक बनावट के दम पर ब्रिटिश अफ़सरों को आकर्षित किया, वहीं कुछ ऐसी भी थीं जिन्होंने दबाव के आगे घुटने नहीं टेके, अफ़सरों के ऐसे किसी भी अनुरोध को उन्होंने ठुकरा दिया.

इतिहास से ये भी पता चलता है कि कई बार जब राजाओं को पैसे की ज़रूरत होती थी तब इन महिलाओं ने युद्ध में आर्थिक तौर पर मदद भी की.

अंग्रेज़ों को पता था कि इन महिलाओं से चतुराई से निपटना है. अंग्रेज़ इन महिलाओं को दबाने की कोशिश करते थे लेकिन वो झुकती नहीं थीं, यही उनकी असली जीत थी.

जब अंग्रेज़ों ने लोगों के सामने तवायफ़ों के बारे में संदेह पैदा करना शुरू किया और इन्हें दबाने के लिए अपनी शक्ति का इस्तेमाल करने लगे तो कभी-कभी ये महिलाएं कमज़ोर दिखाई देती थीं लेकिन कभी हारती नहीं थीं.

अंग्रेज़ों के दोहरे मानदंड और पाखंड ने तवायफ़ों को कई बार गहरा आघात दिया. जब ब्रिटिश सेना के कई अधिकारियों ने संक्रामक यौन रोगों से परेशान होने की शिकायत की तो साल 1864 में अंग्रेज़ ''कॉन्टेजियस डिज़ीज़ एक्ट'' ले आए.

साल 1866 और 1869 में इसे फिर से बढ़ाया गया, 1886 में निरस्त किया गया. इस क़ानून को ऐसे पेश किया गया कि ये वेश्यावृत्ति को रेगुलेट करने की कोशिश है, जिससे ब्रिटिश आर्मी और नेवी में संक्रामक यौन रोग कम फैले.

भारतीय पुरुषों में यौन रोगों की घटनाएं ब्रिटिश पुरुषों के मुक़ाबले काफ़ी कम थीं. ऐसे में इस क़ानून का इस्तेमाल तवायफ़ों पर लगाम कसने के लिए किया गया, उनपर ये आरोप लगाए गए कि विदेशी पुरुषों में यौन रोगों के लिए ज़िम्मेदार ये महिलाएं ही हैं.

कुलीन तवायफ़ों से लेकर 'नाच गर्ल्स' तक

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धीरे-धीरे सिर्फ़ मुगल वंश ही नहीं, अवध के नवाब भी ख़त्म हो गए. पूरा युग ख़त्म हो गया और एक संस्कृति भी नष्ट हो गई. कथक डांसर और क्लासिकल सिंगर, 'नाच गर्ल्स' बन गईं.

इन तवायफ़ों के संरक्षक सिर्फ़ कुलीन वर्ग के लोग और अंग्रेज़ ही नहीं थे. तवायफ़ों से सीखने का मौक़ा कई भारतीय परिवारों के बच्चों को भी मिला.

गुरुग्राम में रहने वाले प्रकाशक बिक्रम ग्रेवा याद करते हैं कि जब उनका परिवार पाकिस्तान से भारत आया, उनके माता-पिता ने उन्हें सही शिक्षा देने के बारे में सोचा.

वो कहते हैं, ''मुझे शहर की मशहूर तवायफ़ के पास भेजा गया, 16 साल के एक युवा के तौर पर मैंने दिल्ली की दो सबसे निपुण तवायफ़ों से बहुत कुछ सीखा.''

इन तवायफ़ों ने समाज को दूसरी अहम चीज़ें भी दी हैं. इतिहास से भूला दी गईं ये महिलाएं एक समय में अपनी कला, व्यवहार और स्वायत्तता के लिए जानी जाती थीं. ये क्लासिकल डांसर और सिंगर, राजपरिवारों का मनोरंजन करती थीं.

देश के सबसे अहम दौर में इन महिलाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. आज़ादी की लड़ाई के दौर में इन महिलाओं ने स्वतंत्रता सेनानियों की पैसे से मदद की, इसके साथ ही उनके लिए प्रेरणा बनीं.

दुर्भाग्य से इन महिलाओं के सम्मान और शुचिता पर उठते सवालों की वजह से इनकी कहानियों और आवाज़ों को कहीं पीछे धकेल दिया गया.

कम जानकारी होने और आधे-अधूरे सच को तोड़-मरोड़कर पेश करने की वजह से ऐसा हुआ. नतीजा ये है कि इन महिलाओं की ज़िंदगी को ग़लत तरीके़ से पेश किया गया.

विडंबना ये है कि आज तवायफ़ शब्द का इस्तेमाल अपशब्द के तौर पर और देह व्यापार में शामिल महिला के लिए किया जाता है.

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