हीरामंडी: लाहौर के शाही मोहल्ले का यह नाम कैसे पड़ा?

हीरामंडी वेब सिरीज़ में मनीषा कोइराला, सोनाक्षी सिन्हा, अदिति राव हैदरी, ऋचा चड्ढा, शेखर सुमन, फरदीन ख़ान जैसे कई सितारों ने अलग-अलग किरदार अदा दिए हैं.

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इमेज कैप्शन, हीरामंडी वेब सिरीज़ में मनीषा कोइराला, सोनाक्षी सिन्हा, अदिति राव हैदरी, ऋचा चड्ढा, शेखर सुमन, फरदीन ख़ान जैसे कई सितारों ने अलग-अलग किरदार अदा दिए हैं.
    • Author, जयदीप वसंत
    • पदनाम, बीबीसी गुजराती के लिए

बॉलीवुड के मशहूर निर्देशक संजय लीला भंसाली की वेब सिरीज़ 'हीरामंडी- द डायमंड बाज़ार' नेटफ़्लिक्स पर रिलीज़ हो गई है.

फ़िल्म के शानदार सेट की बात हो या बेहतरीन कैमरा वर्क की, रिलीज़ के साथ ही आठ एपिसोड की ये सिरीज़ चर्चा में बनी हुई है. कुछ लोग इसकी तारीफ़ कर रहे हैं और कुछ लोग इसकी आलोचना.

इस वेब सिरीज़ हीरामंडी की कहानी भारत के विभाजन से पहले लाहौर में रहने वाली एक तवायफ़ मल्लिका जान की ज़िंदगी और उनके कोठे के ईर्द-गिर्द घूमती है.

दशकों पहले हीरामंडी नृत्य, संगीत और सभ्यता का केंद्र हुआ करती थी, लेकिन समय के साथ-साथ बदलाव आता गया और इस क्षेत्र को 'बदनामी का दाग' लग गया.

इतिहासकारों के मुताबिक़, इस इलाक़े का इतिहास 450 साल पुराना है जिसका विवरण बेहद दिलचस्प है.

हीरामंडी

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इमेज कैप्शन, अकबर के दौर में लाहौर शहर मुग़ल साम्राज्य का अहम शहर था

हीरामंडी अस्तित्व में कैसे आई?

बादशाह अकबर के दौर में लाहौर शहर सल्तनत का केंद्रीय शहर था और उस समय हीरामंडी इलाक़े को शाही मोहल्ला कहा जाता था.

आज भी लाहौर के कुछ इलाक़े जैसे हैदरी गली, टबी गली, हीरामंडी और क़िला रोड पर स्थित नॉवल्टी चौक 'शाही मोहल्ले' के नाम से ही मशहूर हैं.

बादशाही दौर में जिस इलाक़े में शाही परिवार रहते थे, उसी के इर्द गिर्द उनके नौकर और अन्य कर्मचारी रहते थे, उस इलाक़े को 'शाही मोहल्ला' कहा जाता था.

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आज भी जो लोग ऑटो रिक्शा या टैक्सी के ज़रिए उन इलाक़ों तक जाते हैं वो उसे 'शाही मोहल्ला' ही कहते हैं. वहां मौजूद बहुत से 'कोठे' मुग़ल काल में ही बने थे और वो उस क्षेत्र का स्वर्ण युग था.

स्टेज निर्देशक प्रोफ़ेसर त्रिपुरारी शर्मा बताती हैं कि मुग़ल काल में उन इलाक़ों में सत्ता से संबंध रखने वाले अमीर लोग और उनके परिवार रहते थे. प्रोफ़ेसर शर्मा बोलीं कि ख़ुशियों के मौक़े पर उनके प्रोग्राम शाही महलों में होते थे.

वह कहती हैं, "आज कल 'कोठा' शब्द की जिस तरह से व्याख्या की जाती है, वह सही नहीं है. एक समय था जब कोठा कला का केंद्र था जहां सिर्फ़ गाना, संगीत और नृत्य होता था."

"कोठों से जुड़ी महिलाएं अपने आप को कलाकार या अभिनेत्री कहती थीं, वहां बेहतरीन लेख लिखे जाते थे और शायरी होती थी. कोठों पर बहुत उच्च स्तर की चर्चा होती थी, लोग वहां बातचीत करने का हुनर सीखने के लिए भी जाते थे."

प्रोफ़ेसर त्रिपुरारी शर्मा बोलीं, "वहां जाकर लोग ये सीखते थे कि समाज में बातचीत और तर्क कैसे किया जाए."

हालांकि 16वीं सदी के अंत तक लाहौर मुग़लिया सल्तनत का केंद्र नहीं रहा था लेकिन सत्ता का प्रभाव वहां बना रहा.

शाही मोहल्ला कब दूसरी वजहों से चर्चा में आया

करण जौहर की फ़िल्म 'कलंक' में 'हसनआबाद' नाम का एक शहर दिखाया गया है, ज़ाहिरी तौर पर ऐसा लगता है कि उसकी प्रेरणा हीरामंडी के इलाक़े से ही ली गई है.

मुग़लों के पतन के साथ साथ भारतीय उप-महाद्वीप में मराठे मज़बूत हो रहे थे और वो अहमद शाह अब्दाली के हमलों का सामना कर रहे थे.

अब्दाली ने पंजाब, उत्तरी भारत और राजपूताना पर हमले किए और उनकी सेना ने शुरुआत में अपनी छावनी धोबी मंडी और हीरामंडी के क़रीब मोहल्ला दारा शिकोह के इलाक़े में स्थापित की.

वहां बसी तवायफ़ों का संपर्क शाही परिवार के सदस्यों से भी रहता था. अब्दाली के हमले के बाद पैदा होने वाली स्थिति की वजह से ग़रीबी बढ़ी और इस इलाक़े में पैसों के बदले में जिस्म फ़रोशी का कारोबार बढ़ने लगा और वहां कोठों पर रहने वाली महिलाएं जिस्म फ़रोशी का पेशा चुनने पर मजबूर हो गईं.

इस स्थिति को देखते हुए ग़रीबी से जूझ रही महिलाएं इस पेशे में रोज़गार के लिए शामिल होने लगीं. उस दौर में मुग़ल गवर्नर अब्दाली के हमलों को रोकने की कोशिशें कर रहे थे और अलग अलग गिरोहों, सेनाओं में टकराव की वजह से पैदा होने वाली अफ़रातफ़री की वजह से यह इलाक़ा भी प्रभावित हुआ.

इस उथल पुथल के दौर के बाद साल 1799 में लाहौर पर महाराजा रणजीत सिंह के शासन की स्थापना हुई. रणजीत सिंह के दौर में यह इलाक़ा ज़्यादा परेशानी में नहीं पड़ा.

उसी दौर में महाराजा रणजीत सिंह के दीवान हीरा सिंह के नाम पर शाही मोहल्ले का नाम हीरामंडी पड़ा.

महाराजा रणजीत सिंह के दौर में लाहौर एक बार फिर एक बड़े केंद्र के तौर पर उभरा और इसकी शाही रौनक फिर से लौट आई और यह सिलसिला उस समय तक जारी रहा जब तक मार्च 1849 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने लाहौर पर क़ब्ज़ा नहीं कर लिया.

हीरामंडी

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इमेज कैप्शन, महाराजा रणजीत सिंह के दौर में लाहौर एक बार फिर एक बड़े केंद्र के तौर पर उभरा

ब्रिटिश दौर और हीरामंडी

प्रोफ़ेसर शर्मा के अनुसार, जब अंग्रेज़ सत्ता में आए तो उन्होंने उन सभी चीज़ों को बंद करना शुरू कर दिया जो बग़ावत की वजह बन सकती थीं और तवायफ़ों के लिए भी लाइसेंस अनिवार्य कर दिया गया.

प्रोफ़ेसर शर्मा का कहना है कि जब कोठों के लिए लाइसेंस वाला सिस्टम शुरू हुआ तो पुलिस ने क़ानून लागू करने के लिए उन जगहों पर छापेमारी शुरू कर दी.

प्रोफ़ेसर शर्मा बोलीं, ''ब्रिटिश राज के दौरान तफ़्तीश के बहाने किसी भी समय पुलिस वहां छापा मारने के लिए पहुंच जाती थी.''

वो कहती हैं, ''यह मामूली बन गया था. इस स्थिति को देखते हुए लोगों ने यहां आना-जाना छोड़ दिया और धीरे-धीरे इस जगह की धारणा बदलने लगी.''

प्रोफ़ेसर शर्मा के मुताबिक़, इस बदलाव की वजह से हमारे सामाजिक जीवन के एक हिस्से यानी कोठों को इज़्ज़त की निगाह से देखना इतिहास का क़िस्सा बनने लगा और आख़िरकार यह इलाक़ा केवल जिस्म फ़रोशी के अड्डों के तौर पर बदनाम हुआ.

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इमेज कैप्शन, लाहौर का पुराना क्षेत्र

फिल्मों में हीरामंडी

दादा साहब फाल्के ने पहली हिंदुस्तानी फ़िल्म 1913 में बनाई.

शुरुआती सालों में, महिलाएं फिल्मों में अभिनय नहीं करती थीं और पुरुष ही महिलाओं का रूप धारण कर फिल्मों में महिलाओं का किरदार निभाते थे.

अविभाजित भारत और पाकिस्तान फ़िल्म इंडस्ट्री में फिल्मों में काम करने वाले कई अभिनेताओं की जड़ें हीरामंडी में हैं.

भारत और पाकिस्तान के विभाजन के बाद वहां रहने वाले बहुत से लोग भारत आए और यहां फ़िल्म इंडस्ट्री और अन्य क्षेत्रों से जुड़कर अपनी ज़िंदगी गुजारने लगे.

पाकिस्तान की एक लेखिका फ़ौजिया सईद ने भी अपनी किताब में हीरामंडी के बारे में लिखा है.

उन्होंने अपनी किताब 'टैबू: दि हिडन कल्चर ऑफ़ ए रेड लाइट एरिया' लिखने के लिए 8 साल तक हीरामंडी पर शोध किया.

फौज़िया सईद यहां रहने वाली महिलाओं और समुदाय के अन्य लोगों की ज़िंदगी के बहुत से पहलुओं को सामने लाईं.

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