ब्रिटेन में शोहरत पाने की चाह में लगे एशियाई कलाकारों की राह में कितने रोड़े

परफार्म करती एक एशियाई कलाकार

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    • Author, यास्मीन राऊफ
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़

आप टिकटॉक पर वीडियो देखें या सप्ताहांत में रात में घर से बाहर निकलें तो आप को लगेगा कि दक्षिण एशियाई संगीत फैल रहा है. लेकिन इतना लोकप्रिय होने के बाद भी दक्षिण एशियाई संगीत मुख्यधारा में अपना वजूद बनाने के लिए जूझ रहा है.

पश्चिमी लंदन के एक क्लब में शनिवार की रात दक्षिण एशियाई डीजे साउंड, संस्कृतियों और तालों को एक साथ मिला रहे हैं. इस दौरान एक युवा जोर से चिल्लाता है, "यह सिर्फ संगीत नहीं है, यह मेरी संस्कृति और पहचान का उत्सव है."

लोग गानों के ग्लोबल चार्ट के टॉपर्स, मशहूर हिंदी फिल्मी गानों, भांगड़ा और कई अन्य साउंड के रीमिक्स पर नाचते हैं. डीजे डी लिश कहती हैं कि वो दक्षिण एशियाई संगीत को सीमा से आगे बढ़ा रही हैं.

मशहूर होने के लिए संघर्ष कर रहे कलाकार

जे सीन का कहना है कि लोग उनको देखकर उनके संगीत के बारे में धारणा बना लेते हैं

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इमेज कैप्शन, जे सीन का कहना है कि लोग उनको देखकर उनके संगीत के बारे में धारणा बना लेते हैं

25 साल की इस डीजे का असली नाम अलीशा है, वे उन दक्षिण एशियाई संगीतकारों में शामिल हैं, जो अपने संगीत को मुख्यधारा में लाना चाह रहे हैं.

एशियाई कलाकार चार्ट में जगह बनाने की चुनौती से जूझ रहे हैं. ऐसा तब हो रहा है, जब 10 फीसदी ब्रिटिश आबादी एशियाई है.

वहीं ग्राइम जैसी संगीत की दूसरी उपसंस्कृतियां अपने चरम पर हैं, ऐसा लगता है कि एशिया के प्रभाव वाला संगीत कहीं पीछे छूट गया है.

पंजाबी एमसी ने 2002 में अपना हिट भांगड़ा 'मुंडियां तो बच के...' रिलीज किया था. उनके इस एलबम की दुनिया भर में एक करोड़ प्रतियां बिकीं थीं. इसके बाद वो अब तक सबसे अधिक बिकने वाले एकल एलबम में से एक बन गया.

अब करीब दो दशक बाद भी समस्या जस की तस है, केवल कुछ ब्रिटिश एशियाई कलाकार ही टॉप 40 में शामिल हैं. एशियाई प्रभाव वाले कुछ गाने ही चार्ट में जगह बना पाए हैं.

गायक और गीतकार जे सीन ने बीबीसी से कहा कि जब उन्होंने 2000 के दशक की शुरुआत में परफार्म करना शुरू किया था तो लोगों में भ्रम की स्थिति थी.

वो बताते हैं, "वे एक भूरे रंग के बच्चे को देखते थे. वे अनुमान लगा लेते थे कि मैं किस तरह का संगीत बजाने वाला हूं, मेरे मुंह खोलने से पहले ही मेरे बारे में जज कर लिया जाएगा.''

अपनी 2009 की हिट डाउन के लिए मशहूर ब्रिटिश-एशियाई आर एंड बी कलाकार ने कहा कि एक लेबल (रिकॉर्ड और सीडी बनाने और बेचने वाली कंपनी) पर हस्ताक्षर करने के बाद भी, उनसे बेवकूफाना सवाल पूछे जाते थे, क्योंकि दक्षिण एशियाई संस्कृति को लेकर बहुत सारी अज्ञानता थी. लेबल निर्माताओं को हमेशा इसकी जानकारी नहीं होती थी.

क्या कलाकारों से रंगभेद भी होता है

नॉटी बॉय पिछले 10 साल से अधिक समय से संगीत की दुनिया में हैं
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एमली सैंडे और सैम स्मिथ के साथ काम कर चुके संगीतकार नॉटी बॉय ने बीबीसी से कहा, उन्हें भी ऐसा ही अनुभव हुआ था, उन्हें भी एक खांचे में डाल दिया गया था क्योंकि मेरा रंग भूरा था और मैं मुसलमान था.

नॉटी बॉय ने 'ला ला ला...' के साथ यूके में नंबर एक हिट और उनके पांच गानों ने टॉप-10 में जगह बनाई थी. उनका कहना है कि मुख्यधारा में शामिल होने और चार्टिंग में शामिल होने की संभावनाएं बढ़ाने के लिए साउंड को डाईल्यूट करने को कहा गया. उनका कहना है कि मैंने इसका विरोध किया. उन्होंने कहा कि अपने संगीत को लेकर उन्हें कभी कोई पछतावा नहीं रहा.

इन दोनों कलाकारों के मशहूर नाम उनके असली नाम से अलग हैं. उनका कहना है कि नाम छिपाना अपनी विरासत छिपाने के लिए नहीं है.

नॉटी बॉय कहते हैं, "मैं अपनी पहचान के जरिए खुद को साबित नहीं करना चाहता था, इसलिए ध्यान आकर्षित न करने के लिए मैंने इस नाम का इस्तेमाल किया. मैं चाहता हूं कि दुनिया बिना किसी निर्णय के मेरा संगीत सुने."

नॉटी बॉय और जे सीन ने उभरती हुई दक्षिण एशियाई प्रतिभाओं को मंच देने के लिए अपना खुद का एक रिकॉर्ड लेबल बनाया है.

सीन कहते हैं, "जब तक मैं और दक्षिण एशियाई कलाकारों को मुख्यधारा के मंचों पर बजते हुए नहीं देख लेता, मैं आराम से नहीं बैठूंगा. अगर स्पेनिश संगीत और एफ्रोबीट्स ब्रितानी दर्शकों के लिए मुख्यधारा बन सकते हैं तो हमारा संगीत भी ऐसा कर सकता है."

मीडिया ने एशियाई कलाकारों से मूंदीं आंखें

एक एशियाई कलाकार

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जैसे-जैसे दक्षिण एशियाई संगीत लोकप्रिय हो रहा है, रिकॉर्ड लेबल इसका फायदा उठा रहे हैं. अब दक्षिण एशियाई कलाकारों को साइन करने के लिए अधिक प्रतिबद्धता दिखाई जा रही है.

विशाल पटेल 91+ (भारत का आईएसडी कोड) के सह-संस्थापक हैं. यह लेबल खासतौर पर दक्षिण एशियाई कलाकारों को साइन करता है. विशाल कहते हैं कि दक्षिण एशियाई कलाकार बुनियादी ढांचे की कमी की वजह से मुख्यधारा में आने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

वो कहते हैं कि मीडिया में दक्षिण एशियाई मूल के ऐसे लोग कम हैं, इस संगीत को आगे बढ़ाने में मदद कर सकें. अधिकांश मीडिया वाले हमारी संस्कृति को नहीं समझते हैं, इसलिए वे इसे अनदेखा कर देते हैं.

वो कहते हैं, "काले ब्रिटिश कलाकारों के लिए भी एक बार ऐसा ही था, लेकिन वे एक साथ आने और आगे बढ़ने में सक्षम थे. यह लेबल, मीडिया और स्ट्रीमिंग सेवाएं ही हैं जिन्होंने ग्रिम संगीत को बेहतर बनाया है. हमें इस क्षेत्र में ऐसे लोगों की जरूरत है जो दक्षिण एशियाई संगीतकारों को आगे बढ़ाएं और चैंपियन बनाएं."

जैसमीन तखर बीबीसी की प्रजेंटर हैं, उन्होंने एशियन नेटवर्क के अपने इंट्रोड्यूसिंग शो में 500 से अधिक दक्षिण एशियाई कलाकारों को मंच दिया है. उनका मानना ​​है कि दक्षिण एशियाई कलाकार जिस तरह का संगीत बनाते हैं, उसके बारे में लोगों में अज्ञानता है.

वो कहती हैं, "प्रतिभाएं वहां निश्चित रूप से हैं, लेकिन आपने कितनी बार दक्षिण एशियाई कलाकारों को रेडियो पर या स्पॉटिफ़ाई पर सुना है?

वो कहती हैं उन्होंने सोशल मीडिया पर लाखों फॉलोअर्स वालों को देखा है, लेकिन मुख्यधारा में उनकी उपस्थिति बमुश्किल ही है क्योंकि मीडिया उनकी तरफ से आंखें मूंद लेता है.

एशिया की नई आवाजें

गर्ल्स लाइक की यू की सदस्य

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लड़कियों के एक बैंड गर्ल्स लाइक यू ने सोशल मीडिया के जरिए शोहरत पाई है. इस बैंड को विशाल के रिकॉर्ड लेबल ने इंस्टाग्राम पर खोजा था.

20 से 25 साल की चार लड़कियों के इस बैंड के सभी कलाकार दक्षिण एशियाई हैं. यह बैंड कई बार इंस्टाग्राम और टिकटॉक पर वायरल हो चुका है.

हाल ही में इस बैंड के बॉलीवुड के गाने 'ये क्या हुआ...' के रीमिक्स को 60 लाख व्यूज मिले हैं.

इस बैंड की एक सदस्य जया बताती हैं, ''हमें भांगड़ा को पॉप संगीत के साथ पेश करना पसंद है. यह बॉलीवुड और बेयोंसे को मिलाने जैसा है."

पश्चिमी संगीत में बॉलीवुड संगीत का कोई हिस्सा लेना कोई नई बात नहीं है, कई मशहूर पॉप गीतों में भारतीय फिल्मों के अंश लिए गए हैं.

ब्रिटनी स्पीयर्स की टॉक्सिक में लता मंगेशकर की साल 1981 के एक हिंदी गाने का एक टुकड़ा शामिल था, जबकि ब्लैक आइड पीज़ में आशा भोसले के एक गाने को लिया गया था.

इस बैंड की एक अन्य सदस्य यास्मीन बताती हैं कि उनका ग्रुप ब्रिटिश एशियाई महिला होने के स्टीरियोटाइप को तोड़ रहा है. सोशल मीडिया पर इस ग्रुप के अंतरराष्ट्रीय फालोवर्स हैं.

इस ग्रुप को उम्मीद है कि सोशल मीडिया पर अपनी सफलता को वे चार्टिंग के टॉप में बदलने में सफल होंगे. उन्हें इस बात का विश्वास है कि आने वाला समय दक्षिण एशियाई कलाकारों का है.

कोचेला 2024 की, उसके दक्षिण एशियाई प्रतिनिधित्व के लिए सराहना की जा रही है. इसमें मर्करी पुरस्कार के लिए नामांकित जॉय क्रुक्स हैं, जो दक्षिण लंदन के रहने वाले हैं. वे आधे बांग्लादेशी हैं. वो इसमें परफार्म कर रहे हैं.

दलजीत दोसांज

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उन्होंने कुछ समय पहले बीबीसी को बताया था कि अल्पसंख्यक समूहों के संगीतकारों को एक मंच दिया जाना बहुत जरूरी है.

गायक दिलजीत दोसांझ, बॉलीवुड फिल्मों में पगड़ी पहनकर काम करने वाले पहले अभिनेता है. वो लंदन में O2 एरिना में परफार्म करने वाले पहले पंजाबी कलाकार होंगे.

हालांकि, जब दक्षिण एशियाई संगीत की बढ़ती हुई लोकप्रियता दिखाने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं, ऐसे समय में नॉटी बॉय इस बात से सावधान है कि संगीत की दुनिया में प्रतिबद्धता को एक चरण के रूप में नहीं देखा जाता है.

वो कहते हैं, "मैं नहीं चाहता कि लेबल दक्षिण एशियाई कलाकारों पर पैसे फेंकें क्योंकि अभी भूरा होना अच्छा है."

वो कहते हैं, "मैं एक मिनट के लिए नहीं, बल्कि हमेशा के लिए भूरा हो गया हूं, इसलिए इसे देखना ताजगी देने वाला है, लेकिन हमें परिदृश्य को बदलने के लिए दीर्घकालिक प्रतिबद्धता की जरूरत है."

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