पंकज त्रिपाठी की गुमनामी से शोहरत तक की अटल अभिनय यात्रा

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- Author, वंदना
- पदनाम, सीनियर न्यूज़ एडिटर, एशिया डिजिटल
2003 में एक कन्नड़ फ़िल्म छटांक भर का एक रोल, जो क्रेडिट लिस्ट में भी दर्ज नहीं है, पंकज त्रिपाठी की मुश्किल शुरुआत का गवाह है.
इस अनाम रोल से लेकर पंकज त्रिपाठी ने आज वहाँ तक का सफ़र तय किया है जहाँ हर डायरेक्टर-प्रोड्यूसर उन्हें कास्ट करना चाहता है.
फिर वो 'मिर्ज़ापुर' के कालीन भैया हों, 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर' के सुल्तान क़ुरैशी या 'फ़ुकरे' के पंडित जी. एक्टिंग ही नहीं हिंदी भाषा पर उनकी पकड़ के भी लोग फ़ैन हैं.
इंस्टाग्राम पर शायद वो इकलौते एक्टर होंगे जिनके बायो में हिंदी में लिखा है- 'अभिनेता, हिंदी सिनेमा'.
पंकज त्रिपाठी दो नेशनल अवॉर्ड जीत चुके हैं और बड़े-बड़े सिनेमा हॉल में उनकी फ़िल्में लगती हैं. लेकिन जिन्होंने ख़ुद पहली बार सिनेमा हॉल में फ़िल्म तब देखी जब उनके गाँव के पास पहला थिएटर 'बसंत टॉकीज़' खुला.
उनके पिता पूजा करवाते थे तो थिएटर के पूजा समारोह में उन्हें भी ले गए जहाँ 'जय संतोषी माँ' दिखाई जाने वाली थी.
ग़ैर-पारंपरिक हीरो की बॉक्स ऑफ़िस सफलता

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पंकज की नई फ़िल्म है ‘मैं अटल हूँ’ जो अटल बिहारी वाजपेयी पर बनी है.
यूँ तो पंकज त्रिपाठी का सफ़र पटना, दिल्ली और मुंबई से होकर गुज़रता है लेकिन ये दरअसल शुरु होता है बिहार के गाँव बेलसंड से.
वही गाँव जहाँ बचपन में वो अपने छोटे से घर की खिड़की पर बैठे अपने सामने दुनिया को गुज़रते देखते थे- गाँव की सूखी नदी, उस नदी में भरते पानी की कल्पना और फिर बाढ़ में वाकई उफ़नती नदी का नज़ारा.
बचपन से ही शायद पंकज त्रिपाठी कल्पना और किस्से कहानियों के धनी रहे होंगे जिसने उन्हें आज एक सफल और मशहूर कलाकार बनाया है.
एक अनकन्वेंशनल हीरो की बॉक्स ऑफ़िस पर इस सफलता को कैसे देखा जाए?
बीबीसी सहयोगी मधु पाल से बातचीत में फ़िल्म कारोबार विशेषज्ञ गिरिश वानखेड़े ने बताया, “छोटे रोल करते हुए पंकज त्रिपाठी ने अपनी जगह बनाई. फुकरे की कामयाबी में उनका बड़ा हाथ था. ओएमजी-2 की कॉमर्शियल सफलता में उनका ही सबसे बड़ा योगदान है."
"उन्हें नेशनल अवॉर्ड भी मिला है. यानी नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा से एक निकला ये एक्टर बॉक्स ऑफ़िस और ऑफ़ बीट सिनेमा में संतुलन बनाने में सफल रहा है.”
“बड़े सितारों के समकक्ष खड़े होकर अपना रुतबा वो दिखा चुके हैं. ओटीटी पर उनकी कमाल की पकड़ है. ये पूरा गठजोड़ ज़बरदस्त है."
"हिंदी सिनेमा को इस तरह के ग़ैर-पारंपरिक हीरो की ज़रूरत थी जो व्यवसायिक और दूसरी तरह की फ़िल्मों में फिट हो जाए जैसे ओम पुरी. ये स्पेस पंकज त्रिपाठी बख़ूबी पूरी कर रहे हैं.”
छात्र राजनीति से लेकर होटल की नौकरी तक
पंकज 16 अक्तूबर 2004 में बोरिया बिस्तर बांधकर मुंबई पहुंचे थे.
ये इत्तेफ़ाक ही था कि 2023 में जब वो करियर के 20वें साल का आगाज़ कर रहे थे तो उसके अगले ही दिन 17 अक्तूबर को उन्होंने फ़िल्म 'मिमी' में टैक्सी ड्राइवर भानु के रोल के लिए अपना दूसरा राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार जीता.
पंकज के फ़ैन्स को 2004 में उनकी पहली हिंदी फ़िल्म 'रन' याद होगी जिसमें उनको क्रेडिट तक नहीं मिला था और वो विजय राज़ के साथ बहुत कम देर के लिए नज़र आते हैं.
और तो और उनकी आवाज़ भी किसी और से डब करवाई गई थी.
पंकज ज़िंदगी में कई तुर्जबों से गुज़रे हैं और शायद यही उनकी अदाकारी को काफ़ी सहज बनाता है.
वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार नम्रता जोशी कहती हैं, “पंकज त्रिपाठी की सबसे बड़ी ख़ूबी है जिस सरलता और सहजता से वो क़िरदार के साथ एक हो जाते हैं, उनमें एक अनोखी स्थिरता है. वो कभी भागते हुए नज़र नहीं आते. वो क़िरदार के साथ उस लम्हे में जीते हुए नज़र आते हैं. एक बार उन्होंने मुझसे कहा था कि मैं इत्मीनान वाला आदमी हूँ. वो आम आदमी के अभिनेता हैं. यही सहजता उन्हें पारिभाषित करती है.”
उनकी ज़िंदगी पर नज़र डालें तो गाँव में वो एक समारोह में पंडित का काम कर चुके हैं भले वो एक दिन का काम था.
पटना में फिर वो लड़का मेडिकल की पढ़ाई करने आता है लेकिन छात्र राजनीति में चला जाता है.
और फिर वही छात्र पटना में दो साल तक एक होटल में काम करता है और हर तरह के कॉन्टिनेंटल व्यंजन बनाने में महारत हासिल करता है.
पंकज को थिएटर से मिली वाहवाही

ज़िंदगी में असल ट्विस्ट तब आता है जब पटना में रहते हुए उन्हें थिएटर का चस्का लगा.
पंकज त्रिपाठी के चाहने वाले पटना के कालिदास रंगालय का शुक्रिया अदा कर सकते हैं या फिर लक्ष्मीनारायण लाल के नाटक 'अंधा कुँआ' का जिसने पंकज त्रिपाठी पर गहरा असर डाला.
पहली बार उन्हें भीष्म साहनी की कहानी पर बने नाटक में चोर का रोल मिला जिसकी स्थानीय प्रेस में काफ़ी वाहवाही हुई.
'ओएमजी-2' में एक छोटे से कस्बे में बच्चों को सेक्स एजुकेशन देने के लिए कोर्ट में केस लड़ता कांति शरण मुदगल हो, फ़िल्म 'न्यूटन' का नरम-गरम मिजाज़ वाला असिस्टेंट कमांडेंट आत्मा सिंह हो, फ़िल्म 'स्त्री' में लाइब्रेरी वाले रुद्र भैया हों, अपनी ही नवजात बच्ची को ज़िंदा गाड़ देने वाला 'गुड़गाँव' का कहरी सिंह हो या 'मसान' का मामूली सा रेल कर्मचारी साध्या.. पंकज त्रिपाठी ने क़िरदारों की एक लंबी चौड़ी रेंज निभाई है.
मिसाल के तौर पर फ़िल्म 'न्यूटन' का वो सीन देखिए जहाँ सीआरपीएफ़ कमाडेंट बने पंकज त्रिपाठी बिना किसी बड़े डायलॉग बाज़ी के, सहजता से एक अति उत्साही नौसिखिए चुनाव अधिकारी (राज कुमार राव) को नक्सली इलाक़े में काम करने का जोखिम समझाते हैं.
और कहते हैं - "नागालैंड की राजधानी जानते हो? कश्मीर की? गए हो कभी? मैं गया हूँ. पकड़िए राइफ़ल. भारी है न? ये देश का भार है, हमारे कंधे पर."
कुकिंग से सीखे एक्टिंग के गुर

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पंकज त्रिपाठी की ‘बिना कोशिश वाली’ एक्टिंग की एक मिसाल फ़िल्म 'मसान' में मिलती है जहाँ वो अपनी सह कर्मचारी देवी (ऋचा चढ्ढा) को खीर देते हैं और कहते हैं- “जो खीर नहीं खाया, उसने मनुष्य योनि में पैदा होने का पूर्णतः फ़ायदा नहीं उठाया.”
इस पर जब ऋचा चड्ढा पूछती हैं कि क्या आप अकेले रहते हैं? तो पंकज बड़ी सादगी से कहते हैं- “नहीं पिताजी के साथ रहते हैं, पिताजी अकेले रहते हैं. मतलब दिन में अकेले रहते हैं.”
एक्टिंग की प्रक्रिया को हाव-भाव और इमोशन के ज़रिए नहीं बल्कि खाने के ज़रिए समझाने वाले शायद वो पहले एक्टर होंगे.
अपने इंटरव्यू में वो कई बार कहते हैं, “बस मात्रा का खेल है. परफ़ेक्ट डिश बनाने के लिए आपको सही मात्रा में नमक और दूसरी सामग्री चाहिए ताकि खान न ज़्यादा पका हो न कम. इसी तरह एक्टिंग में भी आपको सही मात्रा में इमोशन डालना होता है ताकि न वो ओवरएक्टिंग लगे न अंडरएक्टिंग.”
ये शायद उनके अंदर के ट्रेंड ख़ानसामे का असर है.
एक एक्टर के तौर पर अपनी सफलता का श्रेय पंकज किताबों को भी देते रहे हैं. जब पंकज अपनी पत्नी के साथ पटना से बॉम्बे आए थे तो अपने बहुत सारी किताबें लेकर सपनों के शहर में आए थे.
पंकज उन अभिनेताओं में से हैं जिनकी इंटरव्यू, बातों में लेखकों, किताबों, कविताओं का ज़िक्र लगातार होता रहता है, जो धर्मवीर भारती, रेणु, नागार्जुन, राग दरबारी और कबीर के दोहों पर भी बात कर सकते हैं.

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पंकज त्रिपाठी और स्टीरियोटाइप
सफलता मिलने के बाद एक बड़ी बाधा होती है स्टीरियोटाइप हो जाना. कई आलोचक मानते हैं कि पंकज त्रिपाठी कभी कभी इस चक्र में फँसते नज़र आते हैं.
गिरिश वानखेड़े कहते हैं, “स्टीरियोटाइप होने की बात को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. कुछ फ़ैंस को लगता है कि वो हर क़िरदार को एक ही तरीके से करते हैं. वो हर किरदार में एक ‘पंकज त्रिपाठी’ लेकर आते हैं, जिस वजह से कई बार वो किरदार नहीं लगता, वो पंकज त्रिपाठी हो जाता है. उनकी कॉमिक टाइमिंग अच्छी है लेकिन पंकज त्रिपाठी अगर भाई का , बाहुबली का, गैंग्सटर का रोल कर रहे हैं तो रोल के हिसाब से उनका लाउड होना दिखाई नहीं देता. “
“एक ख़ास इमेज में क़ैद हो गए हैं. इसे तोड़ने के लिए उन्हें ख़ुद को चुनौती देनी चाहिए , ऐसे रोल करने होंगे जो उन्होंने कभी नहीं किए. एक्शन वाला रोल करें, अर्धसत्य में ओम पुरी जैसे क़िरदारों की उड़ान लेनी पड़ेगी”. पारिवारिक रोल है तो बलराज साहनी को देखें. कम्फ़र्ट ज़ोन को तोड़ना, बॉडी लैंग्वेज और डिक्शन में बदलाव ..ये सब उनके लिए मददगार होगा. पंकज त्रिपाठी जैसे होनहार एक्टर को ये करने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगेगा.”
वहीं फ़िल्म समीक्षक नम्रता जोशी की राय थोड़ी अलग है. वो कहती हैं, “हर एक्टर का काम करने का अपना स्टाइल होता है जिसे लोग दोहराव समझ लेते हैं. लेकिन ये किसी एक्टर को कम प्रतिभावान नहीं बना देता. इसका वास्ता क़िरदार गढ़ने वाले निर्देशकों से ज़्यादा है. जैसे अमर कौशिक स्त्री में उनकी कॉमिक टाइमिंग को बाहर लेकर आए. गुड़गाँव के क़िरदार और न्यूटन वाले रोल में ग्रे शेड था जो पंकज त्रिपाठी ने बख़ूबी निभाया.”
वहीं इस मुद्दे पर पंकजी त्रिपाठी ने बीबीसी के मेरी सहयोगी सर्वप्रिया सांगवान को दिए इंटरव्यू में कहा था, “मुझे नहीं लगता कि मैंने खुद को स्टीरियोटाइप किया है. बीच में ऐसा हुआ था जब मुझे लगा था कि लोग मुझे खांचे में ढाल रहे हैं. इसलिए सिनेमा मैं अपने रिदम को ब्रेक करता रहता हूँ. और असल जीवन में भी रिदम को ब्रेक करता हूँ.”
जब हटा दिया गया था रोल

वैसे सफलता की बात करें तो इस मकाम तक पहुँचने में पंकज को काफ़ी समय लगा.. एक्टिंग शुरु करने के करीब 9 साल बाद उन्हें नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा में एडमिशन मिला.
दो बार तो एनएसडी परीक्षा में विफल रहे और मुंबई आने के कोई आठ साल बाद फ़िल्मों में ब्रेक मिला. इस बीच वो टीवी सीरियल करते रहे. ओमकारा, रावण, मिथ्या जैसी फ़िल्मों में छोटे रोल करते रहे.
विज्ञापन भी किए. टाटा टी का जागो रे वाला विज्ञपान याद होगा जहाँ पंकज त्रिपाठी राजनेता का रोल करते हैं.
उनके कुछ रोल तो ऐसे थे जिसके लिए शूट किया लेकिन वो फ़िल्म से हटा दिए गए थे. मसलन ह्रितिक के साथ फ़िल्म 'लक्ष्य'. हालांकि बाद में ह्रितिक के साथ पंकज ने 'अग्निपथ' और 'सुपर 30' में काम किया.
कई सालों के इंतज़ार के बाद 2012 में 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर' में उन्हें सुल्तान क़ुरैशी से पहचान मिली.
उस रोल के ऑडिशिन में भी पहले अनुराग कश्यप ने उन्हें रिजेक्ट कर दिया था. वासेपुर से फ़िल्मों का सिलसिला चल निकला तो पिछले कुछ सालों में वो ओटीटी के सरताज भी कहलाने लगे हैं चाहे वो 'सेक्रेड गेम्स', 'क्रिमिनल जस्टिस' हो या फिर 'मिर्ज़ापुर.'

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उनकी एक फ़िल्म है 'माज़ी' जो 2013 में आई थी. इसमें वो एक क़ातिल और बलात्कारी का रोल करते हैं जो पुलिस स्टेशन में बैठकर बहुत ही ठंडे तरीके से बता रहा है कि उसने कितनी निर्ममता से क़त्ल किया. बहुत बेशर्मी से पुलिस वालों को बोलता है- “मेरी दो शर्त है, बयान के बाद शराब पिलाओगे और सरकारी गाड़ी में सफर नहीं कराओगे.”
ये रोल मात्र 15 मिनट का है. और अचानक आप सोचते हैं कि क्या वो वाकई पंकज त्रिपाठी हैं.
दर्शक को चौंका देने की यही काबिलियत एक एक्टर की ताक़त होती है. सफलता की सीढ़ियों के बीच पंकज त्रिपाठी के फ़ैन्स को उनसे यही उम्मीद है.
निजी ज़िंदगी की बात करें तो संघर्ष के दिनों में पंकज त्रिपाठी की पत्नी मृदुला ने उनका साथ दिया जब वो टीचर का काम करती थीं और पंकज अपनी किस्मत आज़मा रहे थे.
एक ऐसा शख़्स जिसकी यही तमन्ना था कि वो प्रेम विवाह ही करेगा, ऐसे में क्राइम, कॉमेडी, ड्रामा से इतर एक सुंदर लव स्टोरी में उन्हें देखना दिलचस्प रहेगा. ये शायद एक परफ़ेक्ट लव स्टोरी होगी.
पंकज त्रिपाठी के प्रमुख फ़िल्में:- 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर', 'न्यूटन', 'मिमी', 'फुकरे', 'ओएमजी-2'
पंकज त्रिपाठी की वेब सिरीज़:-'मिर्ज़ापुर', 'सेक्रेड गेम्स', 'क्रिमिनल जस्टिस', 'गुड़गांव'
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