कॉफ़ी विद करण: दीपिका पादुकोण की सच बयानी और बेनक़ाब हुआ 'ट्रोल समाज' का डर- ब्लॉग

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- Author, नासिरुद्दीन
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
फ़िल्म निर्देशक करण जौहर के शो ‘कॉफ़ी विद करण’ में अपने पति रणवीर सिंह के साथ शामिल हुईं दीपिका पादुकोण ने अपने दिल की वे बातें साझा कीं, जो अब तक सार्वजनिक नहीं की थी.
दरअसल एक स्त्री के तौर पर दीपिका ने वह सब कहा जो जो पितृसत्तात्मक मूल्यों के पैमाने पर खरा नहीं उतरता है. इसके बाद सोशल मीडिया पर हंगामा हो गया, दीपिका को भला-बुरा कहा जाने लगा. उनके चरित्र पर सवाल उठाए जाने लगे.
इस मामले से एक बार फिर साबित हो गया कि हमारे समाज के एक तबके के लिए लड़कियों का अपने दिमाग़ से सोचना और उसे कह देना, नाक़ाबिले बर्दाश्त होता है.
दीपिका ने इस शो में अपने और रणवीर के क़रीब आने के समय को याद किया. इसी दौरान उन्होंने बताया कि शुरुआत में वे इस रिश्ते के बारे में गंभीर नहीं थीं. प्रतिबद्ध नहीं थीं. उस वक़्त उनकी मानसिक हालत ऐसी नहीं थी कि वे किसी रिश्ते के साथ प्रतिबद्ध हों.
दीपिका ने बताया कि तब वे भी अकेली थीं. रणवीर भी एक रिश्ते से बाहर आए थे. इसी दौर में रणवीर उनकी ज़िंदगी में आए. शुरुआत में उन्हें लेकर कोई कमिटमेंट नहीं थी. यानी वे एक-दूसरे के प्रति ही प्रतिबद्ध नहीं थे. वे किसी और के साथ भी दोस्ती कर सकते थे या ‘डेट’ पर जा सकते थे. हालाँकि, इसके बाद भी वे बार-बार एक दूसरे के पास ही लौट कर आते.
दीपिका बताती हैं कि वे कुछ लोगों से मिलीं भी. यानी ‘डेट’ पर भी गईं. हालाँकि, उनमें न तो दीपिका की दिलचस्पी जगी. न ही उनको लेकर वे उत्साहित थीं. न ही उस वक़्त वे प्रतिबद्ध ही थीं.

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ट्रोल ने क्या कहा और क्या किया?
वे कहती हैं, ‘दरअसल दिमाग़ी तौर पर मैं रणवीर के लिए प्रतिबद्ध थी.’ उन्होंने अंग्रेज़ी में एक बात कही. उसका शाब्दिक अर्थ यह निकलता है कि 'भले ही मेरा शरीर किसी और पुरुष के साथ हो, लेकिन मेरी रूह हमेशा रणवीर के साथ थी.'
दीपिका का यह कहना कि वे 'जब रणवीर के साथ दोस्ती शुरू कर रही थीं, उस वक़्त उनके कई और लोगों से भी दोस्ती थी', उनके लिए बवाले जान बन गया.
सोशल मीडिया पर उनका मज़ाक बनाया जाने लगा. उनके चरित्र पर उँगलियाँ उठाई जाने लगीं. उन्हें ‘अच्छी लड़की’ की श्रेणी से बाहर माना जाने लगा.
सोशल मीडिया पर ट्रोल की जमात में किसी ने कहा कि वे ढोंगी हैं. वे डिप्रेशन/अवसाद की बात कर अपने लिए सहानुभूति बटोरना चाहती हैं. जब उनकी इच्छा होती थी तो वे किसी और के साथ यौन संबंध बना लेती थीं. रणवीर उनके लिए महज़ एक विकल्प थे. वे अवसरवादी हैं.
उनके पुराने इंटरव्यू निकाले जाने लगे. उनके पुराने रिश्तों की पड़ताल की जाने लगी. उनका किन-किन पुरुषों से रिश्ता रहा है, यह बताया जाने लगा. उन्हें अपमानजनक यौनिक शब्दों से नवाज़ा जाने लगा.
कहा गया कि वह शादी में प्रतिबद्ध नहीं हैं. शादी के रिश्ते के बाहर यौन संबंध की वकालत करने वाली हैं. ऐसे लोग किसी के प्रति ‘वफ़ादार’ नहीं होते. उनके लिए रिश्ता महज़ ‘मज़े’ के लिए है. ऐसे ही लोग व्यभिचार/ बेवफ़ाई को स्त्री सशक्तीकरण बताते हैं.
मज़ाक उड़ाते हुए उनके मीम बनाए गए. ऐसे भी मीम बनाए गए जिनमें दीपिका की लानत-मलामत तो थी ही, उनकी निजी ज़िंदगी पर भी टिप्पणियाँ थीं.

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रिश्ते के बारे में बात करना ग़लत है?
सवाल है, रिश्तों के बनने-बिगड़ने के बीच ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव के बारे में बात करना ग़लत कैसे हो सकता है. फ़िल्म के कलाकार बहुतों के लिए प्रेरणा होते हैं. वे उनकी बातें ध्यान से सुनते हैं.
आमतौर पर रिश्तों के टूटने-बिखरने से उपजे अवसाद पर बात करना अच्छा नहीं माना जाता. दीपिका अगर इस पर बात कर रही हैं तो यह बहुतों के लिए इससे उबरने की राह दिखाने जैसा है. दीपिका अवसाद पर खुलकर बोलती और काम करती रही हैं.
लेकिन बात यहीं तक सीमित नहीं है. हमारे समाज में रिश्ता/रिश्तों के बारे में बात करने का पैमाना लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग है. एक लड़के के लिए अपने रिश्तों के बारे में बात करना, उसकी मर्दानगी से जोड़ कर देखा जाता है. उसे लोगों की आलोचना की कड़ी निगाहों से नहीं गुज़रना पड़ता है.
जो बातें दीपिका ने कही, अगर वही बातें रणवीर ने कही होती, तो क्या रणवीर को भी उसी तरह ट्रोल किया जाता? शायद नहीं किया जाता. शायद उस पर तवज्जो भी नहीं दी जाती. हम चाहें तो ऐसे उदाहरण तलाश सकते हैं.

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डरी हुई पितृसत्ता की प्रतिक्रिया?
सवाल है, दीपिका ने जब शारीरिक रूप से किसी और के साथ होने की बात की तो उसका अर्थ क्या है?क्या शारीरिक रूप से साथ होने का मतलब महज़ सोना ही है? यह तो अंग्रेज़ी का मुहावरेदार इस्तेमाल भी हो सकता है.
मुमकिन यह भी है कि न हो और उसका मतलब वही हो, जो ट्रोल कह रहे हैं. तब भी बड़ा सवाल तो है कि स्त्री के शरीर पर अधिकार किसका होगा? स्त्री अपने शरीर का क्या करेगी, यह कौन तय करेगा? क्या यह तय सोशल मीडिया के मर्दाना ट्रोल करेंगे?
अगर एक लड़की तीन-चार लड़कों में से अपने लिए सबसे बेहतर साथी की तलाश कर रही हो तो क्या यह ग़लत है? जब शादियाँ तय करके की जाती हैं तो क्या लड़के कुंडली, ख़ानदान, पैसा देखकर कई लड़कियों के बीच से एक लड़की का चयन नहीं करते?
यहाँ मसला महज़ चयन का नहीं है. मसला यौन शुचिता का है. मसला है, यौन रिश्ता. स्त्री की यौन आज़ादी हमेशा से मर्दाना समाज को डराती रही है. वह यह ख़्वाहिश पाले रहता है कि शरीर तो स्त्री का हो, लेकिन कब्ज़ा या मिल्कियत उसकी यानी मर्द की हो.
इसीलिए जब लड़की या स्त्री कई पुरुषों से दोस्ती की बात करती है तो उसके कान खड़े हो जाते हैं और वह हवलदारी करने लगता है. कहीं इस चुनाव में लड़की ने यौन संबंध तो नहीं बनाए? यही खटका, पितृसत्ता को चुनौती देने लगता है और उसे परेशान करता है. वह यह बर्दाश्त नहीं कर पाता.
स्त्री का यौन जीवन और पुरुष का यौन जीवन एक ही पैमाने पर नहीं तौला जाता है. स्त्री का सम्मान, इज़्ज़त, चरित्र, सब कुछ यौन जीवन में समेट दिया जाता है. दीपिका के साथ भी ऐसा ही हुआ. मर्दाना ट्रोल समाज असल में दीपिका की बात से डर गया. उसे एक अनजाना ख़ौफ़ सताने लगा.
अगर लड़कियाँ अपने यौन अधिकार और आज़ादी का बेख़ौफ़ इस्तेमाल करने लगीं तो क्या होगा? कहीं उनके जीवन में आने वाली लड़कियों ने ऐसा किया तो क्या होगा?… तो यह एक डरी हुई पितृसत्ता की प्रतिक्रिया भी है.

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ट्रोल्स की मर्दानगी
एक और दिलचस्प बात ट्रोल की तरफ़ से हुई. जब दीपिका पादुकोण अपनी ज़िंदगी और रिश्तों के बारे में बात कर रही थीं तो उनके साथ उनके बगल में रणवीर बैठे थे. तो कइयों ने रणवीर के मन की बात भी पढ़ ली. उन्होंने बातचीत के वीडियो में रणवीर के चेहरे के उतरते हाव-भाव में बेचैनी, अटपटापन और नापसंदगी भी देख ली.
यही नहीं, ट्रोल के एक तबके ने तो यहाँ तक कहा कि चूँकि रणवीर यह सब सुन रहे हैं, इसलिए वे ‘जोरू का ग़ुलाम’ हैं. यानी एक पुरुष अपनी महिला साथी की पिछली दोस्ताना ज़िंदगी के बारे में सुनकर चुपचाप कैसे बैठा रहा? एक असली मर्द यह सब कैसे बर्दाश्त कर सकता है?
यह तो ‘मर्दानगी के मूल्यों और पैमाने’ के ख़िलाफ़ बात है. उसे तो अपनी महिला साथी को सबक सिखा देना चाहिए.
अगर कोई मर्द ऐसा नहीं करता और अपनी दोस्त को इतनी जगह देता है कि वह खुलकर अपनी बात कह सके, अपने पुरुष दोस्तों के बारे में या पिछली दोस्तियों के बारे में बात कर सके तो ट्रोल की नज़र में वह असली मर्द नहीं बल्कि ‘जोरू का ग़ुलाम’ है.

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अपने दिमाग़ का इस्तेमाल करतीं लड़कियाँ
इससे पता चलता है कि हमें बोलती हुई… अपने दिमाग़ से बोलती हुई लड़की या स्त्री पसंद नहीं है. उसका बोलना मर्दाना समाज को अपमान लगता है.
दीपिका अक्सर अपने दिमाग़ से बात करती हैं. अपने मन का करती हैं. उन्हें इस बात की परवाह नहीं रहती कि लोग क्या कहेंगे.
यहाँ यह याद दिलाना बेमानी नहीं होगा कि जब जेएनयू के विद्यार्थियों के आंदोलन में एक दिन दीपिका अपना ख़ामोश समर्थन देने पहुँच गई थीं.
उस वक़्त भी उन्हें काफ़ी ट्रोल किया गया था. इस बार अपने विचार ज़ाहिर करने की वजह से ऐसा ही हुआ.
बेहतर होगा कि मर्द, स्त्रियों की ज़िंदगी में ताक-झाँक करने की आदत छोड़ें. उनकी बातें सुनने की आदत डालें.
उन्हें महज़ एक शरीर और यौन शरीर समझना छोड़ दें. बस इतना करें. इससे कई चीज़ें दुरुस्त हो जाएँगी.
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