बॉलीवुड अब भी क्यों लड़ रहा आज़ादी की लड़ाई?

महबूब ख़ान की निर्देशित फ़िल्म 'मदर इंडिया'

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इमेज कैप्शन, महबूब ख़ान की फ़िल्म 'मदर इंडिया' का एक दृश्य
    • Author, राहुल वर्मा
    • पदनाम, बीबीसी कल्चर

इस साल 15 अगस्त को भारत की आज़ादी के 70 साल पूरे हो गए. इस ऐतिहासिक मौक़े का भारत की सबसे बड़ी सांस्कृतिक पहचान यानी फ़िल्मों पर असर पड़ने की बात सोचना लाज़िमी है.

मगर हिंदी फ़िल्में तो देश के स्वतंत्र होने के फ़ौरन बाद से ही आज़ादी की लड़ाई की तमाम कहानियां सुनाती-दिखाती आई हैं.

फ़िल्मों के ज़रिए पिछले 70 साल से आज़ादी के दीवानों की बहादुरी और दिलेरी के क़िस्से लोगों को सुनाए जाते रहे हैं. आंदोलन के हिंसक और अमन पसंद पहलुओं को फ़िल्मों में बख़ूबी पेश किया जाता रहा है.

लोगों को फ़िल्मों के ज़रिए दिखाया जाता रहा है कि अंग्रेज़ों के क़रीब दो सौ साल के राज में हिंदुस्तान को किस-किस तरह के ज़ुल्मो-सितम सहने करने पड़े.

भारत की आज़ादी का मतलब ये था कि ब्रिटेन ने सत्ता को भारतीयों के हाथ में सौंप दिया. भारतीयों ने इस सत्ता हस्तांतरण को क़ुबूल कर लिया. लेकिन आज़ादी की लड़ाई का मतलब था कि देश के लिए आज़ादी के दीवानों ने बहादुरी से लड़ाई लड़ी.

हंसते-हंसते अपनी जान मुल्क़ पर क़ुर्बान कर दी. ऐसे तमाम किरदार भारत के स्वाधीनता संग्राम के क़िस्सों में मिल जाएंगे.

मिसाल के तौर पर 1965 में आई फ़िल्म 'शहीद' को ही लीजिए. मनोज कुमार की ये फ़िल्म शहीद भगत सिंह की ज़िंदगी पर आधारित थी. अंग्रेज़ों ने भगत सिंह को 1931 में महज़ 23 बरस की उम्र में फांसी दे दी थी.

साफ़ है कि देश की आज़ादी की लड़ाई इतनी आसान नहीं थी. 'शहीद' फ़िल्म दिखाती है कि कैसे आज़ादी के दीवानों ने अंग्रेज़ों के ज़ुल्मो-सितम का बहादुरी से मुक़ाबला किया.

भगत सिंह फ़िल्मों के इतने लोकप्रिय क़िरदार हैं कि साल 2002 में ही उन पर तीन हिंदी फ़िल्में बनीं. हालांकि इन फ़िल्मों को कुछ ख़ास कामयाबी नहीं मिली.

राजा हरिश्चंद्र

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इमेज कैप्शन, राजा हरिश्चंद्र 1913 में बनी थी. इसे पहली भारतीय फ़ीचर फ़िल्म माना जाता है

पहली फ़िल्म 'राजा हरिश्चंद्र'

भारत की पहली फ़िल्म 'राजा हरिश्चंद्र' की कहानी की बुनियाद भी अंग्रेज़ों से लड़ाई की ही थी. हां, इसमें कहानी को इशारों में बताया गया था.

1913 में बनी इस मूक फ़िल्म में ऐतिहासिक क़िरदार राजा हरिश्चंद्र की ज़िंदगी को दिखाया गया था. बर्मिंघम यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर राजिंदर दर्दा कहते हैं कि ये फ़िल्म की कहानी राजा हरिश्चंद्र की महानता को दिखाने वाली थी. एक साधु उन्हें बहला-फुसलाकर राज-पाट ले लेता है. हरिश्चंद्र बात के धनी थे.

इसलिए वो अपनी बात से मुकरे नहीं और राज-पाट दान करके चल दिए. कई लोगों को लगता है कि उनसे राज-पाट हड़पने वाला साधु असल में अंग्रेज़ थे, जिन्होंने बहला-फ़ुसलाकर भारत से उसका हक़ छीन लिया था.

ब्रिटिश राज में कई ऐसी फ़िल्में बनीं, जो पौराणिक कहानियों के ज़रिए अंग्रेज़ों पर निशाना साधती थीं. इन कहानियों को अंग्रेज़ अफ़सरों की मंज़ूरी मिल जाती थी. आज़ादी से पहले अगर सीधे तौर पर ब्रिटिश राज पर निशाना साधने वाली फ़िल्में बनाई जातीं, तो उन्हें अंग्रेज़ चलने ही नहीं देते.

आज़ादी मिलने के बाद 50 और 60 के दशक में ब्रिटिश राज की कहानियों पर आधारित कई फ़िल्में बनीं. मूक फ़िल्मों से लेकर रंगीन सिनेमा के आने तक ये सिलसिला जारी रहा.

मदर इंडिया

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इमेज कैप्शन, फ़िल्म 'मदर इंडिया' को भारत का 'गॉन विद द विंड' माना जाता है. 1958 में मदर इंडिया को विदेशी भाषा की बेहतरीन फ़िल्म के ऑस्कर के लिए नामित किया गया था.

भारत को अपने पैरों पर खड़ा दिखाने का दौर

राजेंद्र दर्दा कहते हैं कि फ़िल्मों में अक्सर ऐसा विलेन होता था जो बहुत ज़ुल्म ढाता था. वो ज़मींदार या साहूकार हुआ करता था, जो ग़रीबों को सताता था. जो चमड़े के बूट पहनकर शिकार पर जाते हुए दिखाया जाता था. दर्दा के मुताबिक़ ये क़िरदार अंग्रेज़ साहबों पर आधारित हुआ करते थे.

1957 में आई महबूब ख़ान की 'मदर इंडिया', एक भारतीय महिला की संघर्ष की शानदार दास्तां है. इस फ़िल्म को देखते वक़्त कई बार आप की सांसें थमती मालूम होती हैं.

इसमें राधा के किरदार में नरगिस दत्त को पेश किया गया था. जो अकेले ही अपने दो बेटों को पालती-पोसती हैं. इस दौरान वो बहुत सी मुश्किलों का सामना करती हैं.

फ़िल्म की कहानी राधा के संघर्ष, बलिदान और सम्मान की है. ये कुछ-कुछ आज़ाद भारत की कहानी लगती है, जो अंग्रेज़ों के राज से छुटकारा पाकर अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश कर रहा था.

फ़िल्म के एक सीन में राधा को भारत माता के तौर पर दिखाया जाता है, जो किसानों से देश के निर्माण की अपील करती है. ये पहली भारतीय फ़िल्म थी जो ऑस्कर में नामित हुई थी.

ऑस्कर में जाने वाली एक और भारतीय फ़िल्म थी 2001 में आई 'लगान'. इस फ़िल्म की कहानी भी अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ भारतीयों के संघर्ष की ही कहानी थी. इसके भारतीय किरदार अंग्रेज़ों के लगाए टैक्स का विरोध करते हैं.

'लगान' फ़िल्म को बॉक्स ऑफ़िस पर ज़बरदस्त कामयाबी मिली थी. इस फ़िल्म ने बॉलीवुड की फ़िल्में बनाने के तरीक़े में क्रांतिकारी बदलाव ला दिया था.

लगान

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इमेज कैप्शन, फ़िल्म लगान का एक दृश्य

आज़ादी पर केंद्रित फ़िल्में

फ़िल्म की स्क्रिप्ट किसी को पसंद नहीं आई थी. तब अभिनेता आमिर ख़ान ने फ़िल्म के हीरो का रोल निभाने के साथ-साथ इसके निर्माता का रोल भी अदा किया.

आमिर ख़ान ने देशभक्ति की थीम पर आधारित तीन फ़िल्मों में काम किया. 'लगान' के बाद उन्होंने 'मंगल पांडे: द राइज़िंग' नाम की फ़िल्म बनाई थी.

2005 में आई ये फ़िल्म 1857 में हुई भारत की आज़ादी की पहली लड़ाई के क़िरदार पर आधारित थी. मंगल पांडे ईस्ट इंडिया कंपनी के सैनिक थे, जिन्होंने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ बग़ावत का बिगुल फूंका था.

2006 में आई आमिर ख़ान की एक और फ़िल्म 'रंग दे बसंती' ने ज़बरदस्त कामयाबी हासिल की थी. इस फ़िल्म में आज के दौर के युवा, एक नाटक करते हुए अपने अंदर देशभक्ति का जज़्बा महसूस करते हैं.

ज़ाहिर है, इक्कीसवीं सदी की ये फ़िल्में भारत की तरक़्क़ी और और दुनिया के मंच पर देश का डंका बजने की कहानी कहती हैं.

फ़िल्म समीक्षक नमन रामचंद्रन कहते हैं कि 2001 से 2006 के दौरान भारत की आज़ादी की लड़ाई में लोगों की काफ़ी दिलचस्पी दिखी थी. फ़िल्मकारों ने भी इस विषय पर आधारित फ़िल्में बनाकर इस दिलचस्पी को भुनाया.

मदर इंडिया

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इमेज कैप्शन, इस फ़िल्म में राधा की भूमिका नर्गिस ने निभाई थी, एक ऐसी मां की भूमिका जिसने क़ानून के लिए अपने बेटे की भी हत्या कर देती है. उस दौर में राष्ट्र किस तरह संघर्ष कर रहा है, उसकी झलक इस किरदार में दिखती है

देशभक्ति के जज़्बे को भुनाने की कोशिश

2017 में भी देशभक्ति का जज़्बा बॉक्स ऑफ़िस पर भुनाने की कोशिश की गई. जैसे कि गुरिंदर चड्ढा की फ़िल्म 'वाइसरॉय हाउस.' इसे 'पार्टिशन: 1947' के नाम से अगस्त महीने में रिलीज़ किया गया था.

फिर भी ये फ़िल्म लोगों को लुभाने में नाकाम रही. साफ़ है कि आज़ादी की लड़ाई की कहानियों में अब जनता की उतनी दिलचस्पी नहीं रह गई.

नमन रामचंद्रन कहते हैं कि लोग आज 1947 और उसके पहले के क़िस्से स्क्रीन पर नहीं देखना चाहते. वो आज के दौर का भारत देखना चाहते हैं. इसीलिए स्वच्छ भारत मिशन का संदेश देती फ़िल्म 'टॉयलेट: एक प्रेमकथा' लोगों को ज़्यादा पसंद आती है.

या फिर दंगल जैसी फ़िल्म जो बेटियों को बराबरी का हक़ देने का संदेश देती है. ये नई कहानियां आज के दौर की मांग हैं. ये आज के समाज की पहचान हैं.

हालांकि रामचंद्रन ये मानते हैं कि अगर आज़ादी की लड़ाई की कहानी पर आधारित एक भी फ़िल्म हिट हो गई, तो ये सिलसिला फिर से शुरू हो जाएगा.

वो 'मणिकर्णिका: झांसी की रानी' फ़िल्म की मिसाल देते हैं. ये फ़िल्म अप्रैल 2018 में रिलीज़ होगी.

इसमें झांसी की रानी का किरदार कंगना रनौत ने निभाया है, जिसने अंग्रेज़ों से लोहा लिया था. झांसी की रानी ने ईस्ट इंडिया कंपनी के आगे घुटने टेकने से मना कर दिया था.

1857 की आज़ादी की लड़ाई में झांसी की रानी ने बहुत अहम रोल निभाया था. नमन रामचंद्रन मानते हैं कि अगर 'मणिकर्णिका' फ़िल्म हिट होती है, तो ऐसी फ़िल्में फिर से बनने लगेंगी.

मंगल पांडे

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इमेज कैप्शन, साल 2006 में फ़िल्म आई 'मंगल पांडे'

फिलहाल तो बॉलीवुड की दिलचस्पी स्वतंत्रता की लड़ाई की कहानियों में नहीं दिखती. लेकिन, डिजिटल दुनिया में ऐसी कहानियां कहने-सुनाने का दौर शुरू हो चुका है.

सुभाष चंद्र बोस की ज़िंदगी पर आधारित सिरीज़ 'बोस: डेड ऑर एलाइव', जल्द ही एएलटी बालाजी पर देखने को मिलेगी.

इसी तरह कबीर ख़ान भी 'अमेज़न इंडिया' के लिए जल्द ही डिजिटल सिरीज़ बनाने वाले हैं, जो आज़ादी की लड़ाई की कहानी पर आधारित होगी.

अब इन डिजिटल सिरीज़ में जनता की दिलचस्पी ही बताएगी कि ऐसी कहानियों का आगे क्या होगा.

तभी पता चलेगा कि आज का भारत 1947 और उससे पहले की कहानियों में कितनी दिलचस्पी रखता है.

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