'बॉलीवुड भारत की पहचान है'

किस्से-कहानी सुनना भारतीयों का पसंदीदा शगल रहा है, ख़ासकर पहले से सुनी हुई कहानियों को भी वे चाव से सुनते हैं.
महाकाव्यों के हिस्से, इतिहास, प्रेम प्रसंग, परिवार से जुड़ी लंबी कहानियों का भारतीय लोगों के दिमाग पर गहरा असर होता है.
लोक कलाकार और घुमंतू गायकों की टोली ये काम सदियों से कर रही है. भारतीय सिनेमा भी एक शताब्दी से से यही भूमिका निभा रहा है.
भारत में सिनेमा का इतिहास करीब करीब उतना ही पुराना है, जितना विश्व सिनेमा का इतिहास.
पेरिस में सिनेमा की शुरुआत करने के छह महीने बाद लूमिए बंधु तत्कालीन बंबई के वॉटसन होटल आए और वहां उन्होंने अपनी खोज को प्रदर्शित किया.
भारतीयों ने सिने फोटोग्राफी को कुछ वैसे ही अपनाया जैसे मछली पानी को अपनाती है. एक रील और दो रील वाली फिल्में तो तुरंत ही बनने लगी.
पहली फ़ीचर फ़िल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ 1913 में बनी जो राजा हरिश्चंद्र की मशहूर कहानी पर बनी और सालों की तैयारी के बाद पूरी हुई.
बनते-बदलते भारत की कहानी
हालांकि बॉलीवुड (इसका मतलब हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से है, क्योंकि इसमें दूसरी भारतीय भाषाओं की फिल्में शामिल नहीं हैं) को कभी भारत की सांस्कृतिक और बौद्धिक विमर्श में गंभीरता से नहीं देखा गया.
ख़ासकर आभिजात्य माना जाने वाला तबका जो शास्त्रीय संगीत, शास्त्रीय नृत्य और थिएटर को तरजीह तो देता है लेकिन भारतीय (हॉलीवुड की नहीं) फ़िल्मों को वल्गर और काल्पनिक बताता रहता है.
दरअसल बॉलीवुड का सिनेमा भारतीय समाज की कहानी को कहने का सशक्त माध्यम रहा है.
इसके जरिए भारत की स्वतंत्रता की कहानी, राष्ट्रीय एकता को कायम रखने के संघर्ष की कहानी और वैश्विक समाज में भारत की मौजूदगी की कहानी को चित्रित किया जाता रहा है.
भारतीय सिनेमा विदेशों में काफी कामयाब हुआ है और इसके जैसा दूसरा कोई ब्रांड नहीं जो दुनिया भर में इतना कामयाब हुआ है.
मुद्दों पर बनी फिल्में

बॉलीवुड की फ़िल्में एशिया और अफ़्रीका में काफी लोकप्रिय तो हैं ही, साथ में तेजी से यूरोप और अमरीका के बाज़ार में लोकप्रिय हो रही है.
छुआछूत जैसे मुद्दे पर बंबई टाकीज़ ने 1936 में 'अछूत कन्या' जैसी फिल्म बनाई.
इसी मुद्दे पर बिमल रॉय ने 1959 में 'सुजाता' बनाई.
विधवा की शादी जैसे मुद्दे को 1956 में बनी फ़िल्म 'एक ही रास्ता' में उठाया गया.
जबकि दहेज हत्या जैसी कुप्रथा पर 1950 में 'दहेज' नाम से ही फिल्म बनी थी.
ये मुद्दे समय के साथ भी कायम रहे, हालांकि इसमें बदलते भारत की झलक भी मिलती रही. अन्य राजनीतिक मुद्दों पर भी फ़िल्में बनती रहीं.
1943 में बनी फिल्म ‘किस्मत’ सुपर हिट साबित हुई थी.
भारत छोड़ो आंदोलन जब चरम पर था, तब इस फ़िल्म का एक गाना बेहद लोकप्रिय हुआ था- दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्तां हमारा है.
विविधता में एकता की मिसाल
1949 में भारत को स्वतंत्रता मिले कुछ ही वक्त हुआ था, देश के तौर पर हमारी पहचान बस बन रही थी.
‘शबनम’ नामक फिल्म में पहली बार विविधभाषाई गीत का इस्तेमाल किया गया, जिसमें बंगाली, मराठी और तमिल भाषा का उपयोग किया गया था.
इसके जरिए दर्शकों को ये बताने की कोशिश की गई थी कि ये सभी भारत में ही शामिल हैं.
मशहूर फिल्मकार वी. शांताराम ने 1921 से 1986 के बीच करीब 65 साल तक फिल्मी दुनिया में सक्रिय रहे.
उन्होंने 1953 में विविध रंगी और बहुभाषी समाज होने के बाद भारत की एकता के मुद्दे पर ‘तीन बत्ती चार रास्ते’ फिल्म बनाई.
इस फ़िल्म की कहानी में एक ऐसा परिवार है जिसके घर की वधुएं अलग अलग भाषाएं बोलती हैं.
मोहन सहगल ने उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय लोगों के बीच की शत्रुता पर 1956 में ‘नई दिल्ली’ नाम से फ़िल्म बनाई थी.
ट्रेजडी किंग

इस फ़िल्म में पंजाबी बोलने वाला हीरो अपनी तमिल प्रेमिका से अपने पिता के बारे में बताता है, "मेरे पिता मानते हैं कि अगर किसी कोबरा की एक मद्रासी (सभी दक्षिण भारतीय को उत्तर भारतीय मद्रासी कहते हैं) से मुठभेड़ हो जाए तो सबसे पहले मद्रासी को मारना चाहिए!"
हालांकि इस फ़िल्म में प्यार की जीत होती है, इसमें मधुर संगीत और मनमोहक नृत्य भी शामिल थे.
1940 के दशक में दुखद फ़िल्में बनती रहीं जिसमें हीरो और हीरोइन का प्रेम का कामयाब नहीं होता.
किसी फ़िल्म में या नायक मर जाता तो किसी फ़िल्म में नायिका. कई बार बेहतरीन गाने गाते हुए दोनों एक साथ मौत को गले लगाते रहे.
1950 के मध्य में दिलीप कुमार जो ट्रेजडी किंग के तौर पर मशहूर थे, ने ‘नया दौर’ फ़िल्म से बदलाव की शुरुआत की.
इसमें वे तांगा चलाने वाले थे, जो नई बस सर्विस के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ता है.
वे इस लड़ाई को भी जीतते हैं और फ़िल्म का अंत भी प्रेमी-प्रेमिका के मिलन से सुखद होता है.
मुगले-ए-आज़म
हालांकि एक बुलंद देश के तौर पर भारत की हस्ती पर 1957 में बनी गुरूदत्त की क्लासिक फ़िल्म ‘प्यासा’ और 1958 में बनी रमेश सहगल की फ़िल्म ‘फिर सुबह होगी’ पर सवाल उठाए गए थे.
दरअसल इन फ़िल्मों में जवाहर लाल नेहरू की समाजवादी नीतियों और उसके निराशाजनक परिणामों को चित्रित किया गया था.
1960 में के. आसिफ़ ने अक़बर की बादशाहत पर मुगले-ए-आज़म के तौर पर एक भव्य और ऐतिहासिक फ़िल्म बनाई.
जबकि उसी वक्त राजकपूर ‘जिस देश में गंगा बहती है’ और दिलीप कुमार ‘गंगा-जमुना’ में उस थीम को पेश कर रहे थे कि कोई शख्स किन परिस्थितियों में डाकू बनता है.
भारतीय समाज में मौजूद विभिन्न तनावों ने भी बॉलीवुड में पुख्ता जगह बनाई है और भारतीय दर्शकों को मनोरंजन भी ख़ूब किया है.
ज्यों ज्यों भारत विकसित होने लगा त्यों त्यों ब्रितानिया इमेज को फ़िल्माने का तरीका भी बदला.
1981 में प्रदर्शित मनोज कुमार की फ़िल्म ‘क्रांति’ में अंग्रेजों को भारतीयों के ख़ून का प्यासा दिखाया गया जिसके ख़िलाफ़ देशभक्त भारतीय युद्ध छेड़ते हैं.
बॉलीवुड हमारी पहचान

वहीं 2001 में आमिर ख़ान की फ़िल्म ‘लगान: वंस अपॉन ए टाइम इन इंडिया’ में भारत के एक गांव के किसानों को अपनी लगान की माफ़ी के लिए अंग्रेजों के साथ क्रिकेट मैच खेलते दिखाया गया.
इस मैच में भारतीय गांव के किसानों ने अंग्रेजों को हरा दिया.
ये विश्वस्त भारत की तस्वीर है जो अपने उपनिवेशवाद के दिनों को नए ढंग से देख रहा है.
इसके अलावा भूमंडलीकरण और तेजी से बदलते महानगरीय समाज, ख़ासकर महिलाओं की स्थिति को फ़िल्मों में दिखाया गया है.
ऐसी फ़िल्मों की शुरुआत 1994 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘हम आपके हैं कौन’ से हुई.
दूसरी शताब्दी का इंतज़ार
इसमें दिखाया गया है कि परंपरागत परिवार के लोग एक शादी में मिलते हैं जहां प्रेमी-प्रेमिका एक दूसरे को चुनते हैं.
वहीं 1995 में प्रदर्शित 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' में उन अप्रवासी भारतीयों को केंद्र में रखा गया जो विदेशों में पले बढ़े हैं और अपनी जड़ों को तलाश रहे हैं.
वहीं 2011 में प्रदर्शित ‘जिंदगी ना मिले दोबारा’ में एक बार फिर पुरानी थीम को दिखाया गया जिसमें तीन पुरुष एक साथ स्पेन में अपनी छुट्टियां बिताते हैं.
ये पुरुष स्पेनिश डांसरों से रोमांस भी करते हैं और भारतीय मूल्यों को भी ख़ूब समझते हैं.
भारतीय फ़िल्म इंडस्ट्री दुनिया की सबसे बड़ी फ़िल्म इंडस्ट्री है.
किसी और माध्यम ने भारत की कहानी को इतनी संपूर्णता से पेश नहीं की है.
इसलिए हमें भारतीय सिनेमा की दूसरी शताब्दी का बेसब्री से इंतज़ार है.












