सोने के दाम अब कहां जाएंगे, क्या गोल्ड ख़रीदने का ये सही समय है?

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- Author, रौनक भेड़ा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सोने की क़ीमतों में लगातार उछाल देखने को मिल रहा है. 26 जनवरी को सोने की क़ीमत पहली बार 5 हज़ार डॉलर प्रति औंस (28.35 ग्राम) के पार चली गई.
सोना 4,57,000 रुपये प्रति औंस हो गया था. इसका मतलब है कि 10 ग्राम सोने की क़ीमत 1,61,000 रुपये हो गई है.
इससे यह साबित हो गया कि पारंपरिक रूप से जिस संपत्ति में निवेश किया जाता था, वह अब भी चलन में है.
सोने की ऐतिहासिक तेज़ी 2025 में ही देखने को मिल गई थी, जब गोल्ड प्राइस में 60 फ़ीसदी से ज़्यादा का उछाल आया था. 1979 के बाद इस वर्ष सोने में सबसे ज़्यादा सालाना बढ़त देखी गई.
फ़िलहाल साल 2026 की शुरुआत ही हुई है, अभी पहला महीना ही चल रहा है और सोना 17 फ़ीसदी से ज़्यादा चढ़ चुका है.
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शेयर बाज़ार की अनिश्चितता के बीच निवेशकों ने सोने में निवेश बढ़ा दिया है. सोना और अन्य क़ीमती धातुओं को सुरक्षित निवेश माना जाता है.
लेकिन सवाल ये है कि सोने में कब तक तेज़ी बनी रहेगी, इसके भाव बढ़ने के पीछे क्या कारण हैं और क्या इसमें निवेश करना फ़िलहाल सुरक्षित है?
सोने में तेज़ी के पीछे 3 अहम कारण क्या हैं?

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सोने की तेज़ी के पीछे यूं तो कई कारण हैं, लेकिन सब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं.
भू-राजनीतिक तनाव के कारण दुनिया में अस्थिरता बढ़ रही है, ऐसे टाइम में निवेशक जोखिम उठाने की बजाय पारंपरिक संपत्तियों में निवेश कर रहे हैं. जियोपॉलिटिकल टेंशन की वजह से ही डॉलर का इस्तेमाल भी घट रहा है और सोने पर निर्भरता बढ़ाई जा रही है.
एसेट मैनेजमेंट कंपनी स्प्रॉट इंक के अध्यक्ष रेयान मैकइंटायर ने कहा , "सोने की क़ीमतें भू-राजनीतिक विवाद और आर्थिक अनिश्चितता के कारण मज़बूत बनी हुई हैं. केंद्रीय बैंक लगातार सोना ख़रीद रहे हैं ताकि अमेरिकी डॉलर पर कम निर्भर हों."
नज़र डालते हैं उन तीन कारणों पर जो सोने की क़ीमत को उछाल हैं -
1. ट्रंप की नीतियाँ और जियोपॉलिटिकल टेंशन

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों की वजह से शेयर बाज़ार को कई झटके लगे हैं. इससे निवेशक अब सोने-चाँदी जैसे क़ीमती धातुओं पर निवेश कर रहे हैं. हाल ही में जियोपॉलिटिकल टेंशन की वजह से सोने की क़ीमतें बढ़ी हैं.
अमेरिका ने वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ लिया, इसके बाद सोने की क़ीमतें बढ़ गईं. ट्रंप ने ईरान की सरकार को धमकी दी, क्योंकि वहाँ प्रदर्शनकारियों पर हिंसक कार्रवाई हो रही थी. ट्रंप ने ग्रीनलैंड को अपने अधीन करने की बात भी उठाई.
उन्होंने यूरोपीय देशों पर टैरिफ़ लगाने की धमकी दी. हालांकि, बाद में ट्रंप पीछे हट गए थे. लेकिन व्हाइट हाउस की इस अनिश्चितता से बाज़ार अभी भी डरा हुआ है.
शनिवार को ट्रंप ने कनाडा को चेतावनी दी कि अगर कनाडा ने चीन के साथ कोई व्यापार समझौता किया तो अमेरिका कनाडा से आने वाले सामान पर 100% टैरिफ़ लगा देगा. हालांकि, बाद में कनाडा ने कहा है कि उसका ऐसा कोई इरादा ही नहीं है.
इन सब घटनाओं ने निवेशकों को डरा दिया है. जब दुनिया में युद्ध, हमला या बड़ी राजनीतिक उलझन होती है, तो लोग अपने पैसे को शेयर बाज़ार या अन्य जोखिम वाली चीज़ों से निकालकर सोने जैसी सुरक्षित चीज़ों में लगाते हैं.
इस अनिश्चितता और भू-राजनीतिक जोखिम की वजह से निवेशकों ने सोने की तरफ़ रुख़ किया, जिससे इसकी मांग बढ़ी और क़ीमतें तेज़ी से ऊपर चढ़ गईं.
इसी तरह साल 2025 में भी ट्रंप ने कई देशों पर टैरिफ़ लगाए, तब भी निवेशक 'सेफ़ हेवन' की तरफ़ दौड़े. मार्केट में सेफ़ हेवन उन संपत्तियों को कहा जाता है जो वित्तीय बाज़ारों में गिरावट आने पर भी अपनी क़ीमत बनाए रखती हैं. बुरी स्थिति में भी कई बार यह क़ीमत बढ़ जाती है. सोना और चांदी मार्केट का सेफ़ हेवन हैं.
2. केंद्रीय बैंक सोने की ख़रीदारी कर रहे

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सोने की तेज़ी के पीछे केंद्रीय बैंकों की भारी ख़रीदारी वाक़ई सबसे बड़ी वजहों में से एक है. 2022 से लगातार यह ट्रेंड मज़बूत हुआ है, 2025 में यह और तेज़ हो गया, जिससे सोने की क़ीमतें रिकॉर्ड स्तरों पर पहुंच गईं.
केंद्रीय बैंक (जैसे चीन, पोलैंड, तुर्की, भारत, कज़ाकिस्तान आदि) सोने को रिज़र्व एसेट के रूप में बढ़ा रहे हैं. ये ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि अमेरिकी डॉलर का प्रभुत्व कम हो रहा है.
सैंक्शन्स, ट्रेड वॉर और वैश्विक अस्थिरता से बचने के लिए सोना "इंश्योरेंस" की तरह काम करता है. जियोपॉलिटिकल टेंशन (रूस-यूक्रेन, मिडिल ईस्ट, ट्रेड वॉर) के कारण भी केंद्रीय बैंक इसे तेज़ी से ख़रीद रहे हैं.
गोल्डमैन सैक्स के मुताबिक़, उभरते हुए देश हर महीने औसतन 60 टन सोना ख़रीद रहे हैं. पोलैंड के केंद्रीय बैंक के पास 2025 के अंत में 550 टन सोना था, अब इनका लक्ष्य 700 टन करना है, गवर्नर एडम ग्लापिंस्की ने इस महीने यह बात कही थी. पोलैंड भी अपना भंडार 700 टन तक बढ़ाने की तैयारी कर रहा है. चीन तो पहले ही लगातार 14 महीने से सोना ख़रीद रहा है.
केंद्रीय बैंक बड़े पैमाने पर सोना ख़रीदते हैं और ये 'प्राइस-इंसेंसिटिव' होते हैं (मतलब ऊंची क़ीमत पर भी ख़रीदते रहते हैं). इससे मार्केट में सप्लाई कम पड़ जाती है और क़ीमतें ऊपर जाती हैं. जब सेंट्रल बैंक ख़रीदते हैं, तो प्राइवेट निवेशक, ईटीएफ़ और रिटेल भी फॉलो करते हैं. इससे डिमांड और बढ़ती है.
3. डॉलर का घटता इस्तेमाल

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जब अमेरिकी डॉलर कमज़ोर होता है, तो सोने की क़ीमतें आमतौर पर बढ़ जाती हैं. इसका कारण यह है कि सोना डॉलर में ही ख़रीदा-बेचा जाता है. डॉलर कमज़ोर होने पर दूसरे देशों के लोगों के लिए सोना सस्ता पड़ जाता है, इसलिए वे ज़्यादा सोना ख़रीदने लगते हैं. इससे मांग बढ़ती है और क़ीमत ऊपर चली जाती है.
कमज़ोर डॉलर अक्सर महंगाई या आर्थिक अनिश्चितता के कारण होता है. ऐसे समय में लोग सोने को सेफ़ हेवन मानकर उसकी तरफ रुझान कर लेते हैं.
साथ ही, कमज़ोर डॉलर के साथ अमेरिका में ब्याज दरें भी कम रहती हैं, जिससे सोना रखने का कोई नुक़सान नहीं होता. विश्लेषकों का मानना है कि डॉलर से स्पष्ट तौर पर दूरी बढ़ने पर ही सोने की क़ीमत में वृद्धि हुई है.
अमेरिका और जापान ने मिलकर येन (जापान की मुद्रा) को सहारा देने के लिए हस्तक्षेप किया, जिससे डॉलर की ताक़त घटी. डॉलर कमज़ोर होने से सोना विदेशी ख़रीदारों के लिए सस्ता हो जाता है (क्योंकि सोना डॉलर में ही बिकता है). इसलिए दुनिया भर के लोग ज़्यादा सोना ख़रीद रहे हैं.

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क्या इस साल और बढ़ेगी सोने की क़ीमत?
विशेषज्ञ यही मानते हैं कि फ़िलहाल सोने की क़ीमत में वृद्धि बनी रहेगी.
अलग-अलग रिपोर्ट्स बताती हैं कि 2026 में सोने की क़ीमत मोटे तौर पर ऊपर ही रहने वाली है, भले बीच-बीच में यह कुछ कम हो जाए.
इंडिया बुलियन एंड ज्लैवर्स एसोसिएशन के प्रवक्ता सीए सुरिंदर मेहता ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "सोने की क़ीमत में वृद्धि के सभी कारण अमेरिका की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित कर सकते हैं. ऐसा होता है तो 'सेफ़ हेवन' की तरफ़ दौड़ने वाले लोगों की संख्या में इज़ाफ़ा होगा, जिससे गोल्ड की क़ीमतों में एक बार फिर बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है."

लंदन बुलियन मार्केट एसोसिएशन के ताज़ा सर्वे में एनालिस्ट्स का मानना है कि 2026 में सोने का भाव 7,150 डॉलर तक भी जा सकता है.
जबकि दिग्गज इन्वेस्टमेंट बैंक गोल्डमैन सैक्स ने इस साल के अंत तक सोने की क़ीमत का अनुमान 5,400 डॉलर तक लगाया है.
इंडिपेंडेंट एनालिस्ट रॉस नॉर्मन ने एवरेज 5,375 डॉलर के साथ 6,400 डॉलर प्रति औंस का टारगेट दिया है. उनका मानना है कि फिलहाल अनिश्चितता का दौर जारी रहेगा. इसका सीधा प्रभाव सोने की क़ीमतों पर पड़ने वाला है.
जे.पी. मॉर्गन के अनुसार, सोने की ये तेज़ी अभी ख़त्म नहीं हुई है. हालाँकि रास्ता सीधा नहीं होगा, मतलब क़ीमत ऊपर-नीचे होती रहेगी. लेकिन लंबे समय तक सोना महंगा होने का रुझान जारी रहेगा. इसकी वजह है कि दुनिया भर में लोग और बैंक डॉलर से हटकर सोने की तरफ जा रहे हैं.
इसके मुताबिक, 2026 के अंत तक सोने की क़ीमत 5,000 डॉलर प्रति औंस के आसपास पहुँच जाएगी. 2026 की आख़िरी तिमाही (अक्तूबर-दिसंबर) में औसत क़ीमत 5,055 डॉलर प्रति औंस रह सकती है. जबकि 2027 के अंत तक ये और बढ़कर 5,400 डॉलर प्रति औंस के करीब हो सकती है.

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भारत में सोने को लेकर कैसा रुझान?
भारत में भी दुनिया के बाकी देशों की तरह सोने में लोग तेज़ी से निवेश कर रहे हैं. हालांकि, महंगे भाव की वजह से ज्वेलरी ख़रीद कम हुई है. इसकी सेल करीब-करीब आधी हो चुकी है.
सुरिंदर मेहता ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "भारत में ज्वेलरी की बिक्री में कमी दर्ज की गई है. 40 से 50 फ़ीसदी सेल नीचे जा चुकी है. अगर भविष्य में भी इसी तरह से सोने की क़ीमत बढ़ती रही तो लोगों का ज्वेलरी की तरफ कम ही रुझान रहेगा. हालांकि, क़ीमत एक जगह ठहर जाती है तो ऐसी उम्मीद की जा सकती है कि ज्वेलरी का मार्केट फिर से अच्छा प्रदर्शन करेगा."
उन्होंने आगे कहा, "भले ज्वेलरी ख़रीद कम हो गई हो, लेकिन सोने में निवेश तेज़ी से बढ़ रहा है. इसमें 15 से 20 प्रतिशत की वृद्धि देखने को मिली है. इसकी वजह यह है कि लोगों को उम्मीद है कि भविष्य में भी गोल्ड प्राइस बढ़ सकते हैं."

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निवेशकों को सावधान रहने की ज़रूरत?
सोने की क़ीमतों में उछाल आने के बाद इसमें निवेश बढ़ा है. भले आने वाले कुछ वक़्त तक सोने की क़ीमत ज़्यादा ही रहे. लेकिन निवेशकों को सावधानी बरतनी होगी.
इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट कहती है कि बड़े पैमाने पर एक बार में बहुत सारा सोना न ख़रीदें, खासकर जब क़ीमतें बहुत ऊंची हों. धीरे-धीरे सोने में निवेश बढ़ाना और अपने टोटल इन्वेस्टमेंट के बैलेंस को बनाए रखना बेहतर होता है.
बेलफास्ट यूनिवर्सिटी के आर्थिक इतिहासकार डॉ. फिलिप फ्लायर्स ने बीते साल कहा था, "सोने की क़ीमत निरंतर बढ़ रही है, इस पर दांव लगाना जोखिम भरा हो सकता है. जैसे ही सरकारें सोच-समझ कर फ़ैसला लेंगी और बाज़ार स्थिर होंगे, तब लोग फिर गोल्ड में इन्वेस्ट करने से पीछे हटने लगेंगे."
उन्होंने राय दी कि सोने में निवेश करना है तो 'लॉन्ग टर्म' के हिसाब से करें.
गोल्डमैन सैक्स से जुड़े डान स्ट्रुवेन ने बताया था, "अमेरिका का स्टॉक मार्केट सोने के बाज़ार से लगभग 200 गुना बड़ा है."
इसका मतलब है कि अगर स्टॉक मार्केट या बॉन्ड मार्केट में से थोड़ा-सा भी पैसा बाहर निकलकर सोने में चला जाए, तो सोने के छोटे बाज़ार में यह बहुत बड़ी बढ़ोतरी दिखाई देगी.
रिपोर्ट में आगे कहा गया है, "लेकिन कुछ लोग चिंता कर रहे हैं कि सोने की क़ीमत इतनी तेज़ी से और इतनी ज़्यादा बढ़ गई है कि अब बबल बन रहा है. बबल कभी न कभी फट भी सकता है, यानी क़ीमत अचानक बहुत गिर सकती है. इसलिए निवेशकों को सावधान रहने की ज़रूरत है."
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