यूजीसी के नए नियमों का बीजेपी के अंदर भी विरोध, शिक्षा मंत्री के बयान के बाद भी क्यों नहीं थम रहा बवाल?

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- Author, राजेश डोबरियाल
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव ख़त्म करने के लिए यूजीसी के नए नियमों को लेकर देश भर में विरोध और समर्थन तेज़ हो गया है.
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में छात्रों ने नए नियमों के विरोध में प्रदर्शन किया तो कई नेताओं ने भी इन नियमों को वापस लेने या इनमें संशोधन करने की मांग की है.
बीजेपी के अंदर भी इस मुद्दे पर हलचल मची हुई है. पार्टी के बड़े नेता इन नियमों से किसी के प्रति भेदभाव नहीं होने का आश्वासन दे रहे हैं तो ज़मीन से जुड़े कई कार्यकर्ता और कुछ नेता विरोध भी कर रहे हैं.
कई जगह से बीजेपी पदाधिकारियों के इस्तीफ़े की ख़बरें भी आ रही हैं. यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंच गया है.
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इस मुद्दे पर एक बात ख़ास है कि समर्थन और विरोध में बीजेपी, कांग्रेस और दूसरे दलों के लोग दिखाई दे रहे हैं. यानी यह पार्टी लाइन से इतर एक मुद्दा बन गया है.
विरोध और प्रदर्शन

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13 जनवरी को यूजीसी ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग विनिमय 2026 जारी किया था. आयोग के अनुसार इसका उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थाओं में समानता को बढ़ाना है ताकि किसी भी वर्ग के छात्र, छात्राओं के साथ भेदभाव को रोका जा सके.
नोटिफ़िकेशन के मुताबिक़ उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव खत्म करने के लिए एक इक्विटी कमेटी (समता समिति) बनाई जाएगी जिसमें ओबीसी, विकलांग, अनुसूचित जाति, जनजाति और महिलाओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए. ये समिति भेदभाव की शिकायतों की जांच करेगी.
इस नोटिफ़िकेशन का विरोध करने वालों का तर्क है कि ये सामान्य वर्ग के लोगों के ख़िलाफ़ है, क्योंकि इसमें सामान्य वर्ग के छात्र-छात्राओं के ख़िलाफ़ फ़र्जी आरोप लगाए जा सकते हैं जो उनके करियर के लिए घातक साबित हो सकते हैं.
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार उत्तर प्रदेश के अलीगढ़, संभल, कुशीनगर जैसे कई ज़िलों में छात्र संगठनों और समूहों ने यूजीसी के नए नियमन के विरोध में प्रदर्शन किया और इसे तुरंत वापस लेने की मांग की.
अलीगढ़ में राष्ट्रीय छात्र संगठन और क्षत्रिय महासभा ने हाथरस के बीजेपी सांसद अनूप प्रधान के काफ़िले को रोक दिया. प्रदर्शनकारियों ने यूजीसी का पुतला फूंका और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ नारे भी लगाए.

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शिवसेना (उद्धव गुट) की नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा, " इस गाइडलाइन में एक जजमेंट है… एक वर्ग को शोषित और दूसरे वर्ग को शोषक बताया जा रहा है. यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है. मान लेते हैं कि 7 मामले एसटी, एसटी, ओबीसी के आते हैं और तीन या दो या एक सामान्य वर्ग का आता है… और कौन यह तय करेगा कि जाति आधारित भेदभाव हो रहा है?"
ऐसे मामलों के दुरुपयोग की आशंका जताते हुए उन्होंने पूछा कि झूठे मामलों की स्थिति में क्या होगा? दोष का निर्धारण कैसे किया जाएगा? प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि भेदभाव को ख़त्म करने के नाम पर हम और भेदभाव कैंपस में ला रहे हैं. इस नियमन को वापस लिया जाना चाहिए क्योंकि पूरे देश में यही मांग हो रही है.
भारतीय जनता पार्टी को इस मामले में अपने ही कार्यकर्ताओं, नेताओं के विरोध का सामना करना पड़ रहा है. रायबरेली के बीजेपी किसान मोर्चा के अध्यक्ष श्याम सुंदर त्रिपाठी ने यूजीसी के नए नियमन के विरोध में इस्तीफ़ा दे दिया है.
उत्तर प्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने कहा कि बीजेपी सत्ता में बने रहने के लिए फूट डाल रही है, पहले उसने हिंदू-मुसलमान के नाम पर लड़ाया और अब हिंदुओं को ही जाति में बांट रही है. अजय राय ने कहा कि यूजीसी नियमन को लेकर जो स्थिति कांग्रेस के समय में थी वही होनी चाहिए.

'दुरुपयोग का अधिकार किसी को नहीं'

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यूपी में कांग्रेस ने यूजीसी की नई गाइडलाइन्स का विरोध किया तो कर्नाटक में पार्टी ने उच्च शिक्षा के संस्थानों में भेदभाव को रोकने के लिए विधेयक लाने की ज़रूरत बताई.
कर्नाटक के उच्च शिक्षा मंत्री एमसी सुधाकर ने कहा, "उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव एक पुराना मुद्दा है. आप हैदराबाद में रोहित वेमुला मामले को याद कर सकते हैं. हमारे नेता राहुल गांधी भी कहते हैं कि इसे रोकने के लिए किसी तरह का विधेयक लाया जाना चाहिए."
"लेकिन यूजीसी जो नए नियमन लेकर आई है उसे लेकर कुछ लोगों ने चिंता ज़ाहिर की है. हमें उन्हें दूर करना चाहिए और इसके साथ ही हमारी ज़िम्मेदारी है कि हाशिए के समाज, जिनमें एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग शामिल हैं, के हितों की रक्षा करें. उच्च शिक्षा संस्थान ऐसे सभी विवादों से दूर होने चाहिए और हमें सभी के साथ एक जैसा बर्ताव करना चाहिए. हमारी सरकार भी एक ऐसा विधेयक तैयार कर रही है जिसमें इन सब बातों का ध्यान रखा जाएगा."
भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने इन नियमों का बचाव करते हुए लिखा, "संविधान का आर्टिकल 14 इस देश में जाति, वर्ग, वर्ण, धर्म या संप्रदाय के किसी भी भेदभाव के ख़िलाफ़ है,आप निश्चिंत रहिए, UGC का यह नियम अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़े वर्ग के साथ-साथ सवर्णों पर भी बराबर लागू होगा. यह राजनीति नहीं है, देश बाबा साहेब अंबेडकर जी के संविधान से ही चलता है."
आज़ाद समाज पार्टी के नेता और सांसद चंद्रशेखर आज़ाद ने अपने एक्स अकाउंट पर लिखा, "उच्च शिक्षा संस्थानों के हितधारकों के मध्य पूर्ण समता एवं समावेशन को संवर्धन करने के उद्देश्य से लाए गए यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्द्धन हेतु) विनियम, 2026 का भीम आर्मी - आज़ाद समाज पार्टी (कांशीराम) पूर्ण समर्थन करती है."
समाचार एजेंसी एएनआई से बात करते हुए उन्होंने कहा, "जब उसमें आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों (EWS) को जोड़ दिया गया है, जिसमें सिर्फ़ सामान्य जाति के बच्चे हैं तो फिर किसी को क्या दिक्कत हो रही है."
इस सबके बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने राजस्थान में पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा, "मैं आश्वासन देना चाहता हूं कि किसी का उत्पीड़न नहीं होने दिया जाएगा. कोई भेदभाव नहीं होगा. भेदभाव के नाम पर इन नियमों का दुरुपयोग करने का अधिकार किसी को नहीं रहेगा. इसका दायित्व यूजीसी, भारत सरकार, राज्य सरकारों पर रहेगा. जो भी व्यवस्था बनेगी वह संविधान के दायरे में बनेगी और यह तो सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हुआ है."

मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा

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इस बीच, यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. अधिवक्ता विनीत जिंदल ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है.
उन्होंने अपने एक्स अकाउंट में लिखा, "जाति आधारित भेदभाव सामान्य जाति के व्यक्ति को प्रभावित कर सकता है. याचिका नियम 3(सी) को हटाने या उसमें संशोधन की मांग करती है ताकि क़ानून की नज़र में सभी की समानता सुनिश्चित हो सके. याचिका ऐसे व्यक्तियों के ख़िलाफ़ उचित कार्रवाई की मांग भी करती है जिन्होंने जातिगत भेदभाव के झूठे आरोप लगाए हैं. न्याय जाति-आधारित नहीं होना चाहिए."
इस मामले के सुप्रीम कोर्ट में चले जाने से कुछ नेताओं को राहत भी मिली है कि इस पर सीधे अपनी राय देने से बचा जा सकता है. बीजू जनता दल के नेता प्रसन्ना आचार्य ने इस मुद्दे पर कहा, "हमारा देश सोशलिस्ट, सेक्युलर और डेमोक्रेटिक है. समाज के सभी वर्गों को समान न्याय मिलना चाहिए. मेरी जानकारी के अनुसार यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट में चला गया है. अब माननीय कोर्ट ही इसे देखेगा और अंतिम निर्णय करेगा."
सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जय सिंह ने इस मुद्दे पर आई प्रतिक्रियाओं पर अचरज जताया. पीटीआई से बात करते हुए उन्होंने कहा, "मैं इस मामले पर हुई प्रतिक्रिया को देखकर चकित हूं. एससी, एसटी और ओबीसी समुदाय के भेदभाव से निपटने की कोशिशों पर यह काफ़ी 'अपर कास्ट रिएक्शन' है. इसलिए यह काफ़ी परेशान करने वाला भी है."
उन्होंने कहा कि अभी इस मुद्दे पर वह ज़्यादा कुछ नहीं कहना चाहतीं क्योंकि यह मामला अब भी सुप्रीम कोर्ट में है और उम्मीद जताई कि सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे को तर्कसंगत तरीके से देखेगा. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें भी ये नियम कई मामलों में अपूर्ण लग रहे हैं और वह इसे कोर्ट के सामने रखेंगी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.














