मुकेश छाबड़ा: पंकज त्रिपाठी, राजकुमार राव जैसे तमाम कलाकारों को मौका देने वाले से मिलिए

Mukesh Chabra

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    • Author, सुप्रिया सोगले
    • पदनाम, मुंबई से, बीबीसी हिंदी के लिए

हर दशक में हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में बदलाव आते हैं. ऐसा ही एक बड़ा बदलाव पिछले दशक में आया, जब हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री को कई प्रतिभाशाली कलाकार मिले.

इन कलाकारों में पंकज त्रिपाठी, नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी, राजकुमार राव, विक्की कौशल, ऋचा चड्ढा, हुमा क़ुरैशी, फ़ातिमा सना शेख़, ज़ायरा वसीम, सान्या मल्होत्रा, जयदीप अहलावत, विनीत कुमार सिंह, श्रेया धन्वन्तरी जैसे नाम शामिल हैं.

क्या आप जानते हैं कि इन कलाकारों को किसने ढूंढा और फ़िल्मों में इन्हें किसने मौका दिया? ये हैं कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा. बीबीसी से ख़ास बातचीत में मुकेश छाबड़ा ने अपने सफ़र को साझा किया.

क्या होती है कास्टिंग?

एक फ़िल्म की कहानी या पटकथा में कई किरदार होते हैं, उसके लिए निर्देशक और कहानी के नज़रिए के अनुसार कलाकारों को चुनना और कहानी में पिरोना होता है. ऐसा इसलिए कि कहानी कहने के लिए निर्देशक को कलाकारों की ज़रूरत होती है.

किस किरदार में कौन कलाकार सही बैठेगा इसे तय करने को ही कास्टिंग कहते हैं और यह काम करने वाले को कास्टिंग डायरेक्टर कहा जाता है. फ़िल्म बनाने में यह काम बहुत अहम माना जाता है.

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इमेज कैप्शन, नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी के साथ मुकेश छाबड़ा

कौन हैं मुकेश छाबड़ा?

दिल्ली के मध्यवर्गीय परिवार में जन्मे मुकेश छाबड़ा के माता-पिता फ़िल्मों और फ़िल्मी गानों के बड़े शौक़ीन रहे हैं. उनके पिता हर सप्ताहांत उन्हें फ़िल्म दिखाने ले जाया करते थे. जब वो 11 साल के थे, तब उनके पिता ने उन्हें नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा के 'समर थिएटर वर्कशॉप' में भेजा था.

बचपन से ही फ़िल्मों से प्रभावित मुकेश छाबड़ा ने माना कि उन्होंने जब सलमान ख़ान की 'बाग़ी' और 'पत्थर के फूल' देखी, तो उसका उन पर गहरा प्रभाव पड़ा.

नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा में वे TIE यानी थिएटर इन एजुकेशन कंपनी से जुड़े थे. उस दौरान उन्होंने NSD से जुड़े कई कलाकारों सहित शाहरुख़ खान और इरफ़ान ख़ान की कहानियाँ सुनीं.

जब वे 15 साल के हुए तो 'दिल से' फ़िल्म आई. इस फ़िल्म का भी उन पर बहुत प्रभाव पड़ा. उन्होंने तय किया कि उन्हें फ़िल्मी दुनिया में क़दम रखना है. उसके बाद वे दिल्ली में फ़िल्मों की कास्टिंग में मदद करने लगे.

करियर की शुरुआत

मुकेश छाबड़ा जब दिल्ली में NSD-TIE में थे, तब निर्देशक विशाल भारद्वाज और राकेश ओमप्रकाश मेहरा अपने विज्ञापन के लिए कलाकार तलाशने में मुकेश छाबड़ा की मदद लिया करते थे.

ऐसा करते-करते वो उनकी फ़िल्मों में असिस्टेंट बन गए, जहाँ वे अभिनेता तलाश किया करते थे. अनौपचारिक रूप से शुरू हुए इस काम को उन्होंने 2005 में मुंबई आकर औपचारिक रूप दे दिया.

मुकेश छाबड़ा 2005 में जब मुंबई आए तो फ़िल्मों का वो दौर काफ़ी अलग था. उस समय नए अभिनेता ज़्यादा नहीं आ रहे थे. जो एक्टर एक बार जो किरदार कर लेते थे, उन्हें उसी टाइम के किरदार मिला करते थे. नए कलाकारों को मौक़ा बहुत कम मिल रहा था.

शेखर कपूर की 'बैंडिट क्वीन' और राम गोपाल वर्मा की 'सत्या' में नए और प्रतिभावान कलाकारों को मौका मिला, पर ऐसा सिर्फ़ कुछेक फ़िल्मों में ही हुआ और इन फ़िल्मों के बीच बहुत लंबा अंतर भी था.

लगभग 300 फ़िल्मों में कास्टिंग कर चुके मुकेश छाबड़ा के मुताबिक़, उन्हें 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर' ने भरपूर शोहरत दिलवाई. साथ ही कास्टिंग की अहमियत से फ़िल्म इंडस्ट्री को भी रूबरू करवाया.

गैंग्स ऑफ़ वासेपुर के बाद लोगों को अंदाज़ा हुआ कि फ़िल्म इंडस्ट्री को नए कलाकारों की ज़रूरत है.

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पंकज त्रिपाठी

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गैंग्स ऑफ़ वासेपुर में नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी, पंकज त्रिपाठी, ऋचा चड्ढा, हुमा क़ुरैशी, जयदीप अहलावत, राजकुमार राव, विनीत सिंह, ज़ीशान क़ादरी, जमील ख़ान जैसे कलाकारों को मौक़े के साथ-साथ दर्शकों का प्यार भी मिला.

हालाँकि गैंग्स ऑफ़ वासेपुर की कास्टिंग उनके लिए आसान न थी. 384 किरदारों की कास्टिंग में उन्हें एक साल का वक़्त लग गया. उनकी टीम ने नए कलाकारों की तलाश में दिल्ली, लखनऊ, पटना, बनारस के थिएटर ग्रुप से मुलाक़ात की.

उस समय स्मार्टफ़ोन न होने के कारण अभिनेताओं का ऑडिशन टेप में लिया जाता था. सही अभिनेता का चयन बहुत ही जटिल प्रक्रिया होती थी. मुकेश छाबड़ा ने गैंग्स ऑफ़ वासेपुर फ़िल्म की कास्टिंग से जुड़े कुछ क़िस्से साझा किए.

दर्शकों के बीच 'कालीन भइया' के नाम से मशहूर पंकज त्रिपाठी आज सबसे महंगे कलाकारों में गिने जाते हैं. लेकिन उस दौर में वो काम के लिए काफ़ी हाथ-पैर मार रहे थे. मुकेश छाबड़ा ने बताया कि फ़िल्म के निर्देशक अनुराग कश्यप, सुल्तान क़ुरैशी के किरदार के लिए पंकज त्रिपाठी को लेने के लिए राज़ी नहीं थे.

मुकेश छाबड़ा ने अनुराग से कहा कि उन्हें जो अभिनेता पसंद है, उनका और पंकज त्रिपाठी दोनों का ऑडिशन करते हैं और जो बेहतर लगेगा, उसे ले लिया जाएगा.

ऑडिशन के बाद अनुराग कश्यप ने जब पंकज त्रिपाठी का अभिनय देखा तो वे चौंक गए और कहा कि वो बहुत ही अच्छे एक्टर हैं. इस तरह से पंकज त्रिपाठी उस फ़िल्म का हिस्सा बन गए.

पंकज त्रिपाठी ने मुकेश छाबड़ा के दफ़्तर की दीवार पर तब लिखा, "गैंग्स ऑफ़ वासेपुर के लिए शुक्रिया." इस फ़िल्म ने पंकज त्रिपाठी को पहचान दी.

अनुराग कश्यप के असिस्टेंट मुरारी कुमार को गुड्डू का किरदार दिया गया जो फ़िल्म में फैज़ल खान (नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी) का ख़ास बन जाता है.

मुकेश छाबड़ा

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राजकुमार राव और विक्की कौशल की बदली ज़िंदगी

राजकुमार राव हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री के बेहतरीन अभिनेताओं में गिने जाते हैं. 2013 में उन्हें फ़िल्म 'शाहिद' के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका है. लेकिन आपको बता दें कि हंसल मेहता, राजकुमार राव के साथ काम नहीं करना चाहते थे.

राजकुमार राव को मुकेश छाबड़ा श्रीराम सेंटर ऑफ़ परफॉर्मिंग आर्ट के दिनों से जानते थे. वे उनके जूनियर थे. मुकेश को पता था ​कि वे बहुत ही अच्छे अभिनेता हैं.

शाहिद फ़िल्म के लिए हंसल मेहता में झिझक थी कि नया अभिनेता है जिन्हें कोई जानता-पहचानता नहीं. ऐसे में नए चेहरे पर फ़िल्म को फ़ंडिंग नहीं मिलेगी, तो फ़िल्म कैसे बनेगी.

हालांकि मुकेश के आग्रह पर हंसल मेहता ने चाय पर राजकुमार राव से मुलाकात की और उस मुलाक़ात से हुई दोनों की दोस्ती ने इतिहास रच दिया. शाहिद के अलावा इन दोनों ने सिटी लाइट्स, ओमर्टा, अलीगढ़, बोस: डेड और अलाइव सिरीज़ में एक साथ काम किया.

विक्की कौशल, उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक, संजू, राज़ी जैसी फ़िल्मों में अपने अभिनय का लोहा मनवा चुके हैं. उनकी पहली फ़िल्म 'मसान' को राष्ट्रीय पुरस्कार से भी नवाज़ा गया. उसमें उनके अभिनय की तारीफ़ भी हुई. लेकिन विक्की कौशल मसान फ़िल्म के लिए पहली पसंद नहीं थे.

अभिनय की समझन बेहतर करने के लिए विक्की कौशल ने गैंग्स ऑफ़ वासेपुर में अनुराग कश्यप को असिस्ट किया. मसान की शूटिंग शुरू होने से पहले जिस अभिनेता का चयन हुआ, वे किसी कारण से उसे कर नहीं पाए.

उसके बाद शूटिंग शुरू होने के तीन या चार दिन पहले उनका ऑडिशन अनुराग कश्यप को भेजा गया. इस तरह उनका चयन हुआ. विक्की उससे पहले 'लव शव ते चिकन खुराना' और 'बॉम्बे वेलवेट' में छोटे किरदार निभा चुके थे.

दंगल, आमिर ख़ान

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दंगल की छोरियां

आमिर खान की फ़िल्म दंगल ने हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री को फ़ातिमा सना शेख़, सान्या मल्होत्रा और ज़ायरा वसीम जैसी कई शानदार अभिनेत्रियां दीं. मुकेश छाबड़ा के मुताबिक़, दंगल की कास्टिंग बहुत ही चुनौतीपूर्ण थी.

आमिर ख़ान के साथ मुकेश छाबड़ा 'रंग दे बसंती' में काम कर चुके थे. निर्देशक नितेश तिवारी के साथ वो 'चिल्लर पार्टी' और 'भूतनाथ' जैसी फ़िल्मों में भी काम कर चुके थे.

चार लड़कियों को ढूंढने की ज़िम्मेदारी मुकेश के कंधों पर थी, जिसके लिए उन्हें डेढ़ साल लगे. पूरे देश से उन्होंने 14 हज़ार लड़कियों का ऑडिशन किया. फिर उन्हें शॉर्टलिस्ट करके 1,000 पर लाया गया. उसके बाद इस लिस्ट को 200, 80, 40, 20 और फिर 4 पर लाया गया.

शॉर्टलिस्ट की गई ये चारों लड़कियां फ़िल्म के रिलीज़ होने के बाद अपनी छाप छोड़ने में सफल रहीं. ज़ायरा वसीम हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री को अब अलविदा कह चुकी हैं. लेकिन बाक़ी अभिनेत्रियां फ़िल्म इंडस्ट्री में तमाम फ़िल्में कर रही हैं और अपना एक मुकाम बना चुकी हैं.

ऐसा माना जाता है कि कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा की गैंग्स ऑफ़ वासेपुर ने कास्टिंग के प्रति फ़िल्म इंडस्ट्री के नज़रिए को बदल डाला. गैंग्स ऑफ़ वासेपुर के बाद कहा जाने लगा कि 'स्टार नहीं एक्टर चाहिए.'

अब उन पर कलाकारों के चयन में कोई दबाव नहीं होता. इसके बजाए अब ये कहा जाता है कि जो किरदार के लिए सही है वैसे अभिनेता लेकर आइए.

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इमेज कैप्शन, विक्की कौशल और तापसी पन्नू के साथ मुकेश छाबड़ा

छोटे शहर का टैलेंट

140 करोड़ की आबादी वाले भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है. पूरे हिंदुस्तान में कलाकारों की भरमार है. आज के दौर के कई बेहतरीन अभिनेता छोटे शहर से हैं.

स्मार्टफ़ोन की दुनिया में मुकेश छाबड़ा सिर्फ़ मुंबई ही नहीं बल्कि छोटे शहर के कलाकारों को भी मौका दिलवाने की कोशिश कर रहे हैं.

वे कहते हैं​ कि 'हर इंसान मुंबई नहीं आ सकता, किसी को पैसे की दिक़्क़त है तो किसी की परिस्थितियां उसे मुंबई नहीं आने देतीं.'

आज के दौर में कहानी जिस जगह की होती है, वे वहीं से स्थानीय कलाकारों का चयन करते हैं, ताकि कहानी में नयापन और ताज़गी आए. नए टैलेंट को भी मौक़ा मिलता है और कहानी में स्थानीय लहजा और विश्वसनीयता भी आती है.

मुकेश छाबड़ा का कहना है कि 'हमारे देश में पचासों नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी और पचासों राजकुमार राव एक मौक़े का इंतज़ार कर रहे हैं.' उनकी कोशिश है कि ऐसे कलाकारों को मौका मिले.

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सोशल मीडिया इन्फ़्लुएंसर और कास्टिंग

आज के दौर में सोशल मीडिया पर अधिक से अधिक फ़ॉलोवर बढ़वाने की होड़ लगी हुई है. लेकिन मुकेश छाबड़ा ने साफ़ किया कि सोशल मीडिया इन्फ़्लुएंसर का अभिनय से ज़्यादा लेना-देना नहीं होता है.

वे ये भी कहते हैं कि हमारे देश के बेहतरीन अभिनेता के सोशल मीडिया फ़ॉलोवर कम हैं और जिन्हें अभिनय बिल्कुल नहीं आती, उनके फ़ॉलोवर बहुत ज़्यादा हैं. इसलिए उनका कहना है कि वे कास्टिंग करते समय सोशल मीडिया स्टारडम को नहीं गिनते.

मनोरंजन जगत में अक्सर दबी आवाज़ में कास्टिंग काउच की बात उठती आई है.

इस पर मुकेश छाबड़ा कहते हैं, "मैंने भी सुना है. ये सब कहानियां ही हैं, पर मैंने जिन लोगों के साथ काम किया है, वहां ऐसा नहीं हुआ. मैं दूसरे लोगों की टिप्पणियों पर कुछ नहीं कहना चाहता. हम अपना काम पूरी निष्ठा के साथ करते हैं. ये बहुत ही कठिन काम है जिसमें समय लगता है. हमें दूसरी चीज़ें सोचने का मौक़ा ही नहीं मिलता."

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अगला स्टार कौन?

अपने एक दशक के करियर में मुकेश छाबड़ा ने कई कलाकारों को लॉन्च किया और आज वे कलाकार स्टार बन चुके हैं. लेकिन मुकेश किसी भी कलाकार के स्टार बनने का श्रेय नहीं लेते.

उनका कहना है कि उन्हें काम दिया गया था किरदार ढूंढने का, जिसके लिए उन्हें पैसे मिले. अब ये अभिनेता पर निर्भर करता है कि उनकी क़िस्मत उन्हें कहां ले जाती है. उनका मानना है कि कलाकार का टैलेंट और ऊपर वाला उन्हें स्टार बनाता है.

उन्होंने आने वाले क़रीब 30-40 शो और फ़िल्मों की कास्टिंग की है. इनमें राजकुमार हिरानी की डंकी, नितेश तिवारी, अभिषेक कपूर, अनुभव सिन्हा, हंसल मेहता की फ़िल्मों के साथ राज और डीके का नया शो भी शामिल है.

मुकेश छाबड़ा ने दावा किया है कि स्कैम-2 में जो अभिनेता दिखेगा, वो एक नई खोज हैं और उनका काम दर्शकों को चकित करेगा.

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