फ़िल्म मेकिंग में हिट, बॉलीवुड में क्यों मिसफिट

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- Author, पूजा मेहरोत्रा
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
बॉलीवुड की पहली महिला फिल्म निर्देशक थी फ़ातिमा बेगम. 1926 में उन्होंने फिल्म 'बुलबुल ए परिस्तान' का निर्देशन किया था. उस वक्त एक ख़ास तबके की महिलाएं ही आगे बढ़ पाती थीं.
1926 से 2017 के बीच 91 साल बीत चुके हैं, लेकिन बॉलीवुड में महिला निर्देशकों की गिनती उंगलियों पर की जा सकती है. जो निर्देशन में हैं उन्हें लंबा संघर्ष करना पड़ा है. निर्देशन कर रही महिलाएं क्या कहती हैं-

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निर्देशक लीना यादव- "शब्द", "तीन पत्ती" और "पार्च्ड" फिल्मों का निर्देशन किया है. "पार्च्ड" को टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में काफी सराहना मिली है.
इसे फ्रांस में 33वें सप्ताह में भी देखा जा रहा है. लीना यादव कहती हैं, "हमारे समाज में महिलाएं हमेशा से हाशिए पर रखी जाती रही हैं. बॉलीवुड भी इसी समाज का हिस्सा है."
स्टोरी, कॉन्सेप्ट कितना भी अच्छा हो, फिल्म हीरो पर मिलती है. "1995 में मैंने बॉलीवुड में फिल्म एडिटिंग से कदम रखा. तब भी लोग हमें देखकर कहते थे लड़की और एडिटिंग--कर पाएगी..?" और अब निर्देशन कर पाएगी?
"हमें यानी लड़कियों को बस घबराना नहीं चाहिए. करते रहना चाहिए जो करना है." वो आगे कहती हैं "अगर आपके काम पर कुछ लोग फब्तियां कसेंगे तो कुछ लोग तारीफ़ भी करेंगे. तारीफ़ को साथ रखिए और आगे बढिए."
वो पूछती हैं, "महिला निर्देशक क्या होता है, आप पुरुषों को पुरुष निर्देशक बुलाते हैं क्या? तो हमें महिला निर्देशक क्यों? हम सिर्फ निर्देशक हैं."
निर्देशक शागुफ़्ता रफ़ीक़- प्रॉस्टीट्यूशन से बार डांसर और फिर स्क्रिप्ट राइटर बनी शागुफ्ता ने फिल्म निर्देशन में कदम रख दिया है.
महेश भट्ट के बैनर तले वो 'दुश्मन' फिल्म का निर्देशन कर रही हैं जिसे लिखा भी उन्होंने है. आशिक़ी-2 उनकी लिखी सबसे हिट फिल्म है जिसे वो अपने जीवन की कहानी कहती हैं.

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मर्डर-2, राज-2 जैसी फिल्में भी शगुफ्ता ने लिखी है और शगुफ्ता महज सातवीं पास हैं. शगुफ्ता कहती हैं, "बॉलीवुड नए लोगों को एक्सेप्ट नहीं करता. बिल्कुल बाहरी से तो उनका व्यवहार बहुत ही ख़राब है.''
"अगर लड़की हो तो बिना काम देखे ही बड़ा-सा प्रश्नचिन्ह लगा देते हैं. मुझे 20 साल लग गए हैं..निर्देशक की कुर्सी तक पहुंचने में. इसका पूरा श्रेय मैं पूजा भट्ट को देती हूं."
गौरी शिंदे 'इंगलिश- विंगलिश' और 'डियर ज़िंदगी' जैसी फिल्मों के साथ अपने निर्देशन, लेखन और सोच का लोहा मनवा चुकी हैं. उनकी दोनों ही फिल्मों ने महिलाओं के विषय को संजीदगी से उठाया और उन्हें 2012 में फिल्म फेयर का बेस्ट फिल्म निर्देशक (डेब्यू) का सम्मान भी मिला.

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उनका मानना है, "अगर सोसाइटी आगे बढ़ने नहीं दे रही है तो अपने काम से उन्हें रास्ता दिखाना ही एक रास्ता बच जाता है." गौरी को फिल्म इंडस्ट्री में उतने पापड़ नहीं बेलने पड़े. शिंदे फिल्म निर्देशन से पहले विज्ञापन जगत का जाना-माना चेहरा थीं.
उनके कई विज्ञापनों से समाज में बदलाव का संदेश दिया था. 2013 का तनिष्क जूलरी का विज्ञापन जिसमें एक सांवली महिला है जिसकी दूसरी शादी हो रही है. उसकी 5-6 साल की बच्ची भी है. ये विज्ञापन ख़ूब चर्चा में रहा था.

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अनुषा रिज़वी ने देश में किसानों की आत्महत्या की समस्या को 'पीपली लाइव' में लिखा और निर्देशित किया. फिल्म को दुनियाभर में खूब सराहना मिली. डरबन फिल्म में भी सर्वश्रेष्ठ फिल्म का अवॉर्ड जीता.
अनुषा कहती हैं "मैं पत्रकार रही हूं, मुझे प्रोड्यूसर मिलने में परेशानी नहीं हुई. मुझे अपनी टीम बनाने में बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ा."
"लड़कियों के साथ जल्दी काम नहीं करना पसंद करते हैं. तब ज्यादा जब वो बिल्कुल नई हो. हमारे लिए कुछ चीजें आसान थी तो कुछ बहुत मुश्किल."
दिव्या कुमार खोसला निर्माता और निर्देशक हैं. 'यारियां' और 'सनम रे' फिल्में निर्देशित की हैं. दिव्या कहती हैं, "फिल्म इंडस्ट्री में इसी समाज के लोग हैं जिन्होंने महिलाओं पर कई तरह की पाबंदी लगा कर रखी है."

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महिलाओं को खुद को साबित करने का समय बहुत कम मिलता है. एक बार कुछ अच्छा कर दिया है तो उम्मीदें बढ़ जाती हैं और सफल नहीं हुए तो आपको सिरे से नकार दिया जाता है. यहीं हम लड़कियां हार जाती हैं."
वो कहती हैं, "फिल्में फ्लॉप तो बड़े-बड़े स्टार की हो जाती है, लेकिन बात लड़कियों की हो तो उनकी काबिलियत पर ज़्यादा सवाल उठाया जाता है. यही हमारा स्ट्रगल है."
निर्देशक अश्विनी अय्यर तिवारी को 2017 में उनकी फिल्म 'निल बटे सन्नाटा' के लिए फिल्म फेयर सर्वश्रेष्ठ (डेब्यू) निर्देशक का अवॉर्ड मिला है.

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इन सबके अलावा कई और निर्देशक महिलाएं हैं जिन्होंने लंबा सफ़र तय किया है और जिनके काम को काफी सराहा गया है, फ़राह ख़ान (मैं हूं न, हैप्पी न्यू ईयर), ज़ोया अख़्तर (दिल धड़कने दो), रीमा कागती (तलाश), किरण राव (धोबी घाट).
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