शम्मी कपूर: दो शादी, नूतन-मुमताज़ से लव अफ़ेयर और रोमांस का नया अंदाज़ पेश करने वाला स्टार

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- Author, प्रदीप कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
1957 का साल भारतीय फ़िल्म इतिहास के सबसे सुनहरे सालों में शुमार है. यक़ीन ना हो तो इस साल की फ़िल्मों को देख लीजिए.
इसी साल 'मदर इंडिया' आयी थी, जिसे आज तक ब्लॉकबस्टर मूवी माना जाता है. इसी साल दिलीप कुमार के 'नया दौर' का जादू देखने को मिला था और गुरुदत्त की क्लासिक 'प्यासा' भी इसी साल प्रदर्शित हुई थी.
तीन सदाबहार हिट फ़िल्मों के बीच भारतीय सिनेमा को एक नया सितारा भी इसी साल मिला था. शम्मी कपूर के चार साल के संघर्ष और 19 फ़िल्मों की नाकामी का सिलसिला इसी साल थमा था. आमिर ख़ान के चाचा नासिर हुसैन के निर्देशन में बनी फ़िल्म 'तुमसा नहीं देखा' से शम्मी कपूर ने हंगामा मचा दिया था.
ये हंगामा कैसे और क्यों मच गया था, इस पर बात आगे बढ़ाने से पहले ये जानना दिलचस्प है कि शम्मी कपूर इस फ़िल्म से पहले नाकामी के उस बियाबां में थे जहां से उन्होंने फ़िल्मों को अलविदा कहकर असम के चाय बगानों में मैनेजरी करने का मन बना लिया था.
ऐसा होने की वजहें भी थीं, कहते हैं कि बरगद के पेड़ के नीचे कोई दूसरा पेड़ नहीं पनपता. शम्मी कपूर का सामना तो तीन-तीन विशाल बरगदों से था. परिवार के अंदर और परिवार के बाहर भी.
परिवार के अंदर खुद पृथ्वीराज कपूर जैसी शख़्सियत थी, जो पिता होने के साथ साथ बहुत बड़े अदाकार थे. हालांकि उनका पहला लगाव थिएटर ही था. पृथ्वीराज कपूर के बेटे राजकपूर के लिए भी अपने पिता के सामने खुद को साबित करने की चुनौती थी, लेकिन अपनी कलात्मकता और क्रिएटिविटी के साथ राजकपूर ने ख़ुद को बेहद कम उम्र में ही स्थापित कर लिया था.
शम्मी कपूर को 1951 में जीवन ज्योति फ़िल्म मिली थी, वे अपने करियर की शुरुआत कर रहे थे वहीं उस साल राजकपूर की आवारा ने उन्हें देश दुनिया भर में कामयाबी के शिखर पर पहुंचा दिया था. शम्मी कपूर की पहली फ़िल्म 1953 में प्रदर्शित हुई और अगले चार साल तक शम्मी कपूर नाकामी के बीच डोलते रहे, हालांकि इसी नाकामी के बीच उन्होंने 1955 में उम्र और कामयाबी, दोनों में सीनियर रहीं स्टार अदाकारा गीता बाली से शादी कर ली.
शम्मी कपूर ने उस दौर के बारे में ब्रिटिश चैनल 4 की सिरीज़ मूवी महल में 'शम्मी कपूर, ऑलवेज इन टाइम' के लिए नसरीन मुन्नी कबीर से कहा था, "लोग मेरी तुलना राज जी से करने लगे थे. स्टेज में तो ऐसा करके काम चल गया था लेकिन फ़िल्मों में यह मुश्किल था. मेरी मुश्किलें तब और बढ़ गईं जब गीता बाली से शादी हो गई. मैं केवल पृथ्वीराज कपूर का बेटा और राज कपूर का भाई ही नहीं रहा, अब गीता बाली का पति भी हो गया था."

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आसान नहीं था जगह बनाना
ये वो दौर था जब भारतीय फ़िल्म दुनिया में राज कपूर, दिलीप कुमार और देव आनंद की फ़िल्मों का जलवा था, या कहें इन तीनों को ध्यान में रखकर फ़िल्में और उनकी भूमिकाएं लिखी जाती थीं. लिहाज़ा शम्मी कपूर को कोई अच्छी भूमिका भी नहीं मिल रही थीं.
शम्मी कपूर को इन्हीं दिनों तुमसा नहीं देखा मिली, जिसमें उनको लेने के लिए नासिर हुसैन तैयार नहीं थे. ये फ़िल्म वैसी भी पहले देव आनंद को ऑफ़र की गई थी. उनके पास समय नहीं था. नासिर हुसैन इसके बाद इसमें सुनील दत्त को लेना चाहते थे, लेकिन उनके पास भी शूटिंग के लिए डेट्स नहीं थीं.
बॉलीवुड टॉप 20 सुपस्टार्स ऑफ़ इंडियन सिनेमा में शम्मी कपूर पर लिखे लेख द स्टार लाइक नो अदर में नसरीन मुन्नी कबीर ने लिखा है कि शशधर मुखर्जी ने नासिर हुसैन को कहा था कि 'तुम शम्मी कपूर को ट्राय करो, मैं इसमें संभावनाएं देख रहा हूं.'
इस फ़िल्म में काम करने के दौरान ही शम्मी कपूर ने फ़िल्म इंडस्ट्री को अलविदा कहने का मन बना लिया था. शम्मी कपूर ने अपने ऊपर बनी एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म में कहा है, "मैं फ़िल्म इंडस्ट्री को छोड़कर कुछ और करने की सोचने लगा था. ऐसे ही किसी दिन गीता बाली ने मुझसे कहा था कि शम्मी कपूर, तुम एक दिन बडे़ स्टार बनोगे. मेरी पत्नी की बात सच हुई."
तुमसा नहीं देखा ने आख़िर ऐसा क्या कर दिया था, जो शम्मी कपूर के करियर में इससे पहले नहीं हो पाया था. दरअसल इस फ़िल्म के साथ शम्मी कपूर की स्टाइल और अंदाज़ का वो दौर शुरू हुआ जिसने उन्हें अगले एक दशक तक कामयाबी के शिखर पर बिठाए रखा.
दरअसल, तुमसा नहीं देखा के रिलीज़ से पहले भारतीय सिनेमा के नायक अमूमन गाते हुए ही दिखते थे, डांस नहीं करते थे. खड़े डांस करना या टहलने के अंदाज़ में हाथ-पैर हिलाने के संसार को शम्मी कपूर ने अपने अंदाज़ से हिला कर रख दिया.
तुम सा नहीं देखा से पहली बार ऐसा हीरो सामने आया था, जिसे वाक़ई में किसी ने नहीं देखा था. जिसके हाथ-पैर सब बिजली की तरह चलते दिख रहे थे, उसकी चाल में सितारों वाली अकड़ थी, जो डांस कर रहा था (भले ही उछल कूद वाली शक्ल में हो), जो अपने चेहरे से हर तरह के भाव ज़ाहिर कर रहा था, जिसकी डॉयलॉग डिलिवरी में भी एक रिदम भरा अंदाज़ दिख रहा था. और तो और, बालों के अंदाज़ से लेकर कपड़ों तक के अंदाज़ पर शम्मी कपूर ने खासी मेहनत की थी.
इस फ़िल्म के बारे में कपूर्स: द फर्स्ट फैमिली ऑफ़ इंडियन सिनेमा की लेखिका मधु जैन से मुंबई के साइकॉलॉजिस्ट उदयन पटेल ने कहा है, “वह पहले अदाकार थे जिन्होंने भारतीय सिनेमाई पर्दे पर युवा दिलों की चाहत का खुलेआम इज़हार किया.”
तुमसा नहीं देखा का गाना, 'जवानियां ये मस्त मस्त बिन पिए, जलाती जा रही हैं राह में दिए' ने युवा पीढ़ी की लालसाओं को नया आयाम दिया और बॉक्स ऑफ़िस पर फ़िल्म का जादू चल निकला और शम्मी कपूर यहां से स्टार बने.
इसी पुस्तक में निर्माता निर्देशक और बाद में शम्मी कपूर के समधी बने मनमोहन देसाई कहते हैं, “अगर शम्मी पर्दे पर दिख रहे हों तो हमेशा रोने वाले किरदार देवदास-पारो को भी छेड़छाड़ या चुहल करने की गुंजाइश मिल जाएगी.”

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द स्टार लाइक नो अदर
नसरीन मुन्नी कबीर ने अपने आलेख द स्टार लाइक नो अदर में लिखा है, “शम्मी कपूर से पहले भारतीय हीरो पर्दे पर मैन की तरह नज़र आते थे. जो या तो घर परिवार की ज़िम्मेदारियों को ढो रहा है या फिर संस्कारों से बंधा हुआ है. शम्मी कपूर ने यह बैरियर तोड़ दिया था, उन्हें पर्दे पर देखना एक यूथ या युवा लड़के को देखना था. यह अंतर उन्होंने एक फ़िल्म से पैदा कर दिया.”
इस फ़िल्म की कामयाबी के बाद उनके घर के बाहर फ़िल्म निर्माताओं की कतार लग गई. शम्मी कपूर की जीवनी शम्मी कपूर: द गेम चेंजर में रऊफ अहमद लिखते हैं, “तुमसा नहीं देखा की कामयाबी को भुनाने के लिए उन्हें साइन करने के लिए लोगों की भीड़ थी लेकिन गीता बाली ने उन्हें सलाह दी कि सोच समझकर फ़िल्में साइन करो. इसका एक आसान रास्ता भी उन्होंने सुझाया कि एक लाख रुपये से कम क़ीमत पर किसी फ़िल्म को हां नहीं कहो.”
उस जमाने में एक लाख रुपये की क्या अहमियत थी, इसका अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि राजकपूर ने आवारा के लिए अपने पिता को 50 हज़ार रुपये दिए थे जबकि के. आसिफ़ ने मुगले आज़म के लिए पृथ्वीराज कपूर को 75 हज़ार रुपये दिए थे.
बहरहाल, एक लाख रुपये की बात की गांठ को शम्मी कपूर ने इस तरह बांधा कि उनके अपने दोस्त बप्पी सोनी ने उन्हें 90 हज़ार रुपये की पेशकश की तो उन्होंने फ़िल्म करने से इनकार कर दिया. शम्मी कपूर को एक लाख रुपये देने के लिए भी प्रॉड्यूसर तैयार हो गए थे. बावजूद इसके शम्मी कपूर ने अगले छह महीनों तक कोई फ़िल्म साइन नहीं की. उनके स्टारडम को पक्के तौर पर जमाने का काम नासिर हुसैन के निर्देशन में बनी दूसरी फ़िल्म ‘दिल देके देखो’ ने किया. 1959 में आयी इस फ़िल्म ने साबित किया कि तुमसा नहीं देखा, की कामयाबी कोई तुक्का नहीं थी और शम्मी कपूर का स्वैग स्थापित हो गया.
ये स्वैग कैसा था, इसको लेकर ऋषि कपूर ने अपनी ऑटोबायोग्राफ़ी खुल्लम खुल्ला में लिखा है, “शम्मी अंकल हम सबके फेवरिट थे. पापा तो केवल पापा की तरह थे, हमलोग उन्हें स्टार की तरह नहीं देख पाते थे. लेकिन शम्मी अंकल को देखना, किसी स्टार को देखना था. एकदम फैशनेबल अंदाज़ था उनका. मैं ठीक से याद कर पा रहा हूं तो एक समय उन्होंने दो बाघों को पालतू बनाया हुआ था, जब वो बड़े हुए तो उन्हें ज़ू को सौंपना पड़ा था. वे हमारे बगल वाले बंगले में रहा करते थे. और उनके घर जाना ट्रीट की तरह होता था. वे एक बड़े प्रोजेक्टर पर हम सब को फ़िल्म दिखाते थे.”
शम्मी कपूर के अंदाज़ पर ऋषि कपूर ने लिखा है, “वे शिकार पर जाते थे और हमलोग भी कई बार उनके साथ गए. वे दोनों हाथों में बीयर की बोतल के साथ जीप चला लेते थे.” खाने और पीने के शम्मी कपूर बेहद शौकीन रहे और थोड़े समय बाद ही उन्हें मोटापे ने घेर लिया. ऋषि कपूर याद करते हैं कि चालीस साल की उम्र में शम्मी अंकल ने लीडिंग रोल करना बंद कर दिया था. ऐसा करने वाले भी वे अपनी तरह के इकलौते स्टार थे.
लेकिन इससे पहले उन्होंने फ़िल्मों के कुलीन और अभिजात्य समझे जाने वाले हीरो की दुनिया बदल दी थी. मधु जैन ने उनके परिवार वालों के हवाले से लिखा है कि शम्मी कपूर, अमेरिकी अभिनेता एरल फ्लिन से काफ़ी प्रभावित थे और उनकी आत्मकथा माय विकेड, विकेड थिंग के प्रभाव में थे. लिहाज़ा वे सुर्खियां बटोरने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देते थे.

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दो-दो शादी, दो-दो लव अफ़ेयर
उन्होंने अपने निजी जीवन में फ़िल्मों की कामयाबी से पहले ही तूफ़ान खड़ा कर लिया था. नूतन और उनके प्रेम प्रसंग के चलते ही नूतन की मां शोभना समर्थ ने नूतन को यूरोप पढ़ने भेज दिया था. शम्मी कपूर नूतन को हमेशा अपनी चाइल्डहुड गर्लफ्रेंड कहते रहे. इसके बाद उनका दिल मधुबाला पर भी मिटा और उनसे वो शादी करने के बारे में सोचने लगे थे. मधुबाला का प्रेम उन दिनों दिलीप कुमार के साथ परवान पर था और शम्मी कपूर केवल कपूर ख़ानदान के शहज़ादे थे.
गीता बाली के साथ उन्होंने झटके से शादी कर ली थी, वो भी मंदिर में और घर परिवार वालों को इसके लिए तैयार होने का मौका नहीं मिला था. कपूर खानदान में तब तक महिलाओं को फ़िल्मों में काम करने की आज़ादी नहीं थी, इसलिए राजकपूर, इस शादी को लेकर बहुत उत्साहित नहीं हुए थे.
राजकपूर की शादी अरैंज मैरिज थी. रऊफ अहमद ने शम्मी कपूर: द गेम चेंजर में राजकपूर के सहायक रहे लेख टंडन के हवाले से लिखा है, “राजकपूर संभवत सबसे ज़्यादा कंजर्वेटिव कपूर थे. मैं उनके साथ आरके कॉटेज में था जब घर से फ़ोन आया था कि जल्दी आना है क्योंकि शम्मी कपूर दुल्हन के साथ आ रहे हैं. तब उन्होंने कह दिया था कि वे व्यस्त हैं नहीं आ पाएंगे. लेकिन उन्होंने अपना मन बदला और पार्टी में गए, शायद उन्होंने सोचा होगा कि जब माता पिता का आशीर्वाद शम्मी को मिल गया है तो फिर इस बात को क्यों मुद्दा बनाया जाए.”
हालांकि इस किताब में इसका ज़िक्र है कि शम्मी कपूर और गीता बाली की शादी के बाद ही राजकपूर अपने परिवार के साथ दूसरे घर में रहने चले गए थे. लेकिन मधु जैन ने कपूर परिवार पर जो किताब लिखी है, उसमें लिखा है कि ये नियम पृथ्वीराज कपूर जी ने बनाया हुआ था कि उनके बेटे पिता बनने के बाद अपने घरों में रहने जाएंगे.
वैसे दिलचस्प ये है कि शम्मी कपूर के शिखर पर रहने के दौरान, राजकपूर ने उनके साथ कभी काम नहीं किया. लेकिन शम्मी कपूर की पहली पत्नी के निधन के बाद वे राजकपूर के परिवार के साथ रहे और दूसरी शादी होने तक उनके बच्चों की देखरेख राजकपूर की पत्नी ने ही की और उनकी दूसरी शादी भी करायी. शम्मी कपूर ने अपने करियर की दूसरी इनिंग में राजकपूर के साथ काम भी किया.
बहरहाल, शम्मी कपूर की ज़िंदगी में 1961 में आयी जंगली भी सुपरहिट फ़िल्म साबित हुई. ‘याहू...कोई मुझे जंगली कहे, कहता रहे...’ कहने वाले शम्मी कपूर के सामने लंदन से पढ़ लिख कर लौटीं सायरा बानो की ये पहली फ़िल्म थी.
वैसे दिलचस्प संयोग है कि जब शम्मी कपूर ने अपने करियर की दूसरी पारी शुरू की तो 1975 में आयी फ़िल्म ज़मीर में वो सायरा बानो के पिता बने थे. इस बीच में 1961 से 1971 तक वे लगातार हिट फ़िल्में देते रहे, जिसमें प्रोफेसर, ब्लफ मास्टर, कश्मीर की कली, राजकुमार, जानवर, तीसरी मंजिल, एन इवनिंग इन पेरिस, ब्रह्मचारी, प्रिंस, तुमसे अच्छा कौन है और अंदाज़ जैसी कामयाब फ़िल्में शामिल हैं.

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नयी अभिनेत्रियों के साथ करिश्मा
इन फ़िल्मों में शम्मी कपूर ने जिस तरह से अपनी अभिनेत्रियों से प्यार किया है, उसके बारे में रणबीर कपूर ने शम्मी कपूर पर बनी डॉक्यूमेंट्री में कहा, “मेरे वालिद ऋषि कपूर कहा करते थे कि रोमांस करना सीखना है तो शम्मी कपूर से सीखो. वाक़ई में जब वे अपनी अभिनेत्रियों के सामने खड़े होते थे तो उनकी आंखों से लगता था कि वे उनसे प्यार ही कर रहे हैं.”
इसी डॉक्यूमेंट्री में आमिर ख़ान ने कहा है कि शम्मी अंकल ने हम सबको रोमांस करना सिखाया है. शम्मी कपूर किस तरह से रोमांस को पर्दे पर दिखाते थे, ये देखना हो तो जानवर फ़िल्म में लाल छड़ी मैदान खड़ी वाला गाना देखिए, पहले कुछ पलों को ऐसा लगेगा कि वाक़ई वे लाल छड़ी से प्यार का इज़हार कर रहे हैं, हालांकि बाद में पता चलता है कि लाल छड़ी के अलावा उस सीक्वेंस में लाल ड्रेस में राजश्री भी हैं.
भारतीय फ़िल्मी पर्दे पर ये शम्मी कपूर ही थे, जिनके सामने हीरोइन भी खुलेआम गाने से नहीं हिचकती कि, ‘ओ मेरे सोना रे सोना, दे दूंगी जान जुदा मत होना रे. मैंने तुझे ज़रा देर में जाना, हुआ कसूर खफ़ा मत होना रे.’
शम्मी कपूर अपने करियर के दौरान नई अभिनेत्रियों के साथ काम करने के लिए मशहूर रहे. चाहे तुमसा नहीं देखा कि अभिनेत्री अमिता रही हों, या फिर मुजरिम की रागिनी, या फिर दिल देके देखो की आशा पारेख. कश्मीर की कली में शर्मिला टैगोर और प्रोफेसर में कल्पना, इन सबने अपना करियर शम्मी कपूर के साथ ही शुरू किया.
बहरहाल कामयाबी के बीच 1965 का साल भी आया जब उनकी पत्नी गीता बाली बीमार हुईं और चेचक के चलते उनकी मौत हो गई. शम्मी कपूर के लिए यह किसी बड़े सदमे से कम नहीं था. जब उन्हें पत्नी के बीमार होने की ख़बर मिली तब वे नासिर हुसैन और विजय आनंद की फ़िल्म तीसरी मंजिल की तुमने मुझे देखा...गाने की शूटिंग कर रहे थे.
महज़ तीन सप्ताह के अंदर ही गीता बाली की मौत हुई और उस वक्त इस बीमारी का ख़ौफ़ ऐसा था कि परिवार के लोगों के अलावा कोई शम्मी कपूर के पास तक नहीं पहुंचा. यहां तक कि पृथ्वीराज कपूर की दोस्ती की वजह से एक ही डॉक्टर गीता बाली को देखने के लिए घर आया.
शम्मी कपूर ने कई मौकों पर कहा है कि वे कामायबी के आसमान पर थे तभी ऊपर वाले ने उनपर ब्रेक लगाया. गीता बाली की मौत के बाद मुमताज़ के साथ उनका अफ़ेयर भी सुर्ख़ियों में रहा. मुमताज़ ने सालों बाद एक इंटरव्यू में बताया है कि शम्मी उनसे शादी करना चाहते थे और यही वजह है कि राजकपूर ने मेरा नाम जोकर फ़िल्म में उन्हें मौका नहीं दिया क्योंकि वे घर की महिलाओं के फ़िल्मों में काम करने के पक्ष में नहीं थे. मुमताज़ अपना करियर छोड़ना नहीं चाहती थीं क्योंकि उन्होंने बड़ी मेहनत से बनाया था और दूसरी तरफ़ शम्मी कपूर को अपने दोनों बच्चों की देखभाल करने के लिए पत्नी चाहिए थी.

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दूसरी शादी की कहानी
इसके बाद शम्मी कपूर का अफ़ेयर बीना रमानी के साथ भी चला. बीना रमानी तब लंदन में पढ़ रही थीं और शम्मी कपूर उन्हें स्पोर्ट्स कार गिफ्ट कर आए थे. लेकिन ये साथ भी लंबा नहीं चला क्योंकि बीना रमानी की उम्र कम थी. ऐसे दौर में राजकपूर की पत्नी कृष्णा कपूर ने भावनगर के राज परिवार की नीला देवी के साथ शम्मी कपूर की शादी की बात चलाई.
भावनगर का राज परिवार, राजकपूर का मित्र परिवार था और थिएटर मालिक होने की वजह से परिवार में शम्मी कपूर का भी आना जाना था. लेकिन शादी की बात थी तो नीला देवी से शम्मी कपूर ने खुद बात की. नीला देवी ने एक इंटरव्यू में याद किया है, “उन्होंने देर रात फ़ोन किया था, लैंड लाइन का ज़माना था. मेरे घर वालों ने शम्मी कपूर को कहा भी रात हो गई है, लेकिन उन्होंने दोबारा फोन कर दिया. अपने बारे में सबकुछ बताया, अफ़ेयर के बारे में भी कहा. फिर पूछा कि आप अपने घर वालों से बात करके बताइए और आप ब्रेकफास्ट करने के लिए आ जाइए हमेशा के लिए मेरे यहां रहने. ये बात सुबह पांच छह बजे तक चलती रही. हमलोग उनके घर गए ब्रेकफास्ट के लिए और वहीं फेरे हो गए.”
1969 में दूसरी शादी के बाद शम्मी कपूर अपने करियर पर थोड़ा ध्यान देने की कोशिश करते इससे पहले राजकुमार फ़िल्म की शूटिंग के दौरान एक अजीब हादसा हो गया. शम्मी कपूर को हाथी पर बैठकर गाना था, यहां के हम राजकुमार. उनके पांव को जंजीर के साथ हाथी के गर्दन तक बांधा गया कि वे गिरें नहीं. और चलते चलते अचानक हाथी ने पीछे मुड़कर देखना शुरू कर दिया. जंजीर से बंधे होने के चलते शम्मी कपूर के घुटने की हड्डी टूट गई लेकिन गाते हुए चेहरे पर उनके शिकन तक नहीं आयी.
पहले ही उछल कूद करते हुए कई बार चोट खा चुके शम्मी कपूर के लिए बहुत मुश्किल समय था और उन्हें महीनों अस्पताल में बिताने पड़े. इस दौरान वे मोटे होते गए. पांव पहले जैसे नहीं रहे तो डांस करना संभव नहीं था ऐसे में उन्होंने खुद पर 1971 में ब्रेक लगा लिया. अंदाज़ उनकी आख़िरी सोलो हिट फ़िल्म थी.
शम्मी कपूर के लिए ये ब्रेक किसी नेमत से कम नहीं था. क्योंकि उनके माता-पिता दोनों कैंसर का सामना कर रहे थे. राजकपूर, मेरा नाम जोकर के फ्लॉप होने के बाद आर्थिक मुश्किलों से घिरे हुए थे और उससे निकलने का रास्ता तलाशने में जुटे थे जबकि शशि कपूर चार-पांच शिफ्टों में काम कर रहे थे, दोनों के पास समय नहीं था. ऐसे में शम्मी कपूर ने अपने माता-पिता की लगातार सेवा की. पृथ्वीराज कपूर के निधन के महज 16 दिन बाद उनकी मां का निधन हो गया.
शम्मी कपूर ने इसके बाद अपनी दूसरी पारी की शुरुआत की. उन्होंने कैरेक्टर रोल्स वाली फ़िल्मों में 1975 में बीआर फ़िल्म्स की ज़मीर से किया. प्रेम रोग, परवरिश, हीरो और विधाता जैसी फ़िल्मों में उन्होंने शानदार काम किया.
वैसे दिलचस्प ये है कि शम्मी कपूर ने बतौर हीरो अपने कामयाबी के दिनों में बीआर चोपड़ा के साथ कभी काम नहीं किया था. रऊफ अहमद ने इसका एक दिलचस्प किस्सा बताया है जो शम्मी कपूर ने उनसे शेयर किया था.
रऊफ अहमद लिखते हैं, “बीआर चोपड़ा उनको गुमराह में लेना चाहते थे. इस फ़िल्म की कहानी के मुताबिक शम्मी कपूर की पत्नी माला सिन्हा, सुनील दत्त के प्यार में पड़ जाती हैं. कहानी सुनने के बाद शम्मी कपूर ने बीआर चोपड़ा को कह दिया था कि आपको क्या हो गया है, जिसके पास मेरे जैसा पति होगा, वो क्या किसी दूसरे के प्यार में पड़ेगी. बीआर चोपड़ा को बात दिल पर लग गई.”
हालांकि शम्मी कपूर ने ऐसा केवल बीआर चोपड़ा के साथ नहीं किया था. उनके करियर को नई दिशा देने वाले नासिर हुसैन के साथ भी उनका ऐसा अनुभव रहा. रऊफ़ अहमद ने लिखा है कि नासिर हुसैन ने दिल देके देखो की कामयाबी के बाद अपनी प्रॉडक्शन कंपनी बनाई और जब प्यार किसी से होता है पर काम शुरू किया. इस फ़िल्म के लिए आशा पारेख रिपीट हो रही थीं, शम्मी कपूर उनको खुद संगीत के लिए शंकर जयकिशन के पास ले गए.
ऐसे में एक दिन शम्मी कपूर को नासिर हुसैन ने फ़ोन करके पूछा कि “आशा पारेख और शंकर-जयकिशन तो मेरे साथ हैं, तुम मेरे साथ हो या नहीं?”
इस सवाल को सुनते ही शम्मी कपूर का गुस्सा भड़क गया. वे खुद को उस फ़िल्म में शामिल मानकर चल रहे थे लेकिन उन्हें नासिर हुसैन के फ़िल्म ऑफ़र करने का अंदाज़ पसंद नहीं आया. उन्होंने कह दिया कि नहीं मैं तुम्हारे साथ नहीं हूं. ना नासिर ने दोबारा कोशिश की और ना ही शम्मी को अपनी ग़लती का एहसास हुआ, नासिर ने इस फ़िल्म के लिए देवानंद को साइन किया. हालांकि बाद में दोनों 1965 में तीसरी मंजिल के लिए एक साथ फिर आए. जब इस फ़िल्म को देवानंद ने साइन करने के बाद छोड़ दिया था.

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इंटरनेट को भारत लाने वाले शुरुआती शख़्स
शम्मी कपूर ने बाद में अध्यात्म का रास्ता भी पकड़ा और उत्तराखंड के एक धर्म गुरु के साथ लंबा वक्त व्यतीत किया, लेकिन उनके जीवन में बड़ा बदलाव 1988 में इंटरनेट के आने के साथ आया. वे भारत में एपल कंप्यूटर और इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले शुरुआती व्यक्ति थे.
लेकिन तब तक वे गंभीर बीमारी की चपेट में आ गए थे. अपने नाचते कूदते, लटकते झटकते दृश्यों से भारतीय सिनेमा को हमेशा के लिए बदलने वाले एक्टर ने अपने जीवन के आख़िरी आठ साल व्हील चेयर पर गुज़ारे. सप्ताह के तीन दिन ब्रीच कैंडी अस्पताल में डायलिसिस के लिए जाना होता था. लेकिन जीने का उनका हौसला हमेशा बना रहा. इस दौरान काम भी करते रहे. निधन से कुछ दिनों पहले ही इम्तियाज़ अली की रॉकस्टार में वे रणबीर कपूर को गुरु मंत्र देते नज़र आए थे.
शराब-सिगरेट के अलावा शम्मी कपूर को तेज़ ड्राइविंग का बड़ा शौक रहा. नीला देवी ने अपने एक इंटरव्यू में कहा कि शम्मी बीमारी के दौर में अक्सर कहा करते थे कि जीने का क्या मतलब जब आप ड्राइविंग नहीं कर सकते. 14 अगस्त, 2011 को शम्मी कपूर का निधन हुआ था.
शम्मी कपूर को अपने करियर में डांसिंग स्टार, रिबेल अभिनेता, भारतीय सिनेमा का एल्विस प्रिसले, याहू स्टार और द गेम चेंजर जैसे निकनेम से जाना गया. हालांकि अभिनेता के तौर पर शम्मी कपूर को बहुत ज़्यादा सम्मान नहीं मिला. उन्हें पहली बार प्रोफेसर के लिए 1963 में फ़िल्मफेयर पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था, लेकिन ये सम्मान उन्हें 1968 में ब्रह्मचारी के लिए मिला.
विधाता में सपोर्टिंग एक्टर के तौर पर उन्होंने अपना दूसरा फ़िल्म फेयर अवार्ड जीता. उनके अभिनय को संजीदा एक्टर के तौर पर नहीं देखा गया हालांकि पगला कहीं का और ब्रह्मचारी में उनकी भूमिकाएं संजीदगी से भरी हुई थीं. उन्हें हमेशा एक लाउड एक्टर के तौर पर ही देखा गया.
ऋषि कपूर ने अपनी आत्मकथा के अलावा कई इंटरव्यू में माना है कि शम्मी कपूर भी दादा साहेब फाल्के पुरस्कार के हकदार थे, जो उन्हें नहीं मिला है. लेकिन जैसा कि शम्मी कपूर की फ़िल्म का एक गाना है, ‘तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे, सुनोगे जब भी गीत मेरे संग संग तुम भी गुनगुनाओगे.’ वैसे ही भारतीय सिने प्रेमी उन्हें कभी भुला नहीं पाएंगे.
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