रॉबर्ट ओपेनहाइमर: जब एटम बम बनाने वाले ने सुनाया था गीता का श्लोक

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- Author, बेन प्लैट्स-मिल्स
- पदनाम, बीबीसी फ्यूचर
वो 16 जुलाई 1945 की सुबह का वक़्त था और कंट्रोल बंकर में बैठे रॉबर्ट ओपेनहाइमर उस लम्हे का इंतज़ार कर रहे थे, जो दुनिया को बदल देने वाला था.
उस बंकर से क़रीब छह मील या लगभग 10 किलोमीटर दूर, न्यू मेक्सिको के होर्नादा डेल मुएर्तो के धुंधले रेगिस्तान में दुनिया का पहला परमाणु बम परीक्षण होने जा रहा था.
उस एटमी टेस्ट का कोड नेम था, ‘ट्रिनिटी’.
ओपेनहाइमर थके हुए थे. वो नर्वस भी थे. वैसे तो वो हमेशा ही दुबले पतले इंसान थे. लेकिन, तीन साल तक एटम बम डिज़ाइन करके उसे बनाने वाले ‘मैनहटन इंजीनियर डिस्ट्रिक्ट’ की वैज्ञानिक शाखा, ‘प्रोजेक्ट वाय' के प्रोजेक्ट डायरेक्टर रहने के बाद, उनका वज़न घटकर केवल 52 किलो रह गया था.
वज़न इतना कम हो जाने की वजह से पांच फुट दस इंच लंबाई वाले ओपेनहाइमर बहुत पतले दिख रहे थे. उस रात वो केवल चार घंटे सो सके थे. आने वाले कल की फ़िक्र और बेतहाशा सिगरेट पीने की लत की वजह से आने वाली खांसी के चलते वो जागते रहे थे.

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जब धमाका हुआ...
रॉबर्ट ओपेनहाइमर की जीवनी लिखने वाले इतिहासकारों काई बर्ड और मार्टिन जे शेर्विन ने, 1945 के उस दिन को उनकी ज़िंदगी के सबसे निर्णायक लम्हों में से एक बताया है.
बर्ड और शेर्विन ने ओपेनहाइमर की जीवनी अमेरिकन प्रोमेथियस के नाम से लिखी है. इसी किताब के आधार पर ओपेनहाइमर की ज़िंदगी पर एक नई फ़िल्म ‘ओपेनहाइमर’ बनाई गई है, जो 21 जुलाई को अमरीका में रिलीज़ होने जा रही है.
बर्ड और शेर्विन लिखते हैं कि बम धमाके के काउंटडाउन के आख़िरी मिनटों में सेना के एक जनरल ने उस समय ओपेनहाइमर के मूड को बहुत क़रीब से देखा था.
उस जनरल ने बताया कि, ‘जैसे जैसे धमाके का वक़्त पास आता जा रहा था...डॉक्टर ओपेनहाइमर का तनाव बढ़ता जा रहा था... उस वक़्त वो बमुश्किल ही सांस ले रहे थे.’
आख़िरकार जब धमाका हुआ तो उसने सूरज की चमक को भी धुंधला कर दिया था.
21 किलोटन टीएनटी की ताक़त वाला ये विस्फोट इंसान का किया अब तक का सबसे बड़ा धमाका था.
इससे इतना तेज़ झटका पैदा हुआ, जो 160 किलोमीटर दूर तक महसूस किया गया.
जब पूरे मंज़र पर गरज धमक हावी हो गई, और विस्फोट का ग़ुबार आसमान की ओर बढ़ा तो ओपेनहाइमर के चेहरे पर पसरा तनाव ‘ज़बरदस्त राहत’ में तब्दील हो चुका था.
ओपेनहाइमर के दोस्त और साथ काम करने वाले इसीडोर राबी ने उस समय थोड़ी दूर से उन्हें देखा था.
उन्होंने बाद में बताया, "मैं उनकी चहलक़दमी के अंदाज़ कभी नहीं भूल सकता. मेरे ज़हन से वो तस्वीर कभी नहीं मिट सकती, जब वो कार से उतरे थे... उनकी चाल देखकर ऐसा लग रहा था, मानो वो सातवें आसमान पर हों. वो बहुत अकड़कर चल रहे थे. उन्होंने ये कारनामा जो कर दिखाया था."

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याद आया गीता का श्लोक
1960 के दशक में दिए गए एक इंटरव्यू में ओपेनहाइमर ने अपनी उस प्रतिक्रिया पर दार्शनिकता का एक लबादा डाल दिया था.
उन्होंने दावा किया कि एटम बम के धमाके के बाद उनके ज़हन में हिंदू धर्म ग्रंथ गीता का एक श्लोक आया था.
अंग्रेज़ी में दिए इंटरव्यू में उन्होंने गीता का ज़िक्र करते हुए कहा, "मैं अब काल हूं जो लोकों (दुनिया) का नाश करता हूं."
वो गीता के 11वें अध्याय के 32वें श्लोक का ज़िक्र कर रहे थे.
जहां श्रीकृष्ण कहते हैं, "काल: अस्मि लोकक्षयकृत्प्रविद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्त:।।"
यानी, ‘मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ काल हूं.’
ओपेनहाइमर के दोस्तों ने बताया कि परमाणु परीक्षण के बाद के दिनों में वो बड़े उदास रहने लगे थे.
एक ने उस दौर को याद करते हुए बताया कि रॉबर्ट का 'जीवन मानो ठहर सा गया था.
वो उन दो हफ़्तों के दौरान हर वक़्त किसी ख़याल में गुम दिखाई देते थे. क्योंकि उन्हें पता था कि क्या होने वाला है.
एक सुबह तो उन्हें जापानियों के भविष्य को लेकर इस तरह अफ़सोस जताते हुए (दूसरों को निचले दर्जे का समझने वाली सोच के साथ) सुना गया कि वो ‘बेचारे ग़रीब छोटे लोग, वो बेचारे ग़रीब लोग...’. लेकिन, इसके कुछ दिन बाद ही वो एक बार फिर से नर्वस, पूरी तरह ध्यान केंद्रित किए हुए, और सख़्त मिज़ाज दिखे.
परमाणु बम बनाने के उस प्रोजेक्ट में सेना के अपने साथियों के साथ एक बैठक के दौरान तो ऐसा लगा कि वो शायद ‘उन बेचारे ग़रीब लोगों’ को पूरी तरह भूल चुके थे.
बर्ड और शेर्विन के मुताबिक़, इसके बजाय उस समय ओपेनहाइमर का पूरा ध्यान इस बात में लगा हुआ था कि एटम बम को गिराने के लिए सटीक हालात कैसे होने चाहिए.
वो कह रहे थे, ‘हां, उनको बारिश या कोहरे में इसे नहीं गिराना चाहिए... उन्हें ज़्यादा ऊंचाई पर जाकर धमाका मत करने दो. इसके ऊपर जो आंकड़ा लिखा है, वो बिल्कुल सही है. बम को ऊपर की तरफ़ मत जाने देना, वरना इससे बहुत ज़्यादा नुक़सान नहीं हो पाएगा.’
एटमी टेस्ट के एक महीने से भी कम समय के भीतर हिरोशिमा पर परमाणु बम का हमला कामयाब रहा था.
जब ओपेनहाइमर ने अपने साथियों के बीच इस कामयाबी का एलान किया तो वहां मौजूद एक शख़्स ने देखा, " वो उन्होंने कसकर अपनी मुटठी बांध ली, और अपने हाथ को ख़ुशी से हवा में उछाला था, मानो वो कोई ऐसे लड़ाके हों, जिसने अभी अभी कोई बड़ा इनाम जीत लिया हो."
उस वक़्त ‘छप्पर फाड़ तालियां बजी’ थीं.

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'कल्पना से हेराफेरी करने में उस्ताद वैज्ञानिक'
ओपेनहाइमर, मैनहटन प्रोजेक्ट के जज़्बाती और बौद्धिक दिल थे.
वो इकलौते शख़्स थे जिन्होंने परमाणु बम को हक़ीक़त बनाने में सबसे बड़ा योगदान दिया था.
विश्व युद्ध के बाद ओपेनहाइमर के साथ काम करने वाले जेरेमी बर्नस्टाइन को पूरा यक़ीन था कि कोई और शख़्स ये कर ही नहीं सकता था.
बर्नस्टाइन ने 2004 में अपनी जीवनी, 'अ पोर्ट्रेट ऑफ ऐन एनिग्मा' में लिखा था, "अगर ओपेनहाइमर लॉस अलामोस में निदेशक नहीं होते, तो मेरा विश्वास है कि नतीजा चाहे कुछ भी होता, विश्व युद्ध बिना परमाणु हथियारों के इस्तेमाल के भी ख़त्म हो जाना था."
अपनी मेहनत को कामयाब होते देखकर, ओपेनहाइमर ने जो अलग अलग तरह की प्रतिक्रियाएं दीं. जिस रफ़्तार से वो ख़ुशी के अतिरेक से लेकर, उदासी की गहराई के बीच झूलते दिखे, वो किसी को भी हक्का बक्का कर देने के लिए पर्याप्त है.
किसी एक इंसान के किरदार में नर्वस नज़ाकत, महत्वाकांक्षा, आडंबर और बीमार कर देने वाली उदासी का मेल दिखना लगभग नामुमकिन है.
ख़ास तौर से ऐसे इंसान के भीतर, जो ऐसे प्रोजेक्ट के लिए ज़िम्मेदार हो, जिसकी कामयाबी पर ऐसे ही अलग अलग और विरोधाभासी जज़्बात ज़ाहिर किए गए हों.
बर्ड और शेर्विन, ओपेनहाइमर को एक ‘पहेली’ भी कहते हैं.
वो लिखते हैं, "एक सैद्धांतिक भौतिक वैज्ञानिक जिसने एक महान नेता की करिश्माई ख़ूबियों की नुमाइश की हो, कला का ऐसा पारखी, जिसने अपने भीतर दुविधाओं को पाला-पोसा हो."
यानी एक वैज्ञानिक जिनके बारे में एक और दोस्त ने कभी कहा था कि, वो ‘कल्पनाओं से हेरा-फेरी करने के उस्ताद’ थे.
काई बर्ड और मार्टिन शेर्विन के बयान के मुताबिक़, ओपेनहाइमर के व्यक्तित्व के ये विरोधाभास, उनकी ये ख़ूबियां उनके दोस्तों और जीवनी लिखने वाले, दोनों को हैरत में डाल दिया करती थीं. जिससे उनके लिए ओपेनहाइमर का किरदार बयान कर पाना मुश्किल हो जाता था.
लेकिन, ऐसा लगता है कि ओपेनहाइमर के भीतर ये विरोधाभास बचपन से ही मौजूद था.
वो 1904 में न्यूयॉर्क में पैदा हुए थे. ओपेनहाइमनर, जर्मनी से अमरीका आकर बसे पहली पीढ़ी के यहूदी अप्रवासियों के बेटे थे.
कपड़ों के कारोबार में कामयाबी ने उनके परिवार को रईस बना दिया था.
उनका परिवार, न्यूयॉर्क के अपर वेस्ट साइड में एक बड़े से अपार्टमेंट में रहता था. उनके घर में तीन नौकरानियां और एक ड्राइवर काम करते थे. घर की दीवारों पर यूरोपीय कलाकृतियां टंगी होती थीं.

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'जीनियस बेटा'
एक अमीर परिवार में पैदा होने के बावजूद ओपेनहाइमर एक बिगड़ैल बच्चे नहीं थे.
बचपन के दोस्त उन्हें सीदा सादा और बड़े दिलवाले इंसान के तौर पर याद किया करते थे.
स्कूल के दिनों की एक दोस्त जेन डिडिशाइम, ओपेनहाइमर को एक ऐसे बच्चे के तौर याद करती थीं, जो ‘बहुत जल्दी शर्मा जाता था’ जो ‘बहुत दुबला पतला, ग़ुलाबी गालों वाला...बेहद शर्मीला’ था, मगर ‘बहुत अक़्लमंद’ भी था.
जेन ने कहा कि, ‘हर कोई बहुत आसानी से ये मान लेता था कि वो दूसरों से बहुत अलग और क़ाबिल थे.’
नौ बरस की उम्र में ओपेनहाइमर, ग्रीक और लैटिन ज़बानों में दर्शन पढ़ने लगे थे.
खनिज विज्ञान को लेकर तो वो जुनूनी थे. उस दौर में वो सेंट्रल पार्क में यूं ही टहलते रहते थे और फिर, अपनी नई नई खोज के बारे में न्यूयॉर्क के मिनरेलॉजिकल क्लब को चिट्ठियां लिखते रहते थे.
उनकी चिट्ठियां इतनी बढ़िया होती थीं कि एक बार तो क्लब ने उन्हें एक वयस्क इंसान समझकर प्रेज़ेंटेशन देने का न्यौता भी भेजा था. बर्ड और शेर्विन लिखते हैं कि इस बौद्धिक मिज़ाज ने बचपन से ही ओपेनहाइमर को तन्हा कर दिया था.
एक दोस्त ने उस दौर को याद करते हुए बताया, ‘वो जो कुछ भी कर या सोच रहे होते थे, उसी में उलझे रहते थे.’
वो अपनी उम्र के दूसरे बच्चों की तरह लड़कपन वाले काम भी नहीं करते थे.
उन्हें खेल में कोई दिलचस्पी नहीं थी. उनके एक कज़िन ने कहा, ‘वो अपने हम उम्र दूसरे बच्चों की तरह जोखिम वाले काम करने से बचते थे. दूसरों से अलग बर्ताव की वजह से हम उम्र बच्चे उन्हें अक्सर चिढ़ाया करते थे.’
लेकिन, ओपेनहाइमर के मां-बाप को इस बात का यक़ीन था कि उनका बेटा जीनियस है.
बाद के दिनों में ओपेनहाइमर ने कहा था, "मेरे ऊपर भरोसा करने का मां-बाप का ये क़र्ज़, मैंने बेहद ख़राबी वाला अहंकार पैदा करके अदा किया."
उन्होंने कहा था, "मुझे यक़ीन है कि जो भी बच्चे और बड़े, बदक़िस्मती से मेरे ऩज़दीक आए होंगे, उन्हें मेरे इस अहंकार से ज़रूर चोट पहुंची होगी."
एक बार ओपेनहाइमर ने अपने एक और दोस्त से कहा था, "ये कोई मज़े की बात नहीं है कि किसी किताब के पन्ने खोलें और कहें कि हां हां, मुझे ये सब पता है."

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ओपेनहाइमर की चिट्ठियां
जब ओपेनहाइमर ने हारवर्ड में रसायन शास्त्र पढ़ने के लिए घर छोड़ा तो उनकी ये मनोवैज्ञानिक कमज़ोरी बेपर्दा हो गई.
ऐसा लगा कि उनका नाज़ुक अहंकार और झीने नक़ाब में छुपी संवेदनशीलता उनके किसी काम नहीं आए.
1923 का ओपेनहाइमर का एक ख़त, 1980 के एक संग्रह में छपा था, जिसे एलिस किंबल स्मिथ और चार्ल्स वीनर ने संपादित किया था.
इस चिट्ठी में ओपेनहाइमर लिखते हैं, "मैं मेहनत करता हूं और अनगिनत थीसिस, नोट्स, कविताएं, कहानियां और कचरा लिखता हूं... मैं तीन अलग अलग प्रयोगशालाओं में बदबू पैदा करता हूं... मैं चाय परोसता हूं और कुछ गुमनाम लोगों के साथ, बड़े पढ़े लिखे इंसान की तरह बात करता हूं. फिर हफ़्ते के आख़िर में मैं, इस घटिया दर्जे की ऊर्जा को ठहाकों और थकान के तौर पर बाहर निकालता हूं, ग्रीक साहित्य पढ़ता हूं, ग़लतियां करता हूं. अपनी मेज़ पर चिट्ठियां तलाशता हूं और ये मनाता हूं कि काश मैं मर जाता. देखा!"
स्मिथ और वीनर ने बाद में जो चिट्ठियां जमा की हैं, उनसे पता चलता है कि ओपेनहाइमर की ये समस्या, इंग्लैंड की कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में उनकी पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई के दौर में भी बनी रही थी.
उनके एक ट्यूटर ने एप्लाइड लैब का काम करने पर ज़ोर दिया, जो ओपेनहाइमर की एक बड़ी कमज़ोरी था.
उन्होंने 1925 में लिखा, "मैं बहुत बुरे दौर से गुज़र रहा हूं. लैब का ये काम बहुत बोझिल है, और मैं इस काम में इतना बुरा हूं कि मुझे लगता है मैं शायद ही कुछ सीख रहा हूं.’ उसी साल बाद में ओपेनहाइमर की इस ज़िद ने उनको क़रीब क़रीब एक बड़ी मुसीबत में डाल दिया था. हुआ ये था कि उन्होंने जान-बूझकर लैब के केमिकल से ज़हरीला बनाया गया एक सेब अपने ट्यूटर की मेज़ पर छोड़ दिया था. बाद में उनके दोस्तों ने अंदाज़ा लगाया कि ओपेनहाइमर ने शायद ये कारगुज़ारी दूसरों से जलन और ख़ुद के अपूर्ण होने के एहसास की वजह से की थी. ट्यूटर ने वो सेब तो नहीं खाया, लेकिन इस करतूत की वजह से कैंब्रिज में ओपेनहाइमर की पढ़ाई पर संकट के बादल ज़रूर मंडराने लगे थे. टीचर ने आगे की पढ़ाई जारी रखने देने के लिए ओपेनहाइमर के ऊपर ये शर्त लगाई कि वो किसी मनोचिकित्सक से मिलें. वो मिले भी. उस डॉक्टर ने ओपेनहाइमर के भीतर मनोविकार का पता भी लगाया. मगर बाद में उसने ये कहते हुए ओपेनहाइमर को जाने दिया कि इलाज से उन्हें कोई फ़ायदा होगा नहीं.

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जब ख़ुदकुशी करने के बारे में सोचा
बाद में उस दौर को याद करते हुए ओपेनहाइमर ने बताया था कि क्रिसमस की छुट्टियों के दौरान उन्होंने ख़ुदकुशी करने के बारे में बड़ी गंभीरता से विचार किया था.
उसके अगले साल जब ओपेनहाइमर घूमने के लिए पेरिस गए थे तो उनके बेहद क़रीबी दोस्त फ्रांसिस फर्ग्यूसन ने बताया कि उन्होंने अपनी गर्लफ्रैंड से शादी करने का प्रस्ताव रखा है.
इस बात पर ओपेनहाइमर ने गला घोंटकर उन्हें मार डालने की कोशिश की.
फर्ग्यूसन ने उस दिन को याद करते हुए बताया, "वो पीछे से मेरे ऊपर कूदे और बिस्तर बांधने की एक रस्सी से मेरा गला घोंटने लगे... मैंने किसी तरह वो रस्सी गले से हटाकर ख़ुद को उनसे छुड़ाया... और वो ज़मीन पर गिरकर रोने लगे थे."
ऐसा लगता है कि जब मनोचिकित्सा से ओपेनहाइमर की परेशानी दूर नहीं हुई तो साहित्य उनके बहुत काम आया.
बर्ड और शेर्विन के मुताबिक़, कोर्सिका में छुट्टियां मनाने के दौरान उन्होंने टहलते हुए मासेल प्रूस्ट की 'ए ला रेशेरशे डु टेम्प्स पर्डू' पढ़ डाली.
उन्हें इसमें अपनी ज़हनी कैफ़ियत का कुछ कुछ अक़्स नज़र आया, जिससे उनके अंदर कुछ भरोसा जागा.
इस रचना ने ओपेनहाइमर के भीतर कुछ हमदर्दी भरा एहसास पैदा करने की खिड़की खोली.
उन्होंने ‘कष्टों को लेकर होने वाली बेरुख़ी’ के बारे में इस किताब का एक अंश ज़ुबानी याद कर लिया था, जिसके बारे में उनका ख़याल था कि ये ‘क्रूरता का एक स्थायी और भयंकर स्वरूप है.’
इसके बाद, जीवन में कष्टों के प्रति सोच को लेकर एक दिलचस्पी ओपेनहाइमर में हमेशा बनी रही.
इसी वजह से ओपेनहाइमर अपने पूरे जीवन में आध्यात्मिक और दार्शनिक साहित्य में दिलचस्पी लेते रहे और, इसने आख़िर में उस काम में एक अहम भूमिका अदा की जिसने उन्हें शोहरत और प्रतिष्ठा दिलाई.
उन्हीं छुट्टियों के दौरान ओपेनहाइमर ने अपने दोस्तों से एक ऐसी बात कही थी, जो बाद में सटीक भविष्यवाणी साबित हुई.
उन्होंने कहा था, "मेरी नज़र में वो इंसान सबसे अच्छा है, जो बहुत से काम बेहद शानदार तरीक़े से कर सके फिर भी उसके चेहरे पर सूखे हुए आंसू और उदासी की झलक दिखती रहे."
छुट्टियों के बाद ओपेनहाइमर काफ़ी ख़ुशगवार मूड में इंग्लैंड लौटे. जैसा कि उन्होंने बाद में कहा कि वो अब ‘अपने भीतर ज़्यादा दया और बर्दाश्त करने की क्षमता महसूस कर रहे थे.’
1926 के शुरुआती दिनों में उनकी मुलाक़ात जर्मनी की गॉटिंगेन यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑफ़ थेयोरेटिकल फ़िजिक्स के निदेशक से हुई.
वो बहुत जल्द एक सिद्धांतवादी के तौर पर ओपेनहाइमर की प्रतिभा के कायल हो गए और उन्हें अपने इंस्टीट्यूट में पढ़ने का न्यौता दिया.
स्मिथ और वीनर के मुताबिक़, बाद में ओपेनहाइमर ने वर्ष 1926 को अपने ‘भौतिक विज्ञान में दाख़िले’ का साल बताया था.
वो साल, ओपेनहाइमर की ज़िंदगी में एक निर्णायक मोड़ लाने वाला साबित हुआ. उन्होंने पीएचडी की डिग्री हासिल की और उसके बाद के साल में उन्हें डॉक्टरेट के बाद की फेलोशिप भी मिल गई.
इसके साथ साथ ओपेनहाइमर, वैज्ञानिकों के उस समुदाय का हिस्सा बन गए, जो सैद्धांतिक भौतिकी में तरक़्क़ी की अगुवाई कर रहे थे.
इस दौर में ओपेनहाइमर ऐसे वैज्ञानिकों से मिले, जो बाद में ताउम्र उनके दोस्त बने रहे. इनमें से बहुत से वैज्ञानिकों ने बाद में ओपेनहाइमर के साथ लॉस अलामोस की लैब में काम भी किया.

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गीता पढ़ने के लिए सीखी संस्कृत
अमरीका लौटने के बाद ओपेनहाइमर ने कुछ महीने हार्वर्ड में बिताए. इसके बाद वो फिज़िक्स में अपना करियर बनाने के लिए कैलिफ़ोर्निया चले गए.
उस दौर के उनके ख़त पढ़ते हुए पता चलता है कि उस समय, ओपेनहाइमर ज़हनी तौर पर स्थिर और उदार थे. उस दौर में उन्होंने अपने छोटे भाई को रोमांस और कला के बारे में अपनी दिलचस्पियों के बारे में लिखा था.
बर्कले की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में ओपेनहाइमर ने प्रयोगवादियों के साथ बहुत नज़दीकी से काम किया. वो ब्रह्मांड की किरणों और परमाणु विखंडन को लेकर उनके नतीजों की व्याख्या किया करते थे.
बाद में ओपेनहाइमर ने लिखा था कि उस दौर में वो ‘अकेले ऐसे शख़्स थे, जिनको ये समझ थी कि इन सब का मतलब क्या है.’
बाद में ओपेनहाइमर ने जिस विभाग की स्थापना की, उसकी ज़रूरत उनके मुताबिक़ उस सिद्धांत को समझाने के लिए थी, जिसके बारे में वो बात करना चाहते थे.
‘पहले वो बातें फैकल्टी के सदस्यों, कर्मचारियों और साथियों को समझाना और फिर हर उस इंसान को, जो वो बातें सुनने को तैयार हो... क्या सीखा गया है, कौन सी समस्याएं अभी भी अनसुलझी हैं.’
शुरुआत में ओपेनहाइमर ख़ुद को एक ‘मुश्किल’ अध्यापक कहा करते थे. मगर बाद में अपनी इसी भूमिका में ओपेनहाइमर ने अपने करिश्मे और सामाजिक हैसियत को धार दी, जो बाद के दिनों में प्रोजेक्ट वाय के दौरान उनके बहुत काम आई.
स्मिथ और वीनर ने उनके एक सहकर्मी की यादों के हवाले से लिखा है कि किस तरह उनके शागिर्द ‘जितनी मुमकिन हो उतनी बारीक़ी से उनकी नक़ल किया करते थे. वो उनके हाव-भाव की नक़ल करते थे, उनकी आदतों और उनकी चाल तक की नक़ल किया करते थे. उन्होंने सच में अपने छात्रों की ज़िंदगी पर गहरा असर डाला था.’
1930 के शुरुआती बरसों में जब ओपेनहाइमर अपना अकादेमिक करियर मज़बूत कर रहे थे, तब वो चुपके चुपके साहित्यिक विषयों की पढ़ाई भी कर रहे थे.
यही दौर था, जब उन्होंने हिंदू धर्मशास्त्रों की तलाश की. उन्होंने गीता के अनुवाद के बजाय उसके मूल स्वरूप में पढ़ने के लिए संस्कृत सीखी.
ये वही किताब थी, जिससे नक़ल करते हुए उन्होंने बाद में अपना मशहूर जुमला, ‘मैं काल बन गया हूं’ कहा था.
ऐसा लगता है कि उनकी ये दिलचस्पियां सिर्फ़ बौद्धिक नहीं थीं. असल में ये किताबों से अपनी उलझने दूर करने वाली वो थेरेपी थी, जिसकी शुरुआत उन्होंने 1920 के दशक में प्रूस्ट को पढ़ने के साथ की थी.
कौरवों और पांडवों के बीच महाभारत की लड़ाई की कहानी पर केंद्रित भगवद् गीता ने ओपेनहाइमर को एक दार्शनिक सोच की बुनियाद दी.
बाद में, जब प्रोजेक्ट वाय के दौरान वो नैतिक दुविधा के शिकार थे, तब ओपेनहाइमर ने उस दुविधा से उबरने के लिए गीता का ही सहारा लिया था. गीता में कर्म और कर्तव्य पर ज़ोर दिया गया है और कहा गया कि, ‘कर्म किए जा फल की चिंता मत कर ऐ इंसान!
इसमें इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि नतीजों के ख़ौफ़ से डरकर कुछ नहीं करने को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता है.
1932 में अपने भाई को लिखी एक चिट्ठी में ओपेनहाइमर ने ख़ास तौर से गीता के संदेशों का हवाला दिया है.
इसके बाद उन्होंने लिखा है कि ऐसे दर्शन को वास्तव में परखने का एक मौक़ा शायद युद्ध के दौरान मिल सकता है.

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जब ओपेनहाइमर को हुआ प्यार
उन्होंने लिखा था, "मुझे लगता है कि अनुशासन के साथ... हम दिमाग़ी सुकून हासिल कर सकते हैं... मेरा मानना है कि अनुशासित रहकर हम उन चीज़ों को बचा सकते हैं, जो मुश्किल से मुश्किल वक़्त में हमारी ख़ुशी के लिए बेहद ज़रूरी होती हैं. इसीलिए, मुझे लगता है कि वो सारी चीज़ें जिनसे अनुशासन पैदा होता है, जैसे पढ़ाई और इंसान और इंसानियत के प्रति हमारे कर्तव्य और हमें... युद्ध का स्वागत दिल की अथाह गहरायियों से आभार के साथ करना चाहिए क्योंकि युद्ध के ज़रिए ही हम सबसे कम लगाव वाली स्थिति में पहुंच सकते हैं और तभी हमें शांति की अहमियत समझ में आएगी."
1930 के दशक में ओपेनहाइमर की मुलाक़ात जीन टैटलॉक से हुई थी. वो एक मनोचिकित्सक और डॉक्टर थीं, जिनसे ओपेनहाइमर को प्यार हो गया था.
बर्ड और शेर्विन के मुताबिक़, टैटलॉक की पेंचदार शख़्सियत, ओपेनहाइमर से बहुत मिलती जुलती थी.
टैटलॉक ने काफ़ी कुछ पढ़ रहा था और सामाजिक ज़िम्मेदारियों को लेकर उनका गहरा झुकाव था.
बचपन की एक दोस्त ने जीन टैटलॉक के बारे में कहा था, ‘उनमें महानता की झलक’ दिखती है.
ओपेनहाइमर ने कई बार जीन टैटलॉक के सामने शादी का प्रस्ताव रखा. लेकिन, टैटलॉक ने शादी करने से मना कर दिया. माना जाता है कि टैटलॉक ने ही ओपेनहाइमर का परिचय क्रांतिकारी राजनीति और जॉन डॉन की कविताओं से कराया था.
ओपेनहाइमर ने 1940 में जीव वैज्ञानिक कैथरीन ‘किटी’ हैरिसन से शादी कर ली थी. जो बाद में उनके प्रोजेक्ट वाय का हिस्सा बनी थीं. उस प्रोजेक्ट में कैथरीन, रेडिएशन यानी परमाणु धमाके के बाद पैदा होने वाले विकिरण के ख़तरों पर रिसर्च किया करती थीं. लेकिन, कैथरीन से शादी करने के बाद भी ओपेनहाइमर कभी-कभार जीन टैटलॉक से मिलते रहते थे.
1939 में परमाणु हथियारों के ख़तरे को लेकर, राजनेताओं से ज़्यादा चिंतित वैज्ञानिक थे.
महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन की चिट्ठी ने इस मसले पर अमरीकी सरकार के वरिष्ठ नेताओं का ध्यान खींचा था. सरकारी प्रतिक्रिया सुस्त थी. लेकिन, परमाणु हथियारों के ख़तरे को लेकर वैज्ञानिकों के बीच ख़तरे की घंटी बजती रही थी और आख़िर में अमरीकी राष्ट्रपति को इस मामले में दख़ल देना पड़ा था.
देश के बड़े भौतिक शास्त्री में से एक होने की वजह से ओपेनहाइमर उन गिने चुने वैज्ञानिकों में से एक थे, जिन्हें ज़्यादा गंभीरता से परमाणु हथियारों की संभावना तलाशने की ज़िम्मेदारी दी गई थी.
सितंबर 1942 तक, ये साफ़ हो गया था कि परमाणु बम बनाया जा सकता है. इसमें कुछ योगदान तो ओपेनहाइमर की टीम का भी रहा था. इसके बाद परमाणु बम बनाने की योजना पर ठोस रूप से काम शुरू हो गया था.
बर्ड और शेर्विन के मुताबिक़, जब ओपेनहाइमर ने सुना कि एटम बम विकसित करने के लिए वैज्ञानिकों की टीम के अगुवा के तौर पर उनके नाम पर विचार किया जा रहा है तो ओपेनहाइमर ने अपनी तरफ़ से भी इसकी तैयारी शुरू कर दी थी.
उन्होंने उस दौर में अपने एक दोस्त से कहा था, "मैं वामपंथियों से हर तरह का ताल्लुक़ ख़त्म कर रहा हूं. क्योंकि, अगर मैं ऐसा नहीं करता, तो सरकार के लिए मेरी सेवा ले पाना मुश्किल होगा. मैं देश के प्रति अपनी उपयोगिता के रास्ते में किसी भी बात को आड़े नहीं आने देना चाहता."
बाद में आइंस्टाइन ने कहा था, "ओपेनहाइमर के साथ दिक़्क़त ये है कि वो {ऐसी चीज़ से} प्यार करते हैं, जो उन्हें पसंद नहीं करती, यानी अमरीका की सरकार.’
प्रोजेक्ट वाय से ओपेनहाइमर के जुड़ने में निश्चित रूप से उनकी देशभक्ति और ख़ुश करने की चाहत ने एक बड़ी भूमिका अदा की थी.
मैनहटन इंजीनियर डिस्ट्रिक्ट के सैन्य नेता जनरल लेस्ली ग्रोव्स वो शख़्स थे, जिन्हें एटम बम बनाने की परियोजना के लिए एक वैज्ञानिक निदेशक की तलाश करनी थी.
2002 की एक जीवनी 'रेसिंग फॉर दि बॉम्ब' के मुताबिक़, जब जनरल ग्रोव्स ने वैज्ञानिक निदेशक के तौर पर ओपेनहाइमर के नाम का प्रस्ताव रखा, तो उनका विरोध किया गया था.
ओपेनहाइमर के ‘कट्टर उदारवादी अतीत’ को लेकर चिंता जताई गई. लेकिन, जनरल ग्रोव्स ने ओपेनहाइमर की क़ाबिलियत और उनके मौजूदा ज्ञान का बखान करने के साथ साथ उनकी ‘भयंकर महत्वाकांक्षा’ की तरफ़ भी इशारा किया था.
मैनहटन प्रोजेक्ट के सुरक्षा प्रमुख जनरल ग्रोव्स ने ये भी कहा था, "मुझे इस बात का यक़ीन हो गया है कि वो न केवल वफ़ादार हैं, बल्कि वो अपने काम को कामयाबी से मंज़िल तक पहुंचाने की राह में किसी भी बात को रोड़ा नहीं बनने देंगे और इस तरह, विज्ञान के इतिहास में अपना ख़ास मकाम बनाएंगे."
1988 की एक किताब दि मेकिंग ऑफ़ दि एटॉमिक बॉम्ब में ओपेनहाइमर के दोस्त इसीडोर राबी ने लिखा था, 'ये सबसे असंभव नियुक्ति’ थी. हालांकि, बाद में राबी ने माना था कि ओपेनहाइमर का चुनाव ‘जनरल ग्रोव्स का सबसे धांसू दांव था.’

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ओपेनहाइमर की दुविधा
लॉस अलामोस में ओपेनहाइमर ने अपने विरोधाभासी और तमाम विषयों में दिलचस्पी को बख़ूबी इस्तेमाल किया था.
1979 में अपनी जीवनी 'व्हाट लिटिल आई रिमेंबर' में ऑस्ट्रिया में पैदा हुए वैज्ञानिक ओटो फ्रिस्च ने उन दिनों को याद करते हुए लिखा था, "ओपेनहाइमर ने प्रोजेक्ट वाय में सिर्फ़ वैज्ञानिकों को ही नहीं भर्ती किया था. उनकी टीम में ‘एक पेंटर, एक दार्शनिक और कुछ ऐसे ही दूसरे किरदार थे, जिनके किसी वैज्ञानिक प्रोजेक्ट से जुड़ने की संभावना न के बराबर थी, वो ये महसूस करते थे कि एक सभ्य समुदाय इन सबके बिना अधूरा था."
युद्ध के बाद, ऐसा लगा कि ओपेनहाइमर का रवैया बदल गया है, उन्होंने परमाणु हथियारों को ‘आक्रमण, हैरान करने और आतंक फैलाने’ का औज़ार बताया और, उन्होंने हथियारों के उद्योग को, ‘शैतान का कारनामा’ करार दिया.
एक मशहूर क़िस्से के मुताबिक़ अक्टूबर 1945 में उन्होंने अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति हैरी ट्रुमैन से कहा था, "मुझे महसूस होता है कि मेरे हाथ ख़ून से रंगे हैं."
बाद में राष्ट्रपति ने बताया, ‘मैंने उनसे कहा कि ख़ून से तो मेरे हाथ रंगे हैं- इसलिए इसकी चिंता आप मुझे करने दें.’
अमरीकी राष्ट्रपति से ओपेनहाइमर की ये बातचीत, उनकी पसंदीदा किताब भगवद् गीता में अर्जुन और भगवान कृष्ण की बातचीत से काफ़ी मिलती जुलती है.
जब महाभारत का युद्ध शुरू हुआ था तो अर्जुन ने ये कहते हुए युद्ध करने से मना कर दिया कि अपने परिजनों की मौत के लिए वही ज़िम्मेदार होंगे. लेकिन, तब भगवान कृष्ण ने अर्जुन के मन का बोझ उतारते हुए कहा था, ‘हे पार्थ! इन सब की मृत्यु के लिए मैं उत्तरदायी हूं... उठो... केवल भाग्यशाली योद्धाओं को ही ऐसे युद्धों का अवसर मिलता है... जो ऐसे धर्म युद्ध करते हैं, जीत प्रसिद्धि और राज उन्हीं को मिलते हैं! मेरे हाथों इन सबकी मृत्यु तो पहले से तय है, तुम उठो और ये युद्ध करो...क्योंकि तुम तो निमित्त मात्र हो’.
एटम बम के विकास के दौरान ओपेनहाइमर ने भी ख़ुद अपनी और अपने साथियों की नैतिक हिचक को भी इसी फलसफ़े से दूर किया था.
उन्होंने अपनी टीम को समझाया था कि एक वैज्ञानिक के तौर पर वो इस फ़ैसले के लिए ज़िम्मेदार नहीं होंगे कि परमाणु हथियार का इस्तेमाल कैसे किया जाना चाहिए. वो तो सिर्फ़ अपना काम कर रहे हैं.
अगर, इन हथियारों के इस्तेमाल से ख़ून बहता भी है तो इसके लिए राजनेता ज़िम्मेदार होंगे. हालांकि, ऐसा लगता है कि जब परमाणु बम बन गया तो इस बात में ख़ुद ओपेनहाइमर का यक़ीन हिल गया था. जैसा कि बर्ड और शेर्विन ने लिखा है कि विश्व युद्ध के बाद के दौर में ओपेनहाइमर ने परमाणु ऊर्जा आयोग में परमाणु हथियारों के और विकास का विरोध किया था.
इसमें एटम बम से भी ज़्यादा ताक़तवर हाइड्रोजन बम विकसित करने का फ़ैसला भी शामिल था, जिसकी राह ओपेनहाइमर ने एटम बम बनाकर खोली थी.
इन कोशिशों का नतीजा ये हुआ कि 1954 में अमरीकी सरकार ने उनकी जांच कराई और सुरक्षा के मामलों में उन्हें मिली रियायतें वापस ले ली गईं.
ये नीतिगत कामों में उनकी शिरकत का अंत था. अकादेमिक समुदाय ने ओपेनहाइमर का बचाव किया.
1955 में दि न्यू रिपब्लिक के लिए लिखते हुए दार्शनिक बरट्रांड रसेल ने कहा, "जांच से ये बात बिल्कुल साफ़ हो गई है कि उन्होंने ग़लतियां की हैं. सुरक्षा के लिहाज़ से उनमें से एक ग़लती तो बहुत बड़ी थी. लेकिन इस बात के सबूत कभी नहीं मिले कि उन्होंने देश से ऐसी बेवफ़ाई की जिसे ग़द्दारी कहा जाए... वैज्ञानिक एक त्रासद दुविधा के शिकार थे."

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मौत के 55 साल बाद वफ़ादारी पर मुहर
1963 में अमरीकी सरकार ने ओपेनहाइमर के सियासी पुनर्वास के तौर पर उन्हें एनरिको फर्मी पुरस्कार दिया. लेकिन, ओपेनहाइमर की मौत के 55 साल बाद यानी 2022 में जाकर अमरीकी सरकार ने 1954 का अपना फ़ैसला पलटा और उनका सिक्योरिटी क्लियरेंस बहाल किया, जिससे देश के प्रति ओपेनहाइमर की वफ़ादारी पर मुहर लगी.
अपनी ज़िंदगी के आख़िरी दशकों तक ओपेनहाइमर, एटम बम बनाने की तकनीकी उपलब्धि को लेकर कभी गर्व तो कभी उसके असर को लेकर अपराध बोध जताते रहे थे.
बाद के दिनों में उनकी बातों में नियति के हाथों हार का भाव भी झलकने लगा था. वो बार बार ये दोहराते थे कि एटम बम तो बनना ही था. ओपेनहाइमर ने अपनी ज़िंदगी के आख़िरी बीस बरस, न्यू जर्सी के प्रिंसटन में इंस्टीट्यूट फॉर एडवांस्ड स्टडीज़ के निदेशक के तौर पर बिताए. वहां वो आइंस्टाइन और दूसरे वैज्ञानिकों के साथ काम करते थे.
लॉस अलामोस की तरह प्रिंसटन में भी ओपेनहाइमर ने अलग अलग विधाओं के काम को बढ़ावा दिया.
बर्ड और शेर्विन लिखते हैं कि ओपेनहाइमर अपने भाषणों में इस विचार को अक्सर दोहराया करते थे कि विज्ञान को अपनी जटिलताओं को बेहतर ढंग से समझने के लिए मानव शास्त्रों या कला के विषयों की ज़रूरत है. इस मक़सद से उन्होंने प्रिंसटन में शास्त्रीय संगीत के जानकारों, कवियों और मनोवैज्ञानिकों को जगह दी थी.
बाद के दौर में ओपेनहाइमर, परमाणु ऊर्जा को एक ऐसी समस्या के तौर पर देखने लगे थे, जिसने अपने दौर के बौद्धिक हथियार को पछाड़ दिया था और राष्ट्रपति ट्रूमैन के शब्दों में कहें तो, परमाणु ऊर्जा ‘एक ऐसी नई और क्रांतिकारी शक्ति है जिसे पुराने ख़यालात के सांचे में ढालकर नहीं देखा जा सकता है.’
1965 में ओपेनहाइमर ने एक भाषण दिया था, जिसमें उन्होंने कहा था, "मैंने अपने दौर के कुछ महान लोगों से सुना है कि जब भी उन्हें कुछ हिला देने वाली चीज़ मिली, तो वो ये जानते थे कि ये अच्छी है, क्योंकि वो डरे हुए थे."
बाद में उनका ये भाषण 1984 में ‘अनकॉमन सेंस’ नाम के संग्रह में प्रकाशित किया गया था.
पहले से स्थापित परंपराओं को तोड़ने वाले वैज्ञानिक आविष्कारों के बारे में बात करते हुए वो अक्सर कवि जॉन डॉन के इस मिसरे का हवाला दिया करते थे, ‘ये सब टुकड़ों में बंट गया है… सारी बनावट खंड खंड हो गई है.’

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ओपेनहाइमर की भविष्यवाणी
जो एक और कवि ओपेनहाइमर को बहुत पसंद थे, वो थे जॉन कीट्स.
कीट्स जिन लोगों की तारीफ़ करते थे उन सबकी एक साझा ख़ूबी बताने के लिए उन्होंने ‘नकारात्मक क्षमता’ का जुमला गढ़ा था.
वो कहा करते थे, ‘ये वो स्थिति होती है जब कोई इंसान अनिश्चितताओं, गूढ़ रहस्यों और आशंकाओं से घिरा रहने में सक्षम होता है, और वो तथ्यों और तर्कों की संवेदनाओं से परे होता है.’
बरट्रांड रसेल ने ओपेनहाइमर के बारे में लिखा था कि वो ‘चीज़ों को सहज तरीक़े से देखने में अक्षम हैं.
ये एक ऐसी कमज़ोरी है, जो किसी पेचीदा और नाज़ुक मानसिक स्थिति वाले इंसान में मिलने पर हैरानी नहीं होती.’
रसेल भी शायद ओपेनहाइमर की उसी ख़ूबी की तरफ़ इशारा कर रहे थे, जिसका हवाला कीट्स ने दिया था. ओपेनहाइमर के व्यक्तित्व के विरोधाभासों, उनके ख़ुद को फ़ौरन नए सांचे में ढाल लेने, विज्ञान और कविता के बीच उनकी दौड़ भाग, साधारण विवरण को ग़लत ठहराने की उनकी आदतों का वर्णन करके शायद हम उन्हीं ख़ूबियों की पहचान करते हैं, जिन्होंने उन्हें परमाणु बम बनाने का मक़सद हासिल करने लायक़ बनाया था.
इस महान और भयानक मक़सद को हासिल करने के सफ़र के दौरान भी ओपेनहाइमर ने, ‘आंसुओं की धार वाला हाव-भाव’ ज़िंदा रखा था, जिसकी भविष्यवाणी उन्होंने 1920 के दशक में की थी.
माना जाता है कि पहले परमाणु परीक्षण का नाम ‘ट्रिनिटी’ भी जॉन डॉन की एक कविता ‘बैटर माई हार्ट, थ्री पर्सन्स गॉड’ से आया था. जिसमें उन्होंने ये मिसरा लिखा था, ‘हो सकता है कि मैं फिर उठूं और खड़ा हो जाऊं, तुम मुझे फिर से उखाड़ फेंको और अपनी ताक़त को मोड़ कर मुझे तोड़ दो, उड़ा दो जला दो और मेरा नया व्यक्तित्व गढ़ो.’
जॉन डॉन से ओपेनहाइमर का परिचय कराने वाली जीन टैटलॉक थीं. कुछ लोगों का मानना है कि ओपेनहाइमर ताउम्र, जीन से प्यार करते रहे थे. जीन टैटलॉक ने परमाणु परीक्षण से एक साल पहले ख़ुदकुशी कर ली थी.
परमाणु बम बनाने की परियोजना के हर नुक़्ते, हर कोने पर ओपेनहाइमर की कल्पना की छाप दिखती थी.
त्रासदी और रूमानियत की उनकी समझ का अक़्स दिखता था.
जब जनरल लेस्ली ग्रोव्स ने इस प्रोजेक्ट के प्रमुख के लिए उनका इंटरव्यू लिया था तो हो सकता है कि उन्होंने ओपेनहाइमर में भयंकर महत्वाकांक्षा की झलक देखी थी.
या फिर शायद उन्होंने ज़रूरत के हिसाब से महत्वाकांक्षा के अतिरेक के इस खयाल को वक़्ती तौर पर अपने भीतर जज़्ब कर लिया था.
प्रोजेक्ट वाय की सफलता जितनी रिसर्च का नतीजा थी, परमाणु बम उतना ही ओपेनहाइमर की ये कल्पना करने की इच्छा और क्षमता का भी प्रतीक था कि वो ही ऐसे इंसान हैं, जो इसे मुमकिन बना सकते हैं.
ओपेनहाइमर लड़कपन से ही चेन स्मोकर थे. अपनी ज़िंदगी में वो कई बार टीबी के मर्ज़ के शिकार हुए.
1967 में 62 साल की उम्र में उनकी मौत गले के कैंसर से हुई थी. अपनी मौत से दो साल पहले, सरलता के एक दुर्लभ लम्हे में उन्होंने विज्ञान और कविता के इस्तेमाल के बीच एक ख़ास फ़र्क़ की तरफ़ इशारा किया था.
उन्होंने कहा था कि कविता के उलट, ‘विज्ञान ये सीखने का नाम है कि कोई भी ग़लती दोबारा न की जाए.’
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