लोकसभा चुनाव 2024: बलिया में बीजेपी के सांसद को कितनी टक्कर दे पा रहे हैं सपा के सनातन पांडेय

बीजेपी प्रत्याशी नीरज शेखर (बाएं) और सपा प्रत्याशी सनातन पांडेय

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    • Author, गौरव गुलमोहर
    • पदनाम, बलिया से बीबीसी हिंदी के लिए

उत्तर भारत में बग़ावत की धरती कहा जाने वाला बलिया इन दिनों बढ़ती चुनावी सरगर्मियों के कारण चर्चा में है.

हाल ही में पूर्व मंत्री और मुलायम सिंह यादव के क़रीबी रहे भूमिहार नेता नारद राय के ब़ागी हो सपा छोड़ बीजेपी में जाने से बलिया की राजनीतिक तपिश बढ़ गई है.

बलिया लोकसभा सीट से पूर्व प्रधानमंत्री और आठ बार के सांसद चंद्रशेखर सिंह के बेटे नीरज शेखर सिंह इस बार बीजेपी के टिकट पर मैदान में हैं.

वहीं, दूसरी ओर ग़ैर-राजनीतिक परिवार से आने वाले सनातन पांडेय बीजेपी उम्मीदवार नीरज शेखर के सामने चुनौती पेश कर रहे हैं.

इतिहास गवाह रहा है कि बलिया लोकसभा ब्राह्मण बहुल होने के बाद भी यहां से आज तक किसी भी दल का ब्राह्मण उम्मीदवार चुनाव नहीं जीत सका है.

सवाल यह है कि क्या सनातन पांडेय इस बार बलिया लोकसभा का इतिहास बदल पाएंगे?

स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई और जन-आंदोलन से निकलकर प्रभावशाली लोगों के इर्द-गिर्द घूमने वाली बलिया की राजनीति जातीय समीकरणों पर टिक चुकी है.

दिलचस्प है कि इसी बलिया से साल 1974 में जयप्रकाश नारायण ने 'जनेऊ तोड़ो' का नारा दिया था.

बीजेपी जहां हैट्रिक लगाने की जुगत में है, वहीं समाजवादी पार्टी अपनी खोई सीट वापस पाने के लिए संघर्षरत है.

बलिया जनपद के वरिष्ठ पत्रकार अजीत ओझा बीबीसी से कहते हैं, "बलिया में धरातल पर कोई वर्ग-संघर्ष देखने को नहीं मिलता. ब्राह्मण मतदाताओं में एक बात ज़रूर है कि आज़ादी के बाद से आज तक ब्राह्मण प्रत्याशी जीत कर संसद नहीं पहुंचा है. जब राजनीति में जाति की बात आती है तो विकास के मुद्दे गौण हो जाते हैं, न तो कोई बलिया की मूलभूत आवश्यकताओं के विषय में कोई बात करता है और न ही कोई पॉलिसी की बात करता है."

बीबीसी

क्या है बलिया का मिजाज़?

बलिया के निवासी अनुराग ओझा

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से लगभग 150 किलोमीटर दूर और पूर्वांचल का सबसे पूर्वी जनपद बलिया में राजनीतिक हलचल बढ़ चुकी है.

सुबह के सात बज रहे हैं. बलिया में चाय की दुकानों पर लोगों की संख्या बढ़ने लगी है.

हमारी पहली मुलाकात यहां अख़बार पढ़ रहे अशोक सिंह से हुई. अशोक सिंह बलिया में नीरज शेखर की जीत को लेकर आश्वस्त नज़र आते हैं.

अशोक सिंह कहते हैं, "विपक्ष महंगाई और बेरोज़गारी को मुद्दा बना रहा है लेकिन वर्ल्ड लेवल पर देखा जाए तो यहां कुछ भी महंगाई और बेरोज़गारी नहीं है. दूसरी बात क्या ये लोग बेरोज़गारी ख़त्म कर देगा? यहां लड़ाई समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार सनातन पांडेय और बीजेपी उम्मीदवार नीरज शेखर के बीच टक्कर है."

पिछले चुनावों की अपेक्षा इस बार चुनावी रंग बलिया में कुछ कम ज़रूर नज़र आता है लेकिन बीजेपी से पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर के मैदान में आने के बाद चुनावी रंगत थोड़ी बढ़ी है.

एक तरफ जहां बीजेपी समर्थक एकतरफ़ा जीत का दावा कर रहे हैं, वहीं समाजवादी पार्टी समर्थक नीरज शेखर के लिए राह आसान नहीं मान रहे हैं.

बलिया कलेक्ट्री में चुनावी जमघट लगने वाली चाय की दुकान पर बैठे किसान रणजीत चौबे बीबीसी से कहते हैं, "17 साल से नीरज शेखर सांसद हैं जिनका एक काम धरातल पर नज़र नहीं आता. एक बार दस लोग गांव के ट्रांसफर की समस्या लेकर मिलने गए थे. तीन घंटे बाद मिले, पावर हाउस पर बैठे रहे लेकिन ट्रांसफर्मर नहीं मिला. अगर नीरज शेखर इने निडर हैं तो राज्यसभा से इस्तीफ़ा देकर क्यों नहीं चुनाव लड़ते? इस बार के चुनाव में नीरज शेखर के लिए राह आसान नहीं है."

नारद राय फ़ैक्टर कितना प्रभावी

नारद राय

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बलिया की राजनीति में नारद राय पुराने राजनीतिक खिलाड़ी माने जाते हैं. चर्चा है कि बलिया की रैली में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मंच पर नाराद राय का नाम नहीं लिया, इसलिए वह नाराज़ होकर बीजेपी में शामिल हो गए.

हालांकि राजनीतिक लोग मानते हैं कि नारद राय पिछले लोकसभा चुनाव में पूरी तरह खुलकर एसपी प्रत्याशी सनातन पांडेय के साथ थे लेकिन विधानसभा चुनाव में जब नारद राय प्रत्याशी बने तो सनातन पांडेय ने उनका साथ नहीं दिया.

इसलिए मौका देखते हुए नारद राय ने पाला बदल कर सनातन पांडेय को हराने का एलान कर दिया है.

बलिया लोकसभा में कुछ समय पहले तक भूमिहार मतदाताओं की संख्या बहुत नहीं रही है लेकिन परिसीमन के बाद गाज़ीपुर ज़िले की मुहम्मदाबाद और जहूराबाद दो विधानसभाएं इस लोकसभा में जुड़ने से यहां भूमिहार मतदाताओं की संख्या बढ़ी है.

यही कारण है कि गाहे-बगाहे जम्मू और कश्मीर के मौजूदा उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के भी बलिया से लड़ने की चर्चा सुनाई पड़ जाती है.

नारद राय के बीजेपी में जाने के सवाल पर मनीष तिवारी कहते हैं, "समाजवादी पार्टी के पास कोई भूमिहार चेहरा नहीं है इसलिए उनके बीजेपी में जाने से कुछ न कुछ फ़र्क ज़रूर पड़ेगा. अब बलिया के दोनों बड़े भूमिहार चेहरे उपेंद्र तिवारी और नाराद राय बीजेपी में शामिल हो गए हैं. इस लोकसभा सीट के अंतर्गत भूमिहार मतदाता की संख्या अच्छी-खासी है. हम व्यक्तिगत तौर पर भले ही सनातन पांडेय से जुड़े हैं लेकिन नारद राय के जाने से प्रभाव पड़ेगा."

क्या हैं चुनावी मुद्दे

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इमेज कैप्शन, अग्निवीर भर्ती योजना से नाराज दीपक यादव

पिछले साल बलिया में हीट वेव से 50 से अधिक मौतें होने के बाद खस्ताहाल स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर ये ज़िला काफी चर्चा में आया लेकिन यहां के लोगों की मानें तो इस दिशा में अभी तक कोई ख़ास पहल नज़र नहीं आती है.

बलिया की स्वास्थ्य व्यवस्था पर शुभम सिंह कहते हैं, "बलिया की स्वास्थ्य व्यवस्था औसत से नीचे है. यहां एक सरकारी अस्पताल है जिसकी एक लिमिट है और प्राइवेट अस्पताल भी उतने बेहतर नहीं हैं. यहां बुखार, हल्की-फुल्की चोट और डिलीवरी हो सकती है."

"यदि कोई गंभीर समस्या हो गई तो बलिया के लोगों को बनारस के बीएचयू जाना पड़ता है. यदि कोई सड़क दुर्घटना में गम्भीर रूप से घायल हुआ तो उसे प्राथमिकी करके बनारस रेफ़र कर दिया जाता है. लेकिन चुनाव में स्वास्थ्य मुद्दा दाल में नमक बराबर ही है."

विपक्षी इंडिया गठबंधन संविधान बचाने, बेरोज़गारी-महंगाई ख़त्म करने और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर चुनावी एजेंडा सेट कर रहा है. वहीं बीजेपी राष्ट्रवाद, राम मंदिर और महर्षि भृगु मंदिर कॉरिडोर बनाने के मुद्दे पर चुनाव लड़ रही है.

महंगाई से परेशान रमेश्वरी देवी कहती हैं कि बाजार में दाल 150 रुपया, चावल 50 रुपया और चीनी 50 रुपया मिल रही है.

वे कहती हैं, "योगी-मोदी जो पांच किलो राशन दे रहे हैं उससे क्या होगा? लड़िकन पढ़ लिख के बइठल बाड़न, जीवन चौपट हो रहा है. जो सिलेंडर 400 में मिलता था अब वो एक हजार में मिल रहा है. हम चूल्हे पर खाना बनाने के लिए मजबूर हैं."

आम जनता के मुद्दों से जुड़े आंदोलनों का चेहरा रहे बलवंत यादव बीबीसी से कहते हैं, "बलिया के चुनाव में हर साल आने वाली बाढ़, कटान, जर्जर स्वास्थ्य व्यवस्था, सालों से बंद पड़ी चीनी मील और कताई मील अहम मुद्दा होना चाहिए लेकिन राजनीतिक दल इन मुद्दों पर कभी बात नहीं करते हैं. चीनी मील और कताई मील में बलिया के लगभग चार हज़ार लोगों को रोज़गार मिलता था लेकिन इनके बंद होने के बाद चार हज़ार परिवार बेरोज़गारी के शिकार हो गए. आज बलिया में पलायन मजबूरी बन गई है."

चुनाव में बेरोज़गारी कितना अहम मुद्दा है?

वीडियो कैप्शन, भारत का वो इलाका जहां आज भी लोगों को छूआछूत का सामना करना पड़ता है

केंद्र सरकार की अग्निवीर सेना भर्ती योजना आने के बाद देश भर में कई जगहों से युवाओं ने आंदोलन किया.

बलिया में अग्निवीर योजना के ख़िलाफ़ युवाओं का आंदोलन हिंसक रूप देखने को मिला था.

बलिया रेलवे स्टेशन पर युवाओं ने तोड़फोड़ तो की ही, कई ट्रेनों को भी आग के हवाले कर दिया था.

इस आंदोलन से जुड़े कई युवाओं पर एफ़आईआर दर्ज कर उन्हें जेल भेज दिया गया. पुलिस की इस कार्रवाई से युवाओं में नाराज़गी देखने को मिल रही है.

बलिया के रहने वाले कारोबारी अनुराग ओझा बीबीसी से कहते हैं, "यहां का चुनाव बेरोज़गारी और महंगाई के मुद्दे पर हो रहा है. अग्निवीर योजना के ख़िलाफ़ बलिया के जिन युवाओं ने आंदोलन किया उन्हें धमकाया गया और टारगेट कर प्रताड़ित किया गया. युवाओं पर एफ़आईआर डाल कर उन्हें जेल भेज दिया गया. इसे लेकर युवाओं में बहुत नाराज़गी है."

सेना की भर्ती देख रहे नगीना नगर निवासी युवा दीपक कुमार यादव से हमारी मुलाकात हुई. दीपक यादव 10 साल से भर्ती के लिए दौड़ रहे हैं लेकिन जबसे अग्निवीर आई तबसे दौड़ना छोड़ दिया है.

दीपक कुमार कहते हैं, "चार साल के लिए सेना में कौन जाएगा ? मैं दस साल से दौड़ रहा था लेकिन जबसे अग्निवीर आया मैंने दौड़ना छोड़ दिया. आपको सड़क से लेकर फील्ड तक में कोई नवजवान दौड़ता नज़र नहीं आएगा. पहले हमारे गांव के बगल वाले ग्राउंड में दो हज़ार लड़के दौड़ने के लिए आते थे लेकिन इस समय एक लड़का नहीं आता. मैं अब अपना धंधा कर रहा हूँ, मक्खन की दुकान चलाते हैं. सरकार बदलेगी तो हम लोग दोबारा दौड़ना शुरू कर देंगे."

दलित मतदाता निर्णायक

बलिया चुनाव

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इमेज कैप्शन, दिहाड़ी मज़दूरी करने वाले शख़्स परमात्मा

पिछले लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन प्रत्याशी सनातन पांडेय 4 लाख 53 हज़ार 595 वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहे. बीजेपी उम्मीदवार वीरेंद्र सिंह ने 4 लाख 69 हज़ार से अधिक वोट पाकर लगभग पंद्रह हज़ार मतों से जीत दर्ज की थी.

सवाल यह है कि क्या समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार सनातन पांडेय पिछले लक्ष्य को छू पाएंगे?

पिछले चुनाव में एसपी का बीएसपी के साथ गठबंधन होने के कारण दलित मतदाताओं ने सनातन पांडेय पर विश्वास जताया था.

लेकिन इस बार बहुजन समाज पार्टी ने ललन सिंह यादव को मैदान में उतार कर अपने पुराने मतदाताओं को दोबारा पार्टी के साथ जोड़ने की दिशा में क़दम उठाया है.

हालांकि इंडिया गठबंधन ने संविधान और आरक्षण पर ख़तरे को चुनावी मुद्दा बनाकर दलित मतदाताओं में सेंध लगाने का काम किया है.

दिहाड़ी मज़दूरी करने वाले परमात्मा कहते हैं, "हम इस बार संविधान बचाने के लिए समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार सनातन पांडेय के साथ हैं."

वह कहते हैं, "हम इस बार संविधान के मुद्दे पर अखिलेश यादव के साथ हैं. दोबारा अगर बीजेपी की सरकार बन जाएगी तो संविधान के साथ पूरी छेड़खानी हो जागी. दलित और छोटी जाति को कोई कुछ समझता ही नहीं है."

राजनीतिक दल दावे कुछ भी कर रहे हों लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त यही है कि बलिया में दलित मतदाता इस बार निर्णायक भूमिका में हैं.

जातीय समीकरण किसके पक्ष में?

बलिया

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बलिया लोकसभा सीट ब्राह्मण और दलित बहुल है. इसके अलावा ठाकुर मतदाता अहम भूमिका में रहे हैं.

यहां अनुमानित ब्राह्मण मतदाता लगभग 15 प्रतिशत और ठाकुर मतदाता लगभग 13 फ़ीसदी हैं. जबकि दलित मतदाता 15 फ़ीसदी के आस-पास हैं.

यादव मतदाता लगभग 12 फ़ीसदी, मुस्लिम मतदाता लगभग 8 फ़ीसदी और बनिया मतदाता लगभग 8 फ़ीसदी हैं.

वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में ब्राह्मण, यादव, मुस्लिम मतदाता एसपी उम्मीदवार सनातन पांडेय के साथ नज़र आ रहे हैं. वहीं ठाकुर, बनिया, भूमिहार मतदाता बीजेपी के साथ जाते नज़र आ रहे हैं.

बहुजन समाज पार्टी के कोर मतदाता माने जाने वाले दलित मतदाता इस बार अपने मूल दल से संविधान और आरक्षण के मुद्दे पर हिलते नज़र आ रहे हैं.

प्रदेश के साथ ही बलिया की राजनीति में भी दलित मतदाताओं की भूमिका निर्णायक होने वाली है. देखना दिलचस्प होगा कि दलित मतदाता किस पर विश्वास जताते हैं.

बीजेपी जिलाध्यक्ष संजय यादव अपनी जीत को लेकर आत्मविश्वास से भरे हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "पिछले लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के लिए कठिन चुनौती थी. प्रदेश की दो बड़ी पार्टियों सपा और बसपा का गठबंधन था. उनका वोट प्रतिशत भी हमसे ज्यादा था. इसके बावजूद हमें 51 फीसदी मत देकर 64 सीटें देने का काम किया."

सनातन पांडेय का कहना है कि ये चुनाव भारत के संविधान को बचाने के लिए लड़ा जा रहा है.

उन्होंने बीबीसी हिंदी को बताया, "भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम रहे इसके लिए चुनाव लड़ रहे हैं. इस बार हर वर्ग, हर धर्म के लोग भाजपा के कुशासन से त्रस्त हैं.’’

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