नीतीश के गढ़ नालंदा में सांप्रदायिक दंगों का लोकसभा चुनाव पर कितना असरः ग्राउंड रिपोर्ट

नीतीश कुमार और कौशलेंद्र कुमार

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    • Author, सीटू तिवारी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

50 साल के मोहम्मद अकबर आज़ाद की टीन की दुकान भी नहीं बची. वो बीते एक साल से सड़क किनारे क़ब्रिस्तान की दीवार के सहारे पन्नी तानकर उसकी छांव में बैठकर इस असहनीय गर्मी में अपनी ट्रैवल्स एजेंसी चला रहे हैं.

उनके सिर पर लगे 22 टांकों के निशान और शरीर की दूसरी जगहों पर हुए ज़ख़्म के निशान हल्के हो रहे है. लेकिन दिल का ज़ख़्म ताज़ा है. आंसुओं को ज़ज़्ब किए उनकी आंखें काले फ्रेम के चश्मे से ढंकी हैं.

अकबर आज़ाद बीते साल मार्च 2023 में बिहार शरीफ़ में हुई हिंसा के शिकार है. उस वक्त बिहार के नालंदा ज़िले के मुख्यालय में रामनवमी के मौके पर हिंसा हुई थी.

बिहार शरीफ़: नालंदा ज़िले का मुख्यालय

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इमेज कैप्शन, दंगे के दौरान जली हुई किताबें और दूसरी चीज़ें

अकबर आज़ाद, 'अंजुमन मोफीदुल इस्लाम' नाम के स्थानीय संगठन के सचिव है.

बीबीसी को वो बताते है, "हमारी संस्था के 12 सदस्य शांति समिति के सदस्य थे और हमारी ज़िम्मेदारी इस गगन दीवान मोहल्ले से जुलूस को शांतिपूर्वक पास करा देना था. दो बजे से छोटा-बड़ा जुलूस जाता रहा. रमज़ान का महीना था इसलिए हम लोग पांच बजे तक इफ़्तार के लिए जाना चाहते थे."

"लेकिन प्रशासन ने कहा कि आख़िरी जुलूस पार करा के चले जाएं. प्रशासन के जाने के कुछ देर बाद अचानक एक जुलूस आया और भगदड़ मच गई. हमको दो ईंटा लगा और हम बेहोश हो गए. हमको एक एंबुलेस तक सरकार ने घर जाने के लिए नहीं दी. 24 घंटे तक ऐसे ही मरहम पट्टी करके घर में पड़े रहे."

बिहार के पुराने शहरों में से एक बिहार शरीफ, नालंदा ज़िले का मुख्यालय है.

बिहार शरीफ़ की आबादी करीब साढ़े तीन लाख मानी जाती है, जिसमें मुस्लिम आबादी करीब 30 से 35 फ़ीसदी है. क्या इस बार चुनाव में मुस्लिम समाज के वोटिंग पैटर्न पर इन दंगों का असर होगा?

इस सवाल पर अकबर कहते हैं, "चुनाव में इसका ज़िक्र तो ज़रूर होगा. एमपी महोदय 15 साल से लगातार हैं. इतनी बड़ी घटना हुई. हमारा मदरसा, मस्जिद और दुकानें जलाई और तोड़ी गई मगर सांसद महोदय एक रोज़ भी ख़ैरियत लेने के लिए नहीं आए. ना बिहार सरकार में हमारे मंत्री श्रवण कुमार आए. ज़िला प्रशासन ने सुध तक नहीं ली. 2005 से हम नीतीश कुमार की पार्टी को वोट करते रहे लेकिन वो तो मुस्लिम प्रेम का ढकोसला करते है."

मदरसा अजीज़िया : 'जले के निशान क़ायम, हॉस्टल शुरू नहीं हो सका'

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अकबर की फुटपाथी दुकान से कुछ दूरी पर लहेरी थाना और उससे कुछ दूरी पर मदरसा अजीज़िया है.

मदरसे में साल 2023 में हुए दंगों की बर्बादी के निशान क़ायम हैं.

मदरसे में घुसते ही हॉल, क्लासेज़ और ऑफ़िस की दीवारें उस वक़्त हुई भयावह आगजनी की कहानी कहती है.

ऊंची-ऊंची छतों पर लटके पंखे आज भी मुड़े पड़े है और खिड़कियों की जली हुई लकड़ी देखकर सिहरन पैदा होती है.

बिहार सरकार ने पुरानी बिल्डिंग की मरम्मत और नई बिल्डिंग बनवाने के लिए 29.78 करोड़ रुपये का बजटीय प्रावधान किया है.

मदरसे की प्रशासनिक ईकाई से जुड़े लोगों को चुनाव बाद इस काम के लिए टेंडर निकलने की उम्मीद है.

मदरसा के प्रिंसिपल मोहम्मद शाकिर बताते है, "बिल्डिंग को नुक़सान के अलावा बड़ा नुकसान मदरसे की 4500 किताबें थी, जिन्हें जला दिया गया. इसमें 250 अनमोल किताबें थीं. 10 से 16 साल के 125 लड़के हमारे हॉस्टल में पढ़ते थे, वो वापस नहीं आए. हम अपना हॉस्टल फिर से शुरू नहीं कर पाए. बच्चों के मां बाप मदरसे को लेकर अभी भी ख़ौफ़ज़दा है. अभी बिहार में जब शिक्षकों की भर्ती हुई तो हम अपने बच्चों को उनके सर्टिफिकेट नहीं दे पाए कि वो नौकरी पा सकें. उनके डॉक्यूमेंट्स तक जला दिए गए."

मदरसा अज़ीज़िया कोई आम मदरसा नहीं है. 1896 में ये मदरसा बीबी सोगरा ने अपने शौहर अब्दुल अज़ीज़ के नाम पर शुरू किया था. बीबी सोगरा उस वक्त की प्रसिद्ध समाजसेविका थीं और पूरे बिहार शरीफ़ में उनके नाम पर स्कूल, कॉलेज और मस्जिदें हैं.

इस मदरसे में पहली कक्षा से लेकर एमए तक की पढ़ाई होती है और इसका सिलेबस एनसीईआरटी पर आधारित है. 22 सितंबर, 2022 को यहां की छात्राओं से मिलने के लिए यूनाइटेड नेशनल पॉपुलेशन फंड की इंडिया रिप्रेज़ेंटेटिव एंड्रिया वोजनार भी आई थीं. अभी यहां पढ़ने वाले कुल 500 बच्चों में 85 फ़ीसदी लड़कियां हैं.

मैनें घूम घूम कर शांति क़ायम की : निवर्तमान सांसद

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इमेज कैप्शन, सांसद कौशलेंद्र कुमार

बिहार शरीफ़ के दंगों में 17 साल के गुलशन की मौत गोली लगने से हुई थी. वो पहाड़पुर मोहल्ले के पूरब टोले में रहते थे. उनके संकरे से घर में ग्रांउड फ्लोर पर अंधेरा पसरा है. गर्म दोपहरी में एक कोठरी में गाय बंधी है तो दूसरे में एक बुज़ुर्ग आराम कर रहे हैं.

गुलशन के भाई बात नहीं करना चाहते हैं. बहुत कहने पर उनके बड़े भाई कहते हैं, "हम बहुत बात कर चुके हैं. अब किसी से बात नहीं करेंगें."

लेकिन गुलशन के पड़ोसी दिलीप कुमार कहते है, "सम्राट चौधरी आए थे लेकिन सांसद महोदय नहीं आए. अब जेडीयू बीजेपी में मिल गया है तो वोट हम लोग बीजेपी को ही देते है. कौशलेन्द्र कुमार को हमारा वोट पड़ेगा."

वहीं, मोहल्ले की ही मीना देवी कहती हैं, "कहते हैं- 'अपना काम बनता, तो भाड़ में जाए जनता.' नेता यहां आए तो उन्होने क्या किया, कोई रोज़गार दे दिया मां बाप को? हम कहते हैं कि मोदी सरकार को हम वोट नहीं देंगे लेकिन एक आदमी के कहने से क्या होगा?"

बिहार शरीफ़ दंगों में पीड़ितों से मुलाक़ात नहीं करने की शिकायत मदरसा अज़ीज़िया के प्रिंसिपल मोहम्मद शाकिर को भी है.

वो कहते हैं, "सीएम साहब के सलाहकार मनीष कुमार वर्मा, सुन्नी वक्फ़ बोर्ड के लोग आए, लेकिन अफ़सोस की बात है कि हमारे सांसद महोदय (कौशलेन्द्र कुमार) एक बार भी यहां नहीं आए."

बीबीसी ने जब इस संबंध में निवर्तमान सांसद कौशलेन्द्र कुमार से पूछा तो उन्होंने कोई स्पष्ट उत्तर नहीं दिया.

कौशलेन्द्र कुमार बार-बार यही दोहराते रहे कि, "हम लोग उस वक़्त भी लगातार पूरे इलाक़े में घूमते रहे और कंट्रोल करने की कोशिश करते रहे. वहां के लोगों का रिस्पॉन्स हमारे प्रति अच्छा है."

नालंदा : नीतीश का गढ़

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इमेज कैप्शन, नीतीश कुमार के पैतृक गांव में लगा बोर्ड

बिहार का नालंदा लोकसभा क्षेत्र मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का गढ़ माना जाता है.

नीतीश कुमार का ये गृह ज़िला है. कुर्मी जाति बहुल इस लोकसभा क्षेत्र में अस्थावां, बिहार शरीफ़, राजगीर, इस्लामपुर, हिलसा, नालंदा और हरनौत विधानसभा सीटें आती हैं.

मुख्यमंत्री बनने के बाद नीतीश कुमार ने नालंदा में शूटिंग रेंज, नालंदा यूनिवर्सिटी, पावापुरी मेडिकल कॉलेज, बिहार पुलिस अकादमी, राजगीर अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन सेंटर, ज़ू सफ़ारी, नूरसराय उद्यान महाविद्यालय और हर घर गंगाजल जैसी योजनाओं को लागू किया.

1996 से पहले इस सीट पर कांग्रेस और सीपीआई का क़ब्ज़ा रहा लेकिन 1996 के बाद से ये सीट समता पार्टी और फिर जेडीयू के कब्ज़े में है.

1996 में इस सीट पर जॉर्ज फर्नाडीस तो 2004 में इस सीट का लोकसभा में प्रतिनिधित्व नीतीश कुमार ने भी किया था.

साल 2009 से लगातार तीन बार कौशलेन्द्र कुमार यहां से सांसद चुने जा रहे हैं. इस बार भी पार्टी ने उन्हीं को चुनावी मैदान में उतारा है.

कौशलेन्द्र कुमार इस बार भी अपनी जीत के प्रति आश्वस्त है.

वो कहते है, "पूरे देश में एकाध ऐसा लोकसभा होगा जहां नालंदा जितना काम हुआ हो. यहां का सारा काम तो नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री रहने के कारण हुआ है प्रधानमंत्री मोदी जी के टाइम भी यहां बहुत विकास हुआ है."

'हमने राज्यस्तरीय शांति समिति बनाने का प्लान दिया था'

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इंडिया गठबंधन में ये सीट भाकपा माले के खाते में आई है.

पार्टी ने बिहार की पालीगंज विधानसभा से विधायक 37 साल के संदीप सौरभ को टिकट दिया है.

संदीप सौरभ जेएनयू छात्रसंघ के महासचिव रहे हैं. साथ ही बिहार के शिक्षकों के राज्य कर्मियों का दर्जा दिलाने के आंदोलन में वो केंद्रीय भूमिका में थे.

बिहार शरीफ़ का खंडहर नुमा होटल लाडली आजकल उनका चुनाव कार्यालय बना हुआ है. बिहार शरीफ़ में जब दंगा हुआ था, उस वक्त भाकपा माले भी बिहार सरकार का हिस्सा थी.

संदीप सौरभ कहते हैं, "उस इलाक़े में हम लोग अभी गए थे और जब घटना हुई थी तो हमारा एक डेलीगेशन मुख्यमंत्री से मिला था. हमने नीतीश कुमार को दंगा रोकने का एक प्लान बना कर दिया था कि सिविल सोसाइटी की राज्य स्तर की एक शांति समिति बनाई जाएं जिसके पास पॉवर, फंड और पुलिस महकमा जिसकी बात सुनें. लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं."

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इमेज कैप्शन, विराट कोहली के स्थानीय हमशक्ल से मिलते संदीप सौरभ

संदीप सौरभ अपने जीवन का दूसरा चुनाव लड़ रहे हैं.

पहला चुनाव विधायकी के लिए था और दूसरा संसद तक पहुंचने के लिए, जिसके लिए वो फिलहाल कोशिश कर रहे हैं.

ऐसे में 65 साल के सांसद कौशलेन्द्र कुमार से वो अपनी लड़ाई कितनी मुश्किल मानते हैं?

संदीप कहते हैं, "यहां वामपंथ का स्ट्रॉन्ग बेस है. परिस्थितियां बदली हैं जिसमें युवाओं की अपेक्षा रोजगार है. अब जुमलों से काम नहीं चलता. इस बार जनता को रोज़गार और महंगाई से मुक्ति चाहिए."

'गांव का आदमी सीएम है और हम गंदगी में रहते हैं'

बिहार शरीफ़ से लगभग 30 किलोमीटर दूर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का पैतृक गांव कल्याण बिगहा है. ये हरनौत प्रखंड में पड़ता है.

नीतीश कुमार के घर के ठीक सामने से गुजरने वाली गली गांव के मुसहर टोले की तरफ़ जाती है. जहां लोगों के लिए नाले की गंदगी ही बड़ी समस्या बनी हुई है.

गंगजरिया देवी कहती हैं, "इतना गंदा रहता है यहां, गांव का आदमी सीएम है. गंदगी से सर्दी खांसी होती है, गंदा पानी पांव में लगता है आते जाते. हम लोगों को सीएम के पास जाने नहीं देते ये बताने के लिए कि यहां इतना नरक है."

गांव की ही एक अन्य महिला कोलालो देवी कहती हैं, "आते हैं तो बड़ा-बड़ा आदमी, हाथ से हाथ पकड़कर के खड़ा रहता है (सुरक्षा के लिए बनी ह्यूमन चेन). मिलने देगा तभी ना उनको बताएंगे कि हमारे यहां का नरक देखने आएं."

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इस टोले में कम से कम सात घर ऐसे हैं जहां इस चौड़े नाले को पार करके ही जाया जा सकता है. हरूमनी मांझी ने अपने घर जाने के लिए ताड़ के पेड़ का पुल बना लिया है लेकिन बरसात के समय उस पर पानी भर जाता है.

वो कहते हैं, "हम लोग बरसात के दिन में टोले में आ नहीं सकते. हम लोग कट कर रह जाते हैं. कई बार मुखिया को बोला है- नाले पर पुल बनवा दो, लेकिन वो कहता है मेरे बस की बात नहीं."

इस वार्ड के पार्षद संजय मांझी कहते हैं, "कई बार पुल के लिए आवेदन किया है, नाले की सफाई के लिए कहा गया है लेकिन कुछ होता नहीं है."

इसी टोले में हमें विनीता देवी मिलीं जो एक झोपड़ी में चूल्हे पर रोटी बना रही थीं.

पसीने से तरबतर विनीता गैस के बारे में पूछने पर कहती हैं, "शुरू में गैस का पैसा दिया था लेकिन अब नरेन्द्र मोदी गैस का पैसा नहीं देता. इतनी महंगी गैस कैसे भराएंगे. गरीब अमदी (आदमी) है, जलावन चुनकर खाना पकाते हैं. यहां पर सीएम से कोई मुलाक़ात नहीं करने देता. कुर्मी सब मांझी लोगों को कैसे सटने (मिलने) देगा."

लेकिन क्या नीतीश सरकार से ये नाराज़गी जेडीयू के ख़िलाफ़ वोट में तब्दील होगी? इस सवाल का जवाब 'नहीं' लगता है. जैसा कि हरूमनी मांझी कहते है, "नीतीश हमारे लिए काम नहीं कर रहे, ये उनका धर्म है. लेकिन हमारा धर्म गांव के आदमी को वोट देना है."

नीतीश कुमार का भविष्य

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इमेज कैप्शन, नीतीश कुमार का गांव

नालंदा लोकसभा में सातवें चरण में यानी एक जून को चुनाव होने हैं.

इस लोकसभा में तकरीबन 22 लाख मतदाता हैं जिसमें महिला मतदाताओं की संख्या 10 लाख से ज्यादा है.

इन चुनावों के दौरान नीतीश कुमार की सेहत पर भी चर्चा होती रही है. बीते कुछ महीनों से उनके सार्वजनिक व्यवहार पर सवाल उठे हैं.

नालंदा के मौजूदा सांसद कौशलेन्द्र कुमार कहते हैं, "जेडीयू और उनके चाहने वालों में कोई निराशा नहीं है. वो तो घूम ही रहे हैं. हम भी उनसे अपने क्षेत्र के लिए प्रोग्राम लेंगे."

नीतीश कुमार के पैतृक गांव अनिल पासवान बीबीसी से कहते हैं, "सुनते हैं उनकी बीमारी की ख़बर. चिंता होती है क्योंकि गांव के बड़का नेता हैं. कोई छोटा मोटा नेता थोड़े ही ना है."

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीति में नीतीश कुमार के उभार के गवाह रहे विनय कुमार कहते हैं, "नीतीश का उभार नालंदा का भी उभार है. सरकारी योजनाओं के साथ नौकरियों में कुर्मी जाति का प्रतिनिधित्व भी बढ़ा. यकीनन अगर नीतीश कुमार का पतन होता है तो ये नालंदा के लिए भी झटका साबित होगा."

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