कन्नौजः अखिलेश यादव लेंगे डिंपल की हार का बदला या सुब्रत पाठक उन्हें घेरने में होंगे कामयाब? -ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, कन्नौज से
तेज़ रफ़्तार यमुना एक्सप्रेस से उतरकर तिरवा रोड से होकर कन्नौज शहर में दाख़िल होने वाले लोगों के लिए रेलवे क्रॉसिंग से गुज़रना एकमात्र रास्ता है क्योंकि अभी यहां रेलवे लाइन के ऊपर पुल बन ही रहा है.
ट्रैफ़िक अधिक हो तो क्रॉसिंग पर गाड़ी फंस ही जाती है.
यहीं बाइक पर बीजेपी का झंडा लगाए एक व्यक्ति से जब शहर का राजनीतिक माहौल पूछा तो अमित शाह की रैली में जा रहे इस व्यक्ति ने बेबाकी से कहा, "माहौल तो अखिलेश भैया का है लेकिन हम भी कोशिश में लगे ही हैं."
इस बाइक के ठीक पीछे रुकी एक बाइक पर सवार दो लोगों ने बिना पूछे ही कहा, "माहौल पूछिए मत, माहौल देखिए."
यहां से बायें मुड़ते ही शहर के प्रमुख होटलों में शुमार आशा होटल है जहां सभी कमरे राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ने के कारण बुक हैं.
मन में ये सवाल उठ ही रहा था कि क्या यहां इस बार चुनाव में कोई ज़मीनी मुद्दा है भी या नहीं कि नज़र रेलवे लाइन के उस पर टंगे चुनाव बहिष्कार के बैनर पर पड़ी.
ये कृष्णा नगर कॉलोनी है जो पिछले बीस साल में कृषि भूमि पर बिके प्लॉटों में बस गई है.
रेलवे लाइन और सड़क के बीच खड़ी दीवार को तोड़कर जीटी रोड से कॉलोनी में जाने का एकमात्र रास्ता बनाया गया है.
कृष्णा नगर में अधिकतर रिटायर्ड लोग या सरकारी कर्मचारी रहते हैं. इस बदहाल कॉलोनी में ना कोई सड़क है, ना सीवर लाइन और ना ही कोई लाइट या अन्य सुविधा.

कॉलोनी बसी पर सड़क और सीवर नहीं...

ऊबड़ खाबड़ और गंदे पानी से भरी गलियों से होकर गुज़रना एक मुश्किल काम है. यहां फिसलकर कई लोगों के हाथ-पैर टूट चुके हैं.
इस बदहाल कॉलोनी के लोगों ने इस बार चुनाव के बहिष्कार का एलान किया है.
स्थानीय निवासी रितेश चतुर्वेदी कहते हैं, "हम दस साल से सड़क मांग रहे हैं, लेकिन हमारी कोई सुन नहीं रहा है, इसलिए हमने मतदान बहिष्कार का एलान किया है ताकि हमारी बात सुनी जा सके."
यहां लोग दावा करते हैं कि वो हर स्तर पर अपनी समस्या को उठा चुके हैं, स्थानीय विधायक से लेकर सांसद के घर के चक्कर काट चुके हैं, जब किसी ने नहीं सुनी तो मजबूरी में बहिष्कार करना पड़ा है.
सड़क ना होने की वजह से गिरीश चंद दुबे पिछले आठ महीनों से अपनी कार को घर से बाहर नहीं निकाल पाये हैं. दरअसल, कार बाहर निकालने का कोई रास्ता ही नहीं है.

गिरीश कहते हैं, "रिटायरमेंट के पैसे से ये घर बनाया. कुछ साल पहले नई कार खरीदी, पहले कच्चा ही सही रास्ता था तो किसी तरह गाड़ी निकल जाती थी, अब सब प्लॉट में मकान बन गए, 8 महीने से गाड़ी खड़ी है, कोई बीमार हो जाए अस्पताल नहीं ले जा सकते."
यही हाल रानी मिश्रा का है, उनके घर के बेसमेंट में दो गाड़ियां पिछले लगभग एक साल से खड़ी हैं.
रानी कहती हैं, "एक गाड़ी खड़ी-खड़ी ख़राब हो गई है. दूसरी को बेटा महीने में एक दो बार बेसमेंट में ही आगे पीछे कर लेता है. हम यहां बुरी तरह फंस गए हैं. किसी गांव में भी ऐसा हाल नहीं होगा."
हालांकि चुनाव बहिष्कार की बात जब फैलने लगी तो स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों ने इस कॉलोनी का दौरा किया है और समस्या के समाधान का भरोसा दिया है.
रितेश चतुर्वेदी कहते हैं, "इस तरह का भरोसा हमें दस साल से मिल रहा है. चुनाव हो जाता है और फिर हमारी समस्या की तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता."

हर घर जल से नल का असर

कन्नौज से क़रीब चालीस किलोमीटर दूर छिबरामऊ क़स्बे के पास बसे खल्ला रूप मंगतपुर गांव में हाइवे से नज़दीकी के कारण ज़मीन के दाम आसमान पर हैं.
यहां घर-घर पानी पहुंचाने के लिए लाइन बिछाने का काम चल रहा है. अधिकतर घरों में पानी की टंकी लग गई है लेकिन अभी पानी नहीं आया है.
23 साल की रुचि अपने तीन बच्चों और पति के साथ एक छोटे से कमरे में रहती हैं. पतली-संकरी गली उनके घर तक पहुंचती है.
नई लगी पानी की टंकी ने रुचि के संघर्षपूर्ण जीवन में ख़ुशी की झलक दिखाई है. अब बस उन्हें टंकी से पानी आने का इंतज़ार है. उनके चेहरे की मुस्कान घूंघट के बाहर झांक रही है.
रुचि कहती हैं, "पानी आएगा तो ज़िंदगी बहुत आसान हो जाएगी. अब सरकार बस एक आवास और दे दे."

रुचि के परिवार के पास कोई ज़मीन नहीं है. जिस जगह में वह रहती हैं वो भी पट्टे पर मिली है. यहां घर बनाने लायक ज़मीन ख़रीदना उनकी पहुंच से बहुत दूर है.
उनके परिवार को सरकारी राशन मिलता है जो महंगाई के इस दौर में उनके लिए सबसे बड़ा सहारा है.
रुचि उस लाभार्थी वर्ग का हिस्सा हैं जो सरकार से मिली सुविधाओं के लिए चुनाव में मतदान से धन्यवाद करता रहा है.
लेकिन, रुचि जैसे लोगों की संख्या उनके सामने बहुत कम नज़र आती है जिनके लिए जाति, पार्टी और अन्य मुद्दे चुनाव में अधिक अहम हैं.
खल्लापुर से क़रीब एक किलोमीटर दूर नौगई गांव में बीड़ी बना रहीं उर्मिला के लिए चुनाव में कोई मुद्दा नहीं है.
सरकार से उन्हें फ्री सिलेंडर मिला है लेकिन महंगाई ने गैस को उनकी पहुंच से दूर कर दिया है.
उर्मिला कहती हैं, "हमारे लिए चुनाव में कुछौ नहीं हैं, जिधर माहौल दिखेगा उधर मतदान कर देंगे."

युवाओं की समस्या

गांव में बड़ी तादाद ऐसे युवाओं की है जिन्होंने पुलिस भर्ती के लिए तैयारी की थी. पर्चा लीक होने का आक्रोश उनमें साफ़ नज़र आता है.
ललिता ने बीएससी की डिग्री हासिल की है और अब वो नर्सिंग कोर्स करने का सोच रही हैं.
ललिता कहती हैं, "कई महीने तैयारी की थी. पेपर अच्छा हुआ था लेकिन जब पर्चा लीक का पता चला तो पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई. मैं बहुत देर तक रोई."
ललिता ने अभी तक अपना वोट नहीं बनाया है, लेकिन सरकार के प्रति वो आक्रोश ज़ाहिर करती हैं.
यहीं सुधांशु नाम का एक युवक कहता है, "हमने दिल लगाकर तैयारी की थी, पर्चा लीक हो गया तो झटका तो बहुत लगा. लेकिन पढ़ने वाले लोग अपने दम पर कुछ ना कुछ कर ही लेंगे."
सुधांशु कहते हैं, "मौजूदा माहौल ने हमें राजनीतिक रूप से जागरूक कर दिया है. अब हम जानते हैं कि देश और समाज के लिए क्या सही है."

अखिलेश के आने से बदला माहौल

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कन्नौज राजनीतिक रूप से सरगर्मियों में रहा है. साल 2019 में यहां बीजेपी के सुब्रत पाठक ने पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव को नज़दीक़ी मुक़ाबले में हरा दिया था.
इससे पहले अखिलेश यादव यहां से सांसद रहे हैं.
अखिलेश यादव के यहां से नामांकन करने ने समाजवादी पार्टी कार्यकर्ताओं में नया जोश भर दिया है.
सिर्फ़ पार्टी कार्यकर्ताओं में ही नहीं बल्कि शहर के आम लोगों की ज़ुबान पर भी अखिलेश यादव का नाम सुनाई दे रहा है.
चुनाव के बारे में पूछने पर अधिकतर लोग कहते हैं, "अखिलेश भैया राष्ट्रीय स्तर के नेता हैं, फिर से कन्नौज आ रहे हैं तो अच्छा लग रहा है."
केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कई समर्थक भी अखिलेश यादव के प्रति विरोध नहीं ज़ाहिर करते.
एक ढाबे पर एक युवा कहता है, "सरकार तो प्रधानमंत्री मोदी की भी बुरी नहीं है लेकिन कन्नौज के लिए अखिलेश भैया ही बेहतर हैं."
बीजेपी उम्मीदवार सुब्रत पाठक जानते हैं कि इस बार उनके लिए चुनौती पहले से बड़ी है.
पार्टी कार्यालय से चुनाव प्रचार पर निकलने की तैयारी कर रहे सुब्रत पाठक समर्थकों और प्रसंशकों से घिरे हैं. दूर-दराज़ गांवों से लोग उनसे मिलने आए हैं.

सुब्रत कोशिश कर रहे हैं कि प्रत्येक व्यक्ति से मिल लें. वो कई लोगों का फ़ोन नंबर उनके सामने अपने फ़ोन में सेव करते हैं और अपना नंबर सेव करवाते हैं.
सुब्रत पाठक अपने समर्थकों को ये भरोसा देने की कोशिश कर रहे हैं कि वो पूरी ताक़त से मैदान में हैं और फिर से चुनाव जीतने जा रहे हैं.
अखिलेश यादव की उम्मीदवारी पर सुब्रत पाठक कहते हैं, "हमारे लिए डिंपल और अखिलेश में कोई अंतर नहीं है. पिछली बार समाजवादी पार्टी का बहुजन समाज पार्टी से गठबंधन था, इस बार नहीं है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति जनता का प्रेम और बढ़ा है और जनता मोदी को फिर से पीएम बनाने के लिए वोट कर रही है, ऐसे में मैं नहीं मानता कि अखिलेश के मैदान में उतरने से मेरे लिए कोई चुनौती बढ़ेगी."
हालांकि सुब्रत पाठक ये ज़रूर करते हैं कि अखिलेश यादव के फिर से कन्नौज से उम्मीदवारी करने का एक ही मक़सद है और वो है उनसे राजनीतिक बदला लेना.
सुब्रत कहते हैं, "अखिलेश यादव यहां सिर्फ़ बदला लेने आए हैं, यूपी में बीजेपी की सरकार है, केंद्र में भी बीजेपी की सरकार है, अगर अखिलेश सांसद बन भी जाएंगे तो कन्नौज के लोगों के लिए क्या कर लेंगे. लोग भी ये समझ रहे हैं कि अखिलेश का एजेंडा यहां सिर्फ़ पत्नी की हार का बदला लेना है."
सुब्रत पाठक को भरोसा है कि बीजेपी की डबल इंजन सरकार के दम पर वो अखिलेश यादव को कन्नौज के मैदान में पटखनी दे पाएंगे.
इत्र के उत्पादन के लिए दुनिया भर में मशहूर कन्नौज की गलियों से ख़ुशबू निकलती है. यहां घर-घर में फूलों से ख़ुशबू निकालने का काम किया जाता है.

इत्र उत्पादन के लिए मशहूर

65 साल के राम आसरे पिछले चालीस सालों से ख़ुशबू निकालने का काम कर रहे हैं. एक बड़ी देग में उन्होंने गेंदा डाला है. पूरे दिन तपाने के बाद शाम तक कुछ बूंद ख़ुशबू निकल जाएगी.
राम आसरे के लिए चुनाव में कोई मुद्दा नहीं है. हालांकि, उनके मालिक बिपिन मिश्रा बीजेपी के समर्थक हैं.
बिपिन मिश्रा कहते हैं, "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को आगे बढ़ाया है. राम मंदिर बनाया है और कई ऐसे राष्ट्रीय मुद्दों का समाधान किया है जो दशकों से लटके थे."
कन्नौज की कनेक्टिविटी बढ़ी है और बड़े शहरों तक पहुंच आसान हुई है.
बिपिन मिश्रा कहते हैं, "पान मसाले ने इत्र को लग्ज़री से निकालकर रोज़मर्रा का आइटम बना दिया है, ज़ाहिर है इत्र का कारोबार बढ़ा है. अखिलेश यादव ने इत्र पार्क बनाकर कारोबार को बढ़ावा दिया."
बिपिन मिश्रा नरेंद्र मोदी के समर्थक हैं और राजनीति में इससे आगे नहीं सोचते. हालांकि वो अखिलेश यादव के कार्यकाल के दौरान हुए कामों को भी याद करते हैं.

बीजेपी उम्मीदवार सुब्रत पाठक के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि यहां वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चेहरे को आगे करके चुनाव लड़ रहे हैं जबकि मैदान में उनके सामने एक बड़ा राष्ट्रीय चेहरा है.
स्थानीय पत्रकार पंकज श्रीवास्तव कहते हैं, "अखिलेश की उम्मीदवारी ने सभी समीकरणों को बदल दिया है. यदि अखिलेश यहां मैदान में नहीं होते तो सुब्रत को निश्चित तौर पर पीएम मोदी के नाम का सहारा मिलता."
अखिलेश यादव की उम्मीदवारी ने समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं में भी नया जोश भरा है. सिर्फ़ कन्नौज ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश के लगभग सभी ज़िलों से समाजवादी कार्यकर्ता कन्नौज पहुंचे हैं और घर-घर पहुंच कर जनसंपर्क कर रहे हैं.
अमरोहा से आए सपा कार्यकर्ता तैयब अली तिरवा के कलाम चौक पर लोगों से जनसंपर्क कर रहे थे.
तैयब कहते हैं, "अखिलेश जी ने मैदान में उतरकर पार्टी कार्यकर्ताओं में नई जान डाल दी है. हम ये कोशिश कर रहे हैं कि उनकी जीत के अंतर को इतना बढ़ाया जाए कि सबसे बड़ी जीत दर्ज हो."
अखिलेश यादव की बेटी अदिति यादव भी कन्नौज शहर की गली-गली में जनसभाएं कर रही हैं.
अदिति को देखने ख़ासकर महिलाओं की भीड़ जुट रही है.
अदिति मंच से कन्नौज के लोगों को अखिलेश यादव के कराये काम याद कराती हैं और अपने दादा मुलायम सिंह यादव का नाम लेकर अपने पिता के लिए वोट मांगती हैं.

यहां आई महिलाओं की दिलचस्पी अदिति को सुनने से ज़्यादा उन्हें देखने में नज़र आती है. एक सभा में मिली एक मुस्लिम युवती कहती है, "अखिलेश और राहुल युवाओं की बात कर रहे हैं. हम पहले से ही उनके समर्थक हैं, यहं तो हम अदिति को देखने आए हैं."
समाजवादी पार्टी पूरी ताक़त से कन्नौज में चुनाव लड़ रही है. 10 मई को यहां राहुल गांधी और अखिलेश यादव की संयुक्त रैली हुई, जिसमें भारी भीड़ जुटी.
हालांकि, सुब्रत पाठक ये दावा करते हैं कि उन्होंने समाजवादी पार्टी को कन्नौज में पूरा दम लगाने पर मजबूर कर दिया है.
सुब्रत पाठक कहते हैं, "अखिलेश यादव को बाहर से कार्यकर्ता लाने पड़ रहे हैं, अपनी पूरी पार्टी को मैदान में उतार दिया है. अगर उनके लिए हज़ारों लोग बाहर से आए हैं तो मेरे लिए भी लाखों लोग यहां ज़मीन पर लगे हुए हैं. अखिलेश जी बहुत बड़े आदमी हैं लेकिन मैं जनता के अधिक क़रीब हूं. जनता मेरे पास कभी भी आ सकती है. यही मेरी अखिलेश यादव के ख़िलाफ़ सबसे बड़ी ताक़त है."
कन्नौज लोकसभा सीट अखिलेश यादव के लिए प्रतिष्ठा का भी सवाल बन गई है. पिछली बार डिंपल यादव यहां से हार गई थीं.
सुब्रत पाठक ही नहीं यहां के कई लोग ये मानते हैं कि अखिलेश यादव इस बार उस हार का बदला लेने के लिए भी मैदान में हैं.

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