ओडिशा के सीएम नवीन पटनायक जिस सीट से पांच बार जीते, उस जगह की आंखोंदेखी -ग्राउंड रिपोर्ट

नवीन पटनायक

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    • Author, मानसी दाश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

ओडिशा के मुख्यमंत्री और बीजू जनता दल नेता नवीन पटनायक लगातार पांच बार गंजाम ज़िले की हिंजिली विधानसभा सीट से विधायक रहे हैं. इससे पहले दो बार वो यहीं की आस्का लोकसभा सीट से जीते थे.

नवीन पटनायक के पिता 1996 में आस्का लोकसभा सीट से जीते थे. उनके बाद नवीन ने भी इस सीट से उपचुनाव जीता. साल 2000 से वो हिंजिली विधानसभा सीट से लगातार जीतते रहे हैं.

वो यहां बेहद पॉपुलर हैं और देश में सबसे लंबे अरसे तक मुख्यमंत्री बने रहने वाले नेताओं की सूची में दूसरे नंबर पर हैं. पवन कुमार चामलिंग के बाद लगातार 24 साल से अधिक समय तक राज्य की कमान संभालने वाले नवीन पटनायक महज दूसरे मुख्यमंत्री रहे हैं.

पश्चिम बंगाल में 23 साल से ज़्यादा समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले ज्योति बसु इस सूचि में तीसरे स्थान पर हैं.

पांच बार हिंजिली के विधायक रहने और बीते 25 सालों से प्रदेश का मुख्यमंत्री रहने के बाद भी नवीन पटनायक को लेकर एंटी इनकंबेंसी का बहुत असर नहीं दिखता है. नवीन पटनायक की एक ख़ासियत ये भी है कि वे बिना किसी आक्रामकता के, नरेंद्र मोदी की हिंदुत्व की राजनीति के सामने अपनी राजनीतिक ज़मीन को बचाए रखने में कामयाब रहे हैं.

उनके आलोचक भी स्वीकार करते हैं कि उनके शासन व्यवस्था में कई ऐसे पहलू हैं जिसके चलते लोगों की नाराज़गी उनके प्रति नहीं दिखती है, हालांकि उनके अपने क्षेत्र में दादन खटी यानी रोज़गार के लिए पलायन बड़ा मुद्दा बना हुआ है.

हालांकि सत्ताधारी बीजेडी इसे मुद्दा मानने से इनकार करती है.

बीजेडी प्रदेश सचिव शिवराम गौड़ दावा करते हैं, "नवीन पटनायक और बीजेडी को छोड़ दें तो हिंजिली में और कुछ नहीं है. पिछली बार वो 60 हज़ार से अधिक वोट से जीते थे, इस बार वो 80 हज़ार से अधिक वोटों से जीतेंगे. उन्होंने इस इलाक़े में काफी विकास किया है. लोग यहां पर खुश हैं."

वो पलायन को यहां बड़ा मुद्दा मानने से इनकार करते हैं.

वो कहते हैं, "हिंजिली कृषि प्रधान इलाक़ा है, हम खेती पर निर्भर हैं. रोज़गार के लिए पलायन की जो बात हो रही है, ऐसा कुछ नहीं है. हर राज्य से लोग बाहर जाते हैं. हम खेती पर निर्भर हैं, उन्हें जो कुछ समय मिलता है उसमें वो अतिरिक्त रोज़गार के लिए बाहर जाते हैं लेकिन हमारे इलाक़े में रोज़गार के लिए पलायन नहीं है."

कैसा है हिंजिली चुनाव क्षेत्र?

हिंजिली चुनाव क्षेत्र
इमेज कैप्शन, भुवनेश्वर से हिंजिली की तरफ जाते हुए इस इलाक़े में एक पार्क में बिजू पटनायक की मूर्ति लगी दिखती है. शहर के मुख्य चौराहे पर भी उनक मूर्ति लगाई गई है.
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ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर से क़रीब 170 किलोमीटर दूर हिंजिली के एक तरफ़ ऋषिकुल्या नदी और दूसरी तरफ़ घोड़ाहाड़ नदी बहती है. ये विधानसभा क्षेत्र गंजाम ज़िले और आस्का लोकसभा क्षेत्र में पड़ता है.

साल 2019 के आंकड़ों के अनुसार, यहां वोटरों की संख्या क़रीब 22 लाख है और जानकारों की माने तो यहां की लगभग आधी आबादी पलायन कर या तो महाराष्ट्र या फिर सूरत में बसी हुई है.

साल 1997 में पिता बिजयानंद पटनायक, जिन्हें लोग बिजू पटनायक के नाम से जानते हैं, के निधन के बाद ओडिशा से दूर रहकर पढ़ाई पूरी करने वाले नवीन पटनायक ने राजनीति में कदम रखा था.

राज्य की भाषा न बोल पाने वाले नवीन ने आस्का से उपचुनाव जीता और फिर लोकसभा चुनाव जीतकर सांसद बने. साल 2000 में पद से इस्तीफ़ा देकर हिंजिली से विधानसभा चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया.

शिवराम गौड़ कहते हैं, "साल 2000 में बाढ़, साइक्लोन, सूखा, ग़रीबी और बच्चा बिक्री करने जैसी समस्याएं थी. इसके अलावा सरकार के सामने ओवरड्राफ्ट की भी मुश्किल थी. ऐसे में उन्हें लोगों का समर्थन मिला."

54 साल की उम्र में इस सीट से जीतकर पहली बार मुख्यमंत्री बने नवीन पटनायक अब 78 साल के हो चुके हैं. लेकिन इतने लंबे वक्त में यहां पलायन की समस्या हल नहीं हो सकी, बल्कि उसने और गंभीर रूप लिया है.

हिंजिली के मुख्य शहर हिंजिलीकट से क़रीब छह किलोमीटर दूर सारू गांव है. 4500 लोगों के इस गांव में तकरीबन आधे घरों पर ताले लटके हैं. गांव में जिन लोगों से हमारी मुलाक़ात हुई उन्होंने बताया कि पलायन के कारण इस गांव और आसपास के कई और गांवों में वोटिंग बेहद कम होती है.

गांवों में पलायन का हाल

सारू गांव में दो घर
इमेज कैप्शन, सारू गांव में दो घर

गांव में युवा नहीं दिखते. अगर कोई दिखे और आप उनसे सवाल करें- "कब आए" तो जवाब मिलेगा- "15-20 दिनों के लिए छुट्टी लेकर आया हूं." यहां का लगभग हर युवा राज्य से बाहर काम करता है.

यहां हमारी मुलाकात शंभू दास और ददा साहू से हुई. 18 साल के शंभू दास आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा में काम करते हैं. वो कॉलेज में पढ़ते हैं और केवल परीक्षा देने के लिए सारू आते हैं. 12वीं का परीक्षा दी है.

वो कहते हैं, "गांव में कोई अच्छा रोज़गार या नौकरी तो है नहीं, इसलिए हम बाहर जाकर काम करते हैं. मेरे लिए आगे का कोई प्लान नहीं है, आगे जो होगा देखा जाएगा."

वहीं 25 साल के ददा साहू भी कई सालों से विजयवाड़ा में होटल में शेफ़ हैं.

वो कहते हैं, "घर की परिस्थिति के कारण पढ़ाई छोड़कर मैं काम करने चला गया. यहां अच्छा काम नहीं मिला. कुछ और साल और बाहर रहूंगा और फिर लौटकर यहां होटल खोलूंगा."

शंभू दास और ददा साहू
इमेज कैप्शन, शंभू दास और ददा साहू दोनों आंध्र प्रदेश में काम करते हैं और कुछ दिनों के लिए गांव लौटे हैं. दोनों गांव लौटना तो चाहते हैं लेकिन रोज़गार की कमी के कारण ऐसा करने से डरते हैं.

इस गांव के शिवशंकर साहू भी मुंबई में काम करते हैं और अपनी शादी के लिए छुट्टी लेकर गांव आए हैं.

वो अपने माता-पिता की एकमात्र संतान हैं और उन्हें चिंता है कि उनके माता-पिता को यहां देखने वाला कोई नहीं.

वो कहते हैं, "यहां कोई इंडस्ट्री नहीं, ऐसे में परिवार चलाने के लिए हम बाहर जाते हैं. 25 सालों के लंबे शासन के बाद भी नवीन पटनायक मे अगर यहां कोई इंडस्ट्री बनाई होती तो हमें बाहर नहीं जाना पड़ता."

हमने ये भी पाया कि बीते 70 दशक से यहां से काम की तलाश में पलायन होता रहा है.

लेकिन जहां पहले ये कुछ गांवों और सरकारी नौकरियों के लिए हुआ करता था अब ये समस्या पूरे इलाक़े में महामारी का रूप ले चुकी है.

'यहीं काम मिल जाता तो बाहर क्यों जाते'

घरों पर ताले

हिंजिली के निवासी बताते हैं कि यहां के अधिकतर गांव इस मुश्किल से जूझ रहे हैं.

स्किल्ड और अन-स्किल्ड हर तरह के लोग रोज़गार की तलाश में बाहर जाते हैं और फिर वहीं बस जाते हैं. जो लोग पीछे गांव में रह जाते हैं उनमें अक्सर बुज़ुर्ग होते हैं.

जाम्बूवति साहू और उनके पति सारू गांव में रहते हैं. उनके चार बेटे हैं और चारों राज्य से बाहर रहते हैं.

वो कहती हैं, "सभी मुंबई में हैं. यहां करने को कोई काम तो नहीं है. भीख मांगने की तरह, रोज़ काम करो नहीं तो भूखे रहो. बेटे कई सालों से बाहर हैं. नाती ख़्याल रखता है. भगवान को पता है वो कहां क्या नौकरी करेगा? नौकरी मिलेगी तो वो भी जाएगा."

हिंजिली चुनाव क्षेत्र
इमेज कैप्शन, सारू गांव की जाम्बूवति साहू और पी रामचंद्रपुर की एक स्थानीय महिला

हम सारू गांव से कुछ किलोमीटर दूर पी रामचंद्रपुर गांव (पहले नुआपली) पहुंचे. यहां की भी यही कहानी है. यहां की एक स्थानीय महिला ने हमें बताया कि उनका परिवार 70 सालों से मुंबई में हैं.

वो कहती हैं, "यहां कोई कंपनी है क्या? पहले सरकारी नौकरी मिलती थी अब नहीं मिलती. अब तो सब प्राइवेट है. यहां का पूरा गांव बाहर है, केवल सात-आठ परिवार यहां हैं."

वो ओडिया में कहती हैं, "बारह आना बाहर हैं, चार आना गांव में हैं. (यानी 75 फ़ीसदी लोग गांव से बाहर हैं, बस 25 फ़ीसदी लोग गांव में हैं)."

वो गिनवाती हैं, "पहले नुआपली, सारू, पंद्रहखंडी, चांदुली, पोचलि (पोचलिमा). मकुरझोल, खंड्रा गांव से लोग बाहर जाते थे, अब तो हर गांव से जाते हैं. सूरत जाते हैं वहां कंपनी है. चेन्नै, बेंगलुरु में सरकार ने कंपनी खोल कर दी. ओडिशा सरकार ने क्या दिया? क्या हर कोई खेती करने जाएगा? यहां 10-15 हज़ार मिल जाते तो क्या बाहर जाते, 8 हज़ार मिलता तो भी यहां काम करते."

वैसे तो गंजाम ज़िले को बड़े पैमाने पर पलायन के लिए जाना जाता है. यहां के लोग काम की तलाश में यहां से लोग महाराष्ट्र के मुंबई, गुजरात के सूरत और देश के दूसरे हिस्सों की तरफ जाते है.

लेकिन यहां केवल पलायन ही एक मुद्दा नहीं है. यहां तक पहुंचने के लिए अच्छी सड़कें हैं. यहां स्कूल, कॉलेज और स्वास्थ्य केंद्र हैं और साफ सफाई भी दिखती है. यहां आंखों का एक बड़ा अस्पताल भी है.

यहां सब्ज़ियों की अच्छी खेती होती है और यहां की सब्ज़ियों की सप्लाई पूरे राज्य में होती है.

लेकिन कोल्ड स्टोरेज की व्यवस्था नहीं है. इसका खामियाज़ा भी किसानों को भुगतना पड़ता है. वहीं खेती के अन्य विकल्पों की व्यवस्था न होना भी यहां बड़ा मुद्दा है.

बात करने से घबरा रहे लोग

चांप बेहेरा
इमेज कैप्शन, चांप बेहेरा

हिंजिली में हमने कई और लोगों और ख़ासकर महिलाओं से बात करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने कैमरे पर आने से या उनका नाम लेने से मना कर दिया. कई लोगों ने ये डर भी जताया कि कहीं मीडिया में आने से उन्हें टार्गेट किया जा सकता है.

हिंजिली के बाज़ार में हमारी मुलाक़ात चांप बेहेरा से हुई जो नज़दीक के आनंदी गांव से हैं.

उन्होंने बताया कि सरकारी योजना होने के कारण लोग बच्चों को दसवीं कक्षा तक तो पढ़ा देते हैं लेकिन उसके बाद उन्हें पढ़ाई छोड़ कर रोज़गार की तलाश में जुटना होता है.

वो कहते हैं, "हम खुद काम करते हैं, हमारे बच्चे भी काम करते हैं. घर में अभाव है. सरकार की योजना है तो 10वीं कक्षा तक बच्चों को पढ़ाते हैं लेकिन उसके बाद उन्हें पढ़ाने की आर्थिक स्थिति नहीं है. इसलिए बच्चे भी काम की तलाश में निकलते हैं."

वो कहते हैं, "यहां स्कूल है ये सच है लेकिन पेट की भूख पहले है. सरकार सभी खर्च देती है लेकिन फिर पढ़ाई के और खर्च भी हैं. गंजाम में जितने लोग हैं उनते ही सूरत में है. सरकार से पूछने पर बताएगी, हम क्यों गए. यहां कोई सुविधा नहीं थी."

बासुदेव बल
इमेज कैप्शन, बासुदेव बल

इस बात से आसपास खड़े और लोग भी सहमति जताते हैं.

लोगों का कहना है कि स्कूल होने से एक स्तर तक पढ़ाई की मुश्किल तो हर हो जाती है लेकिन पलायन की समस्या इससे हल नहीं हुई है.

वहीं हिंजिली सान साई के बासुदेव बल कहते हैं, "सरकार भत्ता देती है, हमें साइकिल दिया है. खेती अच्छा होने से क्या होता है, यहां कोल्ड स्टोरेज कहां है? किसानों के लिए क्या सुविधा है? हमें लोन चाहिए, मोटर वाली साइकिल चाहिए. अभी चुनाव है, चार दिन के लिए सरकार पूछ रही है."

प्रदेश की राजनीति

वीडियो कैप्शन, ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के चुनाव क्षेत्र से पलायन क्यों कर रहे है लोग?

केंद्र की बीजेपी सरकार को बीजेडी का समर्थन हासिल है. वहीं राज्य की सत्ताधारी बीजेडी को अब तक बीजेपी का समर्थन हासिल था. लेकिन फिलहाल यहां दोनों प्रतिद्वंद्वी बने हुए हैं.

बीजेडी प्रदेश सचिव शिवराम गौड़ दावा करते हैं कि एक बार फिर यहं से जीत नवीन पटनायक की होगी.

वहीं, यहां से बीजेपी प्रत्याशी शिशिर मिश्रा को भी अपनी जीत का भरोसा है.

वो कहते हैं, "वोटर की मानसिकता अब बदल गई है. यहां रोज़गार की तलाश में लोगों का बाहर जाना बड़ा मुद्दा है. सारू, अन्ड्रा, गन्ड्रा, सिकरी में 45 फीसदी घरों पर ताले मिलेंगे. यहां के विधायक 25 साल मुख्यमंत्री रहने के बाद भी यहां एक सेफ्टी पिन का भी कारखाना नहीं लगा है."

वो कहते हैं, "अविभाजित गंजाम से 6 से 7 लाख लोग बाहर रह रहे हैं. अब ये संख्या बढ़ कर 10 लाख हो गई है. हिंजिली पूरे ओडिशा को सब्ज़ी सप्लाई कर रहा है. हम कोल्ड स्टोरेज की मांग कर रहे हैं लेकिन वो अब तक नहीं बना है. यहां किसानों के लिए इरिगेशन प्वाइंट तक नहीं है."

यहां पर मुख्य टक्कर बीजेडी और बीजेपी के बीच है लेकिन एक तरफ कांग्रस भी है.

कांग्रेस प्रत्याशी रजनीकांत पाढ़ी कहते हैं, "गंजाम ज़िले में दादन खटी बड़ी समस्या है और यहां से 60 फीसदी युवा बाहर जाते हैं. गुजरात के सूरत में बड़ी संख्या में ओडिया लोग हैं. वहां एक ओडिया मीडियम स्कूल है जिसमें ओडिशा के बच्चों को शिक्षा दी जाती है."

नवीन पटनायक, शिशिर मिश्रा, रजनीकांत पाढ़ी
इमेज कैप्शन, बीजेडी उम्मीदवार नवीन पटनायक, बीजेपी उम्मीदवार शिशिर मिश्रा और कांग्रेस उम्मीदवार रजनीकांत पाढ़ी

महाराष्ट्र में प्रवासी ओडिया संगठन के सदस्य वसंत मोहन्ती बताते हैं कि अकेले मुलुंड में तीन हज़ार और पूरी मुंबई में क़रीब 6 लाख से अधिक ओडिया हैं जो अपने गांव छोड़कर यहां नौकरी करने आए हैं, इनमें से अधिकांश युवा हैं.

वो बताते हैं कि प्रवासियों से बच्चों को पढ़ाने के लिए यहां कुर्ला के पास एक अंग्रेज़ी मीडियम स्कूल भी है जहां पाठ्यक्रम में ओडिया भाषा भी पढ़ाई जाती है.

गंजाम ज़िला कभी कांग्रेस का गढ़ हुआ करती थी. 1996 में पीवी नरसिम्हा राव ने बरहमपुर से लोकसभा चुनाव भी जीता था लेकिन बीते सालों उसका मत प्रतिशत यहां लगातार कम होता रहा है.

साल 2000 में 36.65 फीसदी से ये बीते विधानसभा चुनावों में 5 फीसदी तक पहुंच गया है.

इसकी क्या वजह रही, इस बारे में रजनीकांत पाढ़ी कहते हैं, "इससे पहले यहां के कांग्रेस के जो उम्मीदवार थे जो बाहर के थे, इसलिए लोगों ने कांग्रेस पर यकीन नहीं किया. लेकिन मुझे यकीन है कि हम दूसरे नंबर पर रहेंगे. ये चुनाव मुश्किल है, लेकिन अगला चुनाव तक जीत जाएंगे."

वो कहते हैं, "बीजेडी के भीतर अभी अतर्द्वंद्व अधिक है और लोग भी पार्टी से नाराज़ हैं. हो सकता है इसका फायदा हमें मिल जाए."

नवीन पटनायक की लगातार जीत का क्या है राज़?

नवीन पटनायक

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वरिष्ठ पत्रकार रवि दास कहते हैं कि ओडिशा के लोग नेशनल पार्टी की बजाय प्रदेश की पार्टी को अधिक पसंद करते हैं इसी कारण यहां के लोग 24 सालों से उन्हें चुनते रहे हैं.

वो कहते हैं, “लोगों का मानना है कि नवीन पटनायक की छवि साफ-सुथरी है और अपना खुद का परिवार न होने से उनका कोई निहित स्वार्थ नहीं है. ऐसे में वो बेहतर नेता है. ऐसा नहीं है कि उनकी पार्टी राजनीतिक फंडिंग नहीं लेती. इलेक्टोरल बॉन्ड का फायदा पार्टी ने लिया है लेकिन लोगों का मानना है कि नवीन पटनायक की छवि साफ है.”

एक और बड़ा फैक्टर महिला वोटरों का है. वो कहते हैं “ओडिशा में महिलाओं के लिए ख़ास मिशन शक्ति योजना लॉन्च की गई है जिसके तहत महिलाओं को एसएचजी के तहत काम करने के लिए इंटरेस्ट फ्री लोन दिया जाता है. उन्हें गांव में होने वाले काम का ठेका भी दिया जाता है. इसका फायदा भी पार्टी को होता है.”

वहीं राजनीतिक विश्लेषक केदार मिश्रा कहते हैं, “ये अपने आप में पहेली है कि नवीन पटनायक 24 सालों से यहां से लगातार जीतते रहे हैं और कोई एंटी इनकम्बेंसी नहीं दिखती.”

“न तो वो लोगों से अधिक मिलते हैं, न ही उनसे अधिक बातें करते हैं, लेकिन फिर भी वो बेहद पॉपुलर हैं.”

वो कहते हैं, “हिंजिली का इतिहास भी अजीब है. 1952 से लेकर 1980 तक यहां से बृन्दाबन नायक जीतते आए थे. उसके बाद से जो भी जीता है 50 फीसदी से अधिक वोटों से जीता है. यहां चुनाव हमेशा एकतरफा ही रहता आया है.”

नवीन पटनायक के सामने चुनौतियां

नवीन पटनायक की उम्र उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती है. लोगों का ये मानना है कि स्वाथ्यगत समस्या के कारण वो लोगों से अब पहले की तरह मुलाक़ात नहीं कर पा रहे हैं.

रवि दास कहते हैं, “लोग उन्हें प्यार तो करते हैं लेकिन वो पहले की तरह चुनाव अभियान नहीं कर पा रहे हैं. अगर वो आज भी 147 विधानसभाओं में खुद जाने का फ़ैसला लें तो उन्हें कोई रोक नहीं पाएगा. लेकिन अब तक जो पता है उसके अनुसार वो केवल 40-45 चुनाव क्षेत्रों का दौरा कर पाएंगे.”

उनके सामने दूसरी चुनौती पार्टी की दूसरी पंक्ति का नेतृत्व तैयार न कर पाना है.

वरिष्ठ पत्रकार संदीप साहू कहते हैं “अपने उत्तराधिकारी के सवाल पर नवीन पटनायक कहते हैं कि जनता अपना नेता खुद चुनेगी लेकिन लोग फ़ाइवटी अध्यक्ष वीके पांडियान को रैलियां करते देखते हैं. लोग ये संकेत पढ़ लेते हैं और लोग देख रहे हैं कि पांडियान उनके बाद पार्टी के सबसे ताक़तवर नेता हैं.”

लेकिन अहम सवाल यही है कि क्या लोग नवीन पटनायक की जगह पांडियान या फिर किसी और को देखना चाहेंगे, इसी सवाल पर बीजू जनता दल के भविष्य की राजनीति टिकी है.

स्थिति का विश्लेषण

हिंजिलीकट बाज़ार

राजनीतिक विश्लेषक संदीप साहू बताते हैं, "बीजेपी वहां कभी थी ही नहीं, 2009 तक बीजेडी-बीजेपी वहां गठबंधन में लड़ रहे थे. 2009 में जब उन्होंने बीजेपी का हाथ छोड़ा तभी वहां बीजेपी प्रत्याशी के तौर पर खड़ी हुई. यही वजह है कि बीजेडी का वोट शेयर कम होने लगा."

वो समझाते हैं, "रही कांग्रेस की बात तो पूरा गंज़ाम ज़िला कभी उसका गढ़ हुआ करता था. लेकिन कांग्रेस यहां लगातार कम होती गई. जैसे कहते हैं 'अगर आप उन्हें हरा नहीं सकते तो उनके साथ हो लीजिए,' पार्टी के ज़मीनी कार्यकर्ता ताकत की तरफ रुख़ करने लगे और वो धीर-धीरे बीजेपी और बीजेडी की तरफ जाने लगे. इस कारण पार्टी यहां ख़त्म होती गई."

इस बार नवीन पटनायक हिंजिली के अलावा एक और विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे हैं - कंटाबांजी और इन दोनों ही इलाक़ों में रोज़गार के लिए पलायन बड़ा मुद्दा है.

राजनीतिक विश्लेषक केदार मिश्रा कहते हैं, "रोज़गार के लिए पलायन की समस्या यहां बीते कई सालों से है लेकिन इसका कोई हल सरकार के पास नहीं है. इसका हल 24 सालों में नहीं हुआ फिर भी ये कभी चुनावी मुद्दा नहीं बना."

"इसे चुनावी मुद्दा बनाने में न तो बीजेडी की दिलचस्पी है और न ही विपक्ष की. यहां विपक्ष ज़मीनी मुद्दों पर बात नहीं करता और इसका फायदा नवीन पटनायक को मिलता है. ऐसा लगता है कि नवीन पटनायक की सफलता विपक्ष की नाकामी पर निर्भर करती है. ऐसा लगता है कि विपक्ष चाहता है कि नवीन पटनायक सत्ता में बने रहें."

हिंजिली में बीते म्युनिसिपल चुनावों में बीजेपी का प्रदर्शन अच्छा था और इससे उसकी आस बंधी है. वो मोदी की गारंटी की बात कर रही है. वहीं बीजेडी 5टी की गारंटी का वादा कर रही है.

लेकिन यहां का युवा चुनावी वादों पर यकीन करने की बजाय ज़मीनी बदलाव की आस लगाए बैठा है. राजनीतिक पार्टियां इस बार यहां पलायन को मुद्दा बना रही हैं. हालांकि इसका असर नतीजों पर पड़ेगा या नहीं ये कहना मुश्किल है.

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