ओडिशा ट्रेन हादसे की जाँच सीबीआई को क्यों दी गई?

ओडिशा रेल हादसा

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    • Author, चंदन कुमार जजवाड़े
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना

ओडिशा के बालासोर में हुए ट्रेन हादसे की जांच सीबीआई को सौंप दी गई है.

वही सीबीआई, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने ‘पिंजरे में बंद तोता’ कहा था.

सीबीआई पर पहले भी राजनीतिक मशीनरी बनने के आरोप लगते रहे हैं.

आज भी विपक्षी दल सीबीआई के दुरुपयोग का आरोप लगाते हैं.

दूसरी तरफ़ रेलवे में होने वाले हादसों की जांच आमतौर पर कमिश्नर ऑफ़ रेलवे सेफ़्टी करते हैं.

कई बार सीआरएस के अलावा हादसों की जांच रेलवे की अपनी टीम भी करती है.

दरअसल, रेलवे की तकनीकी और विस्तृत जानकारी रेल विभाग के लोगों को ही होती है, इसलिए इस तरह की जांच को ज़रूरी माना जाता है.

सीआरएस मूल रूप से रेलवे के ही अधिकारी होते हैं और उन्हें डेप्युटेशन पर नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अधीन रखा जाता है.

बताया जाता है कि हादसे की निष्पक्ष जांच के लिए मामला सीआएस को सौंपा जाता है.

रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने रविवार को कहा था कि ओडिशा हादसे की जड़ में इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग में समस्या और ट्रैक के एक हिस्से में ऑपरेशनल सिग्नल सिस्टम में समस्या सामने आई है.

इसके साथ ही यह मामला सीबीआई को सौंप दिया गया.

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सबसे पहले जानते हैं कि भारतीय रेल में सिग्नलिंग और इंटरलॉकिंग सिस्टम क्या होता है और यह कैसे काम करता है?

क्या इसे कोई बाहरी आदमी छेड़ सकता है?

सिग्नल

ट्रेन ऑपरेशन में ग्रीन सिग्नल का मतलब है कि ड्राइवर उस रूट पर अपनी अधिकतम निर्धारित गति से ट्रेन चला सकता है.

सिग्नल अगर पीला हो तो ट्रेन की गति कम करनी होती है. हो सकता है कि थोड़ी दूरी पर ट्रेन को रोकना या लूप लाइन पर भेजना हो. रेड सिग्नल मतलब ट्रेन को रूकना है.

पॉइंट

यह पटरी पर वो जगह होती है, जहाँ से ट्रेन मेन लाइन या लूप लाइन पर जाती है.

लूप लाइन साइड ट्रैक होता है, जहाँ एक ट्रेन को रोककर दूसरी ट्रेन को पास दिया जाता यानी आगे भेजा जाता है.

जब ग्रीन सिग्नल ऑन हो तो इंटरलॉकिंग सिस्टम तय करता है कि जिस दिशा में ट्रेन जा रही है, सारे पाइंट्स उसी दिशा में सेट हैं. उसके आगे कोई गाड़ी न खड़ी हो और ट्रेन बिना किसी अवरोध के आगे जा सकती है.

इसके अलावा उस ट्रैक पर दूसरी दिशा से कोई ट्रेन न आ रही हो.

ट्रेन को आगे बढ़ाने या रोकने का कमांड स्टेशन मास्टर देता है. स्टेशन पर ट्रेनों के संचालन का ज़िम्मा उसी के पास होता है.

स्टेशन मास्टर के कंट्रोल में इसके लिए पैनल के साथ दो स्वीच होते हैं. एक सिग्लन के लिए और दूसरा ट्रैक या पाइंट्स के लिए.

सिग्नल और पाइंट्स दोनों इंटरलॉकिंग सिस्टम से जुड़े होते हैं. ट्रेन ऑपरेशन के लिए सारी शर्तें पूरी होने के बाद ही ये एक-दूसरे को सपोर्ट करते हैं और तभी ट्रेन चलती या रूकती है.

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रेल मंत्रालय में सिग्नलिंग एंड टेलीकॉम के पूर्व निदेशक अखिल अग्रवाल के मुताबिक़, “अगर किसी ट्रैक पर ट्रेन खड़ी हो और स्टेशन मास्टर उसी ट्रैक पर दूसरी ट्रेन के लिए ग्रीन सिग्नल का कमांड दे, तो इंटरलॉकिंग सिस्टम ऐसा नहीं होने देगा.”

“इसलिए इंटरलॉकिंग सिस्टम को काफ़ी सुरक्षित माना जाता है. अगर यह फ़ेल भी हो जाए तो यह सुरक्षित दिशा में फ़ेल होता है. यानी अगर ट्रेन के लिए ग्रीन सिग्नल देना हो तो यह रेड दे सकता है. लेकिन ट्रेन को रोकना हो तो इंटरलॉकिंग सिस्टम कभी ग्रीन सिग्नल ऑन नहीं होने देगा.”

इंटरलॉकिंग सिस्टम कंप्यूटर में मौजूद प्रोग्राम के ज़रिए चलता है. अखिल अग्रवाल के मुताबिक़ यह सिस्टम दुनिया में सबसे बेहतर है और इसे ही भारत में अपनाया गया है.

स्टेशन मास्टर के पास मौजूद स्वीच के अलावा इंटरलॉकिंग का पूरा सिस्टम एक बंद रिले रूम में होता है और इसका हर रिकॉर्ड कम्पूटर में दर्ज़ होता है.

इस रिले रूम की एक चाबी मेंटेनेंस स्टाफ़ के पास होती है जबकि दूसरी स्टेशन मास्टर के पास होती है.

यानी ट्रेन कब आई, कब गई, किस ट्रैक से गुज़री या रूकी सब कुछ कम्प्यूटर में दर्ज़ होता है.

इस रिले रूम के अंदर कोई काम करना हो तो इसके लिए भी समय के साथ सारी जानकारी लिखित रूप में रजिस्टर में दर्ज करनी होती है.

इसके अलावा रेलवे स्टेशनों पर ट्रैक पर मौजूद व्हाइट बॉक्स में पॉइंट मोटर रखा होता है.

यह बॉक्स भी बंद होता है. स्टेशन मास्टर के कमांड के मुताबिक़ यह मोटर काम करता है और यह वापस रिले रूम से भी जुड़ा होता है.

अखिल अग्रवाल कहते हैं, “रिले रूम जाकर कोई छेड़खानी कर दे इसकी संभावना नहीं के बराबर है. लेकिन पॉइंट मोटर खुले में होता है, यहां कोई भी छेड़छाड़ कर सकता है, यह ग़लती से भी हो सकता है या जानबूझकर भी.”

ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि जब मामला तकनीकी गड़बड़ी से जुड़ा हुआ है तो इसकी जांच सीबीआई से क्यों कराई जा रही है और क्या ऐसे तकनीकी मामलो का जांच के लिए सीबीआई के पास विशेषज्ञता है?

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सीबीआई क्यों

भारत में हर रोज क़रीब सवा दो करोड़ लोग ट्रेनों पर सफ़र करते हैं.

कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने कहा है कि ऑस्ट्रेलिया की आबादी के बराबर लोग हर रोज़ ट्रेन पर होते हैं, ट्रेन हादसे में क़रीब 300 लोग मारे गए हैं लेकिन सरकार साज़िश रचने की थ्योरी बता रही है.

इस हादसे को लेकर कई विरोधी दलों ने रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव का इस्तीफ़ा तक मांगा है.

लेकिन हादसे की जांच सीबीआई को देने के बाद इस पर विवाद और बढ़ गया है.

दअलसल सीबीआई अपराध की जांच करने वाली संस्था है जबकि इस रेल हादसे को एक तकनीकी मामला बताया जा रहा है.

सीबीआई के पूर्व निदेशक एपी सिंह कहते हैं, “सीबीआई ने पहले भी ज्ञानेश्वरी ट्रेन हादसे की जांच की थी, उसमें माओवादियों ने स्लीपर्स हटा दिए थे. वह एक आपराधिक मामला था. उस वक़्त एनआईए शुरू ही हुई थी. अब हर संदिग्ध आतंकवादी हमले की जांच एनआईए को दी जाती है, जैसा कि साल 2016 के एक मामले में हुआ था.”

20 नवंबर 2016 को कानपुर के पास पटना-इंदौर एक्सप्रेस ट्रेन हादसे में 150 से ज़्यादा लोग मारे गए थे. इसकी जांच उस वक़्त एनआईए को दी गई थी. इस मामले में अब तक एनआईए नहीं बल्कि रेलवे की जांच के बाद 5 रेल कर्मचारियों को नौकरी से निकाला गया था.

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने आरोप लगाया है कि सरकार केवल हेडलाइन मैनेजमैंट कर रही है, जबकि एनआईए को भी कानपुर हादसे की जांच में अब तक कुछ हासिल नहीं हुआ है.

एपी सिंह के मुताबिक़ रेलवे ने ओडिशा मामले में जो एफ़आईआर कराई है, उसमें लापरवाही की धारा लगाई गई है. इसमें आतंक का कोई एंगल नहीं है, इसलिए यह मामला एनआईए को न देकर सीबीआई को दिया गया है. सीबीआई अपनी जांच के बाद और भी धाराएं लगा जा सकती है.

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इमेज कैप्शन, बालासोर में दुर्घटना स्थल पर अधिकारियों से जानकारी लेते हुए पीएम मोदी.

एपी सिंह कहते हैं, “यह जांच सीबीआई को इसलिए दी गई है कि सीबीआई एक स्वतंत्र एजेंसी है. यह एक बड़ा हादसा है और इसमें बड़ी संख्या में लोग मरे हैं. मुझे लगता है कि सीबीआई छह महीने के अंदर जांच पूरी कर लेगी. ”

वहीं सीबीआई के पूर्व स्पेशल डायरेक्टर और ज्ञानेश्वरी ट्रेन हादसे की जांच करने वाले एमएल शर्मा के मुताबिक़, “हादसे की तकनीकी जानकारी रेलवे के एक्सपर्ट के पास होती है, अगर यह केवल एक एक्सीडेंट है और इसमें कोई साज़िश नहीं है तो सीबीआई की कोई ज़रूरत नहीं है.”

एमएल शर्मा कहते हैं, “लेकिन रेलवे अगर किसी को चार्ज़शीट करना चाहे तो उसे न तो आईपीसी और न ही रेलवे क़ानून के अंदर इसका अधिकार है. उसके लिए किसी जांच एजेंसी की ज़रूरत है. उससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण है यह है कि रेलवे के कर्मचारियों के अलावा बाहरी लोगों से पूछताछ का अधिकार रेलवे के पास नहीं है.”

एमएल शर्मा कहते हैं कि ऐसी जांच राज्य पुलिस से भी कराई जा सकती थी, लेकिन सीबीआई की विश्वसनीयता किसी भी राज्य की पुलिस से ज़्यादा है. यह बहुत बड़ा मामला है. कई लोगों की जान गई है इसलिए इसमें कोई दख़ल नहीं दे सकता है.

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कैसे होगी जांच

ओडिशा वाले मामले में सीबीआई जो भी करेगी, उसके लिए रेलवे एक्सपर्ट से भी जानकारी ली जाएगी. ज़रूरत पड़ने पर सीबीआई बाहरी एक्सपर्ट से भी सलाह ले सकती है. इसके अलावा सीबीआई के पास फ़ोरेंसिक एक्सपर्ट होते हैं.

एपी सिंह के मुताबिक़ अभी तक तो यह रेलवे के अंदर का मामला लग रहा है कि स्वीच को किसी ने ऑन किया या जो भी हुआ, यानी इसमें किसी बाहरी व्यक्ति की भूमिका नहीं दिख रही है.

भारतीय रेल के एक पूर्व अधिकारी के मुताबिक़ कई साल पहले अलगाववादी आंदोलन के दौर में कई बार साज़िश या ट्रेनों पर हमले की घटना होती थी तो रेलवे की अपनी जांच में ट्रेन के ड्राइवर, गार्ड, टीटीई, कुछ यात्रियों और आगे-पीछे के सिग्नलिंग स्टाफ़ से पूछताछ की जाती थी.

इस जांच के आधार पर ही ज़रूरत के मुताबिक़ स्थानीय पुलिस में किसी मामले में एफ़आईआर दर्ज़ कराई जाती थी. सीबीआई जैसी एजेंसी को रेल हादसों के मामले आमतौर पर नहीं सौंपे जाते हैं.

अगर किसी हादसे वाली जगह पर पटरी टूटी हो तो यह किसी साज़िश के तहत तोड़ी गई थी या पहले से टूटी जिस पर ट्रेन आ गई और हादसा हुआ, तो रेलवे की जांच में इसके लिए एक्सपर्ट की मदद ली जाती है. सीबीआई भी अपनी जांच में ऐसे तमाम तरीक़ों को शामिल कर सकती है.

एमएल शर्मा के मुताबिक़ रेल मंत्री ने इस मामले को सीबीआई को सौंपकर अच्छा किया है. सीबीआई रेलवे के एक्सपर्ट से तकनीकी जानकारी ले लेगी और बाक़ी जांच ख़ुद करेगी. रेलवे की अपनी जांच चलती रहेगी और सीबीआई भी अपनी जांच करेगी.

यानी हर हाल में सीबीआई को भी अपनी जांच के लिए रेलवे के स्टाफ़ पर ही निर्भर करना होगा.

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