लोकसभा चुनावः क्या बीजेपी के साथ बीजेडी का 'अनौपचारिक गठबंधन' जारी रहेगा?

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- Author, संदीप साहू
- पदनाम, भुवनेश्वर से, बीबीसी हिंदी के लिए
बुधवार को बीजू जनता दल (बीजेडी) ने ओडिशा की 21 लोकसभा सीटों में से 15 और 147 विधानसभा सीटों में से 72 सीटों के लिए अपने प्रत्याशियों की सूची जारी कर दी.
लोकसभा चुनाव के लिए बीजेडी के उम्मीदवारों की सूची में कई नाम चौंकाने वाले हैं.
लेकिन जिस नाम को लेकर सबसे अधिक चर्चा हो रही है, वो है भुवनेश्वर लोकसभा क्षेत्र के लिए चुने गए बीजेडी के प्रत्याशी मन्मथ राउतराय. मन्मथ वरिष्ठ कांग्रेस नेता और जटनी के विधायक सुरेश चंद्र राउतराय के बेटे हैं और उन्होंने हाल ही में एयर इंडिया के पायलट की अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा देकर राजनीति में कदम रखा है.
मन्मथ की मुख्य लड़ाई भाजपा की अपराजिता षडंगी के साथ है, जो मौजूदा वक्त में भुवनेश्वर से सांसद हैं. मन्मथ को इस महत्वपूर्ण सीट से बीजेडी प्रत्याशी बनाए जाने को लेकर आश्चर्य जताने के पीछे दो मुख्य कारण हैं.
पहला ये कि वे बुधवार को ही बीजेडी में शामिल हुए और इसके दो घंटे के अंदर बीजेडी सुप्रीमो नवीन पटनायक ने उन्हें भुवनेश्वर लोकसभा क्षेत्र से पार्टी का प्रत्याशी घोषित कर दिया. दूसरा कारण यह कि इस सीट से लड़ने के लिए श्रीमयी मिश्र पिछले छह महीने से चुनाव क्षेत्र का दौरा कर रही थीं.
गठबंधन न होने से समीकरण बदला

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पिछले दिसंबर में ऐसे ही एक पदयात्रा के दौरान राज्य सरकार के मंत्री और एकाम्र विधानसभा क्षेत्र के विधायक अशोक पंडा ने तो उन्हें पार्टी की लोकसभा प्रत्याशी बताते हुए लोगों से उन्हें समर्थन देने की अपील भी की थी.
लेकिन ऐन वक्त पर श्रीमयी के बदले नए-नए आए मन्मथ राउतराय को टिकट दिए से सभी भौंचक्के रह गए .
जानकारों का मानना है कि पार्टी जिस समय श्रीमयी को सांसद प्रत्याशी के रूप में आगे लाई थी, उस समय पार्टी को पूरी उम्मीद थी कि बीजेडी और भाजपा के बीच चुनावी गठबंधन होगा और सीटों के बंटवारे में भुवनेश्वर संसदीय क्षेत्र बीजेडी के हिस्से में आएगा.
लेकिन आख़िरकार जब गठबंधन नहीं हो पाया, तो पूरा समीकरण ही बदल गया.
पार्टी को लगा अपराजिता, श्रीमयी पर भारी पड़ जाएंगी क्योंकि वे यहां की हैं नहीं.
मन्मथ को चुनावी मैदान में उतारने के पीछे पार्टी की सोच यह है कि न केवल वे भुवनेश्वर लोकसभा क्षेत्र से हैं बल्कि उसके अंदर आनेवाले जटनी विधानसभा क्षेत्र से हैं.
यहां से उनके पिता सुरेश राउतराय विधायक तो हैं ही, बल्कि वे खंडायत संप्रदाय से हैं, जिनकी संख्या इस चुनाव क्षेत्र में लगभग 25 प्रतिशत है.
पार्टी को उम्मीद है कि जटनी ही नहीं, आसपास के सभी इलाकों में मन्मथ को उनके पिता के प्रति लोगों के समर्थन का फायदा मिलेगा .
एक और अहम लोकसभा क्षेत्र कटक के बीजेडी प्रत्याशी को लेकर भी लोग हैरान हैं.
मन्मथ राउतराय की तरह यहां से प्रत्याशी बनाए गए संतृप्त मिश्र भी राजनीति में बिलकुल नए हैं और वे पिछले महीने ही आदित्य बिरला ग्रुप के मानव संसाधन (एचआर) के मुख्य के पद से इस्तीफ़ा देकर बीजेडी में शामिल हुए थे.
कटक लोकसभा क्षेत्र

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लगातार छह बार कटक लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले बीजेडी के वरिष्ठ नेता भर्तृहरि महताब ने पिछले हफ्ते ही पार्टी से इस्तीफ़ा दिया था और गुरुवार को वे भाजपा में शामिल हो गए.
ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि वे कटक से पार्टी के प्रत्याशी बनेंगे. अगर ऐसा हुआ तो संतृप्त के लिए इस दिग्गज नेता को हराकर चुनाव जीतना काफी मुश्किल होगा.
उनके लिए एक मुश्किल यह भी है कि इलेक्टोरल बॉन्ड के बारे में हाल ही में स्टेट बैंक द्वारा जारी सूचना के अनुसार आदित्य बिरला ग्रुप ने बीजेडी को सबसे अधिक चुनावी चंदा (200 करोड़ रुपये से भी अधिक) दिया और जिस समय यह चंदा दिया गया, उस समय वे आदित्य बिरला ग्रुप के वरिष्ठ पदाधिकारी थे.
भुवनेश्वर और कटक की तरह केंद्रापड़ा में बीजेडी प्रत्याशी अंशुमान महांती राजनीति में नए नहीं हैं, लेकिन वे पार्टी में नए जरूर हैं. वे पिछले महीने ही बीजेडी में शामिल हुए हैं.
अंशुमान दिवंगत बीजद नेता और केन्द्रापड़ा लोकसभा क्षेत्र में आनेवाले राजनगर विधान सभा क्षेत्र से सात बार चुने गए नलिनी कांत मोहंती के बेटे हैं, जो बीजेडी अध्यक्ष नवीन पटनायक के साथ अनबन के बाद पार्टी छोड़कर कांग्रेस में चले गए थे और कांग्रेस से विधायक बने थे.
खुद अंशुमान भी 2014 से 2019 तक राजनगर के विधायक रह चुके हैं. लेकिन 2019 के चुनाव में वे बीजेडी के ध्रुव साहू से हार गए थे. केन्द्रापड़ा को बीजेडी का गढ़ माना जाता है.
ऐसे में यह देखना बाकी है कि पार्टी के कार्यकर्ता चुनाव के ठीक पहले कांग्रेस से आए नेता के लिए पूरी निष्ठा से और एकजुट होकर काम करते हैं या नहीं.
अंशुमान का मुक़ाबला वहां से दो बार (2009 और 2014) सांसद रह चुके बैजयंत "जय" पंडा से है, जो इस समय भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं.
पंडा पिछली बार भी केन्द्रापड़ा से भाजपा के प्रत्याशी थे, लेकिन बीजेडी के प्रत्याशी और ओडिया सिनेमा के जानेमाने कलाकार अनुभव मोहंती से क़रीब डेढ़ लाख वोटों से हार गए थे .
लेकिन 2019 के मुक़ाबले इस बार स्थिति काफी अलग है क्योंकि पिछली बार यहां से जीतने वाले अनुभव मोहंती इस बार बीजेडी से किनारा कर चुके हैं. चर्चा है कि वे शीघ्र ही भाजपा में शामिल होंगे.
अरूप पटनायक के लिए हो सकती है मुश्किल

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इस तरह अंशुमान को पंडा के साथ-साथ उन्हें प्रत्याशी बनाए जाने से नाराज़ बीजेडी कार्यकर्ता और स्थानीय नेताओं के विरोध का भी सामना करना पड़ेगा, जो उनके लिए आसान नहीं होगा.
पुरी में भी चार बार सांसद रह चुके पिनाकी मिश्रा के बदले मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त अरूप पटनायक को टिकट दिए जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं.
अरूप पिछली बार भुवनेश्वर लोकसभा क्षेत्र से बीजेडी के उम्मीदवार थे और भाजपा प्रत्याशी अपराजिता षड़ंगी से 23,000 वोटों से हार गए थे.
इस बार उनका मुक़ाबला भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉक्टर सम्बित पात्रा से है, जो पिछली बार भी पुरी से लड़े थे और पिनाकी मिश्रा से केवल 11,000 वोटों से हार गए थे.
हारने के बाद भी सम्बित पात्रा ने पिछले पांच साल में पुरी से बराबर संपर्क बनाए रखा है. हालांकि पटनायक के पक्ष में एक बात यह है कि वे डेलांग से हैं, जो पुरी लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है.
चर्चा में संबलपुर

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फिर भी प्रेक्षकों का मानना है कि उनके लिए पुरी से चुनाव जीतना मुश्किल होगा क्योंकि वे पुरी के बीजेडी इकाई में चल रही गुटबाजी और दो वरिष्ठ नेता और विधायक संजय दासवर्मा और उमबल्लभ सामंतराय के बीच चल रही रस्साकशी के शिकार हो सकते हैं.
राजनीतिक गतिविधि पर पैनी नज़र रखनेवाले लोगों को सबसे अधिक आश्चर्य बीजेडी के ढेंकानाल के प्रत्याशी अविनाश सामल को लेकर है.
सामल पेशे से डॉक्टर हैं और उन्होंने हाल ही में पार्टी में योगदान किया है. उनके चयन के पीछे सबसे बड़ा कारण यह बताया जा रहा है कि वे ढेंकानाल के विधायक और जिला बीजेडी अध्यक्ष सुधीर सामल के भतीजे हैं.
अविनाश का मुक़ाबला भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व राज्यसभा सांसद रूद्र नारायण पाणी से है और इसे एक "ग़ैर बराबरी की लड़ाई" करार दिया जा रहा है.
भुवनेश्वर, कटक, केंद्रापड़ा, पुरी और ढेंकानाल में बीजद के प्रत्याशियों को लेकर आश्चर्य प्रकट जरूर किया जा रहा है.
लेकिन जिस लोकसभा क्षेत्र को लेकर सबसे अधिक चर्चा हो रही है वह है संबलपुर, जहां अध्यक्ष नवीन पटनायक और उनके सबसे चहेते वीके पांडियान के बाद बीजेडी के सबसे अधिक प्रभावशाली नेता और पार्टी के संगठन महासचिव प्रणब प्रकाश दास का मुक़ाबला राज्य बीजेपी के सबसे ताकतवर नेता तथा केंद्रीय शिक्षा और दक्षता विकास मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से है.
प्रणब जाजपुर विधानसभा क्षेत्र से तीन बार विधायक चुने गए हैं और नवीन सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं. लेकिन वे पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं और वह भी ऐसे इलाक़े से जो उनके लिए पूरी तरह से नया है.
हालांकि संबलपुर जिले के लिए पार्टी के पर्यवेक्षक (ऑब्ज़र्वर) की हैसियत से पिछले एक साल से लगातार वहां का दौरा कर रहे हैं.
वैसे प्रधान भी स्थानीय नहीं हैं. लेकिन जो बात उनके पक्ष में जाती है वह यह है कि पड़ोसी देवगढ़ के सांसद रह चुके हैं और उस समय देवगढ़ लोकसभा क्षेत्र के अंदर आनेवाले दो विधानसभा क्षेत्र - देवगढ़ और कुचिंडा - सीमा पुनर्निर्धारण (डीलिमिटेशन) के बाद अब संबलपुर लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा हैं.
यही नहीं, इस लोकसभा क्षेत्र के अंदर आनेवाले अनुगुल ज़िले के छेंडीपदा और आठमल्लिक विधानसभा क्षेत्र भी उनके अपने शहर तालचेर के पास हैं और उनके प्रभाव क्षेत्र का हिस्सा हैं.
बीजेडी के तीसरे सबसे ताक़तवर नेता प्रणब प्रकाश दास

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संबलपुर, पश्चिम ओडिशा का प्राणकेंद्र है, जहां भाजपा का जनाधार मज़बूत है. पिछली बार भाजपा को ओडिशा के जिन आठ लोकसभा क्षेत्रों में जीत मिली थी, उनमें से पांच पश्म ओडिशा में थे.
इनमें से एक संबलपुर भी था, जहां से नितेश गंगदेव सांसद चुने गए थे. पारंपरिक रूप से पूरे पश्चिम ओडिशा में तटीय ओडिशा के लोगों के ख़िलाफ़ काफ़ी नाराज़गी है क्योंकि उन्हें लगता है कि सरकार में हमेशा तटीय ओडिशा के नेताओं का बोलबाला रहता है और पश्चिम ओडिशा की उपेक्षा की जाती है.
यही कारण है कि पश्चिम ओडिशा के इलाकों को लेकर अलग "कोशल" राज्य बनाए जाने की मांग बीच-बीच में उठती रही है.
ऐसे में प्रणब प्रकाश दास, जो तटीय ओडिशा के जाजपुर ज़िले से हैं, उनके लिए यहां से चुनाव जीतना बहुत बड़ी चुनौती होगी.
इन सभी नकारात्मक मुद्दों के बावजूद बीजेडी के संबलपुर में प्रधान के ख़िलाफ़ प्रणब दास को मैदान में क्यों उतारा गया, इसको लेकर दो विपरीत तर्क सामने आ रहे हैं.
पहला, उन्हें "बली का बकरा" बनाया जा रहा है ताकि इस समय बीजेडी के सबसे प्रभावी नेता वीके पांडियान के लिए मैदान साफ हो जाए.
इस तबके का कहना है कि सभी प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद अगर प्रणब जीत भी जाते हैं, तो वे संसद जाएंगे तथा पार्टी और राज्य सरकार में (अगर बीजेडी की सरकार बनती है) उनकी कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं रह जाएगी.
लेकिन बीजेडी नेताओं का कहना है कि क्योंकि वे पार्टी के संगठन संपादक हैं और उन्होंने संबलपुर के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा है, इसलिए पार्टी के कार्यकर्ता उनके लिए पूरे दम से लड़ेंगे और वे विजयी होंगे.
उन्हें संबलपुर से टिकट देकर बीजेडी यह साबित करना चाहती है कि वह भाजपा के साथ "नूरा कुश्ती" नहीं कर रही .
लेकिन बीजेडी नेता चाहे कुछ भी कहें, ज्यादातर लोग यही मान रहे हैं कि भुवनेश्वर, कटक, केन्द्रापड़ा, ढेंकानाल और पुरी की तरह बीजेडी यहां भी "नूरा कुश्ती" ही कर रही है.
बीजेडी और बीजेपी का समीकरण

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वरिष्ठ पत्रकार और प्रमुख ओड़िया अखबार "समाज" के पूर्व संपादक कानन बिहारी दास ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा है कि, "बीजेडी का लोकसभा प्रत्याशियों का चयन बेहद रहस्यमय है. इसमें अंदरूनी समझौते का संदेह पैदा हो रहा है."
एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार और "समदृष्टि" के संपादक सुधीर पटनायक ने इससे एक क़दम आगे बढ़कर सीधे पांडियान पर निशाना साधा है.
उन्होंने कहा, "क्या पांडियान यह कह सकते हैं कि वे अपराजिता षड़ंगी, सम्बित पात्रा और धर्मेंद्र प्रधान को आसान जीत दिलाने के षड्यंत्र में शामिल नहीं हैं ?"
बीजेडी और भाजपा के बीच "नूरा कुश्ती" के आरोप 2019 में भी लगे थे.
चुनाव परिणाम आने के बाद यह आरोप और भी तेज हो गए थे जब यह पाया गया कि भाजपा को दो ऐसे लोकसभा क्षेत्रों में जीत हासिल हुई थी जिनके अंदर आनेवाले सभी विधानसभा सीटों पर बीजेडी के प्रत्याशी विजयी हुए थे.
यह दो लोकसभा क्षेत्र थे भुवनेश्वर और बरगढ़, जहां से भाजपा की वरिष्ठ नेता अपराजिता षड़ंगी और वरिष्ठ नेता सुरेश पुजारी चुने गए थे.
इस धारणा को पिछले पांच सालों में और बल मिला है क्योंकि दोनों पार्टियों और ख़ासकर उनके शीर्ष नेताओं के बीच बहुत ही अच्छे संपर्क रहे हैं.
यहाँ तक कि भाजपा प्रत्याशी और केंद्रीय रेल और आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव को बीजेडी ने दो-दो बार समर्थन देकर राज्यसभा भेजा और वह भी ऐसी स्थिति में जब उसके पास अपनी पार्टी के किसी प्रत्याशी को जिताने के लिए पर्याप्त संख्या थी.
दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं के कड़े विरोध और विधानसभा सीटों को लेकर समझौता न हो पाने के कारण बीजेडी और भाजपा में गठबंधन भले ही न पाया हो, लेकिन लोकसभा के लिए बीजेडी के प्रत्याशी चयन से "अनौपचारिक गठबंधन" के संकेत मिलते हैं.
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