किसान आंदोलन पर बिहार, ओडिशा, केरल के किसानों ने क्या कहा?

किसान का प्रदर्शन

इमेज स्रोत, Sonu Mehta/Hindustan Times via Getty Images

पंजाब के किसानों के साथ-साथ कई दूसरे राज्यों के किसान भी केंद्र सरकार के पास किये गए कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं. कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन तो कई महीनों से चल रहा है लेकिन पिछले महीने 26 तारीख़ को पंजाब के किसान दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर पहुंच गए और वहीं धरना देकर बैठ गए.

क़ानून रद्द करने की माँग के अलावा किसानों की तीन और माँगें हैं. विरोध कर रहे किसान दिल्ली की सीमा पर बीते 13 दिनों से डटे हुए हैं. इस दौरान केंद्र सरकार के साथ उनकी पाँच दौर की बातचीत भी हुई लेकिन किसी भी मुलाक़ात से अब तक कोई नतीजा नहीं निकल सका है.

मंगलवार यानी आज आठ दिसंबर को किसानों ने देशव्यापी भारत बंद बुलाया था. जिसका लगभग सभी विपक्षी राजनीतिक पार्टियों ने समर्थन किया है.

इस प्रदर्शन को सिर्फ़ पंजाब नहीं बल्कि देश के लगभग सभी राज्यों के किसानों का भी समर्थन मिल रहा है.

किसान का प्रदर्शन

इमेज स्रोत, HINDUSTAN TIMES

कैसे होता है आकलन

कृषि मंत्रालय सभी राज्यों में कृषि पर लागत का अध्ययन करवाती है. इस अध्ययन से मालूम होता है कि किसी राज्य में किसी फ़सल को उगाने पर लागत कितनी आती है. इसका आकलन केंद्रीय कृषि मंत्रालय के तहत आने वाली कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) करती है.

लागत और अन्य सेक्टर को ध्यान में रखते हुए, कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) ही भारत सरकार को अपनी सिफ़ारिश देता है कि किसी फ़सल का न्यूनतम समर्थन मूल्य कितना होना चाहिए.

कोशिश ये होती है कि 70 फ़ीसद उत्पादन को न्यूनतम समर्थन मूल्य कवर कर ले. फिर भी कुछ राज्य ऐसे रह जाते हैं जहाँ फ़सल पर लागत समर्थन मूल्य से ज़्यादा होती है. राज्य की कृषि पर लागत को सीएसीपी ध्यान में रखता है.

वैसे तो राज्य सरकारों को यह अधिकार नहीं है कि वो अलग से न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करें. लेकिन कई राज्य अलग से आकलन करते हैं और इसके आधार पर स्टेट एडवाइज्ड प्राइस (एसएपी) या राज्य परामर्श मूल्य तय करते हैं.

ऐसे ही कुछ राज्य जिनका न्यूनतम समर्थन मूल्य से सीधा सरोकार नहीं है और जो राज्य परामर्श मूल्य पर किसानों से उनकी फ़सल ख़रीदते हैं वहां के किसान और इसके संघ दिल्ली में चल रहे इन प्रदर्शनों के बारे में क्या कहते हैं? चलिए जानते हैं.

किसान

इमेज स्रोत, Seetu Tewari

बिहारः "बिचौलिये ज़्यादा हावी हो गए हैं, बहुत कम रेट पर किसान धान बेचने को मजबूर हैं"

सीटू तिवारी, पटना से बीबीसी हिंदी के लिए

बिहार में साल 2006 में नीतीश सरकार ने एपीएमसी एक्ट (एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमिटी) ख़त्म कर दिया था. ऐसा करने वाला बिहार देश का पहला राज्य था. एपीएमसी एक्ट ख़त्म होने के बाद सरकार पैक्स (प्राथमिक कृषि साख एवं सहयोग समिति) और व्यापार मंडल के ज़रिए अनाज की ख़रीदारी करती है.

2017 तक के आंकड़ों के मुताबिक़, राज्य में 8463 पैक्स और 521 व्यापार मंडल है, जो ये ख़रीदारी करते हैं. हर साल सरकार नवंबर मध्य में किसानों से धान की सरकारी ख़रीद का आदेश निकालती है. पैक्स और व्यापार मंडलों को धान की सरकारी ख़रीदारी का लक्ष्य दिया जाता है जो इस वर्ष 45 लाख मीट्रिक टन है.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कुछ समय पहले ही कहा था कि एपीएमसी एक्ट के ख़त्म होने से बिहार के किसानों को लाभ पहुंचा है. उनके इस दावे को तथ्यों के आंकड़े में देखे तो कृषि गणना 2015 -16 के मुताबिक़, बिहार में औसत जोत का आकार महज़ 0.39 हेक्टेयर है. 2018 -19 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, बिहार में लगभग 91.2 फ़ीसद कृषक परिवार सीमांत है जिनके पास एक हेक्टेयर से भी कम जोत है.

किसान

इमेज स्रोत, Seetu Tewari

ज़ाहिर तौर पर ये सीमांत किसान 'सरप्लस प्रोड्यूसर' नहीं है. ऐसे में किसानों की इस आबादी पर एपीएमसी एक्ट के ख़त्म होने का असर न के बराबर है. वहीं अगर सरप्लस प्रोड्यूसर यानी ऐसे किसान जो फसल बेचते है उनकी बात करें तो वो वर्तमान व्यवस्था पर उनकी मिली-जुली प्रतिक्रिया है.

जहानाबाद ज़िले के मोरबिगहा गांव के पवन कुमार बताते हैं, "पैक्स से शुरुआती दौर में तो फ़ायदा था लेकिन अब पैक्स की स्थिति नाजुक है. न तो वो अब सारे किसानों के धान की ख़रीद करती है और न ही पैसा वक्त पर दे रही है. सरकार इसकी भी स्थिति डांवाडोल बनाए हुए है. बिचौलिये तो अब पहले से ज़्यादा हावी हो गए हैं. मंडी रही नहीं तो बहुत कम रेट पर किसान धान बेचने को मजबूर हैं."

पैक्स के साथ एक परेशानी यह भी है कि उसके पास धान की सरकारी ख़रीद का लक्ष्य है जिससे आगे जाकर वो धान नहीं ख़रीद सकती. जिसके चलते किसानों को अगली फ़सल की बुवाई के संसाधन जुटाने के लिए और किसी अन्य मार्केट की अनुपलब्धता के चलते बिचौलियों को औने पौने दाम पर अपना धान बेचना पड़ता है.

कैमूर के विकास कुमार बताते हैं, "इस बार धान 1100 रुपये प्रति क्विंटल बेच रहे हैं. पैक्स ने अब तक धान ख़रीदना ही शुरू नहीं किया है. हम अगली फ़सल लगाने का पैसा कहां से लाएंगे."

किसान

इमेज स्रोत, Seetu Tewari

हालाँकि कुछ किसान इस व्यवस्था से खुश भी हैं. पटना ज़िले के किसान परशुराम प्रजापति कहते हैं, "पैक्स वाला सही है. पहले व्यापारी बहुत कम रेट देता था अभी सरकार के दाम तय करने से ठीक हो गया है."

वहीं किसान विष्णुपद सिंह पैक्स से तो नाखुश हैं लेकिन व्यापार मंडल के कामकाज से खुश हैं. उन्होने बीबीसी हिंदी से कहा, "पैक्स में धान देते थे तो पैसे मिलने में दिक्कत होती थी लेकिन व्यापार मंडल में देते हैं तो पन्द्रह दिन बीतते ही पैसा आ जाता है."

अर्थशास्त्री नवल किशोर चौधरी कहते हैं, "बिहार में किसानों की हालत ख़राब है लेकिन इसकी वजह सिर्फ़ मंडी व्यवस्था का ख़त्म हो जाना ही नहीं है. बिहार में अधिकतर किसान सीमांत है और यहां तकनीक, सिंचाई की व्यवस्था, भूमि का अधिकार कई ऐसे कारक हैं जिसका इस बड़ी आबादी के किसानों के साथ सीधा रिश्ता है. इसलिए राज्य में किसानी पर बात करते वक्त इन सारे कारकों पर भी बात होनी चाहिए, उसे सिर्फ़ मंडी तक ही सीमित मत कर दीजिए."

किसान

इमेज स्रोत, imran qureshi

केरलः "न तो मंडी सिस्टम है और न ही कोई एपीएमसी यार्ड"

इमरान क़ुरैशी, दक्षिण भारत से बीबीसी हिंदी के लिए

केरल में राज्य सरकार सीधे किसानों से तय न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खाद्यान्न (मोटे तौर पर धान) की ख़रीदारी करती है.

यहाँ किसानों को केंद्र से तय की गई कीमतों से अधिक एमएसपी मिलता है. यहाँ किसान को भारतीय खाद्य निगम (फूड कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया) को अपनी फसल बेचने की छूट है लेकिन अधिकांश खाद्यान्न राज्य खाद्य और नागरिक आपूर्ति निगम को ही बेचे जाते हैं.

किसान

इमेज स्रोत, imran qureshi

भारतीय किसान आंदोलन (InFaM) के पीसी साइरिएक ने बीबीसी हिंदी से कहा, "केरल में न तो मंडी सिस्टम है और न ही कोई एपीएमसी यार्ड है. ऐसा इसलिए क्योंकि यह एक उपभोक्ता राज्य है. यहाँ चावल उत्पादन भी इसकी आवश्यकतों की केवल 20 प्रतिशत को ही पूरा करता है."

भारतीय किसान आंदोलन, केरल का एकमात्र स्वतंत्र किसान संघ है. वैसे केरल में रबर, मसाले, कॉफ़ी और चाय की पैदावार का देश के बाकी हिस्सों की तरह ही निगमीकरण किया गया है.

किसानों का प्रदर्शन

इमेज स्रोत, Sandeep Sahu

ओडिशाः "एक क्विंटल धान पर कटनी-छंटनी के नाम पर पाँच किलो काट लिया जाता है"

संदीप साहू, भुवनेश्वर से बीबीसी हिंदी के लिए

देश के अन्य राज्यों की तरह ओडिशा में भी किसानों के समर्थन में मंगलवार को प्रदर्शन किए गए. पश्चिम ओडिशा में बंद का विशेष रूप से असर रहा.

राजधानी भुवनेश्वर में "नव निर्माण कृषक संगठन" ने इन प्रदर्शनों को आयोजित किया है.

इसमें हिस्सा ले रहे जगतसिंहपुर के 70 वर्षीय किसान सुरेन्द्र महारणा कहते हैं, "मोदी सरकार के ये तीन नए क़ानून किसानों का सर्वनाश कर देंगे. अंग्रेज़ों के शासनकाल में जिस तरह ईस्ट इंडिया कंपनी ने स्थानीय कंपनियों की छुट्टी कर दी थी, उसी तरह बड़े बड़े कॉर्पोरेट कृषि के क्षेत्र को पूरी तरह से अपने कब्जे में ले लेंगे और किसानों को बर्बाद कर देंगे."

वैसे ओडिशा के कई इलाकों में किसान राज्य सरकार की धान ख़रीदने की नीति के ख़िलाफ़ पिछले कई दिनों से प्रदर्शन कर रहे हैं. उनका आरोप है कि सरकार के ज़रिए धान की ख़रीदारी के लिए दो साल पहले शुरू किया गया टोकन सिस्टम उनके लिए सिरदर्द बन गया है.

संबलपुर में हुए प्रदर्शन में शामिल किसान बीरेंद्र प्रधान कहते हैं, "यह व्यवस्था किसान विरोधी है. जिनके पास बेचने के लिए धान है उन्हें टोकन नहीं मिल रहा है और जिनके पास टोकन है, उनके पास धान नहीं है. धान का संग्रह स्थानीय स्तर पर होना चाहिए, राज्य स्तर पर नहीं."

किसान कहते हैं कि वे अपनी धान लेकर मंडियों में आते हैं. लेकिन टोकन न होने पर उनकी धान ख़रीदी नहीं जाती, जिसके कारण उन्हें न्यूनतम सहायक दर से कम दाम में अपना धान बेचना पड़ता है. ऐसे में दलालों ने पूरे बाज़ार पर कब्ज़ा कर लिया है.

वो कहते हैं कि धान की गुणवत्ता का हवाला देकर हर क्विंटल धान में "कटनी छंटनी" के नाम पर चार पाँच किलो तक काट लिया जाता है.

इसे दूसरे शब्दों में कहें तो किसान बेचता तो एक क्विंटल धान है, लेकिन उसे पैसे केवल 95-96 किलो के ही मिलते हैं.

किसान

इमेज स्रोत, Sandeep Sahu

लेकिन पश्चिम ओडिशा कृषिजीवि संघ के संयोजक जगदीश प्रधान मानते हैं कि टोकन व्यवस्था में कोई ख़राबी नहीं है.

उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा, "मैं मानता हूं कि कुछ जगहों पर कुछ समस्याएं हैं. लेकिन ये समस्याएं ऐसी नहीं हैं जिसका समाधान न हो सके. जहां भी कोई समस्या आई है, दो-चार दिन में ही उसका समाधान हो रहा है. टोकन व्यवस्था में धान की ख़रीदारी में स्वच्छता आई है और दलालों का दुष्प्रभाव काफी कम हुआ है."

किसानों की नाराज़गी की एक अन्य बड़ी वजह है सरकार की ओर से ज़मीन की श्रेणी के अनुसार ख़रीदे जानेवाले धान के परिमाण का अधिकतम सीमा निर्धारण भी है.

पश्चिम ओडिशा कृषक संगठन समन्वय समिति के संयोजक अशोक प्रधान कहते हैं, "राज्य सरकार ने सिंचाई की सुविधा वाली ज़मीन के लिए ख़रीदे जानेवाले धान की अधिकतम सीमा 19 क्विंटल प्रति एकड़ तय किया है. लेकिन इस साल कोरोना के बावजूद किसानों ने अथक मेहनत कर प्रति एकड़ 27-28 क्विंटल धान उगाया है. ऐसे में बाकी का धान वो कहाँ, कैसे, किसे और किस भाव में बेचेगा?"

जगदीश प्रधान का मानना है कि ओडिशा में किसानों की समस्या तब तक दूर नहीं होगी जब तक वे धान के खेती छोड़कर अन्य चीजें नहीं उगाएंगे.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)