विस्थापन के साए में क्यों हैं जगन्नाथ पुरी के लोग

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- Author, संदीप साहू
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, ओडिशा के पुरी से
विश्वविख्यात जगन्नाथ मंदिर के लिए जाने जाने वाले शहर पुरी में इस समय कोहराम मचा हुआ है. जगन्नाथ मंदिर के सामने जहाँ आमतौर पर हर दिन हज़ारों श्रद्धालुओं का कोलाहल सुनाई देता है वहां अब बुलडोज़रों की गड़गड़ाहट गूंज रही है.
इस साल 19 अगस्त से ज़िला प्रशासन ने मंदिर की 75 मीटर की परिधि में मौजूद सभी घरों, दुकानों और मठों को तोड़ना शुरू किया. तभी से इस पूरे इलाक़े में खलबली मची हुई है.
प्रशासन और राज्य सरकार की ओर से कहा गया है कि मंदिर और वहाँ आनेवाले लाखों दर्शनार्थियों की सुरक्षा के लिए यह ज़रुरी क़दम है. प्रशासन का कहना है कि मंदिर के संस्कार के लिए बनी जस्टिस बीपी दास कमिशन की रिपोर्ट के आधार पर यह निर्णय लिया गया है.
लेकिन जिन लोगों को इस कारण अपना घर, बसेरा या दुकान छोड़ना पड़ रहा है, वो प्रशासन की इस दलील से संतुष्ट नहीं हैं.
पुरी के गोवर्धन पीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चालानन्द सरस्वती धार्मिक मामलों में सरकार की दख़लअंदाज़ी की आलोचना करते हैं.
वो कहते हैं, "सेकुलर संविधान या सेकुलर तंत्र का हस्तक्षेप ऐसे पवित्र स्थान के लिए उचित नहीं है. बल्कि शासनतंत्र का यह दायित्व बनता है कि धार्मिक, आध्यात्मिक विधा के पोषक और सहभागी घटक के रूप में वो ख़ुद को प्रस्तुत करें."

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मंदिर के इतिहास और परम्पराओं से जुड़े सदियों पुराने मठों को तोड़े जाने को लेकर केवल मठों के कार्यकर्ताओं ही नहीं, बल्कि जगन्नाथ संस्कृति के जानकार भी बेहद नाराज़ हैं.
नौ सौ साल पुराना एमार मठ, लन्गुली मठ और बड़ अखाडा मठ पूरी तरह गिराए जा चुके हैं जबकि 18 अन्य छोटे बड़े मठ अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं. इनमें गुरु नानक के दौर में बनाया गया मंगू मठ भी शामिल है, जिसका सिख पंथ से काफ़ी गहरा रिश्ता रहा है.
पंजाब के मुख्यमंत्री कप्तान अमरिंदर सिंह ने हाल ही में ट्वीट के ज़रिए ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से इस मामले में हस्तक्षेप कर मठ को बचाने की अपील की थी .
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इसके उत्तर में पुरी से विधायक पिनाकी मिश्रा ने एक तस्वीर ट्वीट कर लिखा, "मैं आपको से बताना चाहती हूं कि पवित्र मठ को छुआ भी नहीं जाएगा. जैसा तस्वीर में दिख रहा है केवल व्यवसायिक ढांचों को ही तोड़ा जा रहा है. आपको ग़लत सूत्रों से जानकारी मिल रही है."
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कटकी मठ के महंत विजय रामानुज दास अपने दर्द को इस तरह बयाँ करते हैं, "जगन्नाथ मंदिर अगर बरगद का पेड़ है तो मठ इससे निकली इसकी जटाएं (जड़ें) हैं. जब मठ ही नहीं रहेंगे, तो मंदिर की क्या अहमियत रह जाएगी?"
छोटा छाता मठ के महंत रामभूषण दास को यह समझ में नहीं आ रहा कि उनका मठ कब और कैसे मंदिर की सुरक्षा के लिए ख़तरा बन गया.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "यहाँ केवल वेदपाठ की शिक्षा प्राप्त कर रहे बच्चे रहते हैं. यहाँ न तो कोई लॉज चलता है न ही कोई दुकान है. तो मठ कैसे मंदिर की सुरक्षा में बाधक बन सकता है?"

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लेकिन पुरी के कलक्टर बलवंत सिंह इन दलीलों से सहमत नहीं हैं कि मठों को तोड़ने से मंदिर की धार्मिक और अध्यात्मिक धरोहर के साथ कोई खिलवाड़ हुआ है.
वो कहते हैं, "आप ख़ुद जाकर देख सकते हैं कि हमने किसी भी मठ के उपासना पीठ को नहीं गिराया, उन्हें ज्यों का त्यों रहने दिया है ताकि पूजापाठ में कोई बाधा न हो. हमने केवल उन्हीं ढांचों को तोड़ा है जो असुरक्षित थे या जिनका व्यावसायिक रूप से इस्तेमाल हो रहा था. मठों की अन्य गतिविधियों के लिए हम सुरक्षा ज़ोन के बाहर उन्हें जगह देंगे और हर तरह से मदद करेंगे."

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कलक्टर सिंह के इस दलील को झुठलाया नहीं जा सकता कि मंदिर के बाहर का इलाका काफी संकरा था, जिसके कारण रथ यात्रा और अन्य विशेष अवसरों पर भीड़ पर नियंत्रण पाना मुश्किल होता है.
रथ यात्रा, सुना वेष और नागार्जुन वेष जैसे अवसरों पर लाखों की तादाद में श्रद्धालु मंदिर के आसपास इकठ्ठा होते हैं और कई बार भगदड़ में लोगों की जानें भी चली जातीं हैं.
मंदिर के संस्कार के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एमिकस क्यूरी रंजित सिन्हा, ने हाल ही में पुरी का दौरा किया. उन्होंने भी 27 साल बाद अगले वर्ष होने वाले नागार्जुन वेष का हवाला देते हुए प्रशासन के कदम को सही ठहराया है.
अनुमान है कि इस अवसर पर क़रीब 15 लाख लोग पुरी में इकठ्ठा होंगे. ग़ौरतलब है कि नवम्बर, 1993 में हुए पिछले नागार्जुन वेष के दौरान भगदड़ में 6 लोगों की मौत हो गई थी.

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मंदिर के आसपास के इलाक़े में चल रहे तोड़फोड़ को लेकर आम लोगों में भी अलग-अलग राय है. पुरी में रहने वाले सामजिक कार्यकर्ता देवाशीष मिश्र इसका विरोध करते हैं.
वो कहते हैं, "सरकार पुरी को एक पर्यटन शहर बनाने पर तुली हुई है. लेकिन वह भूल रही है कि पुरी भारत के चार धामों में एक है और हिन्दुओं के सबसे पावन स्थलों में से एक है. ईश्वर जगन्नाथ मंदिर में रहते हैं और साधू मठों में रहते हैं. यही साधू ईश्वर से हमारा परिचय कराते हैं. जब मठ ही नहीं रहेंगे, साधू ही नहीं रहेंगे, तो मंदिर का परिचय भी धीरे-धीरे खो जाएगा."
लेकिन भुवनेश्वर से पुरी आई सुधा महान्ति इस मुद्दे पर बिलकुल अलग राय रखतीं हैं. वे कहतीं हैं, "हम लोग जगन्नाथ जी का दर्शन करने यहाँ आते हैं, मठों के दर्शन करने के लिए नहीं. मैं प्रशासन के इस क़दम से ख़ुश हूँ क्योंकि अब मंदिर के सामनेवाला हिस्सा काफ़ी खुला-खुला है, जिससे श्रद्धालुओं को दर्शन करने में सहूलियत होती है."

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मामले के तूल पकड़ने के बाद राज्य सरकार ने ख़ाली किए जा रहे स्थान के लिए बनी योजना का ब्लूप्रिंट मीडिया के ज़रिये लोगों के सामने रखा और कई लोगों ने इसे सराहा भी है.
लोगों का आरोप है कि प्रशासन द्वारा चलाए जा रहे अभियान में मठों के अलावा मंदिर के चारों ओर भी सदियों से बसे लोगों और दुकानदारों को खदेड़ा जा रहा है.
बीबीसी से बात करते हुए मंदिर के उत्तर द्वार के निकट रहनेवाली 70 साल की शान्तिलता की आंखे भर आईं. रूंधी हुई आवाज़ में उन्होंने कहा, "हर रोज़ मेरी सुबह घर के आँगन से मंदिर की चोटी पर फहरा रहे 'बाना' (झंडा) के दर्शन से शुरू होती थी. सोचा था कि ज़िन्दगी के ये आख़िरी दिन भी प्रभु के दर्शन करते हुए गुज़र जाएंगे. लेकिन अब उन्हें कहाँ देख पाऊंगी?"

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मंदिर के कुछ ही फ़ीट दूरी पर बसे सुरेन्द्रनाथ महापात्र को अपना घर और दुकान दोनों ही गवांने पड़ रहे हैं. वो कहते हैं, "हम प्रभु जगन्नाथ के सेवक हैं और रथ यात्रा के दौरान "सेनापटा" सेवा प्रदान करते हैं, जिसके बिना प्रभु रथ पर सवार नहीं होते. वर्ष तमाम हम यहां आने वालों को अलग-अलग सेवाएँ देते हैं. हम सात भाई हैं और चालीस लोगों का हमारा परिवार है. बच्चे यह सोच कर बिलख-बिलख कर रो रहें हैं कि हमें यहाँ से निकाल दिया गया तो हम कहाँ जाएंगे."
नाराज़ महापात्र जगन्नाथ जी की 'सेवा' बंद करने की धमकी भी दे डालते हैं .

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मंदिर के मेघनाद प्राचीर के पास खाजा का व्यापार कर रहे प्रफुल्ल महापात्र से मैंने पूछा कि जब प्रशासन उन्हें जगन्नाथ बल्लभ मठ में बसाने का वादा कर रही है, तो उन्हें यहां से हटने पर आपत्ति क्यों है? उनका उत्तर था, "मंदिर के पास हैं इसलिए लोग हमसे खाजा ख़रीदते हैं. इसी से हमारे परिवार का गुज़ारा होता है. मंदिर से दूर खाजा ख़रीदने कौन जाएगा?"
कलक्टर बलवंत सिंह भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि पुरखों से मंदिर के आसपास रहने और रोज़ी-रोटी कमाने वाले लोगों के लिए मंदिर से दूर जाकर बसना काफ़ी पीड़ादायक है.
वो कहते हैं, "मैं मानता हूँ कि ऐसे लोगों के लिए यह आसान नहीं होगा. 1-2 साल के लिए उन्हें दर्द होगा. लेकिन उनका यह दर्द और त्याग एक महान कार्य के लिए होगा. पुरी चार धामों में से एक है और इसकी गरिमा बनाए रखने के लिए तथा मंदिर और दर्शनार्थियों की सुरक्षा के लिए यह क़दम उठाना ज़रुरी था. उनके इस त्याग को पूरा राज्य सदियों तक याद रखेगा."
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