ओडिशाः सिर्फ़ ‘ब्राह्मणों के लिए श्मशान’ के द्वार सभी के लिए कैसे खुले? -ग्राउंड रिपोर्ट

विवादित श्मशान का द्वार.

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    • Author, संदीप साहू
    • पदनाम, केन्द्रापड़ा (ओडिशा) से, बीबीसी हिंदी के लिए

ओडिशा के केन्द्रापड़ा शहर में केवल ब्राह्मणों के लिए चलाए जा रहे एक अलग श्मशान स्थल को लेकर विवाद उठने के बाद नगर प्रशासन ने इसे सभी वर्गों के लिए खोल दिया है.

साल 1928 में इस श्मशान को 'केवल ब्राह्मणों' के लिए स्थापित किया गया था. अब इसे क़ानून और संविधान के ख़िलाफ़ पाया गया है.

क़ानूनी जानकारों के अनुसार, यह संविधान की धारा 14, 19 और 21 का उल्लंघन करता है, जो धर्म या जाति के आधार पर किसी भी तरह के भेदभाव को गैर क़ानूनी ठहराते हैं.

लेकिन इसके बावजूद ओडिशा की सबसे पुरानी नगर पालिका (सन 1869 में स्थापित) की देखरेख में इतने दिनों तक यह श्मशान कैसे चलता रहा, इसका जवाब किसी के पास नहीं है.

श्मशान के प्रवेश पथ पर लिखे गए "ब्राह्मण श्मशान" को मिटा कर अब उसके स्थान पर "स्वर्गद्वार" लिख दिया गया है.

इसके बाद नगर पालिका की और से यह घोषणा कर दी गई है कि अब सभी जातियों के लोग अपने मृत परिजनों का दाह संस्कार यहां कर सकते हैं.

लेकिन आनन फानन में लिखावट बदले जाने के दो दिन बाद भी पहले से लिखे गए "ब्राह्मण" शब्द का फीका स्वरूप देखा जा सकता है.

विवादित श्मशान

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अंदर चारों तरफ घास उगी हुई है. ऐसा लगता नहीं है कि पिछले कई हफ्तों में यहां किसी का भी दाह संस्कार हुआ हो.

केंद्रपड़ा नगर पालिका के कार्यकारी अधिकारी प्रफुल्ल कुमार बिश्वाल ने बीबीसी से कहा कि यहां अन्य जाति के लोगों का संस्कार भी होता रहा है.

लेकिन बीबीसी की अपनी पड़ताल में इस बात की पुष्टि नहीं हो पाई.

हां, इतना ज़रूर पता चला कि दो साल पहले कश्मीर में एक हमले में मारे गए शहर के एक नौजवान की अंत्येष्टि यहां होने वाली थी.

लेकिन मृतक नौजवान को सेना की ओर से दिए जाने वाले सम्मान के लिए यह जगह छोटी पड़ रही थी, इसलिए आख़िरकार उनका दाह संस्कार शहर के दूसरे श्मशान में संपन्न हुआ.

कैसे उठा विवाद?

दलित नेता नागेंद्र जेना

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शहर के हज़ारीबगीचा इलाक़े में 'ब्राह्मणों के लिए बने' इस प्राचीन दाह संस्कार स्थल को लेकर किसी ने पहले उंगली नहीं उठाई थी.

मामला तब सामने आया जब हाल ही में दलित नेता और ओडिशा दलित समाज की केंद्रापड़ा इकाई के अध्यक्ष नगेंद्र जेना ने इसे गैर संवैधानिक और गैर क़ानूनी बताते हुए आपत्ति दर्ज की.

साथ ही उन्होंने इसे सभी वर्गों के लिए खोलने के लिए ज़िला प्रशासन को एक अर्जी दी और "टाइम्स ऑफ इंडिया" में इस बारे में एक रिपोर्ट छपी.

यहां दूसरी जाति के लोगों की अंत्येष्टि होने के दावे को सरासर ग़लत बताते हुए जेना ने बीबीसी से कहा, "जब स्पष्ट शब्दों में लिखा गया है कि यह श्मशान केवल ब्राह्मणों के लिए है, तो दूसरे जातियों के लोग यहां कैसे आ सकते हैं? वे तो पहले से डरे हुए हैं."

यह पूछे जाने पर कि वे अब क्यों यह मुद्दा उठा रहे हैं जबकि यह श्मशान काफ़ी पहले से है, उनका कहना था कि पहले यहां "ब्राह्मण श्मशान" नहीं लिखा गया था.

हालांकि शहर के लोग कहते हैं कि यह साइन बोर्ड काफी पहले से है.

नगरपालिका ने फ़ंड जारी किया...

वरिष्ठ वकील बिनोद बिहारी नायक

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स्थानीय पत्रकार आशीष सेनापति की "टाइम्स ऑफ इंडिया" में छपी रिपोर्ट के बाद यह मामला सामने आया.

वो कहते हैं, "इतने सालों तक यहां केवल ब्राह्मणों के लिए एक श्मशान चलता रहा, इससे भी अचरज की बात यह है कि स्थानीय विधायक ने नगरपालिका के जरिए इस "ब्राह्मण श्मशान" के दीवार के निर्माण के लिए डेढ़ लाख रुपए भी मंजूर किए."

शहर के ब्राह्मण समाज के बुज़ुर्गों का कहना है कि काफ़ी साल पहले एक ब्राह्मण आदमी ने इस श्मशान के लिए अपनी ज़मीन दान में दी थी. उन्हीं की इच्छा के अनुसार अब तक इस ज़मीन का इस्तेमाल ब्राह्मणों के दाह संस्कार के लिए होता रहा.

लेकिन केन्द्रापड़ा के वरिष्ठ वकील बिनोद बिहारी नायक कहते हैं कि ज़मीन किसी की भी हो लेकिन एक बार जब वह नगरपालिका के अधीन आ गई तब उस पर किसी भी जाति या संप्रदाय की संप्रभुता ख़त्म हो जाती है.

उन्होंने इस संदर्भ में 26 अगस्त, 2019 को मद्रास हाई कोर्ट के एक फैसले का हवाला दिया, जिसमें कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को एक गांव में दलितों के लिए अलग दाह स्थल बनाने के लिए फटकार लगाई थी.

ब्राह्मणों की अंत्येष्टि के लिए अलग दाह स्थल

केंद्रपड़ा नगर पालिका के एक्ज़ीक्यूटिव ऑफिसर प्रफुल्ल कुमार बिश्वाल

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एक्ज़ीक्यूटिव ऑफिसर बिश्वाल ने बीबीसी से कहा कि इस श्मशान को सार्वजनिक कर दिए जाने को लेकर ब्राह्मण समाज की ओर से कोई प्रतिरोध नहीं हुआ.

उन्होंने कहा, "मुझे पूरा विश्वास है कि आगे चलकर सभी जाति और वर्ग के लोग इस दाह स्थल का निर्विरोध इस्तेमाल करेंगे."

केंद्रापड़ा कॉलेज के सेवानिवृत अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद त्रिपाठी, जो खुद ब्राह्मण हैं, भी मानते हैं कि ब्राह्मण इस क़दम का विरोध नहीं करेंगे.

केन्द्रापड़ा में सिर्फ ब्राह्मणों के लिए बने इस दाह स्थल के द्वार अब भले ही सभी जातियों के लोगों के लिए खोल दिए गए हों लेकिन ज़िले के ग्रामीण इलाक़ों में अभी भी कई स्थानों में ब्राह्मणों की अंत्येष्टि के लिए अलग दाह स्थल हैं.

केंद्रापड़ा के इतिहास लिखने वाले स्थानीय लेखक और शोधकर्ता निरंजन मेकाप कहते हैं, "मेरा अपना गांव एक "ब्राह्मण शासन" (केवल ब्राह्मणों का गांव) है और वहां ब्राह्मणों के लिए अलग दाह स्थल है."

उनके अनुसार, "ऐसे ही देपुर, गरेई, गोपीनाथपुर आदि आसपास के जितने भी "ब्राह्मण शासन" हैं, सभी में ब्राह्मणों के दाह संस्कार के लिए अलग स्थान हैं. हालांकि इसका यह अर्थ नहीं है कि ब्राह्मण लोगों को सार्वजनिक श्मशानों में जलाया नहीं जाता है."

देश में संविधान लागू होने के 73 साल बाद आज भी ऐसी प्रथा जारी है, यह दर्शाता है कि संविधान में सभी धर्म, जाति और वर्ग के लोगों को समान अधिकार देने के सफर में अभी कितना रास्ता तय करना बाकी है.

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